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कविता नागर की रिमझिम बरसती सावनी कविताएँ

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1-सावन

जब मन में हम सोचे सावन,

चलचित्र उठे कितने मनभावन,

मन भी करने लगे मनमानी,

दिखे हरियाली और पानी,

वसुधा ने शृंगार किया,

नयी चूनर ओढ़ी धानी,

बहुपुष्प हुए है,सुसज्जित,

धानी चूनर पर शोभित,

क्या खूब है ये कलाकारी

रंगीली ज्यौं कसीदाकारी,

जब उठती घनघोर घटाएँ,

दादुर,मोर,पपीहा गाए।

मन भी ये पंछी बन बैठा,

सोचे कहाँ कहाँ उड़ा जाए।

सावन में डल गए झूलें,

राही फिर रास्ता भूलें,

देखो नदियों का कायाकल्प,

पोषित करने हुई कृतसंकल्प।

चलो देखे नदियों का संगम,

कितना सुंदर दृश्य विहंगम।

        कविता नागर


2.बारिश 

क्या खूब है बातें बारिश की,

कितनी सौगातें बारिश की,

ये बात सुहाने मौसम की

मिट्टी और उसकी खुशबू की

पर्वत पर इठलाते बादल की,

अटखेलियां करती हवाओं की,

प्रकृति और उसकी आभा निखरी,

हुई कंचन काया झरनों की,

ये वृक्ष लगे है,धुले धुलें,

हंसते मुस्कातें फूलों की,

बड़े मगन है बालवृंद भी,

ना सीमा है कौतूहल की,

हर साल आती बरखा रानी,

पर भूलें ना बातें बारिश की,

           कविता नागर


3-जुगनू

टिमटिम करता मन का जुगनू,

जब जीवन में हो अंधेरा,

निराश  नहीं होना है,साथी

रात के बाद आता है,सबेरा।

मन में सुंदर भाव जगाता,

दिशा दिखाकर फिर उड़ जाता,

भावों को देता है प्रकाश,

उड़े चलो जहाँ अनंत आकाश।

कृत्रिमता की नहीं है छाया,

ये प्रकाश स्वयं से आया।

सुंदर मद्धिम विशिष्ट प्रभा,

मन की भी हो ऐसी आभा।

       कविता नागर

4-

      चातक..

चातक पक्षी आतुर है

उस पीयूष स्रोत को पाने को,

बस अंश मात्र की इच्छा है,

तृषा अपनी बुझाने को।

वह बूंद मेह की कब बरसे,

जिसके लिए चातक तरसे,

नक्षत्र स्वाति की करे प्रतीक्षा,

कितना संयम,और कितनी तितिक्षा,

कठोर व्रतधारी चातक है,

तभी तो इतना उसका यश है।

       कविता नागर


5-सफर

सप्तपदी से शुरु सफर है,गायन है जीवन का।

वैवाहिक सुर लगा रहे है,भुला गीत बचपन का।

कुछ मद्दिम, कुछ तीव्र स्वरों से बगिया अब गूंजेगी।

मन डाली पर बैठ प्रेम की अब ये कोयलिया कूकेगी।

एक ही सुर में गाएंगे ये दोनों जैसे हो तोता मैना।

कभी कभी चुपचाप रहेंगे,बोलेंगे बस दो नैना।

सप्तपदी से मन डोर बंधी है,इसको ना उलझाना।

अपना ये जीवन संगीत, तुम सदा ही स्वर में लाना।

लय ताल,लगाकर बारीकी से,घटाबड़ा कर मात्रा।

जीवन की मधुरिम तानों पर चलने दो सहयात्रा।

         कविता नागर


   6-  औरतें

     औरते बड़ी रंगरेज होती है,

जाने कहाँ से हुनर पाती है,ये

कोरे कोरे मन को,अपनी,

खूबियों से रंग जाती है,ये।

बालिका बनकर पिता के जीवन में,

भरदेती है,अनगिनत रंग,

मोम की तरह ढल जाती है,

हर सांचे में,हो जाती है

जिसके भी संग।

माँ की परछाई बनकर

आती है,ये।बड़ी होते होते

माँ की चिर सखी सी

हो जाती है,ये।

वधू की तरह अलंकृत होकर,

दूजे घर आती है,

गैरो को बना अपना,

फिर सजाती है,घर नया।

उसी नये घर की होकर रह

जाती है,ये।

ममता,दया,परवाह करते हुए

बिता देती है,जीवन सारा,

अपने इन्हीं मौलिक गुणों से,

और भी निखर जाती है,ये।

     .    कविता नागर


7-ठोकर

जीवन में कितनी ही बार हमको लगती है ठोकर,

सिखलाती है,हमको यह;नहीं रहना गलतियों का बोझ ढो ढोकर।

कभी कभी ये,लगती नहीं,पर लगवाई जाती है

जानबूझकर राहों में अड़चने बिछाई जाती है।

जब आप चलते है,बेपरवाह

तो गिरते है,फिर डगमगा कर

अपने ही फिर बजाते ताली,

  दोनों हाथ उठा- उठाकर।

जब से मैंने भी खाई है,ये कुछ पूर्व नियोजित सी ठोकर।

  सतर्कता का पहन के चश्मा,,

कदम उठाती देख देखकर।

जब से सीखा है,मैंने लोगों को पहचानना।

बात पते की कहती हूँ, मैं

अब नहीं लगती है,ठोकर।

                   कविता नागर

8-दीवार

मन के इर्दगिर्द ना डालों
संशय की दीवार,
सुंदर रिश्तें नातों का
हो ना यूँ प्रतिकार।
ईर्ष्या बड़ी अहितकारी,
ले आती सुख में दरार।
ऐसा गर हो जाए कभी,
विश्वास डोर थामें रखना।
बड़े भाग्य से जुड़ते है,
ये मन से मन के तार।
कितना सुखद अनुभव है
जब कोई करता अभिसार।
बिना प्रमाण की बातों पर
करना ना गलत व्यवहार।
         कविता नागर


   9-  काया

आत्मा का ये पंछी है,काया के पिंजरे में कैद,

काया को अपना ही जाने,पर ना जाने असली भेद।

उड़ान हमेशा उड़ना चाहे,मन की अनन्त उमंगों की

भूख हमेंशा बढ़ती जाती है,इन ख्वाहिशों के दानों की..

इधर उधर भरमाता डोले,देख केे दाना मन पिंजरा खोले,

कैसे भी दाना मिल जाए,देखे ना मन के भेद।

मत भरमा रे पंछी तू,ये चमकता पिंजरा देख..

जीवन के इस आसमान का छोर भी इक दिन आएगा..

छोड़ के इस काया का पिंजरा, ये पंछी सच में उड़ जाएगा..

    कविता नागर


10-भाग्य

निज को संतुष्ट ना कीजिए,

कहकर विधि-विधान की बातें,

परिश्रम मन से कीजिए,

चाह़े बीतें, दिन रातें।

जो यत्न सुनियोजित होगा

तो ईश्वर भी साहस देंगे।

भाग्य भी झुक जाएगा,

देखकर कर्म की सौगातें।

आलस्य को तज दीजिए,

छोड़कर भाग्यवादी बातें।

सदा सकरात्मक ही रहिए,

जोड़कर कर्मो से नातें।।

      कविता नागर

स्वरचित एवं मौलिक

कविता नागर

देवास(म.प्र.)

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