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दो लघु कथाएं (रक्षाबंधन ) // सुशील शर्मा

बिट्टो का रक्षाबंधन

आज रक्षा बंधन था ,मेरी छोटी बेटी खिड़की पर उदास खड़ी थी ,गुमसुम सी बाहर देख रही थी। मैंने पूछा "क्या बात है बेटी आज उदास ?"

अनमनी सी मुस्कुराने की कोशिश करके बोली "कुछ नहीं पापा। "

मैं समझ गया रक्षाबंधन पर अक्सर हमारे घर में ऐसे ही उदासी छाई रहती है क्योंकि मेरी कोई बहिन नहीं हैं और न ही मेरी बेटियों का कोई सगा भाई ,मेरी पत्नी रक्षाबंधन पर अपने मायके चली जाती है अपने भाइयों के पास और घर सूना सूना सा लगता है हालाँकि बहुत सारी आसपड़ोस की बहिनें राखी बांधने आ जाती हैं लेकिन मेरी बेटियों को उसमें उतना आनंद नहीं आता।

उसकी इस मनःस्थिति को मैं समझ गया और मैं भी उदास होकर अपने कमरे में चला गया क्योंकि उसकी इस उदासी का मेरे पास कोई हल नहीं था।

अचानक बिट्टो दौड़ती हुई आई बोली "चलो पापा अपन किसी अच्छी होटल में खाना खाने चलेंगे। "

मैं तो इसी पल के इंतज़ार में था "चलो जल्दी करो "

मैंने जल्दी से अपनी गाड़ी निकाली और हम दोनों होटल के लिए रवाना हो गए।

रास्ते में बिट्टो ने गाड़ी रुकवाई और जहाँ हमारी काम वाली बाई रहती थी उस गली में घुस गई थोड़ी देर बाद जब वह लौटी तो उसके साथ बच्चों की एक पूरी फौज थी।

'पापा हम आज इन लोगों के साथ रक्षाबंधन मनाएंगे " मेरी खुशी का ठिकाना न रहा क्योंकि बिट्टो  बहुत खुश दिख रही थी।

रास्ते में बाजार से उसने बच्चों के लिए नए कपड़े एवं राखी खरीदीं होटल में पहुँच कर बच्चों ने अपने मन का खाना खाया एवं वहीँ पर लड़कियों ने मुझे राखी बाँधी एवं लड़कों को बिट्टो ने राखी बाँधी सभी बच्चे एवं बिट्टो बहुत खुश थे।

आज बहुत दिनों बाद रक्षाबंधन पर मेरे चेहरे पर प्रसन्नता झलक रही थी।

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राखी का फर्ज

मुझे आज अपनी बहिन के पास राखी बंधवाने जाना था। मन बहुत निराश था जब भी मैं अपनी बहिन के घर जाता हूँ मेरे अंदर एक लघुता की भावना आ जाती है इसका मुख्य कारण हमारे जीवन स्तर में जमींन  आसमान का अंतर होना है। शहर के रईसों में उनकी गिनती है करोड़ों के मालिक राजनैतिक रसूख वाले और मैं एक साधारण नौकरीपेशा वाला व्यक्ति हालाँकि मेरी बहिन ने कभी भी मुझे इस बात का अहसास नहीं होने दिया। मेरे सभी भाई भी उच्च नौकरी पेशा एवं करोड़ों की आमदनी वाले थे। स्वाभाविक है उन लोगों के सामने मेरी कोई हैसियत नहीं थी बस इसी बात पर मन कचोट जाता था कि मैं  अपनी बहिन को अपने अन्य भाइयों जितने महंगे तोहफे नहीं दे सकता था।

मैंने पत्नी से कहा "रत्ना के लिए इस साल क्या ले जाऊँ "

"जो तुम्हारी इच्छा हो वैसे उन्हें हम क्या दे सकते हैं जितना दें उतना कम है।  "मेरी पत्नी ने मेरी मनस्थिति भांपते हुए कहा।

"इस बार तनख्वाह अभी मिली नहीं है  बेटी को पैसे भिजवाने हैं समझ नहीं आ रहा क्या करूँ। "मैंने निराशा से कहा।

"रक्षाबंधन पर बहिन के घर खाली हाथ नहीं जाते उन्हें हज़ार पांच सौ रूपये भी नहीं दे सकते। "मैंने अनमने भाव से कहा।

उसी समय रत्न का फोन आया बोली भैया आप सपरिवार राखी पर जरूर आना और मुझे एक प्यारा सा तोहफा जरूर लाना और हाँ छोटे और मंझले भैया भी आ रहे हैं ।"

मैंने उससे कहा " रत्न तेरा भाई तुझे कसे भूलेगा मैं जरूर आऊंगा।'

रक्षा बंधन के दिन मैं अपनी पत्नी  एक महंगी सी साड़ी जो करीब एक हज़ार रूपये की थी लेकर अपनी बहिन के आलीशान बंगले पर पहुंचा वहां का वैभव देख कर पाने को बहुत नीचा महसूस करने लगा लेकिन मन बहुत खुश था कि मेरी बहिन रानियों जैसी रहती है।

मेरे दोनों भाई भी आ चुके थे हम एक दूसरे से बहुत प्रेम से मिल रहे थे लेकिन मेरे मन में बहुत द्वन्द था कि मेरे दोनों भाइयों की तुलना में मेरे उपहार की मेरे बहिन के घर पर हंसी न उड़े मन बहुत अशांत था।

रक्षाबंधन शुरू हुआ सबसे पहले छोटे भाई को राखी बाँधी उसने गिफ्ट में एक हार दिया जिसकी कीमत करीब दो लाख रूपये थी बहुत सुंदर हार था सब उस हार की प्रशंसा कर रहे थे ,उसके बाद मंझले भाई ने बहिन को हीरे की एक अंगूठी दी जिसकी कीमत भी करीब डेढ़ लाख के आसपास थी। मेरा दिल बैठ गया मुझे समझ में नहीं आ रहा था की मैं कैसे इनके सामने अपना उपहार दूँ रत्ना के ससुराल वाले क्या सोचेंगे इतनी सस्ती साड़ी तो उनके यहाँ की नौकरानियाँ भी नहीं पहनती।

रत्ना मुस्कुराते हुए मेरी और बढ़ी मेरा चेहरा मुरझाया सा था बनावटी हंसी के साथ मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया रत्ना ने मुझे राखी बंधी और तोहफे के लिए मुस्कुरा कर मेरी और देखा मैंने कांपते हाथों से अपना बैग उठाया इतने में रत्ना ने मेरे हाथ से बैग छीन लिया "मुझे भाभी ने बताया है आप मेरे लिए बहुत सुन्दर उपहार लाये हैं मैं अभी पहन कर आती हूँ " रत्ना बैग को लेकर अंदर गई। वो क्षण मेरे लिए बहुत विषम थे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था साथ ही कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

रत्ना अंदर से जब बाहर निकली तो बहुत सुन्दर सोने की जड़ी वाली साड़ी पहने थी साथ में हाथों में सुन्दर सोने की चूड़ियां कानों में सोने के कुंडल ,पांव में सोने की पायल ,माथे पर सोने की बिंदी बिलकुल राजकुमारी जैसी लग रही थी। "भैया इतना सुन्दर उपहार आप वाकई में मेरे सबसे अच्छे भैया हो "रत्ना मुस्कुराते हुए मुझे देखा।

"पर ये सब .....  "मैं  हक्का बक्का रत्ना की और देख रहा था।

"चलो भैया अब हमलोग सब खाना खाएंगे " उसने मुझे बोलने नहीं दिया और हम लोग भोजन करने के लिए बैठ गए वह इठलाती हुई सबको वो सारी  चीजें बता रही थी उसके ससुराल वाले भी मेरी तारीफ कर रहे थे और मैं अपराधबोध से दबा जा रहा था।

मेरी आँखों में कृतज्ञता के आंसू थे।आज मेरी बहिन ने मेरे सम्मान की रक्षा की उसे मालूम था उसका गरीब भाई सबके सामने अपमानित होगा खुद को छोटा महसूस करेगा,मेरे सम्मान की रक्षा के लिए उसने खुद इतने महंगे तोहफे मेरे नाम से सबको दिखाए ताकि मैं नीचा न देख सकूं।

जब मैं वापिस जा रहा था तो मेरी आँखों में स्नेह और कृतज्ञता के आंसू थे।

"रत्ना तू वाकई रत्न है"मेरे स्वर में लड़खड़ाहट थी।

"भैया आपका सम्मान मेरे लिए हर चीज से ऊपर है" उसने मुस्कुराते हुए थैले में से उसकी भाभी की भेजी साड़ी निकाल ली एवम उसकी जगह वो सारे तोहफे जो उसने सबको मेरे लाये हुए बताए थे रख दिए।

"नहीं रत्ना तूने इतना किया इतना ही काफी है मुझे इन सब महंगी चीजों की जरूरत नहीं है और फिर तू मुझसे छोटी है तुझसे ये सब कैसे ले सकता हूँ"

मैंने प्रतिरोध करते हुए कहा।

"भैया आप स्वाभिमानी हैं मुझे मालूम है मैं आपको कुछ नहीं दे रही हूँ मुझे मालूम है आप कुछ नहीं लेंगे ये सारी चीजें में अपनी भतीजियों को दे रही हूं उनको देने का तो मुझे अधिकार भी है और हक़ भी है ।" रत्ना ने जबरदस्ती वो सारे पैकेट एक नए बैग में रख कर मुझे विदा किया।

रास्ते में मैं अपने आप बड़बड़ा रहा था"पगली तूने तो मुझे वो दे दिया जिसका कर्ज तेरा भाई कभी नहीं उतार सकता,तूने मेरा सम्मान मेरा बड़प्पन बचा लिया"

मेरी आंखों से अविरल धारा बह रही थी कलाई पर रत्ना की राखी चमक रही थी।

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