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लघुकथा // अधूरा वादा // ज्योत्सना सिंह

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सुबह-शाम की दुआओं ने और डॉक्टरों के पुरज़ोर इलाज ने अपना रंग दिखाया और उसकी बच्ची ने एक बार फिर से जीवन के रंगो को जीना शुरू किया।

तब उन्होंने ऊपर वाले से किये अपने सभी वादे निभाने शुरू किये।

उसका सदक़ा उतार कर ग़रीबों में बाँटा जाता मंदिर मस्जिद में पूजा-अर्चना, नमाज़-फ़ातिया सब वे करते जो उन्होंने दुआओं में अपनी बच्ची के लिये कहा था।

जिसे उसका मन गर्व से भर जाता। और वह ऊपर वाले का बहुत-बहुत शुक्र करती कि उसे ऐसे माता-पिता की औलाद बनाया।

पर आज वह दुःखी थी। उसके जीवन को बचाने के लिये उसके पिता ने बकरे की क़ुर्बानी की दुआ माँगी थी। और ट्रक में लद आये बकरे की निरीह छवि को देख उसने अपने पिता से कहा।

“क्या ये ज़रूरी है?”

“हाँ, बेटी! आपकी सलामती के लिये ऊपर वाले से किया ये वादा निभाना ज़रूरी है।”

“पर क्या आप अपने बच्चे की जान बचाने के लिये किसी और के बच्चे की जान लेंगे?”

पिता ने अपनी बच्ची को गर्व से गले लगाते हुए कहा।

“न,मेरी बच्ची न बच्चे को खोने का एहसास ही कितना भयावह होता है। ये सहा है मैंने । मैं ये दर्द किसी को नहीं दे सकता।”

और ऊपर वाले से अपने इस वादे के अधूरे रह जाने की क्षमा माँगते हुए अपनी नन्ही सी जान को अपनी बाँहों में भर लिया।

--

ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर

लखनऊ

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