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वार्तालाप जिज्ञासुओं से - डॉ. महेन्द्र भटनागर की डा. सुरेशचंद्र गौतम से बातचीत

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वार्तालाप जिज्ञासुओं से

प्रश्नोत्तर :

गीत-संदर्भ

प्रश्न : डा. सुरेशचंद्र गौतम

उत्तर : डा. महेन्द्रभटनागर

आपने जिस समय गीत-रचना प्रारम्भ की उससे अब तक क्या अंतर पा रहे हैं ?

समय के साथ-साथ, युग-परिवर्तन के साथ-साथ,गीत के स्वरूप में भी परिवर्तन स्वाभाविक है। हिन्दी गीत-रचना का इतिहास, प्राचीन और अर्वाचीन गीत के अंतर को भली-भाँति स्पष्ट करता है। इस गीत-रचना के दो छोर हैं-एक विभिन्न राग-रागनियों में लिखे पद (भजन) और दूसरा उसका अद्यतन अवतरण - नवगीत। इन दोंनों प्रकारों में जो अंतर है, वह उनके प्रत्येक पक्ष में पाया जाता है। अब न राग-रागनियों में निबद्ध छंदबद्ध पद-रचना पायी जाती है, न वैसा अंलकार-विधान अब उपलब्ध है, न वे विषय हैं, न वे प्रसंग-गर्भ हैं, न वैसी भाषा है और न वैसी रूढ़-पद्धति है। आज सारा सौन्दर्य-बोध बदला हुआ है। अभिव्यक्ति-भंगिमाएँ बदली हुई हैं। प्राचीन गीत अभिधामूलक अधिक हैं, जब कि आज का गीत व्यंजनामूलक। प्राचीन गीत विषय-प्रधान अधिक हैं, जब कि आज का गीत व्यक्ति-प्रधान।

हमने जब गीत-रचना प्रारम्भ की तब हिन्दी-साहित्य के उत्तर-छायावादी और प्रगतिवादी युग समानान्तर चल रहे थे। प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी वर्मा के गीतों की एक समृद्ध परम्परा के साथ बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, ’अंचल’, गोपालसिंह ‘नेपाली’, शिवमंगलसिहं ‘सुमन’, गिरिजाकुमार माथुर, शम्भुनाथ सिंह आदि रचनाकारों के गीत अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त कर रहे थे। माना इन सब में ‘बच्चन’ अप्रतिम थे। अपने वैशिष्ट्य और रचना-परिमाण दोनों दृष्टियों से। यदि मात्र गीत को दृष्टि-पथ में रखा जाये तो उत्तर-छायावादी युग को बच्चन-युग कहना अधिक युक्तियुक्त होगा। ‘बच्चन’ जी की गीति-रचना ने हिन्दी-गीत को लोकप्रिय बनाया। सहज, सुबोध, गेय व जीवन-अनुभूतियों से भरपूर। इसी समय प्रगतिवादी कवियों ने हिन्दी-कविता को नया मोड़ दिया। किन्तु प्रगतिवादी कवियों द्वारा गीत-रचना अत्यल्प हुई। शंकर शैलेन्द्र की गीति-रचना प्रतिभा-क्षमता सिने-गीतों के माध्यम से सामने आयी। हमने जब गीत-रचना शुरू की तब हिन्दी गीत का यही परिप्रेक्ष्य था।

आगे चल कर गोपालदास ‘नीरज’ हिन्दी-गीत के सम्राट बन कर अवतरित हुए। आगे चल कर, ‘नीरज’ की गीत परम्परा से हटकर हिन्दी में जो गीति-सृष्टि हुई; वह नवगीत के नाम से चर्चित हुई, प्रतिष्ठित हुई। नवगीत कविता के अधिक निकट है, गेय गीतों के कम। इस दृष्टि से हमारी अनेक काव्य-रचनाएँ नवगीत विधा में समाहित होने योग्य हैं। इसी को दृष्टि में रख कर ‘अंतराल’ में संगृहीत हमारी एक कविता ‘री हवा’ (रचना-काल 1949) को नवगीत कहा गया। यह रचना मुक्त-छंद में होते हुए भी गेय है :

री हवा !

गीत गाती आ,

सनसनाती आ !

डालियाँ झकझोरती

रज को उड़ाती आ !

मोहक गंध से भर

प्राण पुरवैया

दूर उस पर्वत-शिखा से

कूदती आ जा !

ओ हवा !

उन्मादिनी यौवन भरी

नूतन हरी इन पत्तियों को

चूमती आ जा !

गुनगुनाती आ,

मेघ के टुकड़े लुटाती आ !

मत्त बेसुध मन

मत्त बेसुध तन

खिलखिलाती, रसमयी,

जीवनमयी

उर-तार झंकृत

नृत्य करती आ !

री हवा !

लेकिन, जिन गीतकारों के गीत गेय हैं, वे ही सचमुच हिन्दी-गीत की आधुनिक पहचान के वाहक हैं। रचना गीत तब ही बनती है, जब वह गेय होती है।

गीत की सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से आप कुछ क्या नया जोड़ना चाहते हैं जिससे गीत भी अन्य विधाओं की तरह प्रसार पा सके?

सम्प्रेषणीयता गीत का ही नहीं, प्रत्येक साहित्यिक विधा का गुण है। दुरूह व जटिल रचनाएँ जन-जन तक पहुँच ही नहीं पातीं। कृति में दुरूहता व जटिलता का होना रचनाकार की असफलता है। गीत गेय होने के कारण सामान्य जन के कण्ठ में रच-बस जाते हैं। यह तभी सम्भव है, जब वे सम्प्रेष्य हों। सम्प्रेषणीय होने का अर्थ रचना का सपाट होना नहीं । लक्षणा और व्यंजना से आनन्द ग्रहण करने की क्षमता शिक्षित-अशिक्षित सभी रखते हैं। वक्र-कथन दुरूहता का पर्याय नहीं । गीत में तो चमत्कार हर चरण में मिलता है, मिलना चाहिए। कथा-साहित्य के समान ही गीत का प्रसार है। लोककथा और लोकगीत के संदर्भ में भी यही कहा जा सकता है।

व्यक्ति और कृति का सामंजस्य ही आदर्श साहित्य-सृजन में साधक हो सकता है - क्या कहना चाहेंगे ?

व्यक्ति और कृति में सामंजस्य विषयी प्रधान रचनाओं में प्रायः होता ही है; लेकिन विषय-प्रधान रचनाओं में सदैव नहीं। गीत चूँकि विषयी प्रधान होते हैं, अतः उनमें व्यक्ति और कृति का सामंजस्य सहज है। विशुद्ध रचना के स्तर पर तो इसे आदर्श साहित्य-सृजन अवश्य माना जाएगा; किन्तु यह ज़रूरी नहीं, यह सर्जना अन्य कोणों से भी आदर्श हो। प्रत्येक रचनाकार ऋषि नहीं होता। प्रत्येक रचनाकार सामाजिक स्वास्थ्य के प्रति प्रतिश्रुत भी नहीं पाया जाता। सौन्दर्य-दृष्टि यदि शिव-दृष्टि समन्वित है तो वह अवश्य किसी आदर्श की सृष्टि करेगी। सभी रचनाकार व्यक्तिगत जीवन में उदात्त व श्रेष्ठ नहीं होते। श्रेष्ठ रचनाकार को श्रेष्ठ व्यक्ति भी होने चाहिए, पर ऐसा सदैव पाया नहीं जाता। आधुनिक युग में तो ऐसे उदाहरण विरल ही हैं। कबीर या तुलसी या सूर या मीराबाई जैसे रचनाकार आज संसार की किस भाषा के साहित्य में उपलब्ध हैं ? जीवन और कृति में अटूट रिश्ता क़ायम रखने वाले रचनाकारों की सर्जना में अनुभूति की जो सचाई मिलती है, वह आधुनिक साहित्य में बहुत कम देखने में आती है। क्या कारण है, दलितों पर साहित्य लिखने वाले, दलित समाज से नहीं आ रहे। उन पर लिखती है आभिजात्य या उच्च-मध्य वर्गीय बुद्धिजीवियों या सुविधाभोगी अफ़सरों की जमात। ऐसे साहित्य को आदर्श साहित्य-सृजन की संज्ञा कैसे दी जा सकती है ? आक्रोश बुद्धिजीवियों के प्रति नहीं है, उनके नक़लीपन के प्रति है। यदि भोगा हुआ यथार्थ अभिव्यक्त होता है तो निःसंदेह वह वास्तविकता के निकट होगा। फिर चाहे रचनाकार दलित-वर्ग से आया हो या किसी अन्य वर्ग से ।

क्या गीत जीवन से कटा रहा, यदि नहीं तो गीत का क्षेत्र विकसित क्यों नहीं हो सका ?

गीत जीवन से कट कर अस्तित्व में आ ही नहीं सकता। सम-सामयिकता का प्रभाव प्रत्येक युग की गीति-रचना पर स्पष्ट प्रतिबिम्बित है। जीवन चाहे व्यक्ति-परिधि का हो; चाहे युगीन-परिधि का - गीत-रचना से अटूट रूप से सम्बद्ध है। अपनी सीमाओं में गीत का समुचित विकास भी हुआ है - भले ही उसे संतोषप्रद न माना जाये। यदि हम गीत-विधा की तुलना उपन्यास, कहानी, नाटक आदि विधाओं से करें तो अवश्य उसका क्षेत्र इतना विकसित नहीं माना जा सकेगा। गीत जीवन को इतने विस्तार से अपने में समाहित नहीं कर सकता; जितना उपरिलिखित विधाएँ कर सकती हैं। गीत-क्षेत्र का जो अपेक्षानुकूल विकास दृग्गोचर नहीं होता उसके कई कारण हैं। प्रमुख रूप से इसके लिए उत्तरदायी है-आधुनिक गीतों में गेय तत्त्व का अभाव। दूसरा कारण है-गीतों की भाषा। अधिकांश हिन्दी-गीतकार जन-भाषा कम अपनाते हैं, परिनिष्ठित भाषा अधिक। संगीत ने सिने-गीत को जो सफलता प्रदान की है; वह भी साहित्यिक गीति-रचना की लोकप्रियता में बाधक बनी है। ‘दूरदर्शन’ या ‘आकाशवाणी’ के सुगम-संगीत कार्यक्रमों के अन्तर्गत प्रसारित जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा के गीत तक क्या समुचित लोकप्रियता पा सके हैं ? यह सब सत्य होते हुए भी, यह भी सत्य है कि आधुनिक प्रचार-माध्यमों द्वारा गीत पर्याप्त उपेक्षित रहा है।

आपकी दृष्टि में गीत का भविष्य क्या है-यदि आशाजनक है तो कैसे और निराशाजनक है तो क्यों ?

गीत का भविष्य उज्ज्वल है। उसके अस्तित्व को कोई ख़तरा नहीं। मनुष्य मात्र बुद्धिवादी कभी नहीं बन सकता, वह भावना-संवेदना सिक्त भी सदा रहेगा। यह उसकी प्रकृति है। प्रकृति का त्याग सम्भव नहीं। भावना-संवेदना भी कोई विचार-तत्त्व या बुद्धि-तत्त्व के विपरीत वृत्ति नहीं है। गीत जहाँ भावना-प्रधान होते हैं, वहाँ विचार-प्रधान भी। आवेग-आवेश की निहिति के कारण गीत मनुष्य को क्रियाशील बनाता है। उसे जगाता है। झकझोरता है। उसके दिल और दिमाग़ में बड़ी गहराई तक पहुँचने की सामर्थ्य रखता है गीत। मनुष्य को प्रदत्त अन्य ईश्वरीय वरदानों के समान गीत भी उसके लिये एक ईश्वरीय वरदान है। सुख में दुख में, जय में पराजय में, शांति में संकट में - मनुष्य की जीवन-यात्रा में गीत का महत्त्व भौतिक साधनों की उपलब्धि के बाद, सदा बना रहा है। प्रत्येक देश की समृद्ध लोकगीत परम्परा भी इसका प्रमाण है। अतः गीत के भविष्य पर प्रश्न-चिन्ह लगाना असंगत है।

गीत का कथ्य और अन्य विधाओं के कथ्य में क्या अंतर हो सकता है- शिल्प की दृष्टि से अपने विचार दीजिए।

शिल्प की दृष्टि से, गीत के कथ्य और अन्य विधाओं के कथ्य में पर्याप्त अंतर है। गीत का यह शिल्प पक्ष ही है, जो गीत के कथ्य को नियंत्रित करता है। गीत लधु-विस्तारी गेय रचना होती है; अतः उसका शिल्प भी तदनुसार स्वरूप ग्रहण करता है। गीत में विवरण नहीं होते, कोई गाथा नहीं होती, किसी प्रश्न या समस्या की विवेचना भी नहीं होती। माना वे मात्र भावना- प्रधान नहीं होते; विचार-प्रधान भी हातेे हैं। किन्तु उनका विचार-पक्ष वास्तविक जीवन-अनुभूतियों से निर्मित होता है। व्यक्ति-जीवन और जगत के प्रति गीतकार की विचारणा उसके अनुभव के ताप में तप कर अभिव्यक्त होती है। उसमें तरलता होती है, सूक्ष्मता होती है। बौद्धिक जटिलता या तार्किकता नहीं। गीतों में प्रकृति भी पायी जाती है। गीतों में व्यक्ति के सुख-दुख की अनुभूतियाँ सुगम्फित रहती हैं। गीतों में जीवन-दर्शन का गहन बोध पाया जाता है। रूप-सौन्दर्य और प्रेम के रंग गीतों में सर्वाधिक चटक रंगों में उभरते हैं।

गीत का चिन्तन उर्दू-शैली से प्रभावित होता जा रहा है - ऐसा लगता है-आप कैसा अनुभव करते हैं?

‘हिन्दी-गीत का चिन्तन उर्दू-शैली से प्रभावित हो रहा है’-यह कथन असंगत-सा लगता है। चिन्तन को शैली कैसे प्रभावित कर सकती है? चिन्तन को क्या आप गीत का महत्त्वपूर्ण पक्ष मानते हैं ? उर्दू-शैली वस्तुतः हिन्दी की ही एक शैली है। हिन्दी-गीतों में उर्दू-शब्दों का (फ़ारसी-अरबी के प्रचलित शब्दों का) खुलकर प्रयोग होता है। ये शब्द आज हिन्दी के अपने शब्द बन चुके हैं। गीतकार शब्द-शिल्पी होता है। अपने गीतों में शब्द-प्रयोग वह बड़ी सावधानी से करता है। कौन-सा शब्द कहाँ मौजू होगा, यह वह अच्छी तरह जानता है। हिन्दी-गीत का तथाकथित उर्दू-शैली से कोई वास्ता नहीं।

गीत और ग़ज़ल दोनों के व्यक्तित्व के संबंध में आपकी क्या धारणा है - हिन्दी-ग़ज़ल के संदर्भ में कुछ कहें।

गीत और ग़ज़ल के व्यक्तित्व एक दूसरे से भिन्न हैं। हिन्दी में आज गीत की अपेक्षा ग़ज़ल अधिक लोकप्रिय हो रही है। ग़ज़ल को हिन्दी ने पूरी तरह अपना लिया है। ग़ज़ल ग़ज़ल है-वह चाहे हिन्दी में कहीं जाये या उर्दू में। हिन्दी-ग़ज़ल भले ही उर्दू-ग़ज़ल के रूढ़ नियमों का पालन न करती हो, पर उसे कहा तो ग़ज़ल ही जाएगा। हिन्दी-ग़ज़ल तो हिन्दी की होती ही है। इन दिनों उर्दू-ग़ज़ल भी सरल-सुबोध भाषा में कही जा रही है। चाहे यह ग़ज़ल-रचना भारत की हो, चाहे पाकिस्तान की। विशुद्ध फा़रसी-अरबी के शब्दों की भरमार उर्दू ग़ज़ल में नहीं देखी जाती। अनेक उर्दू- ग़ज़लगो तो अब अनेक हिन्दी-शब्दों का प्रयोग करने लगे हैं। हिन्दी-शब्दों से उन्हें अब पहले जैसा परहेज़ नहीं रहा। इससे उर्दू-ग़ज़ल के सम्प्रेषण-क्षेत्र का विस्तार हुआ है। ग़ज़ल की लोकप्रियता के कारण ही हिन्दी-कवि ग़ज़ल-लेखन के प्रति आकर्षित हुए हैं। ग़ज़ल का अपना अलग ‘अन्दाजे़ बयाँ’ होता है। चूँकि हिन्दी और उर्दू पृथक-पृथक भाषाएँ नहीं, अतः ग़ज़ल को दोनों ने ही सहज ही अपना लिया है। ग़ज़ल में अब मात्र प्रेम ही नहीं, सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियाँ भी अभिव्यक्ति पा रही हैं। व्यंग्य ने भी ग़ज़ल को धारदार बनाया है। अब स्थिति यह है कि ग़ज़ल और गीत एक दूसरे के अधिक निकट हैं, जब कि पूर्व में गीत और भजन एक दूसरे के अधिक निकट थे। लेकिन, ग़ज़ल में उर्दू-गंध सूँघने वाले ऐसा नहीं मानते। हिन्दी-ग़ज़ल हू-ब-हू उर्दू-ग़ज़ल नहीं है। उसकी अपनी स्वतंत्र शैली है। कहीं-कहीं तो वह मात्रिक छंद पर उतरती है।

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