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ललित व्यंग्य // खीर और खिचड़ी // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

खीर और खिचड़ी दोनों साथ साथ – ना बाबा ना। खीर और खिचड़ी का कोई साथ नहीं है। खीर के साथ खिचड़ी नहीं खाते और और खिचड़ी के साथ दही खाते हैं, खीर नहीं। खीर हर त्यौहार पर बनती है। खिचड़ी के लिए बस एक ही त्यौहार मुक़र्रर है। मकर संक्रांति का पर्व। इस दिन तिल-गुड और खिचड़ी खाई जाती है, मकर संक्रांति में खिचड़ी का इतना कुछ महात्म्य है कि मकर संक्रांति पर्व को खिचड़ी नाम से ही पुकारा जाने लगा है। पर खिचड़ी किसी अन्य त्यौहार पर नहीं बनाई जाती। खिचड़ी अधिकतर बीमारी-हारी में खाई जाती है। बीमारी में खीर नहीं दी जाती। खीर स्वस्थ लोगों का खाना है। खीर किसी की भी पकाएं (चावल की, लौकी की, गोभी की) लेकिन उसके लिए दूध आवश्यक है। खिचड़ी भले ही उरद की दाल की बनाएं या मूंग की दाल की, उसके लिए दूध बिलकुल गैर ज़रूरी है, चावल आवश्यक है।

एक दूसरे से मेल न खाते हुए भी खीर और खिचड़ी, दोनों कम से कम एक बात में समान हैं। कहा यह जाता है कि खिचड़ी के चार यार – घी, दही, पापड, अचार। दूध और चावल की बनी सादा खीर भी खाने में स्वाद पूरा नहीं आता। खीर में मेवा भी पडी हो, मज़ा तभी आता है। इलाइची केसर पिस्ता बादाम- खीर का पूरा स्वाद लेने के लिए ज़रूरी हैं।

राजनीति में अभी तक खिचड़ी पकती थी। कैसे चुनाव जीता जाए इसके लिए दलों में गुप-चुप मंत्रणाए होती थीं फिर भी जब एक पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाता था, खिचड़ी सरकार बना ली जाती थी। खिचड़ी सरकार की अपनी सीमाएं हैं। ऐसी सरकार में जबतक पटती रहती है, लोग खिचड़ी स्वाद ले ले कर जीमते रहते हैं। अन्यथा खिचड़ी-सरकार पटरी से उतर जाती है। शायद ही कभी खिचड़ी सरकार अपना टर्म पूरा कर पाई हो। खिचड़ी सरकारों को हमेशा बदनामी ही हाथ लगी। शायद इसीलिए राजनीति का रुझान अब खीर की तरफ हो गया है। इसका संकेत केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने कर दिया है। पटना में उन्होंने यादव और कुशवाहा समाज को साथ लाने की वकालत करते हुए कहा की यदि यदुवंशियों का दूध और कुशवाहों का चावल मिल जाए तो खीर बढ़िया बन सकती है। साथ में दलितों,आदि, की पञ्च-मेवा भी मिल जाए तो खीर का स्वाद और भी बढ़ जाए।

राजनीति में आप इशारे से बात करें तो लोग समझते नहीं। सीरियस से सीरियस बात को बस उड़ा देते हैं। कुशवाहा जी इशारा कर रहे हैं कि खिचड़ी कब तक पकाते-खाते रहोगे ? खीर खाओ खीर। लेकिन लोग हैं कि समझते ही नहीं। खिचड़ी खाने की लगता है आदत पड़ गई है। पर ऐसे लोगों की भी दुनिया में कमी नहीं है। मैं कई ऐसे लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ। खीर और खिचड़ी यदि दोनों उनके सामने रख दी जाएं, वे निश्चित रूप से खीर के मुकाबले खिचड़ी को ही वरीयता देंगे। राज-नेताओं को भी खिचड़ी खाने की आदत पड़ गई है। उन्हें वही स्वाद लगती है। खिचड़ी के बाद वे सीधे मलाई खाते हैं। खीर नहीं।

खीर हर तरह से खिचड़ी से बेहतर मानी जा सकती है। लेकिन हमारे खिचड़ी प्रेम को देखिए कि हम कोशिश कर रहे हैं कि इसे राष्ट्रीय व्यंजन घोषित कर दिया जाए। क्यों भई खीर को क्यों नहीं ? खीर भी तो हमारे पूरे भारत में खाई जाती है। कोई ऐसा प्रदेश नहीं है जहां खीर न बनाई जाती हो। मीठी खीर खाइए। खिचड़ी में क्या रखा है ? सच पूछा जाए तो खीर ही, बिना घोषित किए हुए भी, हमारा राष्ट्रीय व्यंजन पहले से है। लेकिन राज-नेताओं को क्या कहा जा सकता है ? कुछ खिचड़ी सरकारें सफल क्या हो गईं, खीर को ही भूल गए। कुशवाहा जी ने गलती सुधारने की थोड़ी कोशिश ज़रूर की है। देखना है कहाँ तक सफल हो पाएंगे ? मेरी शुभ कामनाएं उनके साथ हैं। उम्मीद करता हूँ अब शीघ्र ही खिचड़ी सरकारों की बजाए खीर-सरकारें बना करेंगीं। बल्कि कहना चाहिए की खिचड़ी सरकारें अब खीर-सरकारें कही जाएंगी। नाम बदलने में क्या रखा है –यह कथन ही गलत है। खिचड़ी को खीर कहकर खाइए, फिर देखिए ! खीर का ही स्वाद आने लगेगा।

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०,एच आई जी,

१ सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

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