मृत्यु का क्षण // करण सिंह राजपुरोहित

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|| जीवन दर्शन से ||

➡ करण सिंह राजपुरोहित

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मृत्यु का क्षण

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मृत्यु का क्षण बहुत ही नाज़ुक है। इसका नाम सुनते मनुष्य डर सा जाता है। यद्यपि सभी जानते हैं कि मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है तथापि मनुष्य को मृत्यु के नाम डर क्यों लगता है, यह सामान्य समझ के परे है। गीता दर्शन कहता है कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। सनातन मत में वर्णित कुछ अमर पात्रों की अवधारणा, गीता दर्शन को समझने के विशिष्ट आवश्यकता पर बल देती है। अमर पात्रों की सत्यता पर संदेह व्यक्त नहीं करते हुए, हम कह सकते हैं कि उनकी सार्वजनिक उपस्थिति एवं भूमिका नगण्य है। इसलिए उनके होने या न होने की उपादेयता शून्य ही है। इस बात को अधिक महत्व नहीं देते हुए मृत्यु को शाश्वत सत्य मानकर ही मृत्यु के क्षण का अवलोकन करना अधिक प्रासंगिक है।

मृत्यु के बाद क्या होता है? यह सामान्य समझ से परे की बात है। मृत्यु के बाद की अवस्था पर दार्शनिकों में मतभेद है। इसको समझने के लिए उच्च आध्यात्मिक समझ एवं सर्वज्ञ बुद्धि की आवश्यकता है। सांसारिक मनुष्य इस प्रकार की समझ को नहीं रखता है। मनुष्य की जीवन यात्रा का एक महत्वपूर्ण अंग जन्म से मृत्यु तक है। जन्म से पूर्व का एवं मृत्यु के पश्चात का अध्याय विश्वास एवं एक विशिष्ट विज्ञान पर आधारित है। जो गहन अनुसंधान का विषय है। मनुष्य की जीवन यात्रा का दृष्ट दृश्य जन्म से मृत्यु तक है, जिसमें जन्म प्रथम एवं मृत्यु अन्तिम क्षण है।

मृत्यु के अन्तिम क्षण का अनुभव जिसने किया है, वही इसका सही सही उल्लेख कर सकता है। मृत्यु के इस क्षण का अनुभव करने वाला अपनी कहानी बताने के लिए नहीं रहता है। मृत्यु का गवाह चिकित्सक मृत्यु का वैज्ञानिक कारण बता सकता है लेकिन उस क्षण का अनुभव तो उसके लिए भी एक दुष्कर कार्य है। परमपिता इस पल का सटीक वर्णन कर सकते है, लेकिन यह विषय विश्वास एवं आस्था पर टिका है। इसलिए मृत्यु की अन्तिम अवस्था का अवलोकन कर ही मृत्यु के अन्तिम क्षण का अनुमान लगाया जा सकता है।

मैंने अपने जीवन में तीन मृत्यु के अन्तिम क्षणों को देखा है। मेरे माताजी, पिताजी एवं ससुरजी की मृत्यु को नजदीक से देखने का अवसर मिला। उस पल का वर्णन नहीं किया जा सकता है लेकिन मैंने जो महसूस किया उसे अवश्य शब्दों में पिरोने का प्रयत्न कर सकता हूँ। इस क्षण को हम सभी को देखना है। उस पल में हमारी क्या स्थिति रहेगी? यह संयोग एवं भाग्य का विषय है। आध्यात्मिक पुरुषों के मुख से सुना है जीवन भर के कर्म का अभुक्त कर्मफल अन्तिम पल में व्यक्ति के अभुक्त संस्कार के स्मृति पटल पर रहते हैं। जीवन के अनुभव से ज्ञात हुआ है कि परिजन मृतक को अन्तिम पल प्रभु को स्मरण करवाने का प्रयत्न करते हैं। वह कर पाता है अथवा नहीं यह उसके संस्कारों पर निर्भर करता है। मैं मृत्यु के इन तीन क्षणों को पाठक के समक्ष रखकर उनसे मूल्यांकन करवाता हूँ कि जीवन दर्शन क्या है?

मेरे माताजी की मृत्यु 27 दिसंबर 2008 को मेरे बड़े भाई साहब के निवास स्थान पर हुई। वह मृत्यु का क्षण देखने का मेरा पहला अवसर था। मेरी माताजी को लकवा मार गया था। उनका इलाज विशेषज्ञ के द्वारा करवाया गया लेकिन माताजी ने जीने की इच्छा ही छोड़ दी थी इसलिए विशेषज्ञों के अथक परिश्रम के बावजूद ठीक होने के बाद भी नहीं रही। माताजी को लकवा का एक हल्का सा झटका था। छंद ही दिनों में वह इस झटके से उभर चुकी थी लेकिन उस पल उन्होंने अपने जीने की इच्छा का ही परित्याग कर दिया था। मेरे बारबार विश्वास दिलाने के बावजूद वह अपना मनोबल जीने के लिए नहीं बना पा रहे थी। हम परिजनों द्वारा अच्छी प्रकार से सेवा एवं इलाज दिलाने के बावजूद भी वह कुछ भी नहीं खाने का हटकर लेती थी । कई बार तो खिलाने के लिए हमें भारी मसकत करने पड़ती थी। उनके जीवन की वह अन्तिम रात्रि दृष्टि पटल से ओझल नहीं होती है। उस रात उनकी तबीयत अधिक अस्वस्थ थी। चिकित्सक से सलाह ली गई तो उन्होंने ने वेट एण्ड वॅाच की सलाह दी तथा आवश्यक दवाई दी। रातभर हम परिवार वालों ने माता की देखभाल करने का निर्णय लिया। प्रारंभ में जब माताजी बीमार हुई थी तब मैंने सोचा था कि उनके अन्तिम पल में मैं पास में नहीं रहूँ तो ठीक रहेगा। मुझे माताजी से अत्यधिक स्नेह था इसलिए उस भावुक पल को देखने की मनसा नहीं थी। रात्रि के तीन बजे बड़े भाई साहब ने मुझे जगाया की अब मैं थोड़ी देर सोता हूँ, तु माताजी का ध्यान रख। प्रात: 4:45 पर मानो माताजी ने आवाज दी की बड़े भैया को जगा। मैंने आव देखा न ताव देखा सीधा भाई साहब को जगा दिया। उन्होंने सोचा शायद इसे नींद आ रही होगी। उन्होंने कहा तू सो जा मैं बैठता हूँ। मैं बिस्तर पर पहुंचा ही था कि भाई साहब ने आवाज दी आ देख माताजी को क्या हो रहा है। मैं तपाक से पहुँचा तो देखा की माताजी हमें अलविदा कर चुकी थी। मैंने उन्हें तीन बजे सुबह कीर्तन सुनाया था मानो वह उसी भाव समाधि में विलिन हो गई थी। वह आस्थावान थी लेकिन साधिका नहीं थी। फिर मुझे उनके शांत चित्त शरीर से यही भाव प्रकट हो रहे थे। मुझे याद आ रहा था कि उन्होंने अपनी जिद के आगे जीवन ओर हम सबको हरा दिया और आखिरकार मृत्यु का वरण कर दिया।

मेरे पिताजी का देहांत 10 जुलाई 2012 को पाली के जिला अस्पताल में हुआ। वे दमा रोग के रोगी थे। धूम्रपान एवं अफीम की आदत के कारण अकसर उनके आक्सीजन की कमी हो जाया करती थी। चिकित्सक कृत्रिम आक्सीजन के साथ कुछ दवाई देते तो वे ठीक हो जाते थे। पिताजी सेवा का अधिक सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। गर्मियों की छुट्टियों में मैंने अपना कैडर कैम्प एवं योग कैम्प स्थगित कर उनके साथ समय बीताने का निर्णय लिया। वे मेरी माताजी की तुलना में दु:ख दर्द सहने में मजबूत थे। छोटी मोटी तकलीफ होने पर हमें बताते नहीं थे। मात्र हावभाव देखकर हमें ही समझना पड़ता था। एक दिन मैं उनकी स्नान करने में मदद कर रहा था कि उन्होंने कहा कि अब मैं चला जाऊँ तो अच्छा है। अन्यथा आप लोगों को तकलीफ होगी। मैं उनके मुख यह शब्द सुनकर अचंभित था। जो व्यक्ति जीवन के किसी भी पल मनोबल टूटने नहीं देता था तथा हमें मनोबल मजबूत रखने की सलाह देता था वह आज अचानक हमारी चिन्ता के लिए जाना चाहता है। गर्मी की छुट्टियां समाप्त हो गई तथा मैं अपने कार्य स्थल लौट आया। पिताजी गांव में बड़े भाई साहब के साथ रहते थे। दो दिन बाद बड़े भाई साहब का फोन आया कि पिताजी की तबीयत ज्यादा ठीक नहीं है। चिकित्सक ने भर्ती करवाने की सलाह दी है। हम उन्हें चिकित्सालय ले जा रहे है तथा तु वहाँ पहुँच। मैं सपत्नीक चिकित्सालय पहुँच गया तो देखा कि वे नाज़ुक हालात में थे। आक्सीजन लगी हुई थी। उन्होंने पत्नी को देखते ही कहा कि बच्चे वहाँ अकेले हैं। इसको वापस छोड़कर दे। मैंने सकारात्मक उत्तर दिया। दूसरे दिन ठीक हो गए। चिकित्सक ने छुट्टी भी दे दी। मैं सपत्नीक पुनः कार्य स्थल लौट आया। दूसरी सुबह पुनः फोन आया कि उन्हें पुनः चिकित्सालय ले जाना पड़ रहा है। इस बार मैं अकेला गया। मेरे पहुँचते ही चिकित्सकों ने जिला अस्पताल के लिए उन्हें रेफर किया। उनकी स्थिति देखते हम उन्हें जिला अस्पताल ले गए। वहाँ एक वरिष्ठ विशेषज्ञ के द्वारा इलाज शुरू किया गया। मैं यहां एक बात का उल्लेख करूँगा की पिताजी के दो मित्रों की मौत कैंसर रोग से हुई थी। तब उनका इलाज करने वाले चिकित्सक के पास स्वयं नहीं ले जाने की हिदायत देते हुए कहा था कि यदि तुम मुझे इस चिकित्सक पास ले गए तो मैं मर जाऊँगा। उस समय वे स्वस्थ थे इसलिए मैंने इस उनका वहम ही समझा। बीमार हुए तब हम कभी उन्हें उस चिकित्सक के पास नहीं ले गए। जिला अस्पताल में उनकी मृत्यु के अन्तिम दिन मृत्यु के उस क्षण मोनिटर पर चलयमान धड़कन लाइनें गड़बड़ होती देख नर्स ने मुझे कॅाल रजिस्टर देते हुए तुरंत चिकित्सक को लाने हेतु रिसेपस्न काउंटर पर भेजा। मैं भागाभागा जा रहा था कि रास्ते में वह चिकित्सक मिले, जिसके पास पिताजी न ले जाने की हिदायत दी थी। वे मुझे एवं पिताजी को जानते थे तथा एक बार पिताजी को मिलने भी आए थे इसलिए मुझे पूछा क्या हुआ मैंने कहा पिताजी स्थिति नाज़ुक हैं। मैं कॅाल रजिस्टर ले जा रहा हूँ। उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा ओर पिताजी के वार्ड की ओर निकल पड़े। मैं भी कॅाल रजिस्टर संबंधित काउंटर पर देकर पिताजी के पास पहुँचा, तो देखा कि मोनिटर पर लाइनें सीधे हो रही थी। पास में खड़े उसी चिकित्सक ने पिताजी तपास कर मृत घोषित किया। तभी इलाज कर रहे चिकित्सक को लेकर टीम पहुँची उन्होंने अच्छी प्रकार अवलोकन कर मृत्यु प्रमाणपत्र दे दिया। पिताजी वर्षों पुरानी बात सत्य हो गई। उस चिकित्सक के पास मत ले जाना ले गए तो मैं मर जाऊँगा तथा उसी चिकित्सक द्वारा के आते ही प्राण त्याग दिए। शायद यह एक संयोग था।

तीसरा मृत्यु का क्षण मेरे ससुर जी का था। जिनकी मृत्यु 23 जून 2018 को मेरे ससुराल में उनके पैतृक घर पर सम्पूर्ण परिवार की उपस्थिति में हुई। इस क्षण को बहुत नजदीक से देखा व अनुभव किया। ससुर जी विगत कुछ महीनों से बीमार चल रहे थे। धर्म पत्नी अपने पिताजी के स्वास्थ्य को लेकर अधिक चिंतित एवं भावुक रहा करती थी। उनको लेकर बारबार उनके पिताजी के पास जाना होता था। उनकी मृत्यु के पूर्व दिन धर्म पत्नी जी ने फोन किया कि पिताजी का स्वास्थ्य बहुत खराब है। इसलिए आप आ जाना। मैं तुरंत ही निकल पड़ा, वहाँ पहुँचा तो वे बहुत गंभीर बीमारी की अवस्था में लेटे हुए थे। एक दिन पूर्व मेरे साडुजी जो सनातन मतावलंबी है उन्होंने गीता का पाठ करवाया तथा ॐ नम: भगवते वासुदेवाये का कीर्तन करवाया था। मैंने जाते ही उनकी पल्स चैक की तो ठीक ही चल रही थी। शाम कुछ समय उनकी सेवा कर साधना एवं भोजन के पश्चात् सो गया। रात्रि को बारह बजे मेरी नींद टूटी तो देखा कि सभी परिवार वाले उनके इर्द गिर्द बैठे परेशान नज़र आ रहे थे। मैंने सभी को डाटकर सुलाना चाह सभी मेरी बात मानकर सो गए। लेकिन बड़े व छोटे सालाजी कुछ ही पल में वापस आ गये। मैं उनकी भावना को समझ गया था इसलिए अधिक जबरदस्ती करना उचित नहीं समझा। इसी बीच उनकी पल्स मुझे कुछ संदेहप्रद लगी लेकिन मैंने किसी को कुछ नहीं कहा एवं उनके सहस्रार चक्र को थोड़ा सहलाया तथा इंडा पिंगला को दबाव करने हेतु पैरों के अंगूठे के पास गया तथा सालाजी को सहस्रार चक्र सहलाने का दायित्व सौंपा। इसके बाद पल्स देखी तो सही मिली। मुझे लगा कि अब सब कुछ ठीक है। मैं दो बजे के आसपास सोने चला गया। प्रात: पौने चार बजे छोटे सालाजी मेरे पास आए तथा कहने लगे कि पिताजी की हालत बहुत नाज़ुक हैं। एक बार आप देख लो। मैंने जाकर देखा तो बहुत ही गंभीर लगा। उन्हें वैदिक दीक्षा देने के लिए गायत्री मंत्र का उच्चारण किया तो मानो वे मनाकर रहे हो ऐसा लगा। चूंकि वे सनातन हिन्दू मतावलंबी थे। इसलिए मुझे यह रास्ता ही सही लगा। उनके नकारात्मक को मैंने समझा शायद वह मेरे से नहीं सुनना चाह रहे क्योंकि मैं इनमें विश्वास नहीं करता हूँ। इसलिए छोटे सालाजी यह करने को कहा लेकिन इसबार सकारात्मक नहीं लगा। चूकि तांत्रिक दीक्षा देने का मुझे अधिकार नहीं है इसलिए कोई मंत्र उनके कान नहीं बोल सकता था। इसलिए उस पल मुझे सुझा की नाम मंत्र के रुप बाबानाम केवलम की ध्वनि सुनाना उचित समझा तथा उनके कान बाबानाम केवलम का उच्चारण किया तो मानो उन्होंने स्वीकार किया सा महसूस हुआ। उसके बाद साडुजी जो श्लोक खूब जानते उनसे वैदिक श्लोकों के उच्चारण का निवेदन किया तथा उन्होंने स्वीकार कर दिया। वे वैदिक श्लोका उच्चारण कर ही रहे थे कि मैंने प्लस देखी तो नहीं मिल रही थी। इसलिए बड़े सालाजी को चिकित्सक को बुलवाने भेजा। इसी बीच मुझे उनकी श्वास थमती नज़र आईं। चिकित्सक के आने से पूर्व उन्होंने अन्तिम श्वास ले ली थी। चिकित्सक ने जांच की तो पाया कि कहानी समाप्त हो चुकी है। एक बात थी कि उन्होंने बीमार होते ही जिद पकड़ ली थीं कि मैं अपना पैतृक घर नहीं छोड़ूँगा तो वह जिद अन्तिम समय तक पूरी की। उनके बारे में एक धारणा थी कि यदि उनके पास पैसे नहीं रहते तो बीमार हो जाते तथा उनके जेब अन्तिम वक्त पैसे रहे। यद्यपि चिकित्सालय जाते समय यह मोह भी उन्होंने त्याग दिया था लेकिन परिवार वाले उनके उस स्नेह को संभाल कर रखा। वे इतने कर्मशील थे कि बीमार हालत में भी कर्म करने की सोचते थे। करते करते मरो तथा मरते मरते करो की उक्ति उनके जीवन से मुझे चरितार्थ होती दिख रही थी। यद्यपि वे आनन्द मार्गी नहीं थे।

मृत्यु का यह पल किस प्रकार का होता इसका कोई निश्चित एक नियम नहीं है। तीनों ही मृत्यु कुछ अलग ही अनुभव दे गई। मैं एक वाक्य कहूंगा कि मृत्यु वह अन्तिम पल उसमें जीवन भर के कर्म संस्कार के रुप समेट कर ले जाता है। मनुष्य खाली हाथ नहीं अपने संस्कारों को लेकर जाता है तथा संस्कारों लेकर ही जन्म लेता है। वह उक्ति सत्य नहीं लगती कि खाली हाथ आया था तथा खाली हाथ जाएगा।

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करण सिंह राजपुरोहित @ मृत्यु के बाद भी कुछ तो है ......

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लेखक ➡ करण सिंह राजपुरोहित

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(यह लेख मौलिक, अप्रकाशित एवं स्वलिखित हैं)

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1 टिप्पणी "मृत्यु का क्षण // करण सिंह राजपुरोहित"

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