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प्रेमचंद के लेखन के विविध आयाम - डॉ. रानू मुखर्जी

प्रेमचंद के लेखन के विविध आयाम - डॉ. रानू मुखर्जी

हिन्दी के कथाक्षेत्र में प्रेमचंद का आगमन उस समय हुआ जब वह शैशवावस्था में था। उन्होंने अपनी प्रतिभा, व्यापक अनुभव, पैनी दृष्टि एवं सरल स्वाभाविक शैली के द्वारा कथा – साहित्य को अत्यन्त उच्च कोटी तक पहुंचाया कि वह अपने समय के सर्वश्रेष्ठ कथाकार स्वीकृत हुए। ३१ जुलाई के १८८० में उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ।

कम उम्र में ही परिवार का भरण पोषण का भार उनको उठाना पड़ा। अध्यापक की नौकरी के सिलसिले में उनको बनारस, गोरखपुर, बस्ती, कानपुर जैसे स्थानों पर रहते हुए भारतीय ग्रामों की दुर्दशा एवं कृषकों के दीन-हीन असहाय दशा से परिचित होने का अवसर मिला जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव हमें गोदान जैसे महान उपन्यास में और अनेक कथाओं में मिलता है। उनका वास्तविक नाम धनपत राय था, नवाब राय नाम से उर्दू में लिखते थे और हिन्दी में प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे, जो उनका स्थायी नाम हो गया।

प्रेमचंद का साहित्यिक जीवन १९०१ से आरंभ होता है और मृत्युपर्यंत चलता रहा। रोग शय्या में पडे पड़े भी वो लिखते रहते थे। मना करने पर कहते थे “ मैं मजदूर हूँ और मजदूर को काम किए बिना खाना खाने का अधिकार नहीं है। उन्होंने तीन सौ से अधिक कहानियां और एक दर्जन से अधिक उपन्यास , उनकी सभी कहानियां “मानसरोवर” में संग्रहित है।

उनकी कहानियां सामाजिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक और व्यक्तिगत स्तरों की है। उनकी कहानियां अधिकतर वस्तु प्रधान या घटना प्रधान होती है, जिनमें विकास के कई मोड दिखाए गए हैं। जिससे उनकी कहानियां काफी लंबी हो गई है। उदाहरण के लिए ‘ममता’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘बड़े घर की बेटी, ‘ रानी सारंजा’, “मर्यादा की बेदी” जैसी कहानियों में लंबी घटनाएं देखी जा सकती हैं तो आखिरी दिनों में रचित “माता का हृदय”, “शतरंज के खिलाडी”, “बूढी काकी”, “बलिदान”, “मुक्ति का मार्ग” जैसी कहानियों में कथानक अपेक्षाकृत छोटे हैं। अपनी आरंभिक कहानियों में प्रेमचंद आदर्शवादी है, परंतु आगे चलकर आदर्शोन्मुख यथार्थवादी से दिखते हैं।

सामाजिक – पारिवारिक समस्याओं ने उनको लिखने की प्रेरणा दी। सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों, रुढियों, परंपराओं को उठाकर उनको सुधारने की तीव्र इच्छा भी प्रकट की गई। समस्याओं को उठाने पर भी वे सामान्य जीवनधारा से जुड़े रहे, यही उनकी लोकप्रियता का कारण है। वे दलितों, पीड़ितों, अभावग्रस्तों के जबरदस्त वकील थे। किसान मजदूरों के प्रति उनकी हार्दिक सहानुभूति थी। अतः उन्होंने दीन-दुखी, दुःखी मानवता के अधिकारों के लिए आवाज उठाई, दांपत्य जीवन, जाति, धर्म-संप्रदाय संयुक्त परिवार का मध्यम वर्ग और निम्नवर्ग के परिवारों में दिखाई देनेवाला तनाव, पति-पत्नी में पारस्परिक संदेह, विलासिता, झूठी प्रतिष्ठा का मोह इत्यादि उनकी कहानियों में प्रतिबिंबित हो उठे हैं।

सामाजिक बहिष्कार, के शिकार निम्नजाति की पीड़ित जनता को आधार बनाकर उन्होंने “ठाकुर का कुँआ” कहानी लिखी है। प्रेमचंद का अनुभव इतना विस्तृत है कि कोई उनकी नजरों से बच नहीं सकता। उनके कई स्त्री-पुरुष पात्र ऐसे हैं जो सज्जनता सहृदयता, सच्चरित्रता के आदर्शों से ओत-प्रोत है। “मुक्तिधन” कहानी के दाऊदयाल “ममता” कहानी के गिरधारी, “नमक का दारोगा” के मुंशी बंशीधर आदि पात्र सज्जनता, न्याय प्रियता के प्रतीक है। भयानक जाड़े से बचाने हेतु अपने कुत्ते को अपने अंक में लेकर सोता हल्कू, अपने बंदर के लिए प्राणों को उत्सर्ग करनेवाला मदारी जीवनदास, अपने बैल को पुत्रवत पालनेवाला मोहन ग्राम्य-जीवन के सहृदयता के प्रतीक है। “सौंत की रजिया”, “क्रिकेट मैच की हेलन”, “बड़े घर की बेटी, “रानी सारंधा” की सारंधा और “मर्यादा की बेदी” की प्रभा आदर्श नारियां हैं।

प्रेमचंद की यह मान्यता है कि मनुष्य को छोटी से छोटी परिस्थितियां सुधार सकती हैं। “बूढ़ी काकी” में बूढ़ी विधवा अपनी सारी संपत्ति भतीजे बुद्धिराम को लिख देती है। पर बदले में उसे भतीजों और उसकी पत्नी रुपा की प्रताड़ना मिलती है। धर में सुखराम के तिलक पर दावत होती है, पर बूढ़ी काकी को कोई खाना नहीं देता है। पर छोटी बच्ची लाड़ली से रहा नहीं जाता। वह पुरी लाकर देती है। उससे बूढ़ी काकी को तृप्ति नहीं मिलती है तो वह झूठे पत्तल चाटने लगती है। रुपा से रहा नहीं जाता है। उसके आदर्श खुलकर सामने आता है। वह उदार एवं सहृदय बनकर बूढ़ी काकी को तृप्ति भर खाना खिलाती है।

ग्राम्य वातावरण में आत्मीयता एवं सुख शांति की महक “होली की छुट्टी” में है, तो “पंच परमेश्वर” में भारतीय न्याय व्यवस्था पर अटूट विश्वास दर्शाया गया है। “मंदिर और मस्जिद” में साम्प्रदायिक सदभावों को उजागर किया गया है।

प्रेमचंद ने राजपूत-जाति पर कलंक के रुप में भीरु राजेन्द्रसिंह के चरित्र को उभारा है “स्वांग” कहानी में जिसमें डाकुओं के द्वारा पत्नी के अपहरण पर राजेन्द्रसिंह आंख बंद कर सोने का बहाना करता है। मुगल कालीन भोग-विलास एवं शान-शौकत से उत्पन्न पतन को दर्शाते हुए समाज को सावधान भी किया है। इसका उत्कृष्ट उदाहरण है “शतरंज के खिलाडी” मध्यम वर्ग एवं निम्नमध्यमवर्ग के परिवारों को कहानी का आधार बनाकर प्रेमचंद ने संयुक्त परिवार के खोखलेपन को उजागर किया है और दिखाया है संयुक्त परिवार मात्र मर्यादा के नाम पर टिके हुए है। वहां प्रेम-सौहार्द का अभाव है।

“कफन” कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने यह प्रस्तुत किया है कि मानव अर्थ – पिशाच है, अर्थ के अभाव में भूखा प्यासा मानव पशु – तुल्य आचरण करने लगता है। भूख प्यास और अभाव उसे मानव से राक्षस बना डालता है। “कफन” के पात्र धीसू और बंटा माधव इस प्रतीक्षा में है कि प्रसव-पीड़ा से कराहती बुधिया मर जाए तो आराम जो सोए। सबेरे उठकर देखते हैं तो बुधिया मरी पड़ी है अब उन्हें कफन और लकड़ी की चिंता सताने लगी। दोनों जमीनदार के पास जाकर दुखड़ा रोकर रुपये प्राप्त करते हैं। गांव के बनिए आदि से जमा करके पांच रुपये हो गए। दोनों कफन लेने बाजार में गए। दोनों आपस में बात करते हैं – “कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढंकने को चिथड़ा भी न मिले, मरने पर कफन चाहिए। कफन लाश के साथ जल ही तो जाता है।” दोनों शराब खाने में घूस जाते हैं। शराब पीने लगते है। न जवाबदेही का खौफ था न बदनामी की फिक्र । इन भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था। दोनों मस्ती में गाने लगे लोगों की दृष्टि उन दोनों पर थी। ‘कफन’ यथार्थवादी कहानी है और मानव – मनोविज्ञान पर सटीक बैठती है।

प्रेमचंद की कहानियों में भारत की आत्मा बोलती है। वे भारत के नंगे – भूखे, बेबस एवं उत्पीड़ित ग्रामीणों को स्वर प्रदान करते रहे और उनकी समस्याओं को उजागर करते रहे।

प्रेमचंद की कहानी की सफलता की महत्ता इस बात में है कि उनमें आम जनता की भाषा उनकी समस्यायें उनका जीवन आम जनता की भाषा में ही अभिव्यक्त हुई है। उन्होंने बोल-चाल की हिन्दी में अपनी रचनाएं प्रस्तुत की , जिससे उनके पाठकवर्ग का पर्याप्त विस्तार हुआ।

भारतेन्दु हरिशचन्द्र के बाद हिन्दी में प्रेमचंद एक ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने राजनीति से साहित्य को संबंध ही स्थापित नहीं किया, राजनीति को जीवन का हिस्सा बनाया। १९०८ में “सोजेवतन” उर्दू कहानी संग्रह के प्रकाशन पर उनकी भूमिका उन्होंने लिखा कि नई पीढ़ी के जिगर पर देशप्रेम की असमत का नशा जमना आवश्यक है। इस पर अंग्रेज – कलेक्टर ने उनको बुलाकर “राजद्रोहात्मक” कहानियों के कारण धमकाया और सारी पुस्तकें नष्ट कर दी। ‘हंस’ और ‘जागरण’ पत्रिकाओं को अनेकबार बंद करने का आदेश दिया गया।

प्रेमचंद ने साहित्य और राजनीति के संबंधों को एक नया मोड़ दिया। उन्होंने कहा, “जब तक साहित्य की तरक्की नहीं होगी, समाज और राजनीति भी ज्यों के त्यों पडे रहेंगे। साहित्य, समाज और राजनीति के संबंध अटूट है और तीनों इनसान के कल्याण के लिए हैं। प्रेमचंद ने यद्यपि अपने साहित्य में समाज, धर्म, अर्थ, संस्कृति, इतिहास, शहर और गांव आदि अनेक विषयों पर अपनी कलम चलाई है पर सभी का मूल है विदेशी दास्तां से मुक्ति और स्वराज की स्थापना।

प्रेमचंद का स्पष्ट कथन है कि आनेवाला जमाना “किसानों और मजदूरों” का है और उनकी स्वतंत्रता के बिना स्वाधीनता का कोई मतलब नहीं है। प्रेमचंद मानते है कि यह युग स्वराज्य का युग है, जनता एकाधिपत्य को नहीं सहन कर सकती, चाहे वह स्वदेशी ही क्यों न हो। वे अंग्रेजों की भेद नीति से क्षुब्ध हैं, क्योंकि वे हिन्दू-मुसलमान, छूत-अछूत, को लडाकर और सिख-इसाईयों को भी अलग-अलग करके देश की एकता तथा स्वराज्य आन्दोलन को तोड़ना चाहते हैं। प्रेमचंद जनता की राजनैतिक जागृति को अनिवार्य मानते हैं।

प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों में उनका यह राजनीति-दर्शन इसी विपुलता और प्रबलता से अभिव्यक्त हुआ है। देशप्रेम की कहानियों के संग्रह “सोजेवतन” पर अंग्रेजों के सेंसरशिप के कारण उन्होंने अपना नाम बदलकर प्रेमचंद रखा और कुछ समय तक देशप्रेम की कहानियों के स्थान पर सामाजिक जीवन की समस्याओं पर कहानियां- उपन्यास लिखे। उनके लिए सामाजिक जागृति भी स्वराज प्राप्ति का ही एक अंग थी। उनके विशिष्ट सामाजिक कहानियों में “बडे घर की बेटी” (१९९०), “नमक का दारोगा”(१९१३), “खून सफेद” (१९१४), “अनाथ लड़की” (१९१४), “पंच परमेश्वर” (१९१६), “सेवा मार्ग”(१९१९), “बूढी काकी”(१९२१) आदि। इस काल में कुछ ऐतिहासिक कहानियां भी लिखीं। जिनके द्वारा उन्होने इतिहास के उन अध्यायों को चित्रित किया जो पाठकों के मन में पुरातन के प्रति गौरव तथा वर्तमान के लिए कुछ करने की प्रेरणा दे सकें। इन कहानियों में “रानी सारंधा” , “विक्रमादित्य का घोड़ा”, “राजा हरपाल”, “राजहठ”, “मर्यादा की बेदी”, “पाप का अग्निकुंड” उल्लेखनीय है।

“लाल-फीता” (१९२१) तथा “प्रेमाश्रम”(१९२२) उपन्यास से उनके राजनीति के दर्शन का एक नया युग शुरु होता है। “प्रेमाश्रम” से “रंगभूमि” उपन्यास तक प्रेमचंद ने “स्वत्व रक्षा” (१९२२), “शतरंज के खिलाडी” (१९२४) आदि कहानियों के द्वारा अंग्रेजी शासन में अपने अधिकार, अस्मिता और प्रतिशोध की क्षमता को बनाए रखने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका प्रसिद्ध महाकाव्यात्मक उपन्यास “रंगभूमि” अपने युग की राजनीति का विशद आख्यान है। प्रेमचंद इसे राजनीतिक उपन्यास माना है।

“रंगभूमी” (१९२५) से “कर्मभूमी” (१९३२) तक का समय तीव्र राजनीतिक गतिविधियों का काल है। अतः प्रेमचंद की कहानियों, उपन्यासो में भी इसका गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। कहानियों में “हिंसा परमो धर्म”(१९२६), “मंदिर – २”(१९२७), “शुद्धि”(१९२८), “इस्तीफा”(१९२८), “जुलूस”(१९३०) आदि विशिष्ट हैं। उपन्यासों में भी देश की राजनीतिक परिस्थितियों का बड़ा ही वास्तविक चित्रण हुआ है। “कायाकल्प” में उन्होने सांप्रदायिक दंगों तथा उनके कारणों का सच्चा वर्णन किया है और गांधीजी के तरीके से समझौता कराते हैं। “गबन” उपन्यास में प्रेमचंद अँग्रेज़ी सभ्यता के गुलाम युवक की मानसिकता और चारित्रिक दुर्बलता से युगीन राजनीतिक गतिविधियों का वर्णन करते हैं।

“कर्मभूमि” पूर्णतः राजनीतिक उपन्यास है और प्रेमचंद ने इसे अपने युग की राजनीतिक परिस्थितियों, युग के नेताओं, तथा राजनीतिक घटनाओं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कलकत्ता में गांधीजी द्वारा प्रस्तुत दस सूत्री कार्यक्रमों के आधार पर उपन्यास की रचना की है। “कर्मभूमि” अपनी प्रबल राजनीतिक चेतना से समाज में जागृति उत्पन्न करके महात्मा गांधी राजनीतिक दर्शन को राष्ट्रीय धरातल पर स्थापित करते है। भारत और स्वाधीनता आन्दोलन को व्यापकता से चिन्हित करनेवाला यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास बन जाता है।

प्रेमचंद अपने युग की राजनीति को साहित्य में अवतरित करते हैं। इसे जीवन के अनुभवों से जोड़ते हैं उसे जीवंत और प्रामाणिक बनाते हैं। प्रेमचंद की रचनाओं के अन्तर्गत नैतिक मूल्य संघर्ष में किसी “वाद” के प्रति आग्रह या प्रतिबद्धता दिखाई नहीं देती, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र की गहरी समझ, अद्भुत ग्रहणशीलता और गतिशीलता का स्पंदन महसूस होता है। लेखक और विचारक के रुप में प्रेमचंद सही अर्थ में “भारत रत्न” है।

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा), पहचान (दिल्ली), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “गुजराती लेखिकाओं नी प्रतिनिधि वार्ताओं” का हिन्दी में अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमि गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक पुस्तकों क परिचय कराना।


संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

17, जे.एम.के. अपार्ट्मेन्ट,

एच. टी. रोड, सुभानपुरा, वडोदरा – 390023.


Email – ranumukharji@yahoo.co.in.

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