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सुमन गौड़ की नज़्में

सुमन गौड़ की नज़्में

सुमन गौड़ की नज़्में  



ख़्वाब जो कभी मुक़म्मल नहीं हुआ था
मेरी वजह से
तुम्हारी वजह से
या कुछ लोगों की वजह से
ख़ैर जो भी हुआ
वो गुजरे वक़्त का एक किस्सा बन के रह गया
आज , जबकि
न तुम  " तुम " रहे
न मैं  " मै " रही
और न ही शायद वो लोग रहे
सो चुके है हमेशा के लिए
दूर कही हमसे ख़ामोशी को ओढ़ कर
तो ऐसे में ......
तुम चाहो तो
वक़्त की सिलवटों को सिमटते हुए
एक नया ख़्वाब फिर से देख सकते हो
और , इसके लिए
मैं  , तुम्हें मुक़र्रर करती हूँ ।


रोज देखती हूँ
दीवार पर टँगी हुई
इस तस्वीर में तुम्हें
गुमसुम , ख़ामोश से
झुँझला उठती हूँ
कई बार मैं
सोचते हुए कि ....
थकते नहीं हो तुम
बरसों गुज़र गए
यूँ ही , एक जगह पर बैठे हुए
और
मेरी बेचैनी को समझते हुए
आना चाहते हो बाहर
तस्वीर से तुम
लेकिन मेरे ही हाथ रोक देते है तुम्हें
नहीं .....
अभी ये दुनिया
तुम्हारे लायक नहीं ।


दूर उफ़क़ से आज फिर
इक सितारा टूटा
और ....
चमकती , तेज़ रौशनी
तहलील हो गई शब -ए - तारीक में
मिरी आसूदगी तिश्न-ए-लब पर
तारी हो गई
कि वो मिरा चमकता सितारा
जो सोज़ -ए-हिज़्र में
हमदम-ए-देरीना होता है
मौज़ूद है .....
रात की बॉहों में
सुकूत-ए-शब को ओढे
पर , दिल में इक हूक सी उठी
जो मुझे मुज़तरिब करती है
कही तुम्हारी नई परवान चढ़ी
दास्तां-ए-मुहब्बत तो नहीं ?
फिर कही रिश्ता-ए-जुरअत टूट तो नहीं गया
मैं सुन रही हूँ .....
हिसार-ए-ख़ामोशी में
सीना-ए-सोजाँ से आती सिसकियों की आवाज़
हालाँकि , आज तुम मेरी दस्तरस में नहीं हो
फिर भी , मिरा तार -ए-नफ़स तुम से ही
मक़रूज़ है
तुम्हारे दिये क़र्ब , अज़ाब , बदगुमानी
और पामाल तमन्नाएँ
लौह-ए-जाँ-ए-असासा है मिरे
तुम फ़िक्र न करो
मैं सुन रही हूँ दूर कही से आती
आवाज़-ए-अजां
दुआ करुँगी कि
काएनात-ए-हसीं में
तिरी मुहब्बत सलामत रहे
और , मुझे यक़ी है ....
कुबूल होगी मिरी दुआ
क्योंकि , आज मैंने
अहद-ए-माज़ी की
मिरे ताक़-ए-दिल पे सजी
मेरी यादे , महव-ए-ख़्वाब को
फ़ना कर दिया है ।


एक रोज
मेरी आँखों में झाँकते हुए
पूछा था तुमने
कि मेरी कोई याद जीवित है
तुम्हारे भीतर ....
मैंने भी हँसते हुए
कह दिया था
कि तुम्हारी यादों का जँगल
उगा हुआ है मेरे भीतर
और , तुम
इन आँखों के रस्ते
उतर गए इसी जँगल में कही
आज , बरसों गुज़र गए
इंतिज़ार में.......
मरुधरा में विचरते हुए
तुम्हारी राह देख रहे है
मैं और तुम्हारा लगाया हुआ
रोहिड़ा ।



रात चाँदनी जब छिटकने लगती है
शाख़-ए-गुल पर
तो मेरी पलकें भी
पिरोने लगती है तेरी यादों को
आहिस्ता-आहिस्ता
बीतती रात के साथ
ये यादें घुलने लगती है
आ कर मेरे ख़्वाबों में
तो उस वक़्त मैं बे लिबास सी
तुम्हारे ज़िस्म में समायी
सुकूत-ए-शब् की चादर को ओढ़
पिघलती सी ...
और , तुम
रब्त के इस ख़ूबसूरत मंज़र को
एक ही नाम से पुकारते हुए
माह-ए-तमाम ।


क्या हमारी मोहब्बत भी हो गई
पीतवर्ण सूखे पत्तों की तरह
जो जल कर देते है
सिर्फ़ धुँआ और मुट्ठी भर
राख़ के कुछ अवशेष
यदि ऐसा है तो
आ जाओ किसी रोज़ तुम
ताकि हम दोनों मिलकर लगा दे
एक नया कल्प वृक्ष ।


किसी रोज़ चाँद को देख
जब सुना रहे तुम अपनी कहानी
तो , तुम्हारी भीगी आँखों से
गिरा था आँसू का इक क़तरा
जिसे सहेज लिया था मैंने
अपनी मुट्ठी में
हमेशा हमेशा के लिए
बीतते वक़्त के साथ साथ
     ये आब-ए-चश्म
   तब्दील हो गया है गुहर में
   अब इसे
    मैं रोज़ रखती हूं
   चाँद के सामने
   और  खल्वत  में सुनती हूँ
    तुम्हारी वही कहानी
    अपने इस गुहर के साथ
    अपनी शब्-ए-हिज़्र को
      दूर करती हुई ।


तुम ज़रा सुनो तो
रुको, बैठो
कुछ बात तो करो
तुम्हें आँख भर देखना चाहती हूँ
जी भर सुनना चाहती हूँ
तुम्हारी साँसों को
अपनी साँसों संग
मिलाना चाहती हूँ
पर , तुम
चुपचाप, गुमसुम से
मेरे शानों पर छोड़ कर
एक ख़ामोश सी चुप्पी
चले जाते हो
नाम दे कर इसे
मुहब्बत का ।


वो बीता हुआ लम्हा
मेरी ज़िंदगी का
साँस ले रहा है
आज भी
मेरे भीतर
कही न कही
तभी तो अक्सर उतर आती है
मेरे स्मृति पटल पर
ओस से भीगी वो सुबह
और
महसूस करने लगती हूँ
तुम्हारी साँसों की गर्माहट को
मेरी साँसों के साथ
    हालाँकि
वो उस की बूँदें
अब ठहर चुकी है
मेरी आँखों में दर्द बन कर
    क्योंकि , नहीं जानती थी तैरना
      ये भी ....
     मेरी ही तरह ।



ये तेज़गाम उम्र
निकले जा रही है
तुम ज़रा आ जाओ तो
क़ायम रहे
ये रिश्ता-ए-उम्मीद
          और
मिल जाएगा
ख़ाका-ए-हयात
मेरी ठहरी हुई उन्स को
पा लूँगी मैं भी
मेरे हिस्से की
मायूसी-ए-मआल-ए-मुहब्बत।


सब्र कर लेती
समझा लेती दिल को
बात अगर पैरहन की होती
पर , तुमने तो
दामन-ए-ज़िन्दगी को ही
चाक कर दिया
अब रफ़ू करूं भी तो
कैसे करूँ
मैं



किसी ख़ूबसूरत मन्ज़र को देख
हाथ टटोलने लगते हैं
जेब में रखे मोबाइल को
और
हम अपनी सेल्फी के लिये
तलाशने लगते है
एक ख़ाली सा कोना
ये सोचते हुए
कभी एकाकी पलों में
अपने ख़ालीपन को भरने के लिए
काम आएगी
ये सेल्फी ।



कोने में रखी टेबल पर
तुम्हारी ऐश ट्रे
आज भी वैसी ही है
हाँ , इसे रोज़ साफ ज़रूर करती हूँ
पर , बाहर से ही
भीतर रखे है आज भी कुछ
अध -जले सिगरेट के टुकड़े
तो कुछ अन सुलगी हुई सिगरेट
तेज बारिश में.....
तुम सिगरेट पीते ज़रूर थे
पर बिन सुलगाए ही
अपने होंठों से लगा कर
वापस रख देते थे ऐश ट्रे में
ये कहते हुए कि ....
आज इसकी जरूरत नहीं
और बारिश की बूँदों को
अपनी हथेलियों में समेट
देखा करते थे
मेरे भीगे हुए चेहरे को तुम
यूँ तो वक़्त की मौज पर
कितनी बारिशें हुई
ठीक से याद नहीं
पर , आज सुब्ह से ही हो रही है
ठीक वैसी ही तेज बारिश
जिसे , देख रहे है बाहर सभी
पर , मैं इस बारिश में
तुम्हारी मुक़द्दस हथेलियों को
याद करते हुए
बरस रही हूँ .....
खुद ही के भीतर
और
मेरे भीतर की इस बारिश को
क़रीब से देख रही है
तुम्हारी ऐश ट्रे में
ख़ामोश बैठी
अन-सुलगी सिगरेट।



दूर पर्वतों में
गूँज रही है
आज भी मेरी आवाज
प्रेम से पुकारा था
जब मैंने तुम्हारा नाम
मेरे सच्चे प्रेमी
सदियों के साक्षी सूरज के सामने
अनन्त तक फैली पर्वत श्रृंखलाओं के बीच
तब सच में हुआ था
ब्रह्मनाद ......
और
अमर हो गया
हमारा प्रेम
पर्वत श्रृंखलाओं से ऊँचा उठ कर
देशकाल की सीमाओं से परे
ये ही सच्चा अनुभूति थी
मेरी
तुम्हारी
और
अमरत्व की
प्रेम में
मेरे प्रिये ।



दूर आसमाँ में
बादलों को एक दूसरे में
तहलील होते देखना
कितना दिलकश होता है
कही कोई काला टुकड़ा
तो कही सफ़ेद चमकीला सा
और
जब ये दोनों घुल जाते है
एक दूसरे में
तो उभर आता है
धूसर सा इक नया रंग
बादलों की ये अठखेलिया देखते हुए
किसी वक़्त
कहा करते थे तुम  मुझसे
कि गौर से देखो ज़रा इनको
मेरी आँखों से तुम
उन्मुक्त सी पवन
कितनी आसानी से उकेर देती है
हम दोनों की तस्वीर
इन्हीं बादलों के बीच
और
पहाड़ी की ओट ले
मुस्कुरा देता  है सूरज
सच में ....
तुम दिखाई देते थे मुझे
मेरा हाथ थामे हुए
इन्हीं बादलों के बीच में
और ये मंज़र देखते हुए
वक़्त मानो ठहर सा जाता था
पर, सुनो जानाँ
मैं देखना चाहती हूँ
तुम्हारी ही आँखों से
इस जहाँ की ख़ूबसूरती को
हमेशा-हमेशा के लिए
तो क्या
ऐसा हो सकता है कभी ?
मैं फिर से
देख सकूँ , पहले की तरह
ये सब ।



तुम मेरी ज़िंदगी में आए
और
उतरने लगे मेरे जीवन में
आसपास हाँ हर पल मेरे साथ-साथ
भाता था मुझे तुम्हारा ये साथ
तुम सपने दिखाते
मैं , सपने देखती
और
अपनी ज़िंदगी इन सपनों में ही जीती
इन्द्र धनुषी रंगों में घुल
खुद को , तुम्हारे साथ देखना
अच्छा लगता था
ऐसा न था कि
सच से अनजान थी
याँ, कहूँ तुमने कुछ बताया नहीं
बस , मैं ही जानकर अनजान बनी रही
शायद, यथार्थ के धरातल को
नहीं चाहती थी  देखना
यकायक एक दिन
तूलिका हाथ में ले खीँचने लगी
बहुत सी आड़ी तिरछी रेखाएं
तुम्हारे, मेरे बीच संबंधों को लेकर
और हैरान थी देख कर
कोई भी रेखा ,किसी भी फ़लक पर
मिल न सकी
बनाना चाहती थी
ज़िन्दगी की किताब का आवरण चित्र
तुम्हारे साथ , तुम्हारे घर में
ज़िन्दगी के लम्हों को बाँटते हुए
पर, तूलिका कुछ भी उकेर न सकी
हाँ , तुम्हारे  इर्द-गिर्द
तुमसे जुड़े कुछ बिम्ब ज़रूर थे
उस घर में जो साँस ले रहे थे
सिवाय मेरे।
बहुत टटोला, बहुत देखा
पर बिम्ब तो क्या कोई प्रतिबिम्ब भी न था
आधा- अधूरा सा
मेरा , तुम्हारे साथ
तुम्हारे घर में
पर , दूर गली के नुक्कड़ पर
भीड़ में ज़रूर देख रही थी
एक तन्हा, थकाहारा सा चेहरा
जिसे  पहचानने भर की
कोशिश करते हुए  सोच रही थी
ये हमशक्ल कौन है मेरा अपना सा ।




सोचती हूँ अक्सर
कि ज़िन्दगी का कैनवास है कितना विस्तृत
इन्द्रधनुषी रंगों से है ये भरा
हर किसी को
अपने हिस्से का रंग है मिला
कभी धूप ,तो कभी छाव
कभी दौड़ती,  तो कभी थमती सी
ये ज़िन्दगी
हर फ़लक पर
अपना रूप है ये बदलती
भोर के साथ
स्वर्ण रथ पर हो सवार
पथिक सा रवि
चल देता है नव-सृजन हेतु
अपनी यात्रा पर
हर जगह, हर पल
अपनी रश्मियों को बाँटते हुए
कर देता है सम्पूर्ण वसुन्धरा को हरा भरा
कालचक्र के साथ
कुछ अन्तराल के बाद
   ये सिमटने लगता है
   निशा के आग़ोश में
   और फिर ...
ढलती शाम
तारक दीप प्रज्वलन के साथ
मैं प्रतीक्षारत ...
ऐसे ही किसी क्षण में उभरे किसी रंग की
जो मेरी तूलिका को भा जाए
और उकेर दे
मेरी ज़िंदगी के कैनवास में दबे
किसी प्रतिबिम्ब से बिम्ब को
मेरे लिए
मेरे जीवन में ।




कोहरे में डूबी सुब्ह से
सावन बून्द बून्द झर रहा है
और
खिड़की खोलते ही
नम हवा ने भिगो दी मेरी देह
तुम्हारी ख़ुश्बू से
तुम ज़रा आ कर तो देखो
महकने लगी है मेरी साँसें
तुम्हारी मौन उपस्थिति से
धुन्ध की चादर फ़ैली है चहूँ ओर
पहाड़ियों को समेट रखा है
घने बादलों ने अपने आग़ोश में
मानो हो रही है सम्पूर्ण प्रकृति जैसे तृप्त
ऐसे में
ये निर्वासित भीगी हवा
बन जाना चाहती है पर्याय तुम्हारा
और आतुर है
प्रणय को तरल करने के लिये
पर , मैं विरहणी सी सहमी हुई
सिहर उठती हूँ
तुम्हारी यादों के साथ ।




रेल के डिब्बे में बैठी
सोच रही हूँ
तुम्हारी और मेरी ज़िंदगी भी तो
इस रेलगाड़ी से कुछ कम नहीं
फ़र्क सिर्फ यही है
कि ये नियमों की पालना करते हुए
अपने गंतव्य तक पहुंचती है
और हमने , बस मनमानी की
उस वक़्त, तुम मुझे पा कर
जीत के नशे में चूर
एक इन्जन की तरह
अनजान पटरियों पर
सरपट दौड़ते रहते
और , मैं
अपने सपनों को पूरा करने की
ख़्वाहिश में
उन्मुक्तता से , तुमको थामे
तुम्हारे पीछे - पीछे भागती
इन सब के बीच, जब कभी
कोई स्टेशन पसंद आ जाता
तो ठहर जाते थे , कुछ पलों के लिए तुम
जहाँ आलिंगनबद्ध हो
अपने भीतर उतार लेते थे
और , मैं
प्रणय की बारिश में भीगते हुए
अपने परों को फैला
स्वछन्द आकाश की ऊँचाइयों को
मापने को आतुर हो जाती
पर , तुम अपनी इच्छाओं की जंजीरों में
मुझे जकड़ कर
पुनः दौड़ने लगते
एक नयी पटरी पर
और , हाँ बीच- बीच में
भरते रहते मुझ में
अपनी पसंद ना पसंद
अपने सपने , अपनी इच्छाओं का सामान
जिन्हें मैं , सहेज कर रख देती थी
किसी मालगाड़ी में रखे सामान की तरह
जब कभी, मेरे द्वारा अवहेलना हो जाती
या कोई प्रश्न कर दिया जाता
तो रुक जाते थे तुम
किसी अनजान स्टेशन पर
जो , नहीं होता था तुम्हारी पसंद का
यहाँ अकेला छोड़ कर चल देते थे
किसी मुसाफ़िर की तरह तुम
और , मैं
वही एकान्त में, अकेली
तुम्हारा इंतज़ार करती रहती तब तक
कि तुम लौट न आओ वापस
अपने नये सामान के साथ ।

आज भी  , मेरे ऐसे ही किसी प्रश्न पर
एकाकी कर मुझे
चले गए हो तुम
तो हो जाना चाहती हूँ
तुमसे दूर , हमेशा के लिये
नहीं जकड़ना चाहती हूँ
तुम्हारी सोने की  जंजीरों में
उतर चुकी है सफर की थकन
अब मेरी देह में
थक गई हूँ तुम्हारे सामान को
सम्भालते-सम्भालते हुए
पर , असमंजस में हूँ आज भी
नहीं कर पा रही कोई फ़ैसला
तुमसे अलगाव का
तुम्हारे बिना
मेरे प्रिये ।


एक वक़्त
जब चाहा था तुमने
सिमेटना मुझे
तो, तुम्हारा कहा मान कर
सिमटती हुई चली गई थी
नेपथ्य में  " मैं "
हाशिये की तरह
अपना सृजन करने हेतु
और
मुझसे दूर हो कर तुमने
अपने परों को फ़ैला
विस्तृत उड़ान भरी
चहुँ दिशाओं को नाप
नये आयाम स्थापित किये
साथ ही लिप्त रहे
आमोद-प्रमोद
भोग-विलास में
मुझसे बे ख़बर हो तुम
पर , मैं नैपथ्य से देख रही थी
संजय की तरह
तुम्हारी इस महाभारत को
और तुम प्रत्यक्ष में
आज , वक़्त के साथ जबकि थक गए हो तुम
सत्यं , असत्य
झूठ , फरेब को जान
परेशां हो गए हो
इन बाहरी आडम्बरों से
तो तलाश रहे हो
राजपथ की भीड़ में
मेरे चेहरे को तुम
और , देखो मैं आज भी देख रही हूँ
बहुत करीब से ये सब
पर, अब असम्भव सा है मेरे लिये
चाह कर भी लौट न पाऊँगी
तुम्हारे पास
तुम्हारे जीवन में
अब कभी मैं ।


अनजाने में
अपने चारों ओर
जो कैक्ट्स बो दिये थे
वो अब बड़े हो गये है
इतने बड़े कि
तन्हाई के जँगल में घिर कर
अकेली हो गई हूँ
और
चाह कर भी मेरी आवाज़
तुम तक नहीं पहुँच पा रही
जबकि
जानती हूँ
मेरी इस उदास चुप्पी को
सिर्फ़ तुम ही तोड़ सकते हो
क्योंकि , एक वक़्त था
जब हम हमनवां थे
कल रात
जब चॉन्द आया था
मेरी खिड़की पर
तो कहा मैंने उसको भी
या तो तुम्हारा पता ढूँढ दे
या मेरी बात तुम तक पहुँचा दे
जो भी हो
तुम लौट आओ मेरे पास
मेरे जीवन में
मैं....
मुन्तज़िर हूँ तुम्हारी ।


जब तुम नहीं थे
ये रहगुज़र
बहुत मुश्किल थी
मैं तनहा , अकेली धीरे धीरे
इस पर कदम रखती
कभी भीतर से टूटती
तो कभी ख़ुद को खुद से जोड़ती
बड़ी अज़ब सी बेइख़्तियारी थी
जब तुम नहीं थे
लॉन में हर सुब्ह हारसिंगार झरता था
और सिन्दूरी शाम ये पलाश खिल कर  करता था
पर मेरे लिए सब रंग एक जैसे ही थे
इन्तिज़ार की राह
    आँखों  से आँखों तक पहुंच रही थी
उनींदी , बे ख़्वाब सी
जिनमें कोई चराग़ न जलता था
जब तुम नहीं थे
बारिश के मौसम में
जब पानी बहुत बरसता था
ये बिजली बहुत कड़कती थी
तब , मैं डर कर शेल्फ में टंगी तुम्हारी शर्ट को
पकड़ लेती थी
      और उस पल महसूस करती थी तुमको
      मेरे भीतर उतर कर सहारा देते हुए
जब तुम नहीं थे....
पर अब सब कुछ बदल गया है
तुम मेरे पास आ कर
मेरी ज़िंदगी बन गए हो
अब हर मौसम की दस्तक
मैं चौखट पर सुन रही हूँ
कभी बारिश में भीगती तो कभी
धूप में तपती  हूँ
चाँद को अपनी ही छत पर देखती हूँ
बे ख़्वाब सी आँखों में अब ख़्वाब
बादल बन कर बरस रहे है
अँधेरा हट गया और जुगनू चमक रहे है
मेरी ज़िंदगी का हर लम्हा
अब नूरे सहर है ।



तुमने मुझे जीवन दिया
बहती हुई सरिता सा
पर , मेरा बहना तुम्हें रास न आया
समेटना चाहते थे तुम मुझे
अपनी ख़्वाहिशों की दीवार में
बना देना चाहते थे पोखर सा तुम मुझे
चाहती मैं भी थी सर्व समर्पण के साथ
तुम्हारी इच्छाओं को फलीभूत करना
पर , दिन- प्रतिदिन
तुम्हारी इच्छाओं का आसमाँ विस्तृत होता गया
जिस के किसी एक कोने में चाहते थे
तुम मेरा सूक्ष्म बिन्दुवत सा रूप
शायद , भूल गये थे नियति में कहाँ लिखा है
सरिता की ज़िंदगी में ठहराव
उसे तो बहना है अनवरत , बिना रुके
एक छोर से दूसरे छोर की ओर
आज , जबकि बह रही हूँ मैं
तुम साहिल पे खड़े देख रहे हो
मेरे बहाव को
ये सोचते हुए कि बन न सकी
आज्ञाकारिणी मैं , तुम्हारी
काश , मेरे बहाव के भीतर झाँक देख पाते
मेरी सच्ची तस्वीर को तुम ।



ढ़लते सूरज के साथ
जब शाम खो जाती है
गहराती रात के अँधियारे में
ख़ामोशी पसरने लगती है चारों ओर
तब मैं भी जा बैठती हूँ
खुले आसमाँ के नीचे
मेरे घर की छत पे
चॉन्द , चन्द्रिका संग विचरते हुए
तय करता है अपना सफ़र
तारे जड़े रहते है रात की चुनरी में
झिलमिलाते हुए से
हर दिन दो से चार होते हुए
मेरे मन को और जिज्ञासु करते हुए
सुना है इन तारों के लिए कि.....
होती है ये सद आत्माएँ
जो जगमगाती है हर रात
क्योंकि निकलती है ये भी देखने शाँत चित्त से
अपने प्रियजन को जो हो गए है अब इनसे दूर
बस मैं भी इसी चाह में
रौशनी की इन क़तारों में
ढूँढती हूँ मेरे अपनों को
कि झिलमिला रहे है वो भी
यही कही , इन्हीं के बीच ।



मैं और वो चल रहे थे
साथ-साथ
एक ही रास्ते पर
बिना शर्तों, समझौतों के
अपनी अपनी ज़िंदगी जीते
खुश थे शायद
शक के गर्भ से उपजे बीज से बनी
सरकण्डों की दीवार ने कर दिए थे
हमारे रास्ते अलग-अलग
आरोप , प्रत्यारोप के बीच
दी मैंने कितनी ही परीक्षाएँ
हाँ , नहीं थी अग्नि परीक्षा सीता की तरह
पर उससे कुछ कम भी नहीं
परीक्षा लेने वाला कोई और नहीं
था मेरा अपना ही राम
मेरी हर परीक्षा निष्फल रही
अपनों से ही मैं छलती गई
तार-तार मेरे ज़िस्म की परतों को
सहेजती ,जोड़ती , स्त्रीधर्म निभाते
ख़ुद को ही कसूरवार मानती
सब से एक ही बात दोहराती
' मेरा राम सही है '
पुरुषोचित राम ने सुना दी थी मुझे सजा
जन्मों-जन्मों की विरह वेदना के साथ
मेरे चरित्र , मेरे वजूद पर उठा उंगली
दे दी तुमने मुझे असहनीय पीड़ा
जिसे सहन कर जी रही हूँ
एक ही प्रश्न के साथ
क्या सचमुच में कसूरवार थी ?
मेरे राम ...!


रात का पिछला पहर है
पर तुम्हारी यादों ने मुझे घेर रखा है
नींद मानो आँखों से कोसों दूर है
ड्राइंग रूम में सब फर्नीचर
तरतीब से रखा है
पर , मुझे उनके उभरे हुए नक़्श में
सब बेतरतीब सा नज़र आ रहा है
चाहे सोफा हो , सेंट्रल टेबल या दीवान
सभी ख़्वाब-ए-शीरी में है सब से बे ख़बर
एक दूसरे के आग़ोश में डूबे
पर कोने में रखी वो इजी चेयर
जिस पर तुम्हारा बेशतर वक़्त गुज़रता था
ख़ामोश , कुछ उदास है
मुझे अब भी याद है वो लम्हे
जब तुम सिगरेट का लम्बा कश भरते हुए
धुएँ के छल्लों के बीच से
मेरे धुँधलाए चेहरे को देखा करते थे
और मैं अपने चेहरे को आँचल से छुपाती हुई सी
वक़्त कब , कहाँ , कैसे गुज़रा कहना मुश्किल है
पर अब वापस देखना चाहते है
कुछ ऐसे ही लम्हों को
शब-ए-हिज़्र को ख़त्म करते हुए
मैं और तुम्हारी ये इजी चेयर ।



रात चाँदनी जब छिटकने लगती हूं
शाख़-ए-गुल पर
तो मेरी पलकें भी
पिरोने लगती है तेरी यादों को
आहिस्ता-आहिस्ता
बीतती रात के साथ
ये यादें घुलने लगती है
आ कर मेरे ख़्वाबों में
तो उस वक़्त मैं बे-लिबास सी
तुम्हारे ज़िस्म में समायी
सुकूत-ए-शब की चादर को ओढ़
पिघलती सी........
और , तुम
रब्त के इस ख़ूबसूरत मंज़र को
एक ही नाम से पुकारते हुए
माह-ए-तमाम ।


तुम लहराती फसल के बीच
एक हँसता हुआ चेहरा-सा
तुम पर्वत की चोटी पर अटका
एक बादल का टुकड़ा-सा
तुम बारिश के बाद बना
एक इंद्रधनुष-सा
तुम आसमाँ में चमकता
एक भोर का तारा-सा
तुम ख़ूबसूरत वादी का
एक रस्ता-सा
तुम मन्दिर की मंगला आरती में बजते
एक घण्टी के स्वर-सा
तुम कुछ न हो कर भी सब कुछ
मेरे वजूद का हिस्सा
आख़िर ........
कौन हो तुम ?


ढ़लती शाम में तुम्हारे साथ
चाय की प्याली थामे
छत की मुँड़ेर पर बैठ
ढ़लते सूरज को देखना
अब यादों में ही रह गया है
तब कहा करते थे तुम
समय के साथ बने फ़ासले  ' फ़ासले ' नहीं रहते
अपने कभी दूर जा कर भी  ' दूर ' नहीं होते
सोचती हूँ ! कहाँ सही थे तुम
यदि ऐसा होता ......
तो आज बरसों बाद
छत की मुँड़ेर पर
ढ़लते सूरज के साथ
मैं अकेली नहीं होती ।



तुम मेरे हो
सिर्फ़ मेरे
मेरी हर साँस
एतमाद पर लिखे हो
सिर्फ़ तुम
पर , तब तक ही
जब तक होते हो
तुम मेरे पास
जानती हूँ
तुम न कभी मेरे थे
और , न कभी हो सकते हो मेरे
फिर , क्यूँ सोचती रहती हूँ
हर पल तुम्हें ही
तुमको तलाशना
फिर , पा लेना तुमको ख़्वाब में
क्या यही मामूल है मेरा
जानती हूँ
ख़ता न मेरी थी , न छला इक दूजे को हमने
बस , बेलौस मुहब्बत
जो है पूरे ऐतमाद के साथ
और यही यक़ीन है मेरी ज़िंदगी में
आब-ए-हयात की तरह
कि तुम्हें पाने का ख़्वाब
कभी टूटता ही नहीं
जानती हूँ
कोई ताबीर नहीं इस ख़्वाब कि
हाँ जब तक मैं हूँ
तुम भी तो हो मेरे पास , मेरे साथ
सिर्फ़ ख़्वाब में ।


मैं अज़ल से ता-अबद
तुम्हारी कुछ न हो कर भी
सब कुछ
तुम्हें , तुम्हारे होने का अहसास कराती
मेरे लम्स महसूस करते हुए
हर वक़्त सुनते हो तुम
मेरी ही सदाएं
हर सम्त
हर रहगुज़र से ।


आज कॉफी हाउस की टेबल पर
   सामना  कुछ यूँ होगा
    सोचा न था
अरसे बाद एक दूसरे को देखना
अच्छा लग रहा था
पर , दोनों ही  थे शायद कुछ अफ़सुर्दा से
हाँ कॉफी को  शेअर  हमने
   चीअर्स के साथ ही किया था
और इतना कह सकती हूँ 
   कभी अकेले में कॉफी लेते हुए
   तुम चीअर्स कहना  नहीं भूलते होंगे
   एक दूसरे में  ज़ज्ब थे हम कुछ ऐसे
की दो ज़िस्म इक जान हो जैसे
तुम्हारा दिल मेरी यादों से शाद रहता था
और यक़ीनन
वो आज भी नाशाद नहीं हो सकता
तुम्हारी आँखें सिर्फ़ मेरा ही  ख़्वाब
देखा करती  थी
आज भी तुम्हारी चाहत में , मैं वही शिद्दत
    महसूस कर रही हूँ
    और,  अपनी तस्वीर को
तुम्हारी आँखों में देख रही हूँ
जानती हूँ कुछ तो रस्मन ऐसे थे
और कुछ वक़्त का फ़ैसला
कि हमें दूर होना पड़ा
उस वक़्त तुम ...
एक अज़नबी की मानिंद चले गए थे
हमेशा हमेशा के लिए कहते हुए कि
भूल चुका हूँ तुम्हें
मैं , तुम्हारे इस झूठ में छुपे सच को जानते हुए
जीती रही अपनी ज़िंदगी
इसी सच-झूठ के बीच
और आज इतने बरसों बाद
वापस  कुछ ऐसा ही झूठ कह कर
कॉफी हाउस से चले गए हो तुम
मैं यही टेबल पर बैठी
कॉफी के ख़ाली मग को देख
सोच रही हूँ ,
मैं इनकी तरह नहीं हुई , अभी तुम्हारे भीतर
तो आज भी फिर कैसे मान लूँ
तुम्हारे इस सच को ...
यकीनन ,  तुम आज भी झूठे ही हो।



आज
जबकि तुमने फ़ैसला कर लिया है
अलग हो कर दूर जाने का
तो बेशक जाओ
रोकूँगी नहीं तुमको
वैसे भी आज तक जो चाहा तुमने
वही किया
पर हाँ जाते हुए तुमको इतना ज़रूर कहूँगी
कि मेरी यादों के दीये को
अपने भीतर जला कर रखना
क्योंकि ,कभी लौटना चाहोगे तो
रौशनी तुमको यही देंगे
सुना है
अनजानी राहो के दीये
अक्सर बुझ जाया करते है।



हिज़्र में...
जब चाँद बाम पे होता है
  तो  सितारे जड़ने लगते है
  मिरे तपते बदन पे
  और पिघलता सा मेरा ज़िस्म
  उस वक़्त नहाती हूँ मैं पूरी चाँदनी में
  वो चश्मे शरीर  नाज़बरदार सा
  देखता है मुझे हैरानी से
  पर  , मैं  दर-ओ-दीवार को  बंद करती
हिज़्र में ...
उफ़क़ के उस पार दरीचे से
जब कभी झाँकता है आधा क़मर
निसारे यार की तरह
तो मैं सेज-ए-गुल पर लेटी
अपने  दुपट्टे में फँसी बाली को सम्भालती सी
गुल-ए-पत्ती को चूमते हुए
अपनी प्यास तेरे होंठों पे रखती हूं
हिज़्र में ..



समन्दर किनारे टहलते हुए
अक्सर  रेत पर
तुम एक घर बनाया करते थे
जिस पर  बड़ी ख़ूबसूरती से
हम दोनों का नाम लिखते हुए
    कहा करते थे कि मेरा ख़्वाब है
ऐसे ही एक खूबसूरत घर में ख़ुद को
तुम्हारे साथ देखना ..
हम घंटों इस घर के सामने बैठ
     बातें किया करते
     और तुम घर में मौजूद एक एक चीज को
     बड़े प्यार से मुझे समझाया  करते
     साथ ही  इस ख़्वाब को
      जल्द ही  हकीक़त में बदलने की बात
इसी बीच कोई बड़ी सी लहर आ
घर को अपने साथ बहा ले जाया करती
या कभी कभी तेज बारिश होने लगती
     और हमारा घर टूटने लगता था
इस वक़्त  मैं बहुत असहज हो जाती
और तुमसे कहा करती थी
देखो हमारा घर टूट रहा है
पर , तुम बड़ी लापरवाही से जवाब देते
इसे तो टूटना ही था
तुम्हारी इस बात से मैं नाराज़ हो कर
कहा करती थी
घर को रेत पर मत बनाया करो
तुम कागज़ पर स्केच क्यूँ नहीं बना लेते
    लेकिन  तुम अब भी बे फ़िक्र से
    मेरी बात को अनसुना कर
मुझे बॉहों में भर लेते थे
और ऐसे में ,मैं ख़ामोश सी असहाय हो जाती
क्योंकि  तुम्हारी बाँहें घर से भी ज़्यादा महफूज़
और अच्छी लगती थी।
वक़्त के साथ साथ, वक़्त गुज़र गया
और हमारा ख़्वाब भी टूट गया
कितने बरस गुज़र गए
अब तो ठीक से ये भी याद नहीं
आज इस समन्दर किनारे आयी हूँ
सब कुछ बदला बदला सा है
शायद तुम और मैं भी बदल गए
   पर भीड़ में तलाश रही हूँ वही जगह
जहाँ तुम हमारा नाम लिख कर
घर बनाया करते


सोच रही हूँ
काश उस वक़्त तुम मेरा कहा मान लेते
घर रेत पर न बना कर कही ऐसी जगह बनाते
जो अमिट होती तो शायद
आज तुम्हारा वो ख़्वाब भी
मुकम्मल होता ।



हर रोज़
बेहद क़रीब से देखती हूँ
अपनी अता बे-तलब ज़िन्दगी के
अरमानों को ताक़ पे रख
अज़ीयत को सहते हुए थम .....
बिना किसी एहतिजाज के
चाक़ पे चढ़ते ,गूँथते
तेज़ रफ़्तार से घूमते हुएँ
तक़दीर में लिखी अपनी मसाफ़त को
तय करते हुएँ
कूज़ागर अपनी उँगलियों के
जादुई लम्स से नये-नये मुजस्समा तैयार करता
कभी ज़ख्म -ए -दिल को
तो कभी शैदाइयों को इन बुतो में उतारता
रक्सिन्दा ख़्वाबों को पैकर कर
अपने परतव को निहारता
मसर्रत से झूमता ।
चाहे , कितने ही हिस्सों में तक्सीम हो जाएँ
कितने ही बुतों में ढल जाएँ
एक दिन वापस ......
ये अपने बरहना रूप को पा कर
अपने वुजूद में इंदिजार हो जाती है
       ये मिट्टी ।


माँ कहती थी
याद आए कभी मेरी
जाने के बाद
जीना मुश्किल लगे जब
या उठ जाए किसी से ऐतबार
लेना हो ज़िन्दगी में
कोई अहम फैसला तुम्हें
तो बक्से में बंद एलबम से
वो तस्वीर निकालना
जिसमें उंगली पकड़ कर चलाया था
मैंने तुझे .....
पहली बार ।



माँ कहती थी
शाम होते ही
घर लौट आना
बाहर दरिन्दगी बहुत है
दिन में अपनों का चेहरा
पहचान नहीं पाते
तो रात पर ऐतबार कैसे करे हम।



प्रकट होते हो
जब तुम मेरे भीतर
तो पिघल कर ढलने लगती हूँ
तुम्हारे इच्छित साँचे में
गढ़ दिए है तुमने मेरे कितने ही रूप
बना दिया है.....
  तुमने  अनन्त - सा मुझे
क्यूँ नहीं स्वीकारते हो तुम
मेरे एक ही रूप को
मेरे प्रिये ।

.


तुम मेरे लिये आज भी
सिर्फ़ इक पहेली ही हो
मैं न कल तक
तुमको समझ पाई थी
और ,न ही
आज समझ पा रही हूँ
बदलते मौसम की तरह
न जाने कितनी बार
तुम मेरे पास आये , ठहरे
और गुज़र गये ख़ामोशी के साथ
मैं, हर बार तुमको
पहचानने भर की कोशिश में ही
लगी रही
कभी दरिया , तो कभी समन्दर की तरह
तुम मेरे भीतर उतरे भी
पर ,मैं .....
जीवन भर की प्यास लिये
ख़ुद में तुमको तलाशती ही रही
और ,तुम बने रहे
मेरे लिये  सदैव एक
      मृगतृष्णा से।



क्या तुम्हें याद है आज भी
वो सब
जब कहाँ करते थे तुम
कि चाँदनी रात में
सरगम बन कर उतर जाना चाहते हो
मेरे भीतर
और
मैं , साज़ की तरह छेड़ते हुए कोई तान
बिखेर दूँ तुमको फ़िज़ा में
सुरों की तरह
तुम्हारी ख़्वाहिश के मुताबिक़
मैं ऐसा ही करती थी
पर, आज जबकि नहीं हो पास मेरे तुम
जा चुके हो दूर मुझसे
फिर भी महसूस करती हूँ
चाँदनी रात में फ़िज़ा के दोश पर
उदास सुरों को
मानो पुकार रहे हो तुम्हें
ये कहते हुए कि लौट आओ अब
तुम्हारा साज़ ख़ामोश है
कई दिनों से

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कविता 8963025393771924415

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