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साहित्यकारों से आत्मीय संबंध (पत्रावली / संस्मरणिका) भाग -2 // डॉ. महेन्द्र भटनागर

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भाग 1 ||


भाग 2

साहित्यकारों से आत्मीय संबंध

(पत्रावली/संस्मरणिका)

डॉ. महेंद्र भटनागर

द्वि-भाषिक कवि / हिन्दी और अंग्रेज़ी

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       (परिचय के लिए भाग 1 में यहाँ देखें)

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मेरे बेहतरीन दोस्त अमृतराय

उज्जैन से, सन् 1947 में ‘हंस’ (बनारस) में प्रकाशनार्थ एक कविता (‘युग और कवि’; जो ‘नई चेतना’ में समाविष्ट है- क्र. 21) प्रेषित की और इस प्रकार अमृतराय जी से मेरे संबंध स्थापित हो गये। यह कविता ‘हंस’ में प्रकाशित मेरी प्रथम कविता है। इसके बाद, ‘हंस’ में मेरी कविताओं का नियमित प्रकाशन होने लगा। ‘हंस’ प्रगतिशील-साहित्य का प्रतिनिधि-पत्र था। ‘हंस’ के माध्यम से, बहुत शीघ्र, हिन्दी के साहित्यिक जगत् में जाना जाने लगा; स्थान बना सका। इन दिनों किसी बेहतर नौकरी की तलाश में भी था। देश का राजनीतिक परिदृश्य तेज़ी से बदल रहा था। ‘ऑल इंडिया रेडियो’ में अपनी नियुक्ति की कोशिश में था। अमृतराय जी को भी लिखा। उनका आत्मीयतापूर्ण उत्तर मिला :

. ‘हंस’ - बनारस

दि.20-8-47

भाई महेंद्रभटनागर जी,

आपकी 13 तारीख़ की चिट्ठी मिली।

आपको ‘हंस’ की कविताओं का चयन अच्छा लगाता है यह जानकर बड़ा संतोष हुआ। आप विश्वास मानिए कि ‘हंस’ जो कुछ भी कर पा रहा है, वह आप लोगों के मुक्त सहयोग के ही कारण। अभी उसे बहुत कुछ करना है। आप लोगों का भरोसा है।

लखनऊ रेडियो के कुछ लोगों को मैं जानता हूँ। रही आपके appointment की बात सो चिट्ठी-चपाती से मुमकिन नहीं। आप इस ओर आएँ तो कुछ हो सकता है। मुझसे आपके लिए जो कुछ बन पड़ेगा, सब करूंगा। आशा है, आप स्वस्थ और सानंद हैं।

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विनीत

अमृतराय

उज्जैन में, सन् 1948 में, ‘सन्ध्या’ नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन-भार


एक साहित्य-प्रेमी प्रकाशक (जो होम्योपैथी डाक्टर थे) ने मुझे सौंपा। इसके मात्र दो अंक ही निकल सके (अक्टूबर ’48 और जनवरी ’49 )। सहयोगी लेखक थे - शिवमंगलसिंह ‘सुमन’, मन्मथनाथ गुप्त, ‘अंचल’, ‘मिलिन्द’, रांगेय राघव, त्रिलोचन, रामविलास शर्मा आदि। तीसरा अंक तैयार किया ज़रूर; अर्थाभाव के कारण प्रकाशक उसे प्रकाशित नहीं करवा सके। तीसरे अंक के लिए, भाई अमृतराय जी से रचनाएँ आमंत्रित कीं। इस संदर्भ में, उनका पत्र मेरे पास सुरक्षित है :

. ‘हंस’

बनारस

दि. 14-2-49

प्रिय भाई,

‘सन्ध्या’ के दोनों अंक मिले। सरसरी निगाह से देख भी गया। दूसरा अंक ज़्यादा तगड़ा है। यों दोनों ही अंक अच्छे हैं। अच्छा निकाल रहे हो। उसे देखकर मन को संतोष हुआ।

मैं आजकल प्रकाशन-व्यवसाय के चक्कर में पड़ गया हूँ, इसलिए मेरा लिखना बंद-सा ही है, और लगता है कि अभी कुछ दिन और यही स्थिति रहेगी। तो भी तुमको कुछ भेजने की कोशिश करूंगा।

सस्नेह तुम्हारा,

अमृतराय

‘रानी’ में कल तुम्हारी एक रोमानी कविता देखी - यह सब क्या मामला है? यह ‘अंचल’ वाली पद्धति छोड़ो!

रानी’ (कलकत्ता) मासिक में, मैंने ख़ूब लिखा- कविताएँ, रेखाचित्र/लघु कथाएँ। बड़ी सुरुचिपूर्ण सुन्दर पत्रिका थी। जिस रोमानी कविता का अमृतराय जी ने उल्लेख किया है वह मेरे प्रेम-गीतों के संग्रह ‘मधुरिमा’ में संगृहीत है ( किंचित परिवर्तन के साथ।) ‘अंचल’ जी वाली पद्धति से अमृतराय जी का संबंध नारी के देहिक-मांसल व्यापार-चित्रण से है; सो ठीक ही है। लेकिन ‘मधुरिमा’ की प्रेम-परक कविताएँ पर्याप्त संतुलित व मर्यादित हैं!

दि. 29 जुलाई 1950 को ‘शासकीय आनन्द महाविद्यालय’, धार (मध्य-भारत) में व्याख्याता-पद का कार्य-भार ग्रहण किया। नवम्बर 1950 में, अमृतराय जी को कविताएँ प्रकाशनार्थ भेजीं व अपने कविता-संग्रह के प्रकाशन का भी उनसे अनुरोध किया। इस समय तक ‘तारों के गीत’ और ‘टूटती शृंखलाएँ’ नामक कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। अमृतराय जी ने उत्तर में निःसंकोच लिखा -

. ‘हंस’

बनारस

दि. 25-11-50

प्रिय महेन्द्र,

तुम्हारा 22 तारीख़ का पत्र और कविताएँ मिलीं। कविताएँ संभवतः इसी अंक में जायेंगी। मुझे काफ़ी अच्छी लगीं, बात साफ़ और कलापूर्ण और मार्मिक ढंग से कही गयी है और यही चाहिए।

तुम्हारे कविता-संग्रह को लेते डर लगता है, इसलिए कि पता नहीं कब उसमें हाथ लगा सकूँगा। कविता-संग्रह की खपत भी कम ही होती है, बहुत कम । यह इस चीज़ का व्यावसायिक पक्ष है जिसे देखे बिना भी काम नहीं चलता। मगर तो भी अगर तुम्हारा इतना आग्रह है तो मैं आगे-पीछे छाप ही दूंगा, निश्चिन्त रहो।

सभी साथियों को मेरा नमस्कार कहना।

सस्नेह,

अमृतराय

धार आने के पूर्व, उज्जैन में, मित्र श्री श्याम परमार के सहयोग से, प्रगतिशील विचार-धारा वाले साहित्यकारों की संस्था ‘प्रतिभा-निकेतन’ स्थापित की। हम जैसे साहित्यकार जो सरकारी नौकरी में थे, उन दिनों ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के तत्वावधान में कार्य नहीं कर पा रहे थे; क्योंकि वाम-आन्दोलन की प्रतिनिधि साहित्यिक संस्था होने के कारण ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की गतिविधियों पर सरकार की वक्र-दृष्टि बनी रहती थी। शैक्षिक-सत्र सन् 1949-1950 में देवास में ‘शासकीय शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय’ खुला। शिक्षा-विभाग ने एल. टी-(Licentiate For Teaching ) हेतु जिन अध्यापकों का चयन किया; उनमें मैं भी था; श्री श्याम परमार भी। सन् 1948 में हिन्दी में एम. ए. की उपाधि प्राप्त कर ही चुका था। ‘नागपुर विश्वद्यिालय’ से। श्रेणी द्वितीय; किन्तु प्रावीण्य-सूची में चतुर्थ स्थान। देवास पहुँच कर हमने वहाँ भी ‘प्रतिभा-निकेतन’ की स्थापना की। ‘प्रशिक्षण महाविद्यालय’ के भवन में ही साहित्यिक गोष्ठियाँ करते। विशिष्ट साहित्यकारों (जैसे डा. शिवमंगलसिंह ‘सुमन’ आदि’) के भाषण भी ‘प्रतिभा-निकेतन’ के तत्वावधान में हुए। ‘प्रतिभा-निकेतन’ की गतिविधियों से देवास नगर का प्रबुद्ध-वर्ग आन्दोलित हुआ। यशस्वी व्यंग्य-लेखक श्री शरद जोशी उन दिनों देवास में ही थे; किन्तु उस समय तक उन्होंने लेखन प्रारम्भ नहीं किया था। युवक थे। हमसे प्रायः मिलते रहते थे। यशस्वी गायक श्री कुमार गंधर्व तो देवास के ही थे। उनकी पत्नी श्रीमती कोमकली हमारे साथ एल.टी.कर रही थीं। इस कारण, सत्र-भर, कुमार गंधर्व जी के निवास पर जाना बना रहा। एल. टी. के बाद तत्कालीन शिक्षा-संचालक श्री भैरवनाथ झा ने मुझे पदोन्नत कर ‘शासकीय आनन्द महाविद्यालय’, धार में व्याख्याता-पद पर पदस्थ किया- यह कह कर कि आप कवि हैं; धार का प्राकृतिक-सौन्दर्य आपको रुचिकर लगेगा! धार में भी हमने, सन् 1950 में ‘प्रतिभा-निकेतन’ की स्थापना की। वहाँ, अक्टूबर ’ 50 में, ‘प्रेमचंद पुण्य-तिथि’ के अवसर पर, एक विशिष्ट व महत्त्वपूर्ण बौद्विक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में श्री अमृतराय और भदन्त आनन्द कौसल्यायन को हमने धार आमंत्रित किया। उज्जैन का कार्यक्रम निपटा कर, 11 अक्टूबर’ 50 की शाम, ये दोनों विशिष्ट अतिथि धार पधारे ( मैं स्वयं अपने साथ उज्जैन से, बस में लाया)। बस-स्टैण्ड पर धार के साहित्यकारों और छात्रों ने इनका भव्य स्वागत किया। ‘भदन्त आनन्द कौसल्यायन ज़िन्दाबाद / अमृतराय ज़िन्दाबाद’ का जमकर उद्घोष हुआ। अगले दिन मांडव-गढ़ देखा और रात ‘शासकीय आनन्द महाविद्यालय’ के हॉल में दोनों विद्वान अतिथियों के सार-गर्भित सशक्त-ओजस्वी भाषण हुए। धार के प्रतिक्रियावादी चौंके। नगर में एक नयी चेतना का संचार हुआ। उज्जैन-धार आने के पूर्व, अमृतराय जी का जो पत्र आया; वह इस प्रकार है :

. ‘हंस’

बनारस

दि. 18-8-50

प्रिय भाई,

आपका आठ तारीख़ का पत्र मिला। उसके दूसरे ही दिन ‘प्रतिभा-निकेतन’ के मंत्री का पत्र मिला। मैंने उन्हें स्वीकृति का पत्र दे दिया है। उसके दो-तीन रोज़ बाद ‘सुमन’ का ख़त मिला। मैंने उन्हें लिखा है कि मैं पहले ही स्वीकृति-पत्र भेज चुका हूँ, और मैं जानता हूँ कि तुम्हारी ही इशारेबाज़ी से सब-कुछ हो रहा है। बहरहाल अब मैं प्रेमचंद पुण्य-तिथि के लिए आ रहा हूँ। अब जब आ ही रहा हूँ तो धार की तो बात ही अलग है तलवार की धार को भी देखूंगा!

भाई, ‘टूटती शृंखलाएँ’ जब आयी थी, तब उसे उलट गया था, अब ख़ाक-पत्थर कुछ भी याद नहीं है, बस इतना याद है कि कुछ चीज़ें बहुत अच्छी लगी थीं और कुछ कमज़ोर और उलझी हुईं; क्योंकि दृष्टिकोण में वांछित सफ़ाई नहीं जान पड़ती। अब फिर पढूँ तो कुछ तुक की बात कह सकता हूँ, मगर पुस्तक भी तो इधर-उधर हो गयी है।

प्रेमचंद पर आपके अनुसंधान-कार्य में जो कुछ सम्भव होगा सभी सहायता दूंगा। अभी तो ‘प्रेमचंद के विचार’ नाम से उनकी कुछ एकदम नयी, अछूती सामग्री प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, जो आपके कार्य में बहुत सहायक होगी। यह ख़त लिखते-लिखते ही आज की डाक से आपकी दो कविताएँ मिलीं। अगले अंक में दोनों का, नहीं तो कम-से-कम एक का उपयोग अवश्य करूंगा। ‘विप्लव’ वाली कविता के बारे में सोचना होगा; सरकारी चंगुल में नहीं आना चाहिए हमको।

और सब ठीक ही है। आप मित्रों से मिलने की साध अब पूरी होगी।

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सस्नेह, आपका,

अमृतराय

कुछ समय बाद, मध्य-भारत सरकार द्वारा मेरी गोपनीय जाँच हुई कि क्या मैं साम्यवादी-समाजवादी राजनीति से जुड़ा हुआ हूँ! महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य श्री आर. एम. राजे ने; चूँकि अंग्रेज़ी विषय के वे मेरे गुरु रह चुके थे और मुझे बहुत चाहते थे; मुझे बताया । मेरा लिखित वक्तव्य भी उन्होंने लिया; जिसमें मैंने बहुत ही कड़े शब्दों में लिखा कि मैं राजनीति और राजनीतिज्ञों से घृणा करता हूँ; किसी राजनीतिक संस्था से जुड़ने का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

‘हंस’ में प्रकाशनार्थ प्रेषित ‘विप्लव’ शीर्षक कविता पर अमृतराय जी की टिप्पणी विवेक-सम्मत है; इसमें संदेह नहीं। ‘विप्लव’ कविता कौन-सी थी; अब ज्ञात नहीं। हो सकता है, मैंने इसका शीर्षक बदल दिया हो या इस रचना को नष्ट ही कर दिया हो ।

धार में, आगे चलकर, ‘ प्रतिभा-निकेतन’ में प्रतिक्रियावादी तत्त्व प्रविष्ट हो गये; जो मुझे बहुत नाग़वार लगा। यहाँ तक कि मुझे संस्था से संबध-विच्छेद करने पड़े। बात अमृतराय जी तक भी पहुँची। उन्होंने इस संबंध में मुझे जो लिखा वह अप्रासंगिक है; फिर भी :

. 2 मिण्टो रोड, इलाहाबाद

दि. 7 सितम्बर 1951

प्रिय भाई,

तुम्हारा 21-8-51 का पत्र वर्धा से लौटने पर मिला। यह ‘प्रतिभा-निकेतन’ का मामला कुछ समझ में नहीं आ रहा है। यह तो लगभग साफ़ ही है कि कुछ प्रतिक्रियाशील तत्व ज़रूर दाख़िल हो गए हैं, लेकिन मैं समझता हूँ कि ‘क्रॉसरोड्स’ वाले पत्र में जिस तरह से बात को रखा गया है वह ठीक नहीं है। एकदम सही स्थिति क्या है यह तो शायद ख़ुद देखकर या रहकर ही जानी जा सकती है। मगर यह मानने को मेरा जी नहीं करता कि श्याम परमार प्रच्छन्न सरकारी पिट्ठू है। मगर तुम जब उस संस्था से अलग हुए हो तो उसका भी कोई-न-कोई महत्त्वपूर्ण कारण होगा ही। यह सब बातें मैंने श्याम को ख़त में लिखी थीं और उसके जवाब में उसने मुझको दो ख़त लिखे। जिनसे मेरा कुछ समाधान तो हुआ लेकिन पूरा नहीं हुआ है। मैं तुम्हारी बात से पूरी तरह से सहमत हूँ कि श्याम परमार और रामस्वरूप माहेश्वरी का व्यक्तिगत वैमनस्य मुख्य रूप से इस झगड़े के मूल में है। श्याम ने भी मुझको लिखा है कि धार में ‘प्रतिभा-निकेतन’ ने सचमुच अपने आप को बहुत गिरा दिया है। ‘सुमन’ भाई से भी मैं स्थिति का पूरा पता लगा रहा हूँ और मेरी कोशिश भी इसी दिशा में होगी कि दोनों ही संस्थाएँ फलें-फूलें।

पिछले अंक में तुम्हारी जो कविता छपी थी वह काफ़ी पसंद की गई है। तुम तक यह बात पहुँचानी ज़रूरी थी। इस अंक के लिए क्या कोई तगड़ी चीज़ नहीं भेजोगे?

सस्नेह तुम्हारा,

अमृतराय

12 मई 1952 को विवाह हुआ-मुरार/ग्वालियर से। उस दिनों पिता जी सपरिवार हाई स्कूल, मुरार के छात्रावास में अधीक्षक-भवन में रहते थे; विद्यालय-परिसर में ही। मैं धार । मालवा में। उज्जैन-इंदौर के पास। कुछ गिने-चुने साहित्यिक मित्रों को ही वैवाहिक आमंत्रण-पत्र भेजे। अमृतराय जी को भी भेजा होगा या फिर उन्हें बाद में बताया होगा। उनका उत्तर दि. 6 जून 1952 का है :

. ‘हंस’ कार्यालय, इलाहाबाद

प्रिय भाई,

तुम्हारा प्यारा-प्यारा पत्र मिला। अब धार में तुम्हारा मेहमान बनने में मज़ा आएगा! अच्छी-अच्छी चीज़ें तो ख़ाने को मिलेंगी।

‘कथाकार अमृतराय’ में तुमने जो कुछ भी लिखा हो उसे ख़़ुद ही कहीं छपाना; कहीं मेरे पास न भेज देना वर्ना सड़ जाएगा। अपनी बचत के लिए तुम्हें चेता दिया।

तुम्हारे योग्य क्या कार्य लिखा करूँ, मेरी समझ में नहीं आता। प्यार बनाए रहो, यही बहुत है।

मेरा उपन्यास अब पंद्रह-बीस रोज़ में किनारे लग जाएगा - काफ़ी बड़ा हो गया है और शायद बुरा भी नहीं हुआ है।

अपनी धर्मपत्नी को मेरा प्रणाम देना।

मैं जल्दी ही धार-उज्जैन आऊंगा।

प्यार लो।

अमृत

तुम्हारी कविता जुलाई अंक में दे दूंगा। मई-जून का अंक निकल गया।

‘अमृतराय की कहानियाँ’ शीर्षक से एक आलेख तैयार किया था; जो तब किसी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। बाद में, प्रस्तुत पत्र में उल्लखित उपन्यास


‘बीज’ की समीक्षा भी की थी। (सन् 1956 में ‘हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय’, बनारस से प्रकाशित मेरी आलोचना-कृति ‘आधुनिक साहित्य और कला’ में ये दोनों आलेख समाविष्ट हैं।)

सन् 1952 के बाद, अमृतराय जी से पत्र-व्यवहार रहा तो होगा; लेकिन इस अवधि के पत्र, न जाने क्यों, मेरे संग्रह में मिले नहीं। सन् 1964 का उनका एक पत्र है; जो इस ओर संकेत करता है। सन् 1964 में, ‘महारानी लक्ष्मीबाई कला-वाणिज्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय’, ग्वालियर में सहायक प्रोफ़ेसर-पद पर कार्यरत था :

. 18 हेस्टिंग्स रोड, इलाहाबाद

दि. 6-10-64

भाई,

पहले हाथ जोड़ कर माफ़ी माँग लूँ-उन सब भूलों के लिए, कोताहियों के लिए, लापरवाहियों के लिए जो इन महीनों और बरसों में मुझसे हुई हैं।

किताबें पूरी हो गयीं-और परसों ‘प्रेमचंद स्मृति दिवस’ पर उनको प्रकाशित करने का एक छोटा-मोटा आयोजन है। निमंत्रण-पत्र भी मिला ही होगा। मन पर जैसे एक पहाड़ उतर गया।

प्रकृतिस्थ होते थोड़ा समय लगेगा, फिर कहानी-उपन्यास-लेखों का सिलसिला शुरू होगा। पत्र-पत्रिकाओं को नाहीं करते- करते बेशर्म हो गया। इधर दो वर्षों से मित्रों को जवाब देना भी छोड़ दिया था। अब फिर शायद जल्दी ही वह स्थिति आ सकेगी जब आप सबकी थोड़ी-बहुत सेवा कर सकूंगा। जैसा कि आप देखते ही होंगे, current writing से मैंने नाता ही तोड़ लिया है। मजबूरी थी। दूसरा उपाय नहीं था।

आशा है, स्वस्थ और सानंद होंगे।

सस्नेह, आपका -

अमृतराय

‘हंस’ जैसी महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक पत्रिका का प्रकाशन बंद हो जाना दुर्भाग्य-पूर्ण रहा। इसके पुनर्प्रकाशन के लिए मैंने भी अमृतराय जी को एकाधिकबार लिखा। इस संदर्भ में उनका एक पत्र :

. हंस प्रकाशन

18 हेस्टिंग्स रोड, इलाहाबाद

दि. 30-8-65

प्रिय भाई,

15/8 का पत्र मिला। साहित्य की वर्तमान गतिविधि से आपका दम कैसा घुट रहा है, मैं खूब समझता हूँ; क्योंकि मेरे मन की भी वही दशा है। बहुत बार ‘हंस’ निकालने का विचार मन में आता है, लेकिन परिस्थितियों की प्रतिकूलता देखकर हाथ-पैर फूल जाते हैं। पर अब लगता है कि और चुप बैठना संभव नहीं। संकल्प मन में रूप ले रहा है। आप सब बंधुओं का सहयोग मिले तो एक बार फिर हिम्मत की जा सकती है।

आशा है, प्रसन्न होंगे।

सस्नेह, आपका-

अमृत

इन दिनों मेरा स्थानान्तरण ‘शासकीय महाविद्यालय’, महू (इंदौर) हो चुका था। वहाँ मैं हिन्दी-विभाग का अध्यक्ष था। कुछ समय बाद, ‘इंदौर विश्वविद्यालय’, इंदौर के ‘हिन्दी अध्ययन मंडल’ का सदस्य बना। अनेक शैक्षिक योजनाओं और कार्य-कलापों में व्यस्त रहा। लगभग दो-वर्ष बाद, अमृतराय जी को जो पत्र लिखा उसका उत्तर मिला ज़रूर; किन्तु मेरे कविता-संग्रह के प्रकाशन की कोई जुगत नहीं निकल सकी।

इन दिनों, मेरी कविताओं के अंग्रेज़ी-काव्यानुवादों का एक विशिष्ट संकलन Forty Poems of Mahendra Bhatnagar तैयार हुआ। डा. विद्यानिवास मिश्र जी ने थ्वतमूवतक लिखा (दि. 31 मई 1967) यह संकलन सन् 1968 में S.k~ CÈnd & Co+, New Delhi से प्रकाशित हुआ। इसके पूर्व, सन् 1957 के आस-पास, कुछ कविताओं के चेक-भाषा में अनुवाद चेक-पत्रिका Novy Orient+ में प्रकाशित व चेकोस्लोवेक-रेडियो से प्रसारित हो चुके थे। अनुवादक डा. ओडोलन स्मेकल। पर, विदेशों में हिन्दी-कविता में रुचि लेने वालों की मेरी जानकारी नगण्य थी; एतदर्थ मैंने अमृतराय जी से इस संबंध में कुछ जानना चाहा। अमृतराय जी की यह विशेषता थी कि वे पूरा पत्र ध्यानपूर्वक पढ़ते थे और प्रत्येक अपेक्षा में रुचि लेते थे। निम्नलिखित पत्र उनसे मेरी बढ़ती आत्मीयता का द्योतक है :

. 18 हेस्टिंग्स रोड,

इलाहाबाद

दि. 29 अगस्त 1967

प्रिय भाई,

आपका 7/8 का पत्र मिला। आपसे भेंट हुए सदियाँ हो गयीं, ख़ुद हम

लोगों की अपनी ज़िन्दगियों में जाने कैसे-कैसे उतार-चढ़ाव आये। बहुत जी होता है कि फिर भेंट-मुलाक़ात की कोई सूरत बनती लेकिन दूरियाँ बहुत हैं और यात्रा किसी के लिए भी सुखकर नहीं। इसलिए मन मार कर बैठ जाता हूँ। साहित्य की दुनिया भी अत्यंत दूषित है। ऐसे में सबसे अलग-थलग बैठा अपना थोड़ा-बहुत लिखता-पढ़ता रहता हूँ।

‘सहचिन्तन’ की प्रति भिजवा रहा हूँ। पढ़कर देखिए। मेरा ख़्याल है कि साहित्य की एक आधुनिक और स्वस्थ दृष्टि उसके भीतर से निकलती है। मैं जानता हूँ आप पसंद करेंगे। समीक्षाएँ निकली तो हैं मगर यों ही-सी। किसी ने पढ़ कर गहराई से सोचने और बात कहने की तक़लीफ़ नहीं गवारा की। शायद इसीलिए कि वह कष्टसाध्य चीज़ थी और आजकल सभी तरफ़ चलतू माल का बोलबाला है। आपको पुस्तक पढ़ कर अगर लगे कि सचमुच कुछ नई बात कही गयी है, जो कि महत्त्वपूर्ण है, तो आप अपने ढंग से उस पर कही लिखिएगा, खुलकर।

प्रकाशन की दुनिया में भयानक मंदी है। ऐसे में कोई नई पुस्तक, और वह भी कविता-पुस्तक जिसका बाज़ार एकदम नहीं है, छापने का साहस जुटा पाना कठिन है। अपने किसी स्थानीय प्रकाशक बंधु से पूछिएगा, बहुत ही बुरी स्थिति चल रही है।

विदेशों में हिन्दी-कविता पर कहाँ-कहाँ काम हो रहा है मुझे कुछ भी नहीं मालूम। तो भी कुछ और विस्तार से लिखिएगा, संभव है मैं एक-दो पते आपको दे सकूँ जहाँ से आपके अपेक्षित जानकारी मिल सकेगी।

सस्नेह, अमृत

लेकिन, ‘सहचिन्तन’ अमृतराय जी भिजवाना भूल गये! अनेक महीनों बाद, शायद, मैंने स्मरण कराया हो। महू-आवास के दौरान, सुभद्राकुमारी चौहान पर एक विशेष कार्य-परियोजना बनायी थी। अतः उनका साहित्य एकत्रित किया। अमृतराय जी का भी सहयोग मिला। ‘नई कहानियाँ’ में कभी लिखा नहीं मैंने। अमृतराय जी ने इस पत्रिका को पर्याप्त सँवारा; इसमें संदेह नहीं। इसके पूर्व, उसके अग्रज श्रीपतराय जी की ‘कहानी’ पत्रिका में एकाधिक टिप्पणियाँ मैंने ज़रूर लिखी थीं।

. नई कहनियाँ

हंस प्रकाशन

18 हेस्टिंग्स रोड, इलाहाबाद

दि. 20-4-1968

भाई,

9/4 का पत्र मिला।

अपनी इधर की तीन पुस्तकें आपको भिजवा रहा हूँ-सहचिन्तन, रम्या और हेमलेट। ख़ूब समय लेकर प्रेमपूर्वक इनको देखिएगा। मुझे विश्वास है कि तीनों अपने-अपने ढंग से आपको अच्छी लगेंगी। संभव हो तो इन पर कहीं लिखें भी।

‘मुकुल’ भी भेज रहा हूँ। कुछ कविताएँ ‘त्रिधारा’ नामक संकलन में हैं जो इंडियन प्रेस, राइट टाउन, जबलपुर से प्रकाशित हुई थीं और अब अप्राप्य हैं। कुछ कविताएँ पाण्डुलिपि में हमारे पास हैं जो यहाँ आने पर ही आप देख सकते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में भी ज़रूर कुछ कविताएँ होंगी, पर वह तो आपके पता लगाने की चीज़ है। जो हो आप चाहें तो इस विषय में अजय चौहान, 1967 राइठ टाउन, जबलपुर से पत्र-व्यवहार कर सकते हैं।

सस्नेह, आपका,

अमृतराय

‘नई कहानियाँ’ अपने नगर के एजेंट या व्हीलर की बुकस्टाल से ले लेना ही ज़्यादा अच्छा होगा। डाक से भेजने पर तो अधिक संभावना रास्ते में गुम हो जाने ही की है। लोग कहते हैं, मेरे हाथ में आने के बाद ‘नई कहानियाँ- की आत्मा बदली है। देखिएगा। लिखिएगा। -अ.

सुभद्राकुमारी चौहान विषयक कार्य को सन् 1982 - 1983 में ही गति दे सका; यद्यपि आज-तक अपूर्ण है। इस संबध में वांछित विस्तार से यथास्थान; मात्र कुछ पत्रों के बाद।

24 नवम्बर 1969 से ‘शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय’, मंदसौर में, हिन्दी-प्रोफ़ेसर व अध्यक्ष बना। मंदसौर-आवास के दौरान भी अमृतराय जी से पत्र-सम्पर्क बना रहा। अपने उज्जैन प्रवास पर मुझसे भी मिलने की जो उत्कट उत्कण्ठा उन्होंने प्रकट की; वह आज भी मुझे उद्वेलित करती है। शायद कार्यक्रमानुसार अमृतराय जी का उज्जैन आना हुआ नहीं। उन्होंने अपनी किसी योजना का उल्लेख किया था। यदि मेरा मिलना होता तो उसके संबंध में अवश्य जानकारी मिलती। फिर बात ध्यान से उतर गयी उनका यह विशिष्ट पत्र मेरे प्रति उनकी प्रगाढ़ मैत्री-भावना को उजागर करता है :

. 18 हेस्टिंग्स रोड

इलाहाबाद

दि. 26-3-74

प्रिय भाई,

आपका 17/3 का कृपा-पत्र मिला।

पुस्तकों के संबंध में आप व्यर्थ संकोच कर रहे हैं। यह तो कोई ऐसी बड़ी बात भी नहीं। मैंने शायद आपको लिखा था कि आप अपने यहाँ देखकर मुझे सूची बनाकर भेज दें आपको किन पुस्तकों की ज़रूरत है, मैं आपको भिजवा दूंगा।

आगे समाचार यह है कि मैं मानस चतुश्शती की एक गोष्ठी की अध्यक्षता करने के लिए पकड़ लिया गया हूँ और 2 अप्रैल को वहाँ पहुँचूंगा। दो-तीन रोज़


भोपाल में रुकूंगा, फिर 5-6 तक उज्जैन पहुँचूंगा। बंधुवर ‘सुमन’ जी और डा. भगवत शरण दोनों का बड़ा आग्रह है और मैं भी उनसे मिलने को बहुत उत्सुक हूँ, वर्षों से भेंट नहीं हुई और जब उज्जैन के इतने पास तक पहुँचूंगा तब उनसे मिले बिना लौट आना बहुत ग़लत बात होगी। अतः 5 या 6 के बाद दो-तीन रोज़ उज्जैन में रहने का भी कार्यक्रम है। मुझे पता नहीं, मंदसौर उज्जैन से दूर है या पास। अगर आपके लिए संभव हो तो आने का कष्ट कीजिएगा वर्ना मैं ही देखूंगाा। इच्छा आपसे मिलने की भी है -पता नहीं कितने वर्षों बाद यह भेंट होगी, अगर हो पायी! आपसे अपनी एक योजना के बारे में बात भी करना चाहता था इसलिए अगर संभव हो इतनी तक़लीफ़ करें।

स्नेह साहित, आपका,

अमृतराय

हमारा मंदसौर का महाविद्यालय, ‘विक्रम विश्वविद्यालय’, उज्जैन से सम्बद्ध था। उन दिनों, मैं वहाँ, अन्य समितियों के अतिरिक्त, ‘हिन्दी अध्ययन मंडल’ का सदस्य भी था। अध्यक्ष थे- आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र; जो ‘हिन्दी अध्ययन शाला’, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में हिन्दी-विभागाध्यक्ष भी थे। उनके सेनानिवृत्त होते ही, ‘हिन्दी अध्ययन मंडल’ के अध्यक्ष-पद पर मेरा मनोनयन हुआ (‘मंडल’ का वरिष्ठतम प्रोफ़ेसर होने के कारण/ अधिसूचना दि. 19-10-1973)। दायित्व बहुत बढ़ गया। विभिन्न पाठ्य-क्रमों में पाठ्य पुस्तकों का निर्धारण यद्यपि ‘अध्ययन मंडल’ की प्रायः सर्वसम्मति से ही होता है; तथापि अचानक कुछ भी अन्यथा हो जाने की स्थिति में, आलोचना का लक्ष्य अध्यक्ष ही बनता है! बाद में , अमृतराय जी का एक उपन्यास ‘सुख-दुख’ बी. ए. के पाठ्य-क्रम में निर्धारित हुआ। यथासमय इसकी सूचना मैंने भी अमृतराय जी को दी। उनका जो उत्तर आया; उसका अंतिम अनुच्छेद जिस पारिवारिक आत्मीयता से भरपूर है; वह आज के स्वार्थपरक समाज में विरल है; दुर्लभ है :

. 18 हेस्टिंग्स रोड

इलाहाबाद

दि. 4 जनवरी 1975

प्रिय भाई,

आपका दिनांक 23/12 का कृपापत्र मिला। आपके विशेष यत्न से ‘सुख-दुख’ बी. ए. में लग गई, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। उसके विकल्प में दूसरी कोई पुस्तक नहीं है, यह और भी हर्ष की बात है। पर, आपने लिखा है कि यह पुस्तक जुलाई 77 से पढ़ायी जायेगी, जब कि मुझे कुछ ऐसी सूचना मिली थी कि वह इसी वर्ष से पढ़ाई जायेगी। यदि उसे जुलाई 77 से ही पढ़ाना था तो उसको अभी से लगाने की क्या ज़रूरत थी? बात कुछ समझ में नहीं आयी। कृपया अगले पत्र में इस पर प्रकाश डालें।

आपने ‘सुख-दुख’ पर उच्चस्तरीय समीक्षा-पुस्तक का सम्पादन करने का सुझाव दिया है। अच्छी बात है; पर, अकेले इस पुस्तक पर, उसके विभिन्न पक्षों पर, लिखी गयी पुस्तक, मुझे भय है, केवल छात्रोपयोगी होकर रह जायेगी। क्या इससे अच्छा यह न होगा कि मेरे सभी उपन्यासों पर एक समीक्षा-ग्रंथ तैयार किया जाय? संभव है उसकी कुछ खपत साधारण पाठकों के बीच भी हो सके। हाँ, यदि आप सोचते हैं कि ‘सुख-दुख’ के पाठ्य-क्रम में आ जाने से छात्रों के बीच ही उसकी काफ़ी खपत हो जाने की आशा है तो दूसरी बात है।

अपने देश की संप्रति जो शोचनीय स्थिति है उसके संदर्भ में हम लोग ठीक ही चल रहे हैं।

आशा है, आप भी सपरिवार स्वस्थ और सांनद हैं। मैं तो अब दादा बन गया हूँ। आपके बच्चे कितने बड़े-बड़े हुए और क्या कर रहे हैं? मेरा लड़का और बहू दोनों ही यहाँ विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। लड़का अंग्रेज़ी पढ़ाता है, बहू अर्थ-शास्त्र पढ़ाती है। इसी पहली अक्टूबर को उन्हें एक लड़की हुई।

सस्नेह, आपका,

अमृत

अब हम वर्ष 1979-समाप्ति तक आ पहुँचे। मंदसौर से ग्वालियर स्थानान्तरण हो चुका था। दि. 1 जुलाई 1978 को ‘शासकीय कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय’, ग्वालियर में कार्य-भार ग्रहण किया। अमृतराय जी को ग्वालियर आमंत्रित किया। एकाधिक पत्र भेज कर आग्रह किया। किंतु; वे आने में असमर्थ रहे। उनकी विवशता उचित है; जैसा कि उनके अधेो-अंकित पत्र से स्पष्ट है :

. 18 न्याय मार्ग, इलाहाबाद

दि. 5-12-79

प्रिय भाई,

मैं आपके प्रति बहुत लज्जित हूँ जो आपके 26/9 के पत्र का उत्तर नहीं दे पाया और 31/10 के पत्र का भी उत्तर इतनी देर से दे रहा हूँ। यह देरी नितान्त अकारण नहीं है। पहले तो अपने शोध-कार्य को पूरा करने में लगा रहा, फिर 9 अक्टूबर को उसी प्रसंग में नेशनल लाइब्रेरी और एशियाटिक सोसाइटी में काम करने के लिए गया तो 29 को लौटा। तीन दिन यहाँ रहा और फिर 2 नवम्बर को मध्य-प्रदेश के लिए निकला तो इंदौर, उज्जैन, भोपाल, सागर, जबलपुर होता हुआ 19 की रात को लौटा और आते ही कुछ ऐसी चिन्ताजनक स्थिति में पड़ गया कि कहने की बात नहीं; उर्र्दू के मेरे एक बहुत


पुराने कहनीकार बंधु मुझसे मिलने के लिए आये और यहीं उन्हें हार्ट अटैक हो गया और तीसरे दिन अस्पताल में उनका देहान्त भी हो गया! आप समझ ही सकते हैं, मुझ पर कैसी बीती होगी। अब भी उस मानसिक आघात से मुक्त नहीं हो पाया हूँ।

याात्राएँ इन दिनों बिलकुल ही सुकर नहीं हैं। और व्यस्त भी बहुत हूँ। इसलिए आपके यहाँ आ नहीं पाऊंगा, क्षमा करेंगे।

आशा है, स्वस्थ और प्रसन्न हैं।

आपका

अमृतराय

‘कमलाराजा कन्या महाविद्यालय’, ग्वालियर में आयोजित किसी कार्यक्रम में मैंने अमृतराय जी को पुनः आमंत्रित किया; किन्तु वे इस या उस कारणवश, इस बार भी, नहीं आ सके। ग्वालियर आने के एक सत्र बाद ही, यहाँ के ‘जीवाजी विश्वविद्यालय’ में ‘हिन्दी अध्ययन मंडल’ का, तीन-वर्ष के लिए, अध्यक्ष मनोनीत हुआ - क्षेत्राधिकार में वरिष्ठतम हिन्दी-प्रोफ़ेसर होने के कारण। ‘जीवाजी विश्वविद्यालय’ में हिन्दी की अपनी अध्ययनशाला नहीं है। अमृतराय जी की इच्छानुसार इसलिए संभव नहीं हो सका; क्योंकि हिन्दी के कुछ और भी नये उपन्यासकारों के प्रति मेरी रुचि रही। वस्तुतः इधर हिन्दी-उपन्यास ने आशातीत प्रगति की है। किन्तु स्तरीय व प्रतिष्ठित उपन्यासकारों को ही पाठ्य-क्रम में निर्धारित करने के पक्ष में मैं सदा रहा। अमृतराय जी के साहित्य पर शोध हो; इस दिशा में अवश्य सक्रिय रहा; शोधार्थियों को प्रेरित किया :

. 18 न्याय मार्ग, इलाहबाद

दि. 23-11-80

प्रिय भाई,

15/11 का कृपापत्र मिला।

आप इतने आदर-मान से, प्यार से मुझे बुलाते हैं, मेरी समझ मे नहीं आता क्या कहूँ। मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, उम्र भी बढ़ रही है, 60 वाँ चल रहा है। यात्रा-भीरु सदा का हूँ और इन दिनों तो यात्राएँ जितनी दुष्कर हो गयी हैं, कहीं भी आने-जाने को जी नहीं चाहता। देश भर में सैकड़ों प्रेमचंद-जन्मशती-समारोह हुए, सबने बड़े आग्रह से बुलाया पर मैं गिनती के तीन आयोजनों में ही अब तक गया हूँ, जिनमें से दो में तो इसलिए गया कि अहिन्दी प्रदेश के आयोजन थे, बंगालियों का आयोजन कलकत्ते में और कन्नड़ आयोजन बेंगलूर में। लेकिन दो के लिए फिर पकड़ गया हूँ- दोनों उदयपुर में। एक विश्वविद्यालय का 22-23-24 दिसम्बर को और दूसरा राजस्थान विद्यापीठ का 12-13-14 दिसम्बर को। किसी तरह बच नहीं पाया। कहाँ तक इंकार करो। फिर कुछ लोग तो शायद यह भी समझ लेते होंगे कि यह आदमी बड़ा दंभी है जो इतने मान-मनुहार के बाद भी नहीं पसीजता! अब कैसे किसी को समझाऊँ कि मेरे शरीर की और स्वभाव की भी तो कुछ विवशताए हैं, वर्ना आदर-मान किसे बुरा लगता है। इसके साथ ही एक बात और भी है, मेरा अपना लिखना-पढ़ना भी इसमें बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है, जिससे फिर मन को बड़ा कष्ट होता है। इसलिए भाई, हाथ जोड़ कर, पैर पकड़ कर क्षमा चाहूंगा। लेकिन आप तब ही नहीं मानेंगे तो आना ही पड़ेगा। पर अभी 22/12 के आसपास आने का भी प्रश्न ही नहीं आता क्योंकि पहले से ही बँधा हुआ हूँ। अगले साल देखी जाएगी, कभी डौल बैठा सका।

अब मेरा एक निवेदन। आप अब इस स्थिति में हैं कि मेरा बहुत उपकार कर सकते हैं। एक तो आप मेरी किसी पुस्तक को बी. ए. में लगाएँ, जिससे कुछ बिक्री हो, एम. ए. की पुस्तक तो अधिकांशतः मान-सम्मान की ही बात होकर रह जाती है। दूसरी बात यह कि ‘गोदान’ मेरा प्रकाशन नहीं है। उसके स्थान पर अगर आप ‘ग़बन’ या ‘कर्मभूमि’ को ला सकें तो आभारी होऊंगा। आशा है, सपरिवार कुशल-मंगल है।

आपका,

अमृतराय

अपनी पुस्तकों का एक सूचीपत्र आपको भिजवा रहा हूँ। देख लें, इनमें से जो आपने अब तक न पढ़ी हों, संकेत दें, वह आपके पास पहुँच जाएंगी। आपके पास मेरी सब पुस्तकें हों तो मुझे खुशी होगी। -अ.

‘राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली’ के तत्कालीन व्यवस्थापक श्री ईश्वरचंद्र जी ने ‘आज के लोकप्रिय हिन्दी कवि’ पुस्तकमाला के लिए श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान के जीवन और कृतित्व पर एक सम्पादित पुस्तक का पत्र-अनुबंध मुझसे किया (दि. 23 अक्टूबर 1982 )। इस संबंध में, अमृतराय जी और उनकी पत्नी श्रीमती सुधा चौहान के माध्यम से, श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान के स्वत्वाधिकारी से मैंने पत्राचार करना चाहा। प्रामाणिक सामग्री एकत्र करने में, अमृतराय जी और श्रीमती सुधा चौहान के आश्वास प्राप्त हुए। दि. 13 जनवरी 1983 का पत्र, इसी संदर्भ में है :

प्रिय भाई,

7/1 का कार्ड मिला। ‘मुकुल तथा अन्य कविताएँ’ और ‘मिला तेज से तेज’ की प्रतियाँ आपके आदेशानुसार भिजवा रहा हूँ। और क्या समाचार हैं?

जयपुर का सम्मेलन बहुत अच्छा रहा। बहुत सारे नए लेखक आये थे। देश के कोने-कोने से।


आशा है, स्वस्थ ओैर प्रसन्न होंगे।

आपका,

अमृतराय

खेद है, संकलन लगभग तैयार कर लेने के बाद, ‘राजपाल एण्ड सन्ज़’ ने अपना प्रस्ताव स्थगित और फिर निरस्त कर दिया!

अमृतराय जी को, अपनी काव्य-कृतियों के प्रकाशन के संबंध में जब-तब लिखता रहा; किन्तु उनके प्रकाशन-संस्थान ‘हंस प्रकाशन’ द्वारा मेरी किसी भी नयी कृति का अथवा पूर्व-प्रकाशित किसी भी विशिष्ट कृति के नये संस्करण का

प्रकाशित किया जाना संभव नहीं हुआ। अमृतराय जी कोई कोरे पुस्तक-प्रकाशन-

व्यवसायी तो थे नहीं; मात्र अपनी और अपने परिवार की कृतियाँ प्रकाशित कर लेते थे। अतः प्रकाशन के लिए उनसे बार-बार आग्रह करने का कोई औचित्य था नहीं। फिर भी, उम्मीद रही! सन् 1984 में, इस संदर्भ में जो पत्र लिखा था, उसका उत्तर आया ज़रूर :

. 18 न्याय मार्ग

इलाहाबाद

दि. 30-10-84

प्रिय भाई,

आपका एक पत्र काफ़ी पहले मिला था। आपने अपने कविता-संग्रह ‘जिजीविषा’ के दूसरे संस्करण के यहाँ से प्रकाशन के संबंध में पूछा था। क्या लिखता आपको। मैं तो धंधा समेटने में लगा हूँ, फिर नया कुछ छापने का उत्साह कहाँ से जागे। और यों तो आरम्भ से ही मेरी स्थिति कुछ लेखक-प्रकाशक की रही है; अब और भी सीमित रूप हो गया है। प्रेमचंद-साहित्य के पुनर्मुद्रण के अलावा बस अपनी ही जब कोई नई चीज़ तैयार हो जाती है तो उसको छाप लेता हूँ। जैसे अभी पिछले महीने ‘विचार धारा और साहित्य’ नाम से मेरी एक छोटी-सी पुस्तक छपी है। उसके कुछ महीने पहले मेरे इधर के हास्य-व्यंग्य का एक छोटा-सा संग्रह ‘विज़िट इंडिया’ नाम से प्रकाशित हुआ था। ये दोनों आपको भिजवा रहा हूूँ देखिएगा। अगर जँचे तो कहीं उन पर लिखिएगा, आभारी होऊंगा बिक्री-बट्टे का हाल तो इतने भयंकर रूप से खराब है कि कुछ कहते नहीं बनता।

आशा है, आप स्वस्थ व सानंद हैं।

वर्षों से अपनी भेंट नहीं हुई क्या आप कभी इस ओर नहीं आते?

आपका,

अमृतराय

फिर, अमृतराय जी विदेश भी हो आये। विदेश से संबंधित कुछ जानकारी उसने चाही; जो उपलब्ध नहीं हो सकी। हिन्दी में रुचि रखने वाले कुछ विदेशी विद्वानों से मेरा परिचय रहा; किन्तु अनुवाद या किसी अन्य परियोजना का कार्यान्वय सम्भव नहीं हो सका। अपनी कृतियाँ तक उन्हें नहीं पहुँचा सका। अमृत भाई का दि. 11 जनवरी 1990 का पत्र मिलाः

प्रिय भाई,

आपका एक पत्र काफ़ी पहले मिला था। मुझी से उत्तर देने में प्रमाद हो गया। क्षमा करें।

यहाँ पर मैं सपरिवार कुशल से हूँ। बुढ़ापे ने जितना कुछ घेर लिया है, वह तो उस चित्र से ही स्पष्ट होगा। पर यही तो ज़िन्दगी का खेल है। आपने मेरे कथा-साहित्य पर जो दो आलोचनात्मक लेख लिखे थे, उनका मुझे कुछ स्मरण नहीं। बड़ी कृपा होगी अगर उनकी फ़ोटो-कापी भेज सकें।

विदेशों में मेरे बस कुछ निजी मित्र हैं जो यात्राओं के दौरान मिल गए; फिर उनमें कोई भी ऐसा नहीं जो किसी का सम्पादक हो या काव्य का अनुवादक हो और जिससे आपका परिचय करवाना आपके लिए उपयोगी हो। मैं जितनी बार गया-आया, मेरे उस तरह के भी कुछ मित्र बन ही सकते थे, पर मुझसे तो वह सब कुछ बनता ही नहीं।

कभी दो-चार रोज़ के लिए यहाँ आइए, मेरे पास ही ठहरिए तो बड़ी खुशी हो। सदियों से अपनी भेंट-मुलाक़ात नहीं हुई।

अपने उन लेखों की फ़ोटो-कापी ज़रूर भेजिएगा। देखने की उत्सुकता है। नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ,

सप्रेम

अमृत

मेरे पास, अमृतराय जी का अंतिम पत्र दि. 6 मार्च 1990 का है। मैंने उन्हें ‘लोकभारती प्रकाशन’ (इलाहाबाद) के संबंध में लिखा था। ‘लोकभारती’ से मेरीे दो कृतियाँ प्रकाशित हुईं -‘संवर्त’ कविता-संग्रह और ‘अजेय आलोक’ रूपक-संग्रह। रॉयल्टी नियमित न पा सका; एतदर्थ अमृतराय जी के माध्यम से प्रकरण निपटवाना चाहा :

प्रिय भाई,

23/2 का पत्र मिला।

आत्माराम के यहाँ से आपकी पुस्तक अब तक मुझे नहीं मिली। आपने पुन :

स्मरण कराया है तो भेजते ही होंगे, परेशान न हों।

‘हंस प्रकाशन’ अपनी उसी पुरानी कछुए की चाल से चल रहा है, बल्कि शायद पहले से भी घटिया। दफ़्तर में कुल दो लोग हैं, एक चपरासी और एक पढ़े-लिखे सज्जन जो दफ़्तर का काम देखते हैं। आप फिर समझ ही सकते हैं, बिक्री-बट्टे का क्या हाल होगा। पर, मैं तब भी खुश हूँ, कोई हाय-हाय तो नहीं है। दाल-रोटी के लिए काफ़ी मिल ही जाता है।

‘लोकभारती’ से परिचित तो ख़ूब हूँ पर दुर्भाग्यवश उनके साथ मेरे संबंध ठीक नहीं, इसलिए क्षमा करेंगे। मेरे  कुछ भी कहने का उनक े निकट  कोई  मूल्य न होगा।

सस्नेह, आपका

अमृतराय

सन् 1956 के कुछ पूर्व, जब अमृतराय जी- ‘18 हेस्टिंग्ज़ रोड़’ रहने लगे थे, अपने एक रिश्तेदार की बरात में शामिल होने दिल्ली से इलाहाबाद पहुँचा था। दिन में, अमृतराय जी से मिलने निकल पड़ा। हेस्टिंग्ज़ रोड़ खोजने में थोड़ी कठिनाई हुई। अमृतराय जी मिल गये। बैठक में बैठा, वह उनका अध्ययन-कक्ष नहीं था। चाय पी। तमाम बातें की। लेकिन अधिकांश समय ‘ आदर्शोन्मुख यथार्थवाद ’ पर बहस करने में गुज़र गया। अवांछित - अनपेक्षित! इलाहाबाद और रुक नहीं सकता था; अगले दिन बरात के साथ झाँसी लौटना था।

उनके निधन के पूर्व और अंतिम बार उन्हें अचानक ‘दूरदर्शन’ पर देखा- सुना। किसी विचार-गोष्ठी में । वार्धक्य का असर साफ़ था। जो हो, भाई अमृतराय जी बिछुड़ गये। मेरे साहित्यिक जीवन में उनका स्थान महत्त्वपूर्ण था। वे मेरे एक बहुत ही बेहतरीन दोस्त थे।

संस्मरण 2339508689378487445

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