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रक्षाबंधन पर्व पर विशेष रचना : ऐतिहासिक कहानी -- राखी की लाज ✍ शिव कुमार “दीपक”

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               जयपुर नरेश राजा जय सिंह की बहिन अमर कुमारी सभ्य ,सुशील व सुंदर थी। अमर कुमारी का विवाह जयपुर राज्य की सीमा पर स्थित बूँदी के राजकुमार बुद्ध सिंह हांडा के साथ हुआ था । दोनों के दाम्पत्य जीवन में बड़ा ही प्रेम था । कुछ वर्षों बाद बूँदी नरेश ने राजकुमारी चूड़ावत के साथ विवाह कर लिया ,और नई रानी के मोह-पाश में फंसते चले गये । राजकुमारी चूड़ावत बड़ी रानी से सौतन जैसा व्यवहार करने लगी फलस्वरूप बड़ी रानी के प्रति राजकुमारी चूड़ावत के मन में द्वेष व नफरत की ज्वाला स्वभाविक थी । छोटी रानी, बूंदी नरेश को झूठी कहानियां बनाकर अमर कुमारी के विरुद्ध धीरे-धीरे भड़काने में लगी थी । प्रेम -पाश में फंसे राजा बुद्ध सिंह हांडा के हृदय में भी द्वेष के अंकुर फूटने लगे थे ।धीरे - धीरे राजा व बड़ी रानी के मध्य वैचारिक मतभेद बढ़ गया

और बूंदी नरेश रानी अमर कुमारी से घृणा करने लगे । उन दिनों बूंदी राज्य के हांडा राजकुमारों की यश पताका दूर-दूर तक फैली हुई थी और बूंदी राज्य स्वयं में समृद्धि एवं शक्तिशाली था  लेकिन पारिवारिक कलह के कारण बूंदी राज्य में उत्तराधिकार की लड़ाई बढ़ती चली गई । कई बार राजा जय सिंह ने बूंदी नरेश और रानी अमर कुमारी को समझा-  बुझाकर शांत कर दिया , लेकिन नई रानी चूड़ावत और राजा के हृदय में नफरत की ज्वाला शान्त नहीं हुई । उत्तराधिकार का झगड़ा काफी बढ़ चुका था । कुछ समय बाद राजा बुद्ध सिंह ने कछवाही रानी अमर कुमारी से उत्पन्न पुत्र युवराज भवानी सिंह को अपना पुत्र मानने से ही इनकार कर दिया ,और कहा -  ‘ अमर कुमारी से मेरा कोई प्रणय सम्बन्ध नहीं रहा , यह सन्तान अवैध है ।’ बहिन पर बदचलन होने के आरोप से राजा जय सिंह बड़े क्रोधित हुए । उस समय राजा जय सिंह के मन में बहिन के प्रति प्यार व वफादारी थी ।

                     मौका पाकर राजा जय सिंह ने राजा बुद्ध सिंह की अनुपस्थिति में बूंदी राज्य पर आक्रमण कर दिया । घमासान युद्ध में बूंदी की सेना ज्यादा देर तक न टिक सकी और बूंदी पर राजा जयसिंह का अधिकार हो गया । लेकिन राजा जयसिंह ने अपनी बहिन अमर कुमारी के लिए कुछ नही किया ,बल्कि वृहत जयपुर निर्माण की योजना उसके मस्तिष्क में काम करने लगी ।राजा जयसिंह ने अपनी पुत्री कृष्णा कुमारी का विवाह ,सालिम सिंह के छोटे पुत्र दलेल सिंह के साथ कर बूंदी का राजा घोषित कर दिया ।

            बूंदी राज्य को वापिस पाने के लिए बुद्ध सिंह ने 15000 सैनिकों के साथ बूंदी पर आक्रमण कर दिया लेकिन घमासान युद्ध में पंचोला नामक स्थान पर वह पराजित हो गया ।पराजित बुद्ध सिंह ने भागकर पहले उदयपुर में और फिर अपने ससुर बेगू (मेवाड़) के ठाकुर देवी सिंह के यहाँ आश्रय लिया ।राज सुख से  दुःखी बुद्ध सिंह अत्यधिक शराब व अफीम खाने लगा ,जिससे वह पागल सा हो गया था ।

                   अमर कुमारी अब असहाय थी ।इधर पति ने अपमानित कर दिया ,उधर जिन हाथों में राखी बांधी थी उन्हीं हाथों ने रक्षा की बजाय उसका राज भी छीन लिया । अब अमर कुमारी का एक मात्र पुत्र युवराज भवानी सिंह ही बुढ़ापे का सहारा था ।उत्तराधिकार के झगड़े पर पहले से ही तलवारें खिंच चुकी थी ।एक दूसरे पर हमले जारी थे । लेकिन एक षडयंत्र के तहत धोके से राजा जयसिंह ने भवानी सिंह का कत्ल करवा दिया। जिससे अमर कुमारी राजा जयसिंह से क्रुद्ध शेरनी की तरह खिन्न हो चुकी थी । उसके मन में प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही थी , वह किसी भी तरह बूंदी का दीपक जले देखना चाहती थी ।अब अमर कुमारी के मन में पति द्वारा किये गए अपमान की टीसें कुंठित हो चलीं थीं ।बुद्ध सिंह को भी अपनी गलती का अहसास हो चुका था और अपने किये पर काफी पश्चाताप किया ।अचानक अमर कुमारी ने बुद्ध सिंह के पुत्र (रानी चूड़ावत का पुत्र ) उम्मेद सिंह को बूंदी के राज सिंहासन पर बैठाने का बीड़ा उठा लिया ।

               उस समय चारों ओर मराठाओं की विजय पताका फहरा रही थी । इंदौर के महाराजा  लौह पुरुष श्रीमन्त मल्हार राव होल्कर अपने धर्म और कर्तव्य परायणता के लिए दूर - दूर तक बहुत प्रसिद्ध थे । उन्होंने अपनी ताकत व तलवार के बल पर सैकड़ों राजाओं के गर्व  को चूर - चूर कर दिया था । रानी अमर कुमारी ने  अपने राज व सम्मान को वापस लेने के लिए , दलेलसिंह के बड़े भाई व अपने सहयोगी प्रताप सिंह हांडा (जोअपने उत्तराधिकार हेतु पिता व भाई से लड़ चुके था)  को राखी लेकर राजा मल्हार राव होल्कर के पास भेजा । उस समय होल्कर महाराज दक्षिण के विजय अभियान पर थे । प्रताप सिंह हांडा ने होल्कर महाराज को सारी कहानी सुनाई और अमर कुमारी द्वारा भेजी गई राखी को उनके हाथों में सौंप दिया । होल्कर महाराज ने तुरंत राखी को स्वीकार कर अमर कुमारी को अपनी धर्म बहिन बना लिया और उसकी रक्षार्थ उत्तर की ओर कूँच कर दिया ।

                  22 अप्रैल सन 1734 ई० को सूर्य ग्रहण के दिन अपनी विशाल सेना के साथ महाराजा मल्हार राव होल्कर ने बूंदी पर आक्रमण कर दिया । मराठों और राजपूतों के मध्य घमासान युद्ध हुआ ।दोनों ओर से तोपें आग उगल रहीं थीं जिससे आसमान में धुआँ- धुआं ही नजर आ रहा था । वीर सैनिकों की तलवारें एक दूसरे पर वार कर रहीं थीं । होल्कर सेना की वीरता के आगे राजपूत सेना  परास्त हो चुकी थी और मैदान छोड़कर भाग निकली । हजारों राजपूत सैनिक युद्ध में मारे जा चुके थे तथा हजारों सैनिक घायल हो चुके थे ।पराजय का मुख देखकर दलेल सिंह जान बचाकर रणभूमि से भाग गया लेकिन उसके घायल पिता सालिग सिंह को होल्कर महाराज ने भागने से पूर्व बन्दी बना लिया । राजपूतों की पराजय हो चुकी थी । होल्कर महाराज ने बूंदी के किले पर अधिकार कर लिया । अगले दिन होल्कर महाराज ने उम्मेद सिंह को बूंदी के राज सिंहासन पर बिठाया । राजा बुद्ध सिंह की सूर्यवंशी रानी अमर कुमारी ने भरे दरबार में  होल्कर महाराज के हाथों में राखी बाँधकर अपना धर्म भाई घोषित किया ।

इस प्रकार वीरवर मल्हार राव होल्कर ने राखी की लाज रखी ।

▪ बहरदोई , सादाबाद (हाथरस )

               उत्तर प्रदेश -281307

आलेख 6992055028207049255

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