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व्यंग्य लेख - सरकारी भोजन लेखक - कमल किशोर वर्मा कन्नौद

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एक देश था देश में राजा होते ही हैं, सो वहाँ भी था । उसकी सरकार भी थी और गाँव के सरपंच से लेकर प्रधानमंत्री तक सब नियुक्त थे । उसने जनता की उ...


एक देश था देश में राजा होते ही हैं, सो वहाँ भी था । उसकी सरकार भी थी और गाँव के सरपंच से लेकर प्रधानमंत्री तक सब नियुक्त थे । उसने जनता की उन्नति के लिये जनता को बहुत अधिकार दिये जैसे जिन्दा रहने का अधिकार, खाने का अधिकार, लेटरिंग जाने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, बिना पढे़ पास होने का अधिकार, वगैरह-वगैरह ......अब वह तो जन कल्याणकारी राजा था, उसको खुद को भी तो कुछ अधिकार चाहिये ? सो उसने अपने लिये भी अधिकार तय किये जैसे घोटाले का अधिकार, दलाली का अधिकार, वोट बैंक का अधिकार, विपक्षी की हर बात को बुरी बताने का अधिकार, अपने ऐशोआराम के लिये जनता के धन का मनमाना इस्तेमाल का अधिकार , भ्रष्टाचार का अधिकार, और इन सब में प्रमुख था-वह अधिकार जिसके तहत हम कुछ भी बोलें वह सही, दूसरा कुछ भी बोले वह गलत, हम पक्षपात करें तो सही दूसरा करे तो गलत । हम धार्मिक पक्षपात करें तो भी हम धर्म निरपेक्ष और दूसरा कोई यह बात करे तो वह साम्प्रदायिक , वगैरह- वगैरह ..................

खैर साहब जलने वाले तो जलते ही रहते हैं अब उनकी किस्मत में ये सुख नहीं तो हम क्या करें ? तो हम कह रहे थे एक किस्सा - वहाँ गरीब बहुत थे, सो राजा के मन में खयाल आया- क्यों न गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिये एक सरकारी भोजनालय खोल दिया जाय ? जहाँ गराबों को दस रू. में भोजन कराया जाय । बस खयाल आते ही आनन फानन में मिटिंग बुलाई गई एक भोजन मंत्रालय का गठन किया गया, एक बडा बजट आवंटन हुआ। भोजन मंत्री बने, मंत्री से जिला, जिला से तहसील और तहसील से गाँव स्तर तक समितियाँ बनी, सभी समितियों में अपनी पार्टी के लोंगों की नियुक्ति की गई । कई अधिकारी नियुक्त किये गये उनके लिये कई वाहन खरीदे गये कई भवन बनवाये गये उनके लिये फर्नीचर खरीदा गया उन पर बडे-बडे बोर्ड लगवाये गये, एक पोर्टल बनवाया गया, जिस पर भोजनालय और उससे जुड़ी हर जानकारी दर्ज की गई । प्रत्येक हितग्राही की जानकारी और आवेदन आनलाइन रजिस्टर्ड किये जाने का प्रावधान किया गया। बडे बडे साहब ने पैसे लेकर प्रत्येक गाँव में भोजन सहायक की नियुक्ति की। एक विशेष पर्व पर समारोह पूर्वक उनका उद्घाटन किया गया, सभाएं हुई, उनमें लोग लाये गये । मंत्रीजी आये ,उनके लिये फाइव स्टार से खाना बुलवाया गया । इन सब में जमकर भ्रष्टाचार हुआ ऐसा लोग कहते हैं, मै नहीं कहता । खूब भाषण हुए, जनता को बार-बार ये अहसास कराया गया कि हम तो आपके सेवक है ये सब आपकी भलाई के लिये ही है ।

राजा तो अपनी इस योजना पर फूला न समाता था। अब चूँकि योजना सरकारी थी उसका खूब प्रचार किया गया नुक्कड़ सभाएँ हुई , हर चौराहे और पुल पर बोर्ड लगवाये गये, इन सब में करोड़ों का व्यय हुआ। अधिकारियों ने निर्देश दिए कि जो भी आदमी भोजन करने आए उसका फोटो वाट्सअप पे भेजें और पोर्टल पे अपलोड करें। तर्क दिया गया कि इससे कार्य में पारदर्शिता आएगी !

एक आदमी ने ये सब सुना ..... उसने सोचा राजा कितना भला है ? उसके दिमाग में आया कि सरकार बहुत दयालु है , चलो मै आज वहाँ जाकर भोजन कर लूँ ।

साधारण कद-काठी का आम आदमी लोक लुभावन नारों से सुसज्जित दीवारों वाले आलीशान भवन में डरते-डरते प्रवेश करता है। दरवाजे के समीप स्टूल पर बैठा दरबान उसे झिड़की देता हुआ बोला - क्या बात है ? कहाँ रहते हो ? गरीब होने का प्रमाणपत्र लाये ? साब मीटिंग में है देर से आना ...... बेचारा भूखा स्वयं को निरीह प्राणी समझकर जवाब देता रहा परन्तु दरबान शायद पिछले जन्म में कंस का दरबान था जब तक उसने पाँच रू. रिश्वत नहीं ले ली तब तक उसके सवाल खत्म नहीं हुए। अब बेचारा अन्दर गया अब उसका सामना एक शालीन कर्मठ दिखने वाले विशिष्ट व्यक्ति से हुआ , उसने एक ठण्डी साँस लेते हुए कहा - भोजन के दस रू. जमा करा दो । आम आदमी का भूख से बुरा हाल था उसने तत्काल दस रू. जमा कराये । पैसे जमा कराने के बाद उसे एक रसीद और एक फार्म देकर वह विशिष्ट व्यक्ति विशिष्ट सरकारी लहजे में बोला - इसे भरकर सामने वाले काउन्टर पर जमा कर दो । फार्म पढ़कर वह बेचारा भूल गया कि वह किस देश का नागरिक है ? उस फार्म में जो जानकारी भरी जाना थी उनमें प्रमुख थी आवेदक का नाम, पता ,जाति, उम्र, व्यवसाय,गरीबी रेखा सूची का क्रमांक, आधार नम्बर, आईडी नम्बर, आप कितना रोटियाँ खाएंगे ? गेहूँ का प्रकार लिखें, रोटी की लम्बाई चौडाई लिखें ,रोटी गैस अथवा चूल्हे पर बनाई जाय ? सही विकल्प पर टिक करें , दाल सादी या ऐगमार्क वाली ? किस ब्रांड की ? उसमें पानी का प्रतिशत और चाहे गये मसालों के नाम और उनकी मात्रा का ब्यौरा दें , अन्य अचार पापड़ आदि के बारे में भी इसी प्रकार की जानकारियाँ थी । गराबी रेखा के नीचे वाले राशनकार्ड की फोटोकापी आधार कार्ड की फोटोकापी , उस वार्ड के पार्षद से लिखा हुआ , यहीं रहते हो इस बात के लिये तहसीलदार का स्थाई निवासी प्रमाणपत्र संलग्न करें । उस फार्म को भरने में बेचारे की रही-सही ऊर्जा भी खत्म हो गई ,निढाल होकर उसने फार्म जमा किया और भोजन का इन्तजार करने लगा बहुत देर बाद उसको उस कहावत का अर्थ समझ में आया जो उसने कभी पाँचवी कक्षा में रटी थी कि हर चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती। हर शालीन कर्मठ दिखने वाले विशिष्ट व्यक्ति ................नहीं होते । कुछ घण्टे व्यतीत हो जाने पर ,बार-बार पूछे जाने पर उसको यह बताया गया साहब अभी मीटिंग में है आप का आवेदन पहुँचा दिया गया है जैसे ही साहब की स्वीकृति मिलेगी आपके भोजन का प्रबन्ध हो जायेगा । गरीब देश का गरीब नागरिक इन्तजार के सिवाय कर ही क्या सकता ? पैसे तो जमा कर ही चुका था, पर देखिये देर है अंधेर नहीं ! आखिर साहब बाहर निकले और मंत्रीजी को फोन पर बधाई देते हुए बताया - सर हमने जो गरीबों के हित में योजना बनाई है उसमें पहला आवेदन आ चुका है इसके लिये हम भोजन उत्सव का आयोजन करेंगे, पडौसी मुल्क के प्रधानमंत्री को आमंत्रित करेंगे इससे विदेशों में हमारी छबि सुधरेगी हमारे विपक्षियों का मुँह बन्द हो जायेगा, अगले चुनाव में भी इसका लाभ मिलेगा , मंत्रीजी अपने अफसर की बुद्धिमानी देख कर खुश हो गये और उसके प्रमोशन पर विचार करने लगे तथा अपने मंत्रालय की कर्त्तव्यनिष्ठा का बखान कर प्रधानमंत्री से और अधिक आवंटन की मांग कर डाली ।

भूख से व्याकुल उस आदमी को बताया गया - हमारे खरीदी इन्सपेक्टर एगमार्क वाली दाल और सब सामान का कोटेशन लेने गये है जैसे ही कोटेशन प्राप्त होंगे, बड़े साहब खरीदी का आर्डर देंगे , आप बिल्कुल चिन्ता न करें । पर भूख तो किसी कानून को नहीं मानती ! सो उस आदमी ने उस विशिष्ट कर्मचारी से कहा कि कोई बात नहीं जब तक भोजन नहीं बन जाता अपन चलें पास के होटल से नाश्ता करके आते है, विशिष्ट कर्मचारी तो आग्रह के कच्चे होते ही है , वे दोनों पास के होटल में गये ,ष्जी भर के नाश्ता किया तथा वह आदमी बोला आप यहीं बैठिये मै आपके लिये गुटका लाता हूँ यह कह कर वह आदमी (बिना बिल चुकाये) जो बाहर गया तो कभी वापस न लौटा । उसने हिकारत भरी नजर से देखा उस दिव्य इमारत पर लिखा था पुनः पधारें , हम आपका सहयोग करने के लिये कृतसंकल्पित है ।

न जाने कैसे विपक्ष को इस पूरे मामले की भनक हो गई उन्होने सरकार गिरा देने की योजना बना डाली , अविश्वास प्रस्ताव लाया गया ,सांसद खरीदे गये , भ्रष्टाचार निवारण समिति बना दी गई , जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के कई आरोप थे उसको समिति का अध्यक्ष बना दिया गया उस जाँच में भी भ्रष्टाचार हुआ । लीपापोती करने के लिए एक सदस्यीय जाँच आयोग बैठा दिया गया। एक रिटायर्ड व्यक्ति को जाँच आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। रिटायर्ड व्यक्ति को रोजगार मिल गया, ( अब यह अलग बात है कि कार्य क्षमता खत्म होने पर ही तो उसे रिटायर्ड किया गया था ) आयोग की अवधि बार बार बढ़ाई गई। कई साल बाद, करोड़ों रू. खर्च करके आयोग ने रिपोर्ट पेश की - वह व्यक्ति भूखा नहीं गया था उसे हमारे कर्मचारी ने अपने व्यय से नाश्ता कराया था । कर्त्तव्यनिष्ठ कर्मचारी को समारोह पूर्वक राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया, मंत्रीजी को देश रत्न दिया गया , मंत्रीजी की फोटो छपी और नीचे लिखा गया हम किसी को भूखा नहीं रहने देंगे हम आपका सहयोग करने के लिये कृतसंकल्पित है ।

फिर भी आम आदमी इन सब का लाभ न ले पाये तो यह उसका भाग्य , इसमें सरकार का क्या दोष ?

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लेखक - कमल किशोर वर्मा कन्नौद


लेखक परिचय

कमल किशोर वर्मा , दुर्गा कालोनी कन्नौद जिला देवास म.प्र.

शिक्षा - बी. एससी . एम.ए. बी.एड.

कवि, लेखक, गीतकार, संगीतकार, चि़त्रकार, ज्योतिषी, हस्तरेखा विशेषज्ञ, सामुद्रिकशास्त्र, वास्तुशास्त्र विशेषज्ञ, आयुर्वेद के ज्ञाता, प्राचीन भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ इतिहासकार

लिखी गई पुस्तकें -

काव्यांजलि निहारिका भाग 1 तथा भाग 2 ( काव्य संग्रह )

एक चम्मच सच ( र्व्यंग्य लेख व कहानी संग्रह )

मुगल काल का काला सच ?

राजा राममोहन राय का सच ?

कैसा महात्मा था गाँधी ?

सिन्धु का विनाश कारण और विश्लेषण

देव चर्चा

पुस्तक परिचय - देव चर्चा

पुस्तक देवचर्चा का कथानक इस प्रकार प्रारम्भ होता है कि भगवान विष्णु ने एक बार नारदजी से कहा कि हे नारद, हमारे प्रिय आर्यावर्त भारतखंड से हमें श्रीकृष्ण रूप से आए लगभग 5000 साल हो गए हैं आप भारत में जाकर 6 माह रहिए और हमें वहाँ का सब बात हाल समाचार विस्तार से बताइये । तब नारदजी भारत आए और यहाँ के हालात का विस्तार से वर्णन किया .. यहाँ के दुःख-दर्द, लाचारी, चोरी, बेइमानी, सत्तालोलुपता, भ्रष्टाचार, अन्याय और अत्याचार की कथा विस्तार से कही । वही कथानक है ।

पुस्तक परिचय - सिन्धु का विनाश कारण और विश्लेषण

सिन्धु घाटी की सभ्यता के बारे में आज बहुत सी बातें जानी जा चुकी है । सब जानते हैं कि सिन्धु घाटी की सभ्यता बहुत विकसित थी । परन्तु खुदाई से प्राप्त कुछ बर्तन औजार मकान गली सड़क से उस समय की भौतिक जानकारी ही प्राप्त होती है, मानसिक वैचारिक कर्तव्यनिष्ठा कार्यशैली आपसी तालमेल, विचारधारा, शासन व्यवस्था अधिकारियों कर्मचारियों की कार्य शैली उनके कार्य व्यवहार नियम रीति-रिवाज और भ्रष्टाचार के बारे में खुदाई से पता नहीं चल सकता ! अब सबसे बड़ा प्रश्न है कि इतनी विकसित सभ्यता नष्ट क्यों हो गई ? सिन्धु घाटी की सभ्यता नष्ट होने का कारण मै जानता हूँ । सिन्धु घाटी में उस समय लगभग 38 विभाग थे जिनमें लगभग 5000 नियम, कानून, योजना, कार्य, कार्यशैली, और कार्यपद्धति मूर्खतापूर्ण और भ्रष्ट थी। ये योजनाएँ सिर्फ इस लिये बनाई गई थी कि राजा और अधिकारियों को कमीशन और रिश्वत मिल सके ! समाज देश मानवता का क्या होगा ? इसका न तो उनको ज्ञान था न इससे उनको मतलब ? वे सिर्फ वही योजना बनाते थे जिसमें उनको धन मिले ! उन सब मूर्खतापूर्ण योजनाओं का वर्णन इस पुस्तक में है । राजा और अधिकारियों की सत्तालोलुपता जिद तानाशाही भ्रष्टता और मूर्खता से कैसे विनाश हो जाता है यही विवेचना है ।

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रचनाकार: व्यंग्य लेख - सरकारी भोजन लेखक - कमल किशोर वर्मा कन्नौद
व्यंग्य लेख - सरकारी भोजन लेखक - कमल किशोर वर्मा कन्नौद
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