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अध्ययन सामग्री - कहानी – अकेली - मन्नू भंडारी // डॉ. जयश्री सिंह

डॉ. जयश्री सिंह

सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक, हिन्दी विभाग,

जोशी - बेडेकर महाविद्यालय ठाणे - 400601

महाराष्ट्र

कहानी – २ अकेली - मन्नू भंडारी

लेखिका परिचय :- आधुनिक हिंदी साहित्य जगत में मन्नू भंडारी आधुनिक कथा लेखिकाओं की पहली पंक्ति की लेखिका है। उनकी रचनाओं में अभिव्यक्त व्यक्ति और युग जीवन का यथार्थ मूल्यांकन है। मन्नू भंडारी हिंदी कहानी के उस दौर की एक महत्वपूर्ण लेखिका है जिसे नई कहानी आंदोलन के नाम से जाना जाता है। उनकी कथा यात्रा हिंदी कथा साहित्य में एक नया मोड़ लेकर सामने आती है। पारिवारिक संबंधों की गहरी होती हुई दरारें, अंतर्द्वंद से उठता हुआ सैलाब, पात्रों की उठती-गिरती मानसिकता मन्नू जी के कथा साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण व केंद्रीय बिंदु हैं। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य के विकास में नारी जीवन के मूक क्षणों को वाणी देने वाली सुप्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी का आधुनिक कहानीकारों में विशिष्ट स्थान है।

कृतियाँ – महाभोज, आपका बनती, स्वामी, एक इंच मुस्कान, कलवा (उपन्यास), एक पलेट सैलाब, मैं हार गयी, तीन निगाहों की एक तस्वीर, यही सच है, त्रिशंकु, श्रेष्ठ कहानियाँ, आँखों देखा झूठ (कहानी संग्रह), बिना दीवारों के घर (नाटक) । मन्नू भंडारी जी को हिन्दी अकादमी, दिल्ली का शिखर सम्मान, बिहार सरकार, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, व्यास सम्मान और उत्तर प्रदेश हिन्दी संसथान द्वारा पुरस्कृत किया गया है।

मन्नू जी के ‘अकेली’ कहानी का जैसा शीर्षक है वैसी ही इसकी कथा भी है। सोमा बुआ बूढी परित्यक्ता तथा अकेली स्त्री है। इस कहानी में मन्नू जी ने सोमा बुआ का चरित्र-चित्रण बहुत ही संवेदनापूर्ण ढंग से चित्रित किया है।

कहानी की कथावस्तु :- सोमा बुआ बुढ़िया परित्यक्ता और अकेली है। बुढ़िया सोमा बुआ पिछले बीस वर्षों से अकेली रहती हैं। उनका इकलौता जवान बेटा हरखु समय से पहले ही चल बसा। उनके पति पुत्र वियोग का सदमा सह न सके तथा घर छोड़ कर तीर्थवासी हो गये। सोमा बुआ के सन्यासी पति साल में एक महीना घर आते हैं। बुआ को अपना जीवन पड़ोस वालों के भरोसे ही काटना पड़ता है। दूसरों के घर के सुख-दुख के सभी कार्यक्रमों में वह दम टूटने तक यों काम करती हैं, मानो वह अपने ही घर में काम कर रही हो। जब बुआ के पति घर पर होते हैं तब बुआ का अन्य घरों में सक्रिय बना रहना बंद हो जाता है। तब उनकी जीभ ही सक्रिय हो उठती है। पड़ोसन राधा के समक्ष बुआ मन का गुबार निकालती है राधा के यह पूछने पर कि सन्यासी महाराज क्यों बिगड़ पड़े? बुआ बोल पड़ती है कि उनका औरों के घर आना जाना उनके पति को नहीं सुहाता। पति का स्नेहहीन व्यवहार तथा बुआ के पास पड़ोस से बिन बुलाये निभाए जाने वाले व्यवहारों पर पति द्वारा लगाया जाने वाला अंकुश उन्हें कष्ट देता है। पति से होने वाली कहा सुनी पर बुआ रोने लगती है। वे राधा से कहती हैं कि, “ये तो हरिद्वार रहते हैं, मुझे तो सबसे निभानी पड़ती है। मेरा अपना हरखू होता और उसके घर काम होता तो क्या मैं बुलावे के भरोसे बैठी रहती। मेरे लिए जैसा हरखू वैसा किशोरीलाल। आज हरखू नहीं है इसी से दूसरे को देख देखकर मन भरमाती रहती हूं।“ दरअसल सोमा बुआ अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए सबसे जुड़ना चाहती है इसलिए बिन बुलाये ही सबके घर जाकर काम में जुट जाती हैं। जैसे- “अमरक के बिखरे हुए कल रह-रहकर धूप में चमक जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे किसी को भी गली में घुसता देख बुआ का चेहरा चमक उठता है। मन के बहलने प्रसंगों को वह तलाश थी रहती है। कहीं थोड़ी देर के लिए दिल बहल जाता है तो कहीं फिर से गहरी चोट मिल जाती है।


जिन दिनों उनके पति आये हुए होते है उसी समय सोमा बुआ के दूर के रिश्ते में किसी का ब्याह पड़ जाता है। बुआ की आदत को जानते हुए उनके पति साफ निर्देश देते हैं कि जब तक उनके घर से न्योता न आये सोम बुआ वहाँ नहीं जाएँगी। उनकी विधवा ननद उनके जख्मों पर नमक छिड़कते हुए झूठ ही कहती है कि निमंत्रण की लिस्ट में बुआ का भी नाम है बुआ न्योते का इंतजार करती है साथ ही मन में न्योते की प्रसन्नता लिए ब्याह में भेंट देने के जुगाड़ में भी लग जाती है वे लोग पैसे वाले हैं साथ ही दूर के रिश्तेदार भी। यूँ तो सामाजिक बंधन बनाना मर्दों का काम है, किन्तु सोमाबुआ मर्द वाली होकर भी बेमर्द की है इसलिए व्याह में भेट देने के लिए अपने मरे हुए बेटे की एकमात्र निशानी ‘सोने की अँगूठी’ बेचवाकर पड़ोसन राधा से चांदी की सिंदूरदानी तथा साड़ी- ब्लाउज का इंतजाम करवाती हैं। अपने हाथों में लाल-हरी चूड़ियां पहन कर पहन कर जाने वाली साड़ी को पीले रंग मांड कर बुआ पाँच बजे के मुहूर्त के निमंत्रण का इंतजार करने लगती है। सात बज जाते हैं किन्तु निमत्रण न आने पर वह दु:खी हो जाती है। इतनी तैयारियों के साथ पल पल निमंत्रण के इंतजार के बाद बुआ को विश्वास ही नहीं होता कि सात कैसे बज सकते है जबकि मुहूर्त पांच बजे का था।” सोम बुआ को व्याह का बुलावा नहीं आया था। ऐसे ही उन्हें किसी के घर से बुलावा नहीं आता फिर भी बुआ बन बुलाये ही चली जाती।


निष्कर्ष : - इस कहानी में हुआ एक ऐसा चरित्र है जो सामाजिक संबंधों को निरंतर बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील है। आज भी उनके मन में परंपरागत अधिकार को बनाए रखने का मोह है। जिसके लिए वह अपने को गाँव वालों से जोड़ें रखती हैं। कहानी में मन्नू जी ने आधुनिक परिवेश में व्यक्तिवादिता और उपयोगितावादिता को प्रस्तुत किया है। आज पारस्परिक संबंधों में जैसे दरार सी पड़ गई है। विशेषतः दीन और दु:खी लोगों के साथ कोई अपना रिश्ता बनाए रखना नहीं चाहता। व्यक्ति का एकाकीपन आधुनिक समाज का शाप है।


वस्तुतः पति-पत्नी सुख-दुख के सहचर होते हैं पर बुआ की व्यथा यह है कि जिसके साथ वह निज-दु:ख बाँट सके वही उन्हें दुखी कर देता है। बुआ के सन्यासी पति की उपस्थिति में उनकी जीवन गति का निषेध हो जाता है। उनका घूमना, फिरना, मिलना, जुलना बंद हो जाता है अर्थात जिंदगी ठहर कर सन्यासी जी के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाती है। सामाजिकता से कट जाना और पति का संग साथ भी न मिल पाना दुखी और अकेली सोमा बुआ के लिए बोझिल बन जाता है लेकिन सन्यासी जी को बुआ के दुःख से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि किसी बात पर ताने मार कर वे उन्हें नियंत्रित करने का प्रयत्न भी करते रहते हैं। पति के जाते ही सोमा बुआ की दिनचर्या का यह रुका बांध फूट जाता है और आस पड़ोस के सुख दुख में शामिल होकर अपना जीवन काटने की कोशिश में जुट जाती है। दू:सह पति संग और पुत्र-वियोग दोनों को भुलाने का उपाय भी बुआ के पास अपने श्रम के बल पर समाज में शामिल होने का प्रयत्न में छुपा है। इसलिए बुआ किसी के बुलावे का इंतजार नहीं करती। बिन बुलावे के उनकी उपस्थिति बड़ी मर्मभेदक है। बुलावा ना भेजने पर वे पड़ोस को माफ कर देती हैं और उपाय भी क्या है? यह माफ कर देना एक तरह से स्वयं को दिलासा देना है। इस दिलासे में भी अपना होना भी खोजती चलती हैं। “बेचारे इतने हंगामे में बुलाना भूल गए तो मैं भी मान करके बैठ जाती? मैं तो अपनेपन की बात जानती हूं….आज हरखू नहीं है…. इसी से दूसरों को देख-देखकर मन भरमाती रहती हूं। लाख उपेक्षा के बावजूद यह पास-पड़ोस ही है, जो बुआ के जीने का सहारा है ना कि पति का संग साथ।


पति की दुनिया समानांतर संसार है जिसमें पत्नी की जगह नहीं है परंतु गृहणी धर्म में उनकी जरा भी लापरवाही सन्यासी जी को बर्दाश्त नहीं है। वे वैरागी जरूर है पर खासे दुनियादार भी है समाज को अच्छी तरह समझते तो हैं पर मनुष्य के सुख दुख में शामिल नहीं होना चाहते बल्कि सन्यास लेकर पुत्र शोक से उत्पन्न यथार्थ की समस्याओं से भागते ही हैं। अपने दुख को वे सन्यास में महिमामंडित करके जी रहे हैं और सोमा बुआ का दुख? इसके लिए उनके पास सांत्वना का कोई शब्द नहीं है। इस तरह घर और समाज दोनों तरफ से बुआ के हिस्से में अकेलापन ही आता है।
सोमा बुआ जो अपना बेटा खो चुकी है, अपने पति द्वारा त्याज्य जैसी स्थिति में है। समाज उन्हें बार-बार तिरस्कृत करता है फिर भी बुआ के भीतर गहरे पड़े दुख में भी सांस लेने की इच्छा जीवन का उत्साह, उमंग, इच्छाएं सब दबाव पड़ा है उनमें। वे कुछ देर को अपना दुख भूल कर दूसरों के सुख में प्रसन्न हो जाने की सामर्थ्य रखती है पर सन्यासी जी नहीं।
स्त्रीत्व, मातृत्व और पत्नीत्व से अलग है। बुआ का लाल हरी चूड़ियों के बंद पहनकर शादी में जाने की तैयारी के लिए मन ही मन उत्साहित होना, साड़ी पीले रंग में रंगना, शादी में दिए जाने वाले सामान की तैयारी करना आदि उनके भीतर की स्त्री से परिचित कराता है, जो सारे दुखों, उपेक्षाओं, तिरस्कार के बावजूद स्त्री है और विवाह में शामिल होने की अपनी बेहद सामान्य सी हुलस को रोक नहीं पाती है।

सन्दर्भ सहित व्याख्या: -

“इस स्थिति में बुआ को अपनी जिन्दगी पास पदोस्वलों के भरोसे ही कटनी पड़ती थी. किसी के घर मुंडन हो,छठी हो, जनेऊ हो, शादी हो या गमी, बुआ पहुँच जाती और फिर छाती फाड़कर कम करतीं, मानो वे दूसरे के घर में नहीं, अपने ही घर में काम कर रही हो।“

संदर्भ :-प्रस्तुत अवतरण प्रथम वर्ष हिंदी कला के पाठ्य पुस्तक ‘श्रेष्ठ हिंदी कहानियां’ में निर्धारित कहानी ‘अकेली’ से लिया गया है। इसकी लेखिका ‘मन्नू भंडारी’ जी है। इस कहानी द्वारा लेखिका एक अकेली स्त्री के मनोभाव का चित्रण करती है।

प्रसंग :-प्रस्तुत कहानी में एक स्त्री जो की अकेली है। वह अपना मन बहलाने के लिए आस पड़ोस में जाकर उन्हें अपना मानकर, उनके साथ रहकर अपना जीवन काटती रहती हैं। लेखिका कहानी द्वारा एक स्त्री के अकेलेपन तथा उसके जीवन जीने की आशा पर प्रकाश डालती है। लेखिका उस स्त्री के मन में उठने वाले भावों को बहुत खूब तरीके से बताती हैं।

व्याख्या :- कहानी में लेखिका सोमा बुआ के माध्यम से एक अकेली स्त्री के चरित्र का चित्रण करती है। कहानी में सोमा बुआ के पति सन्यासी हैं। साल के कई महीने वे बाहर रहते हैं, और एक महीने भर के लिए घर आते हैं। सोमा बुआ के एक ही बेटा था वह भी अब जीवित न रहा। बेटे के साथ पति की अनुपस्थिति में बुआ अपने जीवन में एकदम अकेली हो चुकी थी। अपने इसी अकेलेपन को दूर करना चाहती है। इसलिए आस पड़ोस के घरों में शादी, मुंडन, छठी या फिर जनेऊ जैसे कार्यक्रमों में बिन बुलाये जाकर छाती फाड़कर काम करती है। लोगों को अपना मानकर उनमें घुलने मिलने की कोशिश करती रहती। अपना सारा दुख भूल कर लोगों की खुशी में शामिल हो जाती।

लेखिका ने सोमा बुआ के जीवन में इस अकेलेपन का सहारा आस-पड़ोस को बताया है। अनजान लोगों में भी वह अपने लोगों का आभास करती है। पूरी जिंदगी सोमा बुआ अपने पति की प्रतीक्षा या उनकी राह देखने में गुजारती है। अपने मन को खुश करने के लिए वह सबके यहां बिन बुलाए जाती और यह भी कहती कि, अपनों के यहां से कोई बुलावा थोड़े ही आता है, शायद वे लोग भूल गए होंगे मुझे बुलाना। यह सब कहकर वह अपना मन बहलाती है और खुश रहने की कोशिश करती है। लेखिका अपना सारा जीवन ऐसे ही बीताती है तथा किसी से कोई उम्मीद न रख कर सब को अपना मानती हैं।

विशेष :- इस प्रकार इस कहानी में सोमा बुआ अकेली होने के कारण सबको अपना मान कर जीने वाली सबके दुख-सुख में तत्पर रहने वाली लाचार स्त्री है। उनकी इसी लाचारी के कारण वे अपने पास पड़ोस के लोगों द्वारा छली जाती हैं। वे धन भी लुटती हैं जीतोड़ मेहनत भी करती हैं फिर भी लोगों से सम्मान नहीं पा पाती।

बोधप्रश्न :-

१) ‘अकेली’ कहानी के माध्यम से सोमाबुआ के अकेलेपन के दुःख का विस्तार से वर्णन कीजिये।

२) कहानी के माध्यम से पुत्र के खो देने के बाद सोमबुआ और उनके पति की स्थिति का चित्रण कीजिये।

एक वाक्य में उत्तर लिखिए : -

१) ‘अकेली’ की रचनाकार का नाम लिखिए।

उत्तर :- ‘अकेली’ मन्नू भंडारी जी की रचना है।

२) सोमाबुआ के पति को किस बात का सदमा लगा था?

उत्तर :- सोमाबुआ के पति को पुत्र वियोग का सदमा लगा था।

३) सोमाबुआ को अपनी जिंदगी किसके भरोसे काटनी पड़ती थी?

उत्तर :- सोमाबुआ को अपनी जिंदगी पास – पड़ोसिनों के भरोसे काटनी पड़ती थी।

४) सोमाबुआ के पति साल के ग्यारह महीने कहाँ रहते थे?

उत्तर :- सोमाबुआ के पति साल के ग्यारह महीने हरिद्वार में रहते थे।

५) सोमाबुआ के पास पुत्र की एकमात्र निशानी क्या थी?

उत्तर :- सोमाबुआ के पास मृत पुत्र की एकमात्र निशानी अंगूठी थी।

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