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'हास्य व्यंग्य' //'आजाद' 'कुर्ता-पजामा की विशेषता' -०राजकमल पांडे

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       0कुर्ता-पैजामा दो ही व्यक्ति सिलवा पाते हैं, एक वो जिन्हें राजनीति के नाम से ढोंग करना आता है दूसरे वो लोग हैं जो कुर्ता-पैजामा धारण करने के बाद ही नेता बन पाते हैं? मष्तक की ललाट अगर राजनीति की छवि बयां कर रही हो तो नेतागण गांव, शहर में कुर्ता-पैजामा पहन कर ही निकले अन्यथा 'विदाउट ड्रेस' वाले नेताओं को शहर, गांव के आवारा कुत्ते पहचान कर पीछे पड़ सकते है, जिससे नेतागण को बच पाना मुश्किल होता है। कुर्ता-पैजामा पहनने का एक विशेष लाभ यह है कि तमाम छोटे-बड़े अधिकारी बेचारे धौंस खाते हैं, और जनता डरी-सहमी सी रहती है। कुर्ता-पैजामा वाले नेतागण राजनीति के योग्य हो न हो अपितु कुर्ता-पैजामा नेताओं को धारण करने के बाद नेताओं के योग्य जरूर हो जाता है।

कुर्ता-पैजामा वाले नेताओं की मुख्य विशेषता यह होती है कि वह जब भी किसी कार्यक्रम में भाषण देने जाते हैं, तो वह कुर्ता-पैजामा पहन कर ही जाते हैं वरना कार्यक्रम में मौजूद लोग यह नही समझ पाते की यह अब नेता ही है या फिर उद्योगपति हो गए हैं। वैसे कम ही नेता कोट-पेंट पहनना पसंद करते है? जब शादी पार्टी में नेताओं का बुलावा होता है, तो वह बहुरंगी कुर्ता-पैजामा पहन कर जाते हैं व साथ ही खादी वाली कोटी तो भूलते ही नही हैं। क्योंकि शादी में नेता की उपस्थिति तभी पता चलता है, जब वह कुर्ता-पैजामा व खादी वाली कोटी और एक वगैर लेंस वाला चश्मा हो...अहह... फिर तो फटे, तंग हाल नेता के राजनीति में भी चार चांद लग जाते हैं?

इतने में पाईजी! बोल उठे लेखक महोदय! आप ये बताएं कि क्या कोट-पेंट वाले नेता-नेता नही होते उनके पास भी तो उधार से लिए राजनीति का ज्ञान होता है फिर जरूरी तो नही की वह कुर्ता-पैजामा धारण करें तभी नेता कहलायेंगे?

हां पाईजी! तुम कह तो ठीक रहे हो यद्यपि जनता के मस्तिष्क में नेतागण को पहचानने के लिए एक ही चित्र छपा है, जो कुर्ता-पैजामा और खादी का कोट पहने दिख जाए वही नेता है। जैसे शादी में दूल्हे के लिए कोट, पेंट सिलवाया जाता है ठीक उसी प्रकार राजनीति में प्रवेश करने के उपरांत नेतागण को कुर्ता-पैजामा धारण करना अति आवश्यक हो जाता हैं। जितना वगैर कोट, पेंट वाले दूल्हे को शादी में पहचानना मुश्किल होता है, वैसे ही 'विदाउट ड्रेस' वाले नेता को समाज मे खोजना कठिन कार्य हो जाता है। राजनीति के चरित्र दोहरे हैं, अपितु कुर्ता-पैजामा पहनना नेतागण को अनिवार्य है? निजी विचार, सामाजिकता भाव, देश के उत्थान हेतु विचार हो न हो यद्यपि बदन में कुर्ता-पैजामा व खादी की कोटी अवश्य हो, अन्यथा जनता पदच्युत कर देती है?

लेखक महोदय! जब आप कुर्ता-पैजामा की इतनी विशेषता बता ही चुके है, तो जरा यह भी बताने की कृपा करें कि क्या कुर्ता-पैजामा वाले नेतागण की श्रेणी भी होता है।

हां पाईजी! कुर्ता-पैजामा वाले नेतागण की श्रेणी भी होता है,जिस नेतागण को जनता का सबसे ज्यादा खून चूसने में महारत हासिल होता है, वह कोसा के कपड़े का कुर्ता-पैजामा पहनते है, और जो थोड़ा कम खून चूसता जानता हैं कार्य क्षमतानुसार वह नेता सूती के कपड़े का कुर्ता-पैजामा पहनता है, और जिस नेतागण का पार्टी ही खून चूसती वह नेता टेरीकाट का कुर्ता-पैजामा तक ही सीमित रह जाते हैं। सुनो पाईजी! अंदर कोई झांक कर देखने नही जाता कि आपने अंडरवियर कौन से ब्रांड की पहनी है, ऊपर क्या पहना है यह मायने रखता है? अंदर क्या पहना है यह बात तो तब पता चलता है जब नेतागण किसी धरना में बैठते है और सरकार के निर्देशो में पुलिस नेताओ को स्थल से खदेड़ती है, तो इस आपा-धापी में किसी का पैजामा के नाड़ा असमय ही खुल जाता है, तब पता चलता है कि नेता जी किस ब्रांड का अधोवस्त्र (जाँघिया) पहनते है लक्स कोज़ी, अमूल माचो या फिर नाड़े वाले जाँघिया ? यह तो जनता के खून चूसने के साइज पे निर्भर करता है कि नेताजी! किस ब्रांड के अंदर से लेकर बाहर तक वस्त्र धारण करते है? अगर कुर्ता-पैजामा कोसा के कपड़े का होगा तो स्वतः ही उनका चरित्र बेहतर दिखेगा। जितना नेतागण को चेहरे में चमक पैसा दिखा सकता है, शायद ही उतनी चमक कोई ब्रांडेड क्रीम दे पाए?

लेखक महोदय! फिर आप ये बताइये की जिस नेता के मैले कुर्ता-पैजामा होते है उनका क्या है ?

अरे पाईजी! जिस नेता के कुर्ता-पैजामा मैले होते हैं, यह देखकर कदापि धोखा नही खाना चाहिए कि मैले कुर्ता-पैजामा धारण करने के भांति विचार भी मैले होगें बल्कि यह भी हो सकता है कि जो विचार कोसा का कुर्ता-पैजामा पहनने वाले नेता के पास न हो वह विचार मैले कुर्ता-पैजामा वाले नेता के पास मिला जाए। इंसान आपने विचारों से महान बनता है, कोसा और रेशम के कपड़े पहनने से महान नही बनता? गांधी, नेहरू, अटल, सुभाष, विवेकानंद आदि यह अपने निजी विचारों से महान बनें हैं, कपड़ो के चयन से नही ? यह विचार आज के कपड़ो के चयन करने वाले नेताओं में कब तक आ सकेगा यह कह पाना जरा मुश्किल है।

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