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शिव उपासना एवं बेलपत्र - श्रीमती शारदा डॉ. नरेन्द्र कुमार मेहता

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शिव उपासना एवं बेलपत्र

प्रतिवर्ष श्रावण मास का आगमन हमारे परिवार में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष तथा विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए भी उल्लास, उमंग और शिव आराधना का प्रमुख माह है। श्रावण के आगमन के पूर्व ही हम माली काका को बिल्वपत्र, धतूरा, आँकड़ा, पारिजात के पुष्प आदि शिव पूजन की सम्पूर्ण सामग्री देने का विशेष रूप से आग्रह करते हैं। शिव पूजन में सबसे अधिक महत्व बिल्व पत्र का ही होता है। ऐसी मान्यता है कि बिल्व पत्र समर्पित करने पर ही शिवपूजा पूर्ण कहलाती है।

ऐसा कहा जाता है कि समुद्र मंथन से निकलने वाले जहर को भगवान शंकर ने ग्रहण कर लिया था और उसे अपने कंठ में रोक लिया था। तभी से शिव जी का नाम नीलकंठ हुआ। उस जहर की गर्मी को दूर करने के लिए शिव जी पर आज भी लगातार जल चढ़ाया जाता है, दूध चढ़ाया जाता है तथा शिवलिंग पर पंचामृत स्नान भी कराया जाता है। शिवलिंग पर अनवरत रूप से जल व दूध की पतली धारा गिरती रहती है। बुद्धि की जड़ता को दूर करने के लिए शक्कर मिश्रित दूध का अभिषेक करने की परम्परा है। इससे शिवभक्त विद्यार्थियों को अध्ययन में विशेष सफलता प्राप्त होती है। दुग्धाभिषेक के पश्चात् शुद्ध जल स्नान के पश्चात् बिल्वपत्र चढ़ाते समय उसके चिकने भाग को शिव के मस्तक पर रखा जाता है। कुछ परिवारों में शिवालयों में बिल्वफल भी अर्पित किये जाते हैं। बिल्व पत्र चढ़ाते समय निम्नलिखित श्लोक बोला जाता है : -

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्।

त्रिजन्म पापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।।

नित्यकर्म - पूजा प्रकाश शिवपूजा गीताप्रेस

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सामान्यतः बिल्वपत्र के तीन पत्ते होते हैं। दो पत्ते वाले बिल्वपत्र पूजन में मान्य नहीं हैं। बिल्व पत्रों के कुछ वृक्षों पर पाँच, छः, सात तथा ग्यारह पत्ते भी होते हैं। परन्तु ये यदा - कदा ही प्राप्त होते हैं। ऐसे पेड़ दुर्लभ प्रजाति के होते हैं। भारत के पड़ौसी देश नेपाल में ज्यादातर पेड़ों पर ऐसे ही बिल्वपत्र प्राप्त होते हैं। वहाँ के पशुपतिनाथ मंदिर में हजारों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिवर्ष जाते हैं। कहीं - कहीं सफेद रंग के बिल्वपत्र भी पाये जाते हैं।

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हिन्दू संस्कृति में शिवलिंग पूजन में विशेषकर तीन पत्तियों वाले बिल्वपत्र अर्पित किये जाते हैं। ये तीन पत्तियाँ अर्थ, धर्म तथा मोक्ष प्रदान करने का प्रतीक हैं। स्कंद पुराण के अनुसार यह कथा है कि शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती जी ने अपने ललाट का पसीना पोंछ कर फैंका। पसीने की कुछ बूॅंदें मंदार पर्वत पर गिरीं जिनसे बिल्व वृक्ष का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसी मान्यता है कि बेलवृक्ष के विभिन्न हिस्सों में कई देवी - देवताओं का निवास है। बिल्व वृक्ष की जड़ में पार्वती, शाखाओं में दाक्षायिणी, फूलों में गौरी तथा फल में माँ कात्यायिनी का निवास रहता है। जो भक्त भगवान आशुतोष को बिल्व पत्र श्रद्धा - भक्ति के साथ अर्पित करता है उसकी सम्पूर्ण मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। वह भोलेनाथ का परम प्रिय शिष्य कहलाता है तथा वांछित फल प्राप्त करता है -

‘‘शिवे भक्तिः शिवे भक्तिः शिवे भक्तिः र्भवे भवे ।

नान्यथा शरणंनास्ति त्वमेव शरणं मम’’

बिल्व पत्र तोड़ने के कुछ नियम पंडितों ने दर्शाये हैं। पत्रों को तोड़ने में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। खंडित बिल्वपत्र शिवपूजन में मान्य नहीं हैं। यदि किसी कारणवश ताजे बिल्व पत्र उपलब्ध न हो तो पूजित बिल्व पत्रों को शुद्ध जल से धोकर पूजा में उपयोग करने का विधान है। कहा जाता है कि अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा तथा सोमवार को बिल्वपत्र नहीं तोड़ना चाहिये।

बिल्वपत्र तोड़ते समय निम्नलिखित श्लोक बोलने का विधान है : -

अमृततोभ्दव! श्रीवृक्ष! महादेव प्रियः सदा।

गृह्णामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्।।

आचारेन्दु

घर में लगा हुआ बिल्व वृक्ष सुख - समृद्धि तथा शान्ति लाता है। वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन बिल्व वृक्ष की उत्पत्ति मानी जाती है। शिवजी ने भी कहा कि मैं बिना बिल्व पत्र के पूजा स्वीकार नहीं करूँगा। बिल्व पत्र का औषधीय महत्व भी है। यह शरीर की उष्णता को शान्त करता है। उच्चरक्त चाप तथा मधुमेह में लाभकारी है। बिल्व फल को श्रीफल भी कहा जाता है। आयुर्वेदीय चिकित्सक श्रीफल से निर्मित शरबत को ग्रीष्म ऋतु में पीने की सलाह देते हैं। यह यकृत तथा पेट की अन्य व्याधियों को दूर कर उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है। बेल फल से निर्मित मुरब्बा खून आमपेशिच में निरापद औषधि के रूप में प्रसिद्ध है। त्वचा संबंधी रोग भी दूर करता है। ज्वर आने पर बिल्व पत्र का काढ़ा बनाकर दिया जाता है। चिकित्सक बिल्व पेड़ के विभिन्न भागों से बने रस, काढ़े तथा चूर्ण को लेने की सलाह देते हैं।

श्रावण के सोमवार से ही सोलह सोमवार के व्रत का प्रारंभ किया जाता है। मेरा यह विशेष आग्रह है कि शारीरिक रूप से कमजोर तथा वृद्ध भक्तजन यदि श्रावण मास में विशेषकर सोमवार को शिवालय जाने में असमर्थ हों तो बाजार से अभिषेक पात्र क्रय कर घर में ही श्रद्धापूर्वक शान्ति के साथ अभिषेक, पूजन कर भगवान आशुतोष को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद ग्रहण कर सकते हैं। क्योंकि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा है -

हरि व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम ते प्रकट होहिं मैं जाना।

बालकांड - दो. क्र. 185, 3

शिवालयों में जल, दूध, दही, शहद, घी आदि के कारण चलने में फिसलने का भय रहता है। कई वृद्ध भक्त चोटिल होकर चलने - फिरने में असमर्थ हो जाते हैं। उन्हें इस बात पर शान्तिपूर्वक विचार करना चाहिये और अपने मित्रों को इस विचार के लिये प्रेरित करना चाहिये।

मैं प्रतिवर्ष अपने घर की क्यारी में बिल्व फल के बीज उपचारित कर बो देती हूँ। भगवान शिव की कृपा से लगभग सभी बीज अंकुरित होकर नन्हें पौधों के रूप में विकसित हो जाते हैं, जिन्हें मैं आस - पड़ौस, बगीचों, मंदिरों में रोपित करने के लिए दे देती हूॅं। पौधों का विकास धीमा होता है पर धीरे - धीरे वे वृक्ष रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। ऐसा करने से नई पीढ़ी को वृक्षारोपण के प्रति जागरूकता बढ़ती है वे भी इस ओर एककदम बढ़ा सकते हैं।

बिल्व वृक्ष की जड़े हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक माटी में इस तरह गुम्फित हो चुकी हैं कि शिवोपासना का श्रावण मास हो, महाशिवरात्रि हो, हरतालिका पूजन हो, सोलह सोमवार हो या फिर अन्य शिव पूजन हो हमारे शिवमंदिरों में जनसैलाब उमड़ पड़ता है, और बिल्वपत्र का विक्रय अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है। कई विक्रेताओं की उदरपूर्ति का आश्रय बन जाता है और प्रतिवर्ष बिल्व पत्र के वृक्षों का रोपण करने से पर्यावरण संरक्षण होता है और नगर की हरीतिमा में वृद्धि भी होती है।

श्रीमती शारदा डॉ. नरेन्द्र कुमार मेहता

एम.ए.संस्कृत

Sr. MIG-103, व्यास नगर,

ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन, (म.प्र.)456010,

Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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