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कहानी संग्रह - वे बहत्तर घंटे - हमारा देश महान - राजेश माहेश्वरी

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कहानी संग्रह

वे बहत्तर घंटे

राजेश माहेश्वरी

हमारा देश महान

एक दिन देवर्षी नारद ब्रम्हाण्ड में भ्रमण करते हुए अचानक भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई पहुँच गये। वे जहां पर उतरे उसके सामने ही एक चाय की दुकान और उसके बाजू में एक पान की गुमटी उन्हें दिखलाई दी। इससे पहले तक उन्होंने इन दोनों को नहीं देखा था। वे इससे अनभिज्ञ थे। वे वहां पहुँचे और उन्होंने चाय का रसास्वादन किया। इस पेय को पीकर वे प्रसन्न हो गये। पान खाकर उनका मन गदगद हो गया। उनके सामने की दीवार पर लिखा था- कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है।

वे मुम्बई की ऊंची-ऊंची इमारतों और फर्राटे से भागती हुयी कारों को देखकर सोचने लगे कि भारत ने कितनी प्रगति कर ली है। यह भारत भूमि महान और नेक है। इसीलिये कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है। उन्होंने चाय और पान वाले से पूछा- यहां समय क्यों नष्ट कर रहे हो, मेरे साथ स्वर्गलोक चलो। वहां अनेक दिनों से कोई नहीं पहुँचा है। पूरा स्वर्ग खाली पड़ा है।

नारद जी की बात सुनकर वे दोनों सोचने लगे। आज संध्या के समय किस पागल से बेवजह पाला पड़ गया। उन्होंने नारद जी से कहा- हे महाराज! आप हमारे चाय और पान की कीमत दीजिये और यहाँ से चलते बनिये। वरना आपकी बातों से यहां तमाशबीनों की भीड़ लग जाएगी। हमारा ग्राहकी का समय है, उसे बर्बाद मत कीजिये।

नारद जी ने पुनः विनम्रता पूर्वक पूछा- आप लोग नाराज क्यों हो रहे हो। मैं वास्तव में आपको स्वर्गलोक ले जा सकता हूँ।

तब चायवाला बोला- हमारे देश की धरती स्वर्ग से भी अच्छी है। यहाँ पर बच्चों को दोपहर का भोजन सरकार की ओर से मुफ्त प्राप्त होता है। साल में सौ दिन का बेरोजगारी भत्ता प्राप्त होता है। कारखानों में नौकरी पक्की हो जाने पर मालिक भी हमें आसानी से नहीं निकाल सकता है। हमारा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। हमारे पास असीमित अधिकार हैं। हम काम करें या न करें उत्पादन दें या न दें हमारा वेतन पक्का रहता है। हम स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। देश में अनेक नियम व कायदे हैं पर यहां पर भ्रष्टाचार गरीबी और महंगाई के कारण ये किताबों में ही बन्द पड़े रहते हैं। हमारा जैसा मन होता है वैसा करने की हमें पूर्ण स्वतन्त्रता है। हर मोहल्ले में बियर बार और पब है। वहां साकी अपने हाथों से मदिरापान कराती है। आप हमारे साथ चलिये और स्वर्ग से भी अच्छा नजारा देखिये। आप वहां पहुँचकर स्वर्ग को भी भूल जाएंगे। फिर भला हम लोगों को स्वर्ग जाने की क्या आवश्यकता है।

यह सब सुनकर नारद जी अचकचा गये। उन्होंने चाय-पान का दाम चुकाया और वहां से स्वर्ग की ओर विदा हो गए।


(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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