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कहानी संग्रह - वे बहत्तर घंटे - यमराज और चित्रगुप्त - राजेश माहेश्वरी

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कहानी संग्रह

वे बहत्तर घंटे

राजेश माहेश्वरी

यमराज और चित्रगुप्त

एक बार यमराज और चित्रगुप्त में आपस में कहा-सुनी हो गई। विवाद इतना बढ़ा कि चित्रगुप्त ने काम करना बन्द कर दिया। उनका कहना था कि यमराज इतने वर्षों से अपनी गद्दी पर विराजमान हैं किन्तु मानव के कर्मों का लेखाजोखा तो मुझे ही बनाना पड़ता है। इसमें कितना परिश्रम और मेहनत करना पड़ती है यह मैं ही जानता हूँ। यमराज तो केवल दण्ड देने का निर्देश देते हैं। यह सामन्तवादी प्रवृत्ति अब मुझे स्वीकार नहीं है। यहाँ पर भी प्रजातन्त्र आना चाहिए। यमलोक में भी प्रजातन्त्र की स्थापना की मांग करते हुए वे अनशन पर बैठ गए।

चित्रगुप्त के अनशन की खबर से सारे ब्रम्हाण्ड में तहलका मच गया। सभी हतप्रभ थे क्यों कि पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। खबर पाकर प्रभु ने नारद जी को बुलाया और निर्देश दिया कि यमराज और चित्रगुप्त का विवाद आप जाकर निपटाइये। प्रभु के आदेश से नारद जी उनके पास पहुँचे और दोनों को समझाने का प्रयास करने लगे किन्तु वे दोनों नारद जी की बातों से सहमत नहीं हुये। तब नारद जी ने सोचा कि इन दोनों को प्रभु के पास ले जाएं। उन्होंने प्रभु से इसकी अनुमति मांगी। भगवान ने उनसे कहा कि यमराज को यदि स्वर्ग लोक दिखा दिया तो वे यहीं जम जाएंगे और फिर वापिस नहीं जाएंगे। इससे सब जगह अफरा-तफरी फैल जाएगी। इसलिये ऐसी गलती मत करना।

नारद जी को एक युक्ति सूझी। उन्होंने यमराज और चित्रगुप्त दोनों को ही नीचे की ओर झांकने के लिये कहा और उन्हें भरतखण्डे आर्यावर्ते के दर्शन कराये। नारद जी ने उन्हें बताया कि यहाँ प्रजातन्त्र है। ध्यान से देखो वहाँ मंहगाई, भ्रष्टाचार, हरामखोरी और अनैतिक वातावरण में रहने के लिये जनता बाध्य है। वह बहुत हलाकान है पर उसके पास कोई विकल्प नहीं है।

वहां लोक सभा, राज्यसभा, अनेक विधान सभाएं और विधान परिषदें हैं। वहां प्र्रतिदिन नये-नये अपशब्दों का प्रयोग जनता के चुने हुए प्रतिनिधि एक दूसरे के लिये करते हैं। आपस में गाली गलौज और हाथापाई करते हुए एक दूसरे से झगड़ कर कपड़े तक फाड़ते रहते हैं। वहां की प्राचीन संस्कृति, सभ्यता और संस्कार तार-तार हो गये हैं।

यदि आप इस लोक में भी ऐसी ही स्थिति चाहते हैं तो मैं यहाँ भी चुनाव करवा देता हूँ। चुनाव की तारीख भी तय कर देता हूँ व इससे संबंधित सारी प्रक्रियाएं भी पूरी करवा देता हूँ। मतदान की पात्रता रखने वाले देवी-देवताओं की सूची बनवा देता हूँ।

यमराज और चित्रगुप्त ने भारत में प्रजातन्त्र की ऐसी दुर्दशा देखकर आपस में विचार विमर्श किया कि हम व्यर्थ ही प्रजातन्त्र की बात करके आफत मोल ले रहे हैं। हम यहाँ पर सुखी हैं। हमारे बीच में मतभेद हो सकते हैं पर मनभेद नहीं है। वहां तो प्रजातन्त्र के नाम पर लूटतन्त्र चल रहा है। जनता सृजन में कम और विध्वंस में अधिक लगी हुई है। हमें निर्माण चाहिए निर्वाण नहीं। दोनों ने अपने विचार बदल लिये और आपस में गले मिलकर अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। नारद जी भी नारायण नारायण कहते हुए देव लोक की ओर प्रस्थान कर गये।


(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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