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हास्य नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक १२ - राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित


हास्य नाटक

“दबिस्तान-ए-सियासत”

राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

हास्य नाटक //  “दबिस्तान-ए-सियासत” - अंक 9 // राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित


नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक ११ यहाँ पढ़ें



हास्य नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक १२

मंज़र एक

बेचारी ग़रीब की जोरू”


नए किरदार – चाँद मियां = टेम्पो-ड्राइवर !

[मंच रोशन होता है, स्कूल की बड़ी बी आयशा अपने कमरे में बैठी अपने लबों पर लिपस्टिक लगा रही है ! फिर पर्स से आइना बाहर निकालकर अपना चेहरा देखती है ! देखती हुई वह अपनी ख़ूबसूरती का भान करती हुई इठलाती है ! पूरे स्टाफ़ में सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत होने का ग़ुरुर के कारण, उसे अपना चेहरा एक दफ़े आईने में देखने के बाद भी उसका जी नहीं भरता...वह बार-बार, अपना चेहरा आईने में देखती जा रही है ! तभी स्कूल के छोटे दफ़्तरेनिग़ार जमाल मियां, कमरे में आते नज़र आते हैं ! उनको देखते ही वह झट आईने को अपने पर्स में डाल देती है, फिर क्रेडिल से चोगा उठाकर किसी से गुफ़्तगू करने का नाटक करती है !]

आयशा – [फ़ोन पर, गुफ़्तगू करने की एक्टिंग करती हुई]] – वालेकम सलाम ! जनाब, ख़ैरियत हैं ?

[अब जमाल मियां कमरे में आते हैं ! टेबल पर काग़ज़ रखकर, वे वहीं खड़े रहते हैं ! फिर, कहते हैं !]

जमाल मियां – बड़ी बी ! ख़त व किताबत [पत्र-व्यवहार] का काम पूरा कर लिया, अब ये सारे ख़त यहाँ रख रहा हूं ! आपसे गुज़ारिश है, आप इन पर अपने दस्तख़त कर लीजिएगा...फिर, मुझे यहाँ से रुख़्सत होने की इज़ाज़त दीजिये !

आयशा – [जमाल मियां की तरफ़ ध्यान न देकर, फ़ोन पर कहती है] – कौन ? अरे, आप...जनाब ख़ैरियत है ? [चोगे पर रुमाल रखकर, जमाल मियां से कहती है] ज़रा इत्मीनान रखो, जमाल मियां ! जानते नहीं, डिप्टी डाइरेक्टर साहब फ़ोन पर हैं ! [फिर चोगे से, रुमाल हटा देती है] ख़ैरियत है, जनाब ? कभी आप हमारे दौलतखाने तशरीफ़ रखें हुज़ूर, आपकी बड़ी मेहरबानी होगी ! ....हां....जी हां...ठीक है...अजी, क्या फ़रमाया आपने ? ...... अच्छा, कर्मचारी स्टे लायेंगे ? ... कुछ नहीं, जनाब इन वकीलों को चार पैसे मिल जायेंगे आपकी मेहरबानी से !.... जी हां .... फिर, केस तो आप ही निपटायेंगे ? ...ख़ैर, बाद में आपका मज़नून देख लेंगे... शबा ख़ैर, रखती हूं !

[चोगे को क्रेडिल पर रख देती है, फिर जमाल मियां से कहती है !]

आयशा – [जमाल मियां से] – जमाल मियां, गोया हमने कसम खा ली, आपके सर-ए-अज़ीज़ की ! अब किसी से नहीं कहेंगे कि, हमारे बड़े-बड़े ओहदेदारों से कितने अच्छे रसूख़ात है ? आप तो ख़ुद तो जानते ह हैं, दिन-भर कितने लोगों के फ़ोन आते रहते हैं ? सभी चाहते हैं कि, मैं अपने रसूख़ात काम लेकर उनका काम करवा दूं !

[दराज़ से पेपर निकालकर, जमाल मियां को देती है ! फिर, आगे वह उनसे कहती है !]

आयशा - क्या करूँ, मियां ? ये बड़े बाबू आक़िल है ना, मानते ही नहीं हमारा कहना ! अल्लाह जाने, इन्हें किस कारण है हमसे मुखासमत [विरोध, शत्रुता] ? देखिये इस पेपर को हमने आपा की ख़्वासत के माफ़िक, उनका तबादला हुक्म ज़ारी करवाया !

जमाल मियां – सच्च कहा, बड़ी बी आपने ? वास्तव में आपकी बहुत चलती है चवन्नी, इस सियासत के गलियारे में ?

आयशा खुश होकर, आगे कहती है] – अजी मियां, आप क्या जानते हैं ? मालूम है ? हमने उनके घर के पास ही, उनके मोहल्ले की स्कूल में उनकी पोस्टिंग करवाई है ! ऐसा कौन करवा सकता है, मियां ? मियां, बोलिए आप !

[इतना सुनकर, जमाल मियां आयशा की तरफ़ मुंह ताकने लगे ! फिर, उस तबादला-ए-हुक्म को देखते ही, उनके चेहरे पर रंगत बदलने लगी ! उनका मग़मूम [दुखित] चेहरा, आशा की किरणों से चमकने लगा !]

जमाल मियां – बड़ी बी ! मुझे ऐसा लगता है कि, आपकी ज़राफ़त और जुरअत हर काम को कामयाब बना देती है ! मुझे मालूम है, “आप ही वह मेरे मुअज्ज़म हैं, जो मेरी बीबी का तबादला इस पाली शहर में करवा सकती है !” आपको हमारे ऊपर आपका मेहर बरसाना होगा, इसके लिए हम आपके शुक्रगुज़ार रहेंगे !

आयशा – [बेरुख़ी से] – ना, बाबा ना ! अब हम किसी पचड़े में, नहीं फंसेंगे ! जनाब, आना-जाना कुछ नहीं..और, ऊपर से यह जिल्लत..बदनामी ? खौफ़ खा गए , हम !

[बड़ी मुश्किल से आयी यह चेहरे की चमक, अब गायब होने लगी ! जमाल मियां का यह महज़ून [दुखित] चेहरा देखकर आयशा के लबों पर मुस्कान छा जाती है ! लबों को रुमाल से ढ़कती हुई, वह कहती है !]

आयशा – [रुमाल से अपने लबों को ढ़कती हुई, कहती है] – मियां आप माना आफ़रीनी में भी कमाल रखते हैं, आपका काम हम करेंगे ही, मगर हम चाहते हैं...पहले, आपकी क़ाबिलियत देखें ! लीजिये, इस काग़ज़ में सारी डिटेल लिखी है !

जमाल मियां – हुज़ूर, फ़रमाइए ! आपका यह बन्दा दो मिनट में काम कर लाएगा !

आयशा – [पर्स से एक काग़ज़ बाहर निकालकर, उन्हें थमाती है] – आपाजान को, पांच माह का पगार नहीं मिला ! आप, उनके एलिमेंटरी महकमें में जाएँ ! अपने रब्त काम में लाकर, आपा को उनके पगार का भुगतान कराएं ! गोया यह परवाज़े तख़य्युल नहीं है, आपकी क़ाबिलियत का इम्तिहान है !

जमाल मियां – [अपने-आप] – काहे की, यह इब्नुल वक़्ती ? क्या, फ़ायदा सभी नहीं लेते ? हमें तो ख़ाली, एक बिल ही बनवाना है ! महकमा भी कौनसा ? अपनी बीबी का, और क्या ? फिर इधर इनका काम हुआ, और उधर इनका लख़्तेजिग़र बनने से रोकने वाला कौन ?

[अब खुशी के मारे जमाल मियां के पाँव, ज़मीन पर थम नहीं रहे हैं ! ख़ुशी से काफ़ूर होकर मियां, कमरे से बहार आ जाते हैं ! बाहर स्टूल पर बैठी शमशाद बेग़म को, नोट-बुक में हिसाब-किताब करते हुए देखते हैं ! वह हिदाब को इन्द्राज करने के दौरान, बराबर बड़बड़ाती जा रही है !]

शमशाद बेग़म – [बड़बड़ाती हुई] – इस नौकरी के सफ़र में, सर के बाल सफ़ेद हो गए हैं ! मगर, पत्ता नहीं, इस काबिने की जिम्मेदारी, जो मेरे सर है..न मालुम कब ख़त्म होगी ? ए मेरे ख़ुदा, अब इन बाजुओ में अब, इस जिम्मेदारी उठाने की ताकत रही नहीं ! अल्लाह, अब मुझे इस ख़िलक़त से उठा ले !

जमाल मियां – [उन्हें दिलासा देते हुए, कहते हैं] – ख़ालाजान ! आप बेफ़िक्र रहें ! वल्लाह, क्यों इस ख़िलक़त से रुख़्सत होने की इल्तज़ा आप ख़ुदा से कर रही हैं ? मरे, तुम्हारे दुश्मन ! क़र्ज़ की बात ठहरी, तो मग़मूम होने की क्या ज़रूरत ? आपको मैं बैंक से लोन दिलवा दूंगा ! बस, आप लोन लेने का फॉर्म बैंक से ला दीजिएगा !

[इतना कहकर मियां चल दिए, अपनी सीट पर बैठने ! सीट पर बैठकर, अपनी अगली चाल पर विचार करने लगे, क्योंकि कबूतर को फंसाने का चुग्गा तो वे डालकर आ चुके हैं...बस, अब कबूतर के फंसने का इन्तिज़ार करना है !]

जमाल मियां – [अपने-आप] – वाह मियां, वाह ! क्या शतरंज की चाल हमने चली है, हमने ? अब यह चाल रंग लायेगी ! आख़िर, करें क्या ? इस खुर्राट ख़ाला की अक्ल ठिकाने लानी, ज़रूरी है ! हम ठहरे, नवाब ख़ानदान के, रसिकता तो हमारे रोम-रोम में बसी है ! जब भी, इस स्कूल की ख़ूबसूरत लड़की को देखते हैं तब ख़ुदा जाने क्यों हमारी आँख चल पड़ती है ?

[बैठे-ठाले, जमाल मियां की नाक में ख़ाज आने लगती है ! फिर क्या ? झट उंगली नाक के अन्दर घुसेड़कर खुजाने लगते हैं ! अचानक, उनको तड़ा-तड़ छींकें आने लगती है ! बेचारे मियां, छींकों की झड़ी लगा देते हैं ! फिर मियां, वापस बड़बड़ाने लगते हैं !]

जमाल मियां – क्या करूँ, मैं ? यह क़ारनामा [लड़कियों के साथ, छेड़खान करने का क़ारानामा] इस ख़ाला को हैरत-अंगेज़ की ठौड़, महसूद [घृणित] लगता है ! तब यह शैतान की ख़ाला हमारे काम करने की तारीफ करने की ठौड़, मुख़ासमत पर उतर आती है ! अब ज़रूर ऊंट, आयेगा पहाड़ के नीचे ! जब यह शैतान बैंक का ब्याज भरेगी, तब अपने-आप उसे अपनी नानी याद आ जायेगी ! बड़ी पीराना बनकर आयी, और मुझे कहती है ज़बून [बुरा, दुष्ट] ?

[दोनों हाथ ऊपर ले जाकर, अंगड़ाई लेते हैं ! फिर जेब से मेडम सुपारी का पैकेट बाहर निकालकर, मीठी सुपारी को अपने मुंह में रखते हैं ! अब मियां के शैतानी दिमाग़ के कल-पूर्जों में, तेल जाता है ! अब वे सुपारी को चूसते हुए, वापस बड़बड़ाने लगते हैं !

जमाल मियां – [बड़बड़ाते हैं] – बड़ी आयी, दाऊद मियां की चमची बनकर, स्कूल को सर पर उठाये बैठी है ! जब बैंक के काटेगी, सौ चक्कर ! तब मैं बैठा-बैठा चैन की बंशी बजाऊंगा ! चलो, अच्छा किया...एक लालच की फूलझड़ी, चला दी हमने अपने फितुरिया दिमाग़ से !

[तभी शमशाद बेग़म पानी का लोटा लिए आती है, जमाल मियां के पास !]

शमशा बेग़म – किस फ़िक्र में बैठे हैं, मियां ? छोड़ दीजिये फ़िक्र, और आबेजुलाल से अपने हलक़ को तर कीजिएगा !

[जमाल मियां पानी का लोटा लेकर, पानी पीते हैं ! फिर लोटा शमशाद बेग़म को थमाते हुए कहते हैं !]

जमाल मियां – [लोटा थमाते हुए] – देखो ख़ाला, कल हमारे ख़्वाब में मरहूम अब्बा हुजूर आये थे ! वे कह रहे थे “बेटा जमाल ! बैंक का मैनेजर तुम्हारी दुनिया छोड़कर, हमारे जन्नत में आ गया है ! वह कह रहा था कि, सरकार ने अब अवाम को बहुत सुविधाएं दे रखी है !

शमशाद बेग़म – और क्या कहा, हुज़ूर ?

जमाल मियां – अब अवाम आराम से सस्ती दर पर बैंक से लोन लेकर, घर की कई समस्याओं से निज़ात पा सकती है ! बच्चों की शादी, मकान बनवाना, गाड़ी ख़रीदना, बच्चों की पढ़ाई ज़ारी रखना वगैरा कई काम निपटा सकती है, इस ख़िलक़त में !

शमशाद बेग़म – और क्या कहा, आपके अब्बा हुज़ूर ने ?

जमाल मियां – अब्बा हुज़ूर ने आगे कहा “मैंने तो बेटा, कह डाला उनसे कि, आप जन्नत में बैंक की एक ब्रांच खोल दीजिएगा ! हम ख़ुदा के पास शिफ़ायत लगाकर, आपको ज़रूर बैंक खोलने की इज़ाज़त दिलवा देंगे ! बस, बात यही है, इसकी ठेकेदारी हमको ही मिलनी चाहिए !”

[इतनी लम्बी तक़रीर पेश करके, आदत से मज़बूर जमाल मियां वापस अपनी उंगली नाक में डाल लेते हैं ! फिर बेशऊर होकर, नाक खुजाते हुए शमशाद बेग़म से कहते हैं !]

जमाल मियां – [नाक को खुजाते हुए] – अरे, मच्छर बहुत बढ़ गए ख़ाला ! इन कमबख़्त मच्छरों ने, मेरी नाक को भी नहीं छोड़ा ! ऐसा लगता है, इस कमरे के पीछे बने स्टोर की सफ़ाई काफ़ी दिनों से नहीं हुई है ! इस कारण यहाँ, मच्छर पनपते जा रहे हैं !

[अब बेचारी मुहताज शमशाद बेग़म जिसे बैंक के लोन की सख्त ज़रूरत है, उसे जमाल मियां को ख़ुश रखना ज़रूरी हो गया है ! उसे उम्मीद है, शायद बैंक लोन दिलाने में जमाल मियां मदद कर दे तो... उनका आया काम, निकल जाएगा ! मज़बूर होकर वह लोटे को वहीं टेबल पर रखकर, दीवार पर टंग़ा डस्टर उठाकर कहती है !]

शमशाद बेग़म – [डस्टर उठाकर] – बेफ़िक्र रहें, आप ! अभी झाड़ लेती हूं...!

[फिर क्या ? वह उनकी टेबल, अलमारियां और दीवारों को डस्टर से झाड़ने लगती है ! झाड़ने के बाद, वह उनके नज़दीक आकर कहती है !]

शमशाद बेग़म – जनाब, अब बताइयेगा कि, बैंक लोन हासिल करने के लिए फॉर्म के साथ कौन-कौनसे दस्तावेज़ नत्थी करने है ? आपकी मेहरबानी से मुझे लोन मिल गया तो हुज़ूर, मैं आपको दुआ दूंगी ! आपकी मेहरबानी से छोरे की शादी पर लिया गया कर्जा उतर जाएगा ! आगे, आपसे और क्या कहूं ? इस महाजन की औलाद ने क़र्ज़ क्या दिया ? जनाब, मेरा जीना दुश्वर कर डाला !

[अब वह डस्टर को यथा-स्थान रखकर, लोटा लिए मटकी के पास आती है ! वहां मटकी के ढक्कन पर रखकर, वापस लोन की बात याद दिलाने जमाल मियां के पास आती है !

शमशाद बेग़म – अब बताइये, जनाब कौन-कौनसे दस्तावेज़ फॉर्म के साथ नत्थी करने हैं ?

जमाल मियां – काहे की फ़िक्र करती हो, ख़ाला ? आख़िर हम यहाँ बैठे हैं ना, आपकी ख़िदमत में ! तसल्ली से बता देंगे, अभी ज़रा इस टीसी वाले काम से फारिग़ हो जाऊं ?

शमशाद बेग़म – [मायूस होकर, कहती है] – चलती हूं, बाद में आऊंगी !

जमाल मियां – नहीं, नहीं ! ख़ाला कहीं मत जाना, मैं तो दो मिनट में फारिग़ होता हूं इस काम से ! तब-तक आप इन अलमारियों की सेपरेशन वाल के पीछे रखी रेको में रखे छोरियों के हाज़री रजिस्टरों के बण्डल बाँध दें, सूतली का गट्टा वहीं पीछे रखा है ! अरी ख़ाला, यह काम निपट जाए तो हमें बहुत मदद मिलेगी ! कारण यह है कि, ये सारे रजिस्टर हमें जिल्दसाजी की दुकान पर भेजने हैं.. जिल्दें चढ़वाने के लिए !

शमशाद बेग़म – जो हुक्म !

[जमाल मियां जहां बैठते हैं, उनके पीछे गोदरेज की अलमारियों को एक लाइन में रखकर कमरे के बीच में सेपरेशन वाल बना रखी है, जहां जमाल मियां स्टोर का सामान रखा करते हैं ! मिल एरिया में आयी लड़कों की सेकेंडरी स्कूल के बड़े दफ़्तरेनिग़ार आक़िल अंसारी हैं, जिनके छोटे भाई सरोज खां जिल्दसजी का काम किया करते हैं ! आक़िल अंसारी ठहरे, रशीद मियां के ख़ास दोस्त ! अब बड़ी बी के शौहर रशीद मियां के दोस्त के भाई को जिल्दसाजी का काम दे दिया जाय तो बड़ी बी भी खुश हो जायेगी, यही कारण है, मियां इन रजिस्टरों को सरोज खां की दुकान पर जल्द भेजने के लिए उतावली करते जा रहे हैं ! सेपरेशन वाल के पीछे दीवार से सटी हुई हाज़री रजिस्टरों से भरी रेके रखी हुई है ! इन पर इतनी भारी मात्रा में डस्ट जमी हुई है, जिसे देखने से ऐसा लगता है कि कई सालों से इन रजिस्टरों को झाड़ा नहीं गया है ! बेचारे चपरासियों के पास यहाँ सफ़ाई करने का इतना वक़्त कब रहा ? रहता तो बेचारे यहाँ आकर, इन रजिस्टरों पर जमी धूल को झाड़ लेते ! इन बेचारों की मज़बूरी है, उनको अपना ख़ाली वक़्त कभी दाऊद मियां के पास तो कभी आक़िल मियां के कमरे में बैठकर हफ्वात [ग़प-शप] हांकने में लगाना पड़ता है ! फिर, उनको कहाँ इतना वक़्त जो यहाँ आकर इन रजिस्टरों पर जमी धूल को साफ़ कर दे ? कर देते तो, बेचारों के इस्त्री किये हुए कपड़े ख़राब हो जाते ना ? जब भी काम पड़ने पर रजिस्टर की ज़रूरत होती है, रजिस्टर ले जाने के बाद वे वापस उसी स्थान पर सही तरीक़े से उस रजिस्टर को नहीं रखते ! इस कारण उबड़-खाबड़ तरीक़े से रखे रजिस्टरों के हाथ लगाते ही, रेक के सारे रजिस्टर धड़ाम से आकर बेचारी मग़मूम शमशाद बेग़म के कमजोर बदन पर गिरते हैं ! वह बेचारी दब जाती है, इन धूल-भरे रजिस्टरों के नीचे ! हवा में उड़ी यह धूल शमशाद बेग़म के कपड़े तो ख़राब करती ही है, मगर उड़ी हुई धूल उसके नासा-छिद्रों में घुसकर उसका बुरा हाल बना देती है ! बेचारी लगातार छींकती है, आख़िर नाक सिनककर इन छींकों से मुक्त होती है ! तब वह ज़ोर से चिल्लाती हुई, बोल उठती है !]

शमशाद बेग़म – [कपड़ों पर लगी धूल, झाड़ती हुई] – ए मेरे मोला ! कोयले की दलाली में हाथ काले !

[बरामदे में स्टूल पर बैठे तौफ़ीक़ मियां सिगरेट का कश ले रहे हैं ! साथ में, वहां बैठी मेडमों से गुफ़्तगू भी करते जा रहे हैं ! उनकी आवाज़ जैसे ही शमशाद बेग़म के कानों में गूंज़ती है, वह झट उन्हें मदद के लिए पुकारती है !]

शमशाद बेग़म – [ज़ोर से, तौफ़ीक़ मियां को पुकारती हुई] – अरे ओ...तौफ़ीक़ मियां ! अजी सुनते हो ? ज़रा इधर आकर मदद करना !

[जनाब तौफ़ीक़ मियां एक सलीकेदार चपरासी ठहरे, वे ख़ुद ग्यारवी पास मुलाज़िम हैं ! इस तरह देखा जाय तो, जनाब बदक़िस्मत से किसी आरक्षित कोटे के आदमी न हैं..इसलिए इनको मज़बूरन चापरासी बनना पड़ा ! छोटे दफ़्तरे निग़ार की क़ाबिलियत केवल दसवी पास है, मगर यहाँ तो ये जनाब तौफ़ीक़ साहब नौकरी में आने से पहले ही ग्यारवी पास कर चुके थे ! यह तो सरकारी बदइन्तज़ामी है, जहां तौफ़ीक़ मियां जैसे क़ाबिल इंसान को ‘छोटे दफ़्तरेनिग़ार की नौकरी’ न देकर उनसे कम क़ाबिलियत रखने वाले जमाल मियां को छोटे दफ़्तरेनिग़ार की पोस्ट दे दी गयी ! कारण एक ही है, जमाल मियां ठहरे आरक्षित मृतकर्मचारी आश्रित के कोटे के ! जो तौफ़ीक़ मियां से क़ाबिलियत कम रखने के बाद भी, वे तौफ़ीक़ मियां को हुक्म देने वाले बन गए ! अब यही कारण है, हमारे तौफ़ीक़ मियां अपनी खुनस मिटाने के लिए, अपनी पर्सनलिटी बनाए रखते हैं ! सफ़ेद उजली क्रीज़ की हुई वर्दी पहनते हैं, और बीड़ी न पीकर सिगरेट पीया करते हैं ! और, बोलते भी हैं, ख़ालिस उर्दू...वह भी अदब से ! जनाब का ख़ास्सा भी ऐसा, वे एक दिन पहनी हुई वर्दी को दूसरे दिन नहीं पहनते हैं ! उधर इस स्कूल के हेड साहब दाऊद मियां की बात ही निराली है, वे एक ही वर्दी को एक पूरे हफ़्ता चला लिया करते हैं ! तौफ़ीक़ मियां को बदन से निकलते पसीने की बदबू बर्दाश्त नहीं होती, इसलिए वे अपनी वर्दी पर महंगे इत्र का छिड़काव करके स्कूल आया करते हैं ! दूर से आ रहे तौफ़ीक़ मियां से पहले, उनके कपड़ों पर छिड़काव किये गए इत्र की सुंगंध पहुंच जाती है ! जिससे मालूम हो जाता है कि, तौफ़ीक़ मियां तशरीफ़ ला रहे हैं ! इतने सारे महामद होने के बाद भी इनमें एक ख़ामी है कि, वे अपने बदन को तनिक भी कष्ट होने नहीं देते ! ये जनाब ठहरे दानिशमंद किस्म के इंसान..जिनको उर्दू शाइरी का है, बड़ा शौक ! नौकरी के पहले जब ये अपने अजदाद के शहर [पूर्वजों के शहर] सोजत में रहते थे, तब इनका नाम शहर के आला दर्ज़े के शाइरों की गिनती में आया करता ! आज भी वहां जाते हैं, तब वहां के लोग इनसे बहुत अदब के साथ पेश आते हैं ! दूसरा इनका शौक कहिये या इनकी आदत,जनाब ख़ाली नहीं बैठकर ये इल्म की चर्चा में अपने आपको व्यस्त बनाये रखते हैं ! जनाब की रईसी तबीयत होने के साथ, ये लखनऊ की तहज़ीब को अपनाए बैठे हैं ! जनाब में इतने सारे महामद [गुण] होने के बाद भी जनाब में एक एब ज़रूर नज़र आता है ! ये जनाब अपने जिस्म को किसी किसी प्रकार की तकलीफ़ से गुज़रने नहीं देते ! तकलीफ़ देने से, कहीं इनकी सफ़ेद वर्दी पर कोई दाग न लग जाए ? इस बात का, उनको अक्सर ध्यान रहता है ! कई दफ़े आक़िल मियां सभी चपरासियों को इकट्ठा करके बगीचे में काम करने के लिए ले जाते हैं, तब तौफ़ीक़ मियां कैंची से पांच पत्ती की बेल की कटिंग करके उसे सुन्दर आकर देने का काम किया करते हैं ! क्योंकि, वे इस काम को आसानी से कर सकते हैं ! मगर कभी भी, अन्य चपरासियों की तरह बगीचे में पत्थर लाना, खड्डे खोदना वगैरा मेहनती काम नहीं करते ! ऐसे कामों से, वे दूरी बनाये रखते हैं ! ये दूसरे चपरासी भी कोई कम नहीं, उनकी पूरी कोशिश रहती है की, मियां से किसी तरह मेहनती काम करवाया जाय ? लोग जानते हैं, जंगल में आग लगती है तब कलाग़ [कौआ] कभी उस आग में नहीं जलता, और जंगल का चूहा सबसे पहले भग जाता है जंगल छोड़कर ! इस स्कूल के ऐसे मेहनाते कामों से बचने वालों के उदाहरणों में, तौफ़ीक़ मियां और दिलावर खां का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है ! इस तरह तौफ़ीक़ मियां और दिलावर खां भी, कलाग़ और चूहे की तरह मेहनती काम से अक्सर बच जाया करते हैं ! अब ऐसे वक़्त, उनको शमशाद बेग़म की करुण पुकार सुनाई देती है ! बेचारी ख़ाला के चार दफ़े पुकारने के बाद, जनाब स्टूल से उठते हैं ! फिर ख़ाला के निकट न जाकर, वे सीधे जमाल मियां के पास चले आते हैं ! वहां रखे स्टूल पर तशरीफ़ आवरी होकर धीमी आवाज़ में जमाल मियां से कहते हैं !]

तौफ़ीक़ मियां – [धीमी आवाज़ में, कहते हैं] – आदाब ! शरे-ओ-अदब...ज़रा, हम मेहरबानी रखिये..हुज़ूर !

[जमाल मियां अपने लबों पर जहरीली मुस्कान बिखेरते हुए, उनको चुपचाप बैठे रहने का इशारा करते हैं ! उनका सपोर्ट पाकर तौफ़ीक़ मियां, उनको धीरे-धीरे कहते हैं !]

तौफ़ीक़ मियां – [धीमी आवाज़ में] – हुज़ूर, हम तो तबादला-ए-ख्याल [बाहर जाने का सोचना] कर रहे थे ! अल्लाहताआला, अब्बा हुज़ूर को जन्नत नसीब करें ! उनके इतने बड़े कुनबे पर, कहीं बुरी नज़र न लग जाय ? मगर मुझे तो कहना पडेगा जनाब कि, इस कुनबे में आये दिन किसी का इन्तिकाल होता है तो कभी किसी का निकाह !

जमाल मियां – मियां, कोई मरे या कोई शादी करे, उनकी बला से..! इसमें, आपको क्या तकलीफ़ ? कहिये, क्या फ़िक्र है आपको ?

तौफ़ीक़ मियां – अरे जनाब, आप समझे नहीं ? अम्माजन के बाद हम ठहरे, सबसे बड़े बेटे इस घर के ! ख़ानदानी वज़ा...इस रिश्तेदारी को निभाते हुए, हमें बार-बार शरीक होना पड़ता है, कभी किसी के निकाह में तो कभी किसी के जनाजे में ! बस हुज़ूर, नसीबे-दुश्मना-जान जोख़म पाल रखी है हमने !

[शमशाद बेग़म के पुकारने की आवाज़, वापस सुनायी देती है ! मगर, यहाँ तौफ़ीक़ मियां कहाँ सुनने वाले उस महज़ून की पुकार ? वे तो इस आवाज़ को अनसुना करके, जमाल मियां को कुछ न कुछ सुनाते ही जा रहे हैं ! अब वे अपने शिकवे को शेर का जामा पहनाते हुए, अपना कलाम पेश करते हैं !]

तौफ़ीक़ मियां – “जनाब, इन्तिकाल होता है उनका ! मारी जाती तमाम छुट्टिया हमारी !! निभानी पड़ती हमें यह ख़ानदानी वज़ा ! ख़ाक़ हो गयी छुट्टियां हमारी !!””

[फिर, वापस शमशाद बेग़म के पुकारने की आवाज़ सुनायी देती है ! जो आवाजे बाज़गश्त [प्रतिध्वनि] बनकर, वापस लौट जाती है !]

शमशाद बेग़म – [पुकारती है] – अरे ओ, तौफ़ीक़ मियां ! यहाँ हम, आपके दीदार के लिए तरस रहे हैं ! अरे जनाब, हम फाइलों के नीचे दब चुके हैं...आकर हमें बाहर निकालो ! साथ में झाड़ू लेते आना...

[मगर, तौफ़ीक़ मियां कहाँ जाने वाले ? जनाब तो वहीँ बैठे ज़ोर से चिल्लाते हुए कह देते हैं !]

तौफ़ीक़ मियां – [ज़ोर से आवाज़ देते हुए] – अभी आता हूं, ख़ाला ! इत्मीनान रखो, ख़ाला ! ज़रा कुव्व्ते जाज़बा से भरा शेर पेश कर रहा हूं ! [जमाल मियां से] हुज़ूर ! सच्च कह रहा हूं, पहला इत्तिफाक है...जी घबराता है ! आपके सर-ए-अज़ीज़ की कसम खाकर कहता हूं, हमने कभी धूल से भरे रजिस्टर कभी नहीं ढोए ! धूल देखकर, हमारा यह कलेज़ा हलक़ में उतर आता है ! और, क्या उज्र करूँ ? असतग़फ़िरुल्लाह, मालिक मुझे इस आयी आफ़त से निज़ात दिला दें !

जमाल मियां – [लबों पर, तबस्सुम बिखेरते हुए] – फ़हवुल मुराद, मियां ! अब आप, फ़ौरन बाहर जाइए ! सवारी का बंदोबस्त करके आ जाइए ! गाड़ी वाले से कहना कि, चालीस अदद बस्तें हैं, फिर किश्तियां भी शामिल है ! समझ गए, मियां ?

तौफ़ीक़ मियां – मंजूर है, अभी गया और सवारी का बंदोबस्त करके आता हूं, हुज़ूर ! अब, रुख़्सत दीजिये, हुज़ूर !

[जमाल मियां का इशारा पाते ही, तौफ़ीक़ मियां झट हो जाते हैं...नौ दो ग्यारह ! अब शमशाद बेग़म पल्लू से पसीना पोंछती हुई, वहां आती है !]

शमशाद बेग़म – [जमाल मियां से] – क्या कहूं, मियां आपसे ? चक्कर आ रहा है..ख़ुदा जाने, सर क्यों घुमता जा रहा है ? इस सबके बावज़ूद मैंने चालीस अदद बस्ते व किश्तियां तैयार कर डाले ! वल्लाह ! अच्छा रहता, मियां तौफ़ीक़ मदद के लिए आ जाते !

[कुछ देर बाद, मेन गेट के बाहर टेम्पो के हॉर्न की आवाज़ सुनायी देती है ! फिर इस गेट के बाहर, टेम्पो रुकता नज़र आता है ! अब टेम्पो से बाहर निकलकर, तौफ़ीक़ मियां बाहर आते हैं ! और, बाहर आकर गेट का दरवाज़ा खोलते हैं ! फिर, उस टेम्पो के ड्राइवर चाँद को हुक्म दे डालते हैं !]

तौफ़ीक़ मियां – चलो चाँद मियां, दालान की ओर ! [पाकीज़ा फिल्म का नग़मा गाते हैं] चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो....

चाँद मियां – अरे मियां, तौफ़ीक़ यार ! क्या कह रहे हो ? दिलदार को वहीँ रहने दो, कहाँ चढ़ाए जा रहे हो हम पर ?

[अब टेम्पो दालान के पास आकर, रुक जाता है ! ड्राइवर चाँद के बाहर आते ही, तौफ़ीक़ मियां झट टेम्पो के अन्दर ड्राइवर की सीट पर बैठ जाते हैं ! इधर धूल से भरे इन हाथों और मुंह को पानी से धोकर शमशाद बेग़म, आकर दालान में खड़ी होती ही है...तभी तौफ़ीक़ मियां की पुकार, उसे सुनाई देती है !]

तौफ़ीक़ मियां – [शमशाद बेग़म को, आवाज़ देते हुए] – तशरीफ़ लायें, ख़ाला ! ज़रा बस्ते व किश्तियां गाड़ी में चढ़ा दीजिये !

शमशाद बेग़म – [हाथ-मुंह पोंछती हुई, ज़ोर से कहती है] – हाय अल्लाह ! यह क्या, नाइंसाफ़ी ? सारे बस्ते और किश्तियां हमने तैयार की, अल्लाह के मेहर से ! अब, हाथ-मुंह धोकर, फारिग़ हुए हम ! और अब सामने, वापस वाही इल्लत ? अब मियां आँखें होते हुए, नज़र नहीं आता आपको...?

[तभी, जमाल मियां सामन की फ़ेहरिस्त लिए आते हैं ! और, शमशाद बेग़म को देते हुए कहते हैं !]

जमाल मियां – [शमशाद बेग़म को फ़ेहरिस्त थमाते हुए, कहते हैं] – लीजिये, यह फ़ेहरिस्त ! इसके मुताबिक ये चालीस अदद बस्ते और किश्तियां टेम्पो में चढ़ा दीजिये, ख़ाला ! फिर वापस आकर, चूल्हे पर चाय बना देना ! जानती हो, अब रिसेस होने वाली है !

[अब वह जमाल मियां को क्या ज़वाब दें ? अब यहाँ जमाल मियां को कैसे इनकार करे, क्योंकि मुफ़लिस शमशाद बेग़म उनकी जान-पहचान काम में लेकर बैंक से लोन पास करवाना चाहती है ! इस कारण, अभी उसे जमाल मियां का हर हुक्म मानना होगा..बस, बेचारी अपनी क़िस्मत को कोसती हुई टेम्पो में बस्ते और किश्तियां चढ़ाती है ! काम से फारिग़ होने के बाद, वह खड़ी-खड़ी अपने धूल से भरे कपड़ों पर नज़र डालती है ! फिर क्या ? बेचारी ग़रीब की जोरू, वापस उन कपड़ों को झाड़ने लगती है..जिन्हें वह थोड़ी देर पहले, झाड़ चुकी थी ! वह कपड़े झाड़कर, जैसे ही आराम की साँस लेने लगी, तभी यह टेम्पो धूल के गुब्बार उड़ाता हुआ आँखों से ओझल हो जाता है ! इस तरह बेचारी महज़ून शमशाद बेग़म के झाड़े हुए कपड़े, वापस धूल के गुब्बार से गंदे हो जाते हैं ! अब बेचारी करें, क्या ? उन कपड़ों को वापस झाड़कर, चाय बनाने के लिए चूल्हे के पास चली आती है ! भगोने में चाय का पानी डालकर, उसे चूल्हे पर चढ़ा देती है ! फिर दीवार पर टंगी दीवार घड़ी में, वक़्त देखने लगती है !`थोड़ी देर बाद वह जाकर, वह रिसेस की घंटी लगा देती है ! मंच पर, अँधेरा छा जाता है !]

नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक १२ राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित मंज़र २ ‘क़ुरबानी का बकरा ख़ुद ही आ गया हलाल होने !’

[मंच रोशन होता है, बरामदे में लगी कुर्सियों पर मेडमें बैठी है ! शमशाद बेग़म सभी मेडमों को चाय से भरा प्याला थमा देती है ! इसके बाद, शमशाद बेग़म चाय का प्याला लिए बड़ी बी के कमरे में दाख़िल होती है ! फिर, उसे चाय का प्याला थमा देती है ! आयशा चाय का प्याला थामकर, शमशाद बेग़म से कहती है !]

आयशा – [शमशाद बेग़म से] – देखो ख़ाला ! गेट पर, बराबर ध्यान रखना ! डवलपमेंट कमेटी के मेंबर जनाब हाजी मुस्तफा, अभी तशरीफ़ लायेंगे ! उनके आने के बाद चाय-बिस्कुट वगैरा लेती आना !

[शमशाद बेग़म चली जाती है !]

आयशा – [होंठों पर, लिपस्टिक लगाती हुई] – ये हाजी साहब आयेंगे, कब ? आख़िर, जनाब से चन्दा जो लेना है तो... मुझे इन्तिज़ार तो करना ही होगा !

[हाजी मुस्तफ़ा अचानक कमरे में दाख़िल होते हैं, और आते वक़्त वे आयशा की कही हुई बात को सुन लेते हैं !]

हाजी मुस्तफ़ा – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – मज़ा तो इन्तिज़ार करने में ही है, मोहतरमा ! कहिये ख़ैरियत है ?

आयशा – सकपकाकर कहती है] – सलाम, हाजी साहब ! बहरहाल ख़ैरियत है ! [जम्हाई लेती है, जिससे सर पर ढका दुपट्टा गिरकर कंधों पर आ जाता है !] कुछ नहीं जी, ज़रा मोहल्ले की ग़रीब बच्चियों की फ़ीस जमा करवाने का केस दर्दे सर मोल ले लिया ! जब आपने फीस जमा करवाने का जुम्मा अपने में लिया है, तब कहीं जाकर हमें राहत मिली है ! हुज़ूर की मेहरबानी, बक़रार रहे !

हाजी मुस्तफ़ा – हमारी मेहरबानी नहीं जी, ख़ुदा का मेहर समझिये !

आयशा – अब, क्या करें ? क्या नहीं करें, कोई रहनुमा था नहीं, इसलिए आपको तकलीफ़ दी हमने ! [लबों पर तब्बसुम लाती है !]

[आयशा का रिदा [दुपट्टा] सर से कंधे पर आने से, उसके हुस्न पर हाजी मुस्तफ़ा की निग़ाह गिरती है ! सकपकाकर, वे अपनी नज़रें नीचे झुका लेते हैं ! फिर, शर्माते हुए कहते हैं !]

हाजी मुस्तफ़ा - [शर्माते हुए] – हुजूरे आलिया ! स्कूल का ऐसा कोई काम हो, और हम ख़िदमत कर सकें..बस आप हमें, संदेश भेज देना ! यह बन्दा, आपकी ख़िदमत के लिए हाज़िर हो जाएगा !

[तभी आयशा का ध्यान, गिरे हुए दुपट्टे की तरफ़ ध्यान जाता है ! फिर क्या ? झट उज़ागर हो रहे उरोज़ों को, रिदा से ढक लेती है ! फिर अपने लबों पर मुस्कान लाकर, कहती है !]

आयशा – [मुस्कराती हुई] – क़िब्ला....ज़रा, अलील है ! यह तो वल्लाह हो नहीं सकता कि जब हम किसी माजरे से परेशान हो, और आप मदद ना करें ? बस, जनाब से मैं क्या उज्र करूँ ? बस आप दे दीजिये, इन पांच ग़रीब बच्चियों की फ़ीस ! [काग़ज़ में बच्चियों के नाम और क्लास लिखकर, उन्हें काग़ज़ थमाती है !]

[हाजी मुस्तफ़ा उस काग़ज़ को पढ़कर, जेब से करारे-करारे नोट बाहर निकालकर आयशा को थमा देते है ! फिर, वे उससे कहते हैं !]

हाजी मुस्तफ़ा – एक तमन्ना रह गयी, बाकी ! वह है ना बड़ी बी, मेरी छोटी वाली दुख्तर बेबी रौनक...? पढ़ाई में ज़रा कमजोर रह गयी, अल्लाह ताआला इस साल उसे पास करा दे, तो उसका निकाह करवाकर अपना फ़र्ज़ पूरा कर लूं ! फिर, अल्लाहताआला के फ़ज़लोकरम से एक बार और हज कर आऊँ ! काश, ऐसा हो पाता ?

आयशा – मुझे तो ऐसा लगता है, यह मामला पढ़ाई से जी चुराने का हो सकता है ? क्या, कोई..?

हाजी मुस्तफ़ा – क्या करें, हुज़ूर ? बेचारी जोड़, बाकी और ज़रब में कमजोर है ! जानती हैं, आप ? गए साल बेचारी ने, क्या-क्या नहीं किया ? अरे हुजूरे आलिया, हर इम्तिहान के रोज़ कारचोब वाला इमामजामिन पहना करती, और घर से रुख़्सत होते वक़्त बेग़म उसको दही-मछली चखा देती..और क्या ? मेहतरानी को बुलाकर, सदका...

आयशा – हाय इतने सारे टोटके करने के भी बाद, ये टोटके कुछ भी काम नहीं आये ! बेचारी रौनक छ: नंबर से रह गयी ! यही बात है, ना ?

[आयशा झट नोटों को अपने कब्जे में लेते हुए, उन्हें पर्स में रख देती है ! फिर भोली बनी हुई, हाजी साहब का मुंह देखने लगती है ! भोली शक्ल बनायी हुई आयशा का इस तरह देखने से, हाजी साहब की आगे कहने की हिम्मत बन जाती है ! वे आगे, कहते हैं !]

हाजी मुस्तफ़ा - रौनक इस साल, प्राइवेट स्टूडेंट की तरह इम्तिहान में बैठेगी ! मगर...

आयशा – मगर, क्या ? तकल्लुफ़ की क्या ज़रूरत ? कुछ बयान कीजिये, हाजी साहब ! हम आपका काम नहीं करेंगे, तो किसका काम करेंगे ?

[तभी शमशाद बेग़म तश्तरी में चाय, मिठाई और नमकीन लेकर हाज़िर हो जाती है ! सारा सामान टेबल पर, करीने रखकर, वह चली जाती है ! उसके जाने के बाद, दोनों चाय के प्याले उठाते हैं ! अब, हाजी साहब आगे बयान करते हैं !]

हाजी मुस्तफ़ा – [चाय की चुसकी लगाते हुए] - असतग़फ़िरुल्लाह कहीं इन लबों से ग़लत बात न निकल जाए ? आपका हुक्म हो तो...यह बन्दा इल्तज़ा करता है, आपसे...यूं तो बेबी रौनक प्राइवेट इम्तिहान में बैठेगी, मगर हम चाहते हैं..कि, वह आपके मेहर से रेगुलर क्लास में बैठकर पास हो जाए !

[नाश्ते की प्लेट, हाजी साहब की तरफ़ खिसकाकर, आयशा कहती है !]

आयशा – हुज़ूर, यह क्या..आप हाथ धरे, बैठ गए..? अरे जनाब, नोश फ़रमाएं..जनाब हाथ बराबर चलता रहना चाहिए ! ना तो ये नमकीन ठन्डे हो जायेंगे, जनाब ! फिर ठन्डे नमकीन खाने में, कहाँ लुत्फ़..? हुज़ूर, नमकीन गरम-गरम खाने का मज़ा ही अलग है !

हाजी मुस्तफ़ा – [मिठाई का टुकड़ा मुंह में, डालते हुए] – हुज़ूर, हम ज़रा मीठे के शौकीन ठहरे ! इसलिए हम, पहले मीठा ही खायेंगे ! लीजिये, अब काम की बात करें ! अगर आपको मंजूर हो तो, उसे कल से भेज दूं स्कूल ?

आयशा – [अपने आप] – अल्लाह का शुक्र है, क़ुरबानी का बकरा ख़ुद ही आ गया हलाल होने ! फिर हम क्यों पीछे रहें, इस भेड़ को मूंडने...?

[सर पर ढका रिदा वापस कन्धों पर आ जाता है, उसे वापस सही-सलामत रखती हुई आयशा अपने लबों पर मुस्कान बिखेर देती है ! फिर, वह कहती है !]

आयशा – [लबों पर मुस्कान लाकर, कहती है] – जनाब, परवाज़ –ए-तख़य्युल [कल्पना की उड़ान] किस काम की ? आप तो अपने हो, फिर मुझे कहने में क्या शर्म ? आप हम पर वसूक करते हैं, और हम आप पर वसूक रखते हैं ! बस, यही कहना है..ज़रा स्कूल में फर्नीचर की कमी है ! किसी की ओर से, इन्तिज़ाम हो जाय... फ़हवुल मुराद [तो ठीक है] है, बस एक-दो सेट....

हाजी मुस्तफ़ा – ख़ुदा की पनाह, कहीं से क्यों ? अपने ग़रीबखाने से भेज देता हूं, फर्नीचर...हुज़ूर, [मिठाई व नमकीन की प्लेट, ख़ाली हो जाती है] अभी वापस हाज़िर हुआ !

[हाजी मुस्तफ़ा, जाते हुए नज़र आते हैं ! धीरे-धीरे, उनकी पदचाप की आवाज़ आनी बंद हो जाती है ! मंच पर, अँधेरा छा जाता है !]

नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक १२ राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

मंज़र ३ “शतरंज की चाल”

[मंच रोशन होता है, स्कूल का मेन गेट नज़र आता है ! इस वक़्त हाजी मुस्तफ़ा इसे पार करके, मनु भाई की दुकान की ओर अपने क़दम बढ़ाते जा रहे हैं ! अभी वहां पत्थर की बैंच पर, फन्ने खां साहब और मनु भाई बैठे शतरंज खेल रहे हैं ! उनकी चालों पर अपनी नज़र गढ़ाए मियां तौफ़ीक़, पास ही खड़े हैं ! तभी सड़क से मूंडी हुई भेड़ो का झुण्ड गुज़रता है, उस झुण्ड को देखकर उनके लबों पर तबस्सुम फ़ैल जाती है ! वे मुस्कराकर, कह देते हैं !]

तौफ़ीक़ मियां – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – शतरंज की सौ चालें होती है, हर चाल से चाल निकलती है ! [हाजी मुस्तफ़ा को देखते हुए] और, फिर क्या ? हर चाल से मूंड ली जाती है, भेड़ ! क्या करें, जनाब ? वह बेचारी भेड़ ख़ुद अपनी ख़ुशी से जाती है, मूंडने के लिए...[हाजी मुस्तफ़ा की ओर, उंगली से इशारा करते हुए] देख लीजिये सामने, मूंडी हुई भेड़ इधर ही चली आ रही है !

[फिर क्या ? बिछी शतरंज से मनु भाई का प्यादा उठाकर उसे एक क़दम आगे चला देते हैं, जिससे फन्ने खां साहब का ऊंट उस प्यादे की चाल के रास्ते में आ जाता है ! फिर जनाब, ज़ोर से बोलते हुए कहते हैं !]

तौफ़ीक़ मियां – [ज़ोर से, बोलते हुए] – शह....! सद्दाम साहब बचाओ, अपने बादशाह को !

मनु भाई – [खुश होकर, कहते हैं] – वाह...तौफ़ीक़ साहब ! सद्दाम साहब का बादशाह बेमौत मारा गया, वह भी इस अदने से प्यादे की मार से...? अरे जनाब, अब गेम साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है कि, “प्यादा खड़ा है, वजीर के ज़ोर पर! और, क्या कहें तौफ़ीक़ साहब ? क्या कमाल चाल सोची आपने...? वाह उस्ताद, वजीर खड़ा है...हाथी के ज़ोर पर !

फन्ने खां - [बुरा मुंह बनाकर, कहते हैं] – इस बार मात मिली है तो क्या ? मैं क्या भेड़ हूं, जिसे लोग बार-बार मूंडते रहें ? अब तुम मियां याद रखना, मैं भी अब शतरंज की ऐसी चाल चलूँगा कि..[हाजी मुस्तफ़ा को देखते हुए] क्यों हाजी साहब, मुंह उतारे क्यों बैठे हो ? कहीं किसी ने आपको, मूंड लिया क्या ?

[अब फन्ने खां साहब के साथ-साथ, सभी हंसते हैं !]

हाजी मुस्तफ़ा – [अपने-आप] – ये लोग, किसका जिक्र कर रहे हैं ? कहीं वह बादशाह, हम तो नहीं ? जिसे शह मिली है, या वह भोली भेड़ हम तो नहीं जजी उस खुर्राट हुस्न की मल्लिका के हाथो मूंड ली गयी !

[फिर अपने आप, उनके मुंह से बरबस ये अल्फ़ाज़ निकल पड़ते हैं !]

हाजी मुस्तफ़ा – अरे, आरिफ़ लोगों ! ज़राफ़त [विनम्रता] से क़ुबूल कीजिये, मिली हुई शह को ! क्या आप नहीं जानते, यह ऐसी जंगाह [युद्ध का मैदान] है...जहां..

मनु भाई – [अधूरे बोले गए जुमले को पूरा करते हैं] – शतरंज की सौ चाले होती है, चाल से चाल में से चाल निकलती है !

[मंच पर, अँधेरा छा जाता है !]

कुछ कठिन उर्दू अल्फ़ाज़ के मफ़हूम -: ख़त व किताबत = पत्र-व्यवहार, ख़्वास्त = प्रार्थना, मुख़ासमत = विरोध या शत्रुता, मग़मूम = दुखित, ज़राफ़त = विनम्रता, जुरअत = हिम्मत या दुस्साहस, महजून = दुखित, महसूद = घृणित, महामद = गुण, आवाज़े बाज़गास्त =प्रतिध्वनि, फ़ेहरिस्त = सूची, इंडेक्स, परवाज़-ए-तख़य्युल = कल्पना की उड़ान, फ़हवुल मुराद = तो ठीक है, जंगाह = युद्ध का मैदान, रिदा = चूनरी, चुन्नी, दुपट्टा !

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  1. पाठकों, आपको यह अंक 12 ज़रूर पसंद आया होगा, बेचारी शमशाद बेगम के पीछे किसी बड़े आदमी का कोई ज़ोर नहीं, इसलिए वह हर जगह मात खाती है । जबकि तौफ़ीक़ मियां झट पाला बदलकर उसी ओर चले जाते हैं, जिसका सूरज उदय हो..। वे कभी अस्त हुई शख़्सियत वाले आदमी का साथ कभी नहीं करते, दूसरे शब्दों में ज़माने में जो प्रभावी होगा, उसकी तरफ ही मियां रहेंगे । इस तरह मियां के पीछे हमेशा ताकतवर शख़्स का जोर रहता है । इससे वे खाली फायदा ही उठाते हैं । यह स्कूल यानी दबिस्तान है, जहां जंगाह में शतरंज बिछी है । इस शतरंज में कई चालें चली जाती है, हर चाल से चाल निकल करती है । वही खिलाड़ी जीतता है, जो अपने मोहरों को बचाना जानता है । न तो फिसड्डी खिलाड़ी की तरह उसका बुरा हाल बन जाता है, जिसे कोई भी शख्स भेड़ की तरह उसे मूंड सकता है । यही है, शतरंज की चाल । इस अंक को पढिये, आपको बहुत पसंद आएगा ।
    दिनेश चंद्र पुरोहित
    dineshchandrapurohit2@gmail.com

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