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कवि मनीष की कविताएँ

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हरी-हरी वसुंधरा,
जब गीत गाने लगे,
दिशाएँ झूमने लगे,
हवाएँ झूमने लगे,

नीला-नीला ये गगन,
नीला-नीला ये गगन
जब प्रेम बरसाने लगे,

तब समझ लेना

होने को चमत्कार है,
आने वाली बहार है,
आने वाली बहार,

पर बदन पर जब चलती
है उनकी आड़ियाँ,
कैसे महकेगी प्रेम की
फुलवारियाँ,

सिसक-सिसक के ये,
वसुंधरा मर जाएगी,
तब जिन्दगी कैसे,
जिन्दा रह पायेगी,

बंजर पड़े बदन पे,
खेत कैसे लहलायेगी,

दम तोड़ देगी बहार ये,
मर जाएगी बहार,

आओ ! इस वसुंधरा को,
हम बचाएँ ये ले प्रण,
बर्बाद ना करे हरियाली,
ये ले प्रण,

जब हर मानव में,
जब हर मानव में
मानवता समाएगी,
ये वसुंधरा खिलखिलायेगी,
वसुंधरा खिलखिलायेगी,

तब आ जाएगी,
फिर से बहार,

तब समझ लेना हो गया
है चमत्कार,
हो गया चमत्कार,

हरी-हरी वसुंधरा,
जब गीत गाने लगे,
दिशाएँ झूमने लगे,
हवाएँ झूमने लगे,

नीला-नीला ये गगन,
नीला-नीला ये गगन
जब प्रेम बरसाने लगे,

तब समझ लेना होने
को चमत्कार है,
आने वाली बहार है,
आने वाली बहार


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सरगम है भूखी,बोल की खातिर,
मोती बिखरी है,पिरोने की खातिर,
प्यार तड़पता है,बरसने की खातिर,

जमाने का अब है यही दस्तूर,
लब रोती है हँसने की खातिर,
कोई गर कहे हाँ,
ना आती है दिल तोड़ने की खातिर,

शराब तड़पती है, पीने के खातिर,
हसीनाएँ मचलतीं हैं बिखरने के खातिर,
शबाब तड़पती है शराब बनने के खातिर,
बच-बच के चलना अब तो यहाँ,
ये जमाना अब तो हो चुका बड़ा शातिर,

क्या आसमाँ,क्या धरती,
हर कोई अब है तड़पता,
आग में पिघलने की खातिर,
रात तड़पती सहर की खातिर,
सहर तड़पती है रात की खातिर,
जिस्म तड़पता है पिघलने की खातिर,
राह तड़पती है मंजिल की खातिर,

पर,
बच-बच के चलना अब तो यहाँ,
ये जमाना अब तो हो चुका बड़ा शातिर,


******************************************

गगन के ये तारे,
लगते बड़े हैं प्यारे,
टिमटिमाते रहते हैं,
झिलमिलाते रहते हैं,

रात के ये दुलारे,
गगन के ये तारे,

रोशनी इनकी कभी
आती है, कभी है
नहीं आती, सो ये
झिलमिलाते नजर हैं
आते, गगन के ये तारे,

रात के ये दुलारे,
गगन के ये तारे,

सुख-दु:ख को जो,
तोले बराबर प्यारे,
वही जीवन में,
चमके बनके सितारे,

सीख देते हैं यही,
अनमोल ये तारे,
रात के ये दुलारे,
गगन के ये तारे,

रात के ये दुलारे,
गगन के ये तारे


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चल फौजी आगे बढ़ तू,
देश तेरा है कह रहा,
चल फौजी आगे बढ़ तू,
देश तेरा है कह रहा,

तोड़ दे चट्टानों को,
गिरा दे तू बिजलियाँ,
राक्षसों को मार दे,
खेल खूँ की होलियाँ,

जैसे खेलते हैं वो मासूमों,
के खूँ की होलियाँ,
काट दे गद्दारों के सर,
मिटा दे उनके नाम ओ निशाँ,

चल फौजी आगे बढ़ तू,
देश तेरा है कह रहा,
चल फौजी आगे बढ़ तू,
देश तेरा है कह रहा


******************************************

लतपथ-लतपथ खून गिरे हैं,
भारत माँ के वीर पड़े हैं,
गोलियों से छल्ली है काया,
डर रहा है देख मौत का साया,

मौत अमर को कैसे मार सके है,
संग जिसके महाकाल चले है,

सामने जो दुश्मन खड़े हैं,
अब लाशों में तबदील पड़े हैं,
कोई ना अबतक समझ है पाया,
कैसे मौत भी है थर्रा गया,

अरे ! वो मौत पे भी विजय पा सके है,
जो भारत माँ का लाल बने है,

लतपथ-लतपथ खून गिरे है,
भारत माँ के वीर पड़े हैं,
गोलियों से छल्ली है काया,
डर रहा है देख मौत का साया,

मौत अमर को कैसे मार सके है,
संग जिसके महाकाल चले है,


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आया सावन झूम के,
मन गाया झूम के,
हरियाली से लिपट गई धरा सारी,
मन नाचा मेरा झूम के,

जागे मेरे भोले भंडारी,
मन की खिली फुलवारी,
भोले बाबा आये मेरे द्वारे,
नाची सारी सृष्टि झूम के,

खोल लंबी-लंबी जटा,
वो देने आया जीवन गंगा,
दु:ख हरने वो आया सबके,
दु:ख हरने आया वो मेरे मन के,

बज उठी उसके नाम की शहनाई,
सारी सृष्टि हो गई मस्त झूम के,
मनमोहक छटा उसकी सबके मन को भाई,
तार बज उठ मेरे मन के,

आया सावन झूम के,
मन गाया झूम के,
हरियाली से लिपट गई धरा सारी,
मन नाचा मेरा झूम के


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सदियों पहले धरती
पर आया एक मसीहा,
क्या कहें क्या था वो,
इन्साँ था या फरिश्ता,
जर्जर पड़े एक देश,
को मिला एक मसीहा,
सदियों पहले धरती
पर आया एक मसीहा,

पहले अफ्रीका में उसने
जन-जागरण किया,
फिर न जानें कहाँ-कहाँ
क्रांति का बिगुल फूँका,
फिर आया वो अपने देश
बनके अमूल्य नगीना,
सदियों पहले धरती
पर आया एक मसीहा,

एक हुंकार पर उसने
जन-सैलाब खड़ा कर दिया,
देखते ही देखते उसने मरते
देश को फिर से जिंदा कर दिया,
फिरंगी उसके सामने
टिक न पायें कहीं ना,
सदियों पहले धरती
पर आया एक मसीहा,

एक लाठी पकड़ के चलनेवाला,
देखते ही देखते उसने फिरंगियों
को उठाके उनके घरों में फेंक डाला,
कितना सहा उसने अपमान,
फिर भी सर झुका के करते थे
फिरंगी उनका सम्मान,

अपने स्वाभिमान के आगे
उसने जुल्म को झुका डाला,
दिया अपने देश वासियों
को सम्मान का निवाला,
धरती पर आया न कभी
कोई ऐसा कभी ना,
सदियों पहले धरती
पर आया एक मसीहा,

करता वो जिधर हाथ
लोग देते उसका साथ,
बगैर खून-खराबा किये
दिला दी उसने हमें आजादी,
क्या कमाल थे हमारे बापू,
क्या कमाल थे हमारे बापू जी,

टपका जमीं पे अमूल्य मोती
बनके उसका एक-एक पसीना,
उसके खून का एक-एक कतरा है अमूल्य नगीना,
सदियों पहले जमीं पे आया एक मसीहा,
सदियों पहले जमीं पे आया एक मसीहा


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हिंदुस्तान में भरा नया प्राण,
दिया सब को स्वाभिमान,
और दिया नारा जग को,
जय जवान,जय किसान,

धीमे पड़े हमारे देश को,
शिथिल पड़े हमारे देश को,
दिया गति और सम्मान,
जय जवान,जय किसान,

जब पड़ा हमपे खतरा,
झुका ना कभी वो चेहरा,
सबको दिया दर्जा बराबरी का,
और कहा जय जवान,जय किसान,

जिन्दगी अपनी खरच दी सारी,
दिखाया समझ-बुझ, होशियारी,
गिरने ना दिया हमारा अभिमान,
जय जवान,जय किसान,जय जवान,जय किसान


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वह कौन है जो खड़ा है सामने तेरे,
वह कौन है जो खड़ा है सामने तेरे,
वो आईना है सच का,
वो आईना ए हक़ीक़त है,
वो आईना है तेरे मन का,

जो संग रहेगा हरवक्त साथ तेरे,
वह कौन है जो खड़ा है सामने तेरे,

जितना भी तू उससे नज़रें चुरायेगा,
वो पकड़ ही लेगा जहाँ भी तू जायेगा,
वो रहेगा हरवक्त सरेआम तेरे,
जो चलेगा हरवक्त साथ तेरे,

जो संग रहेगा हरवक्त साथ तेरे,

जीवन एक चलती हुई है कश्ती,
जो साहिल ए वफ़ा पे हीं है थमती,
जो रूक जाए तो आ जाए मौत सामने तेरे,
ग़र मैं हूँ ग़लत तो तू दे जवाब सामने मेरे,

वह कौन है जो खड़ा है सामने तेरे,
वह कौन है जो खड़ा है सामने तेरे,
वो आईना है सच का,
वो आईना ए हक़ीक़त है,
वो आईना है तेरे मन का,

जो संग रहेगा हरवक्त साथ तेरे,
वह कौन है जो खड़ा है सामने तेरे


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मुस्कुरा, मुस्कुरा,
ज़िन्दगी का है,
यही फ़लसफ़ा,
मुस्कुरा, मुस्कुरा,

चाहे आँधी,चाहे,
तूफाँ आए, तू,
बढ़ता जा बगैर,
घबराये, दिलजले,
ना दिलजला,
मुस्कुरा, मुस्कुरा,

सोचना है क्या,
डरना है क्या,
ठान ली हमने जो,
रेत को भी समन्दर,
बना जायेंगे,

तो फिर,

है कहाँ, है कहाँ,
जुल्म की बदलियाँ,
जो भी छाई हैं,
उड़ जायेंगी,
वो बदलियाँ,

जब लायेगा जवाँ,
आँधियाँ, आँधियाँ,

मुस्कुरा, मुस्कुरा,
ज़िन्दगी का है,
यही फ़लसफ़ा


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  मनीष कुमार
पिता-श्री सतीश शर्मा
पूर्वी नंदगोला नागा बाबा का बंगला मालसलामी पटना सिटी, बिहार,

पिन-८००००८

कविता 2196587016778478598

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