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सल्तनत काल और लोकदेवता बाबा रामदेव की भूमिका // डॉ. राजेन्द्र जोशी

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डॉ. राजेन्द्र जोशी

व्याख्याता समाजशास्त्र,

श्री जैन कन्या पी.जी. महाविद्यालय,

बीकानेर

सल्तनत काल और लोकदेवता बाबा रामदेव की भूमिका

उतर भारत में 11वीं शताब्दी में तुर्क राज्य कि स्थापना के साथ ही भारतीय समाज में मुसलमानों के रूप में एक ऐसा तत्व आ गया जिसे हिन्दू समाज कालान्तर में भी आत्मसात् न कर सका । सल्तनत कालीन भारत की जनसंख्या में हिन्दुओं की संख्या लगभग 95 प्रतिशत थी । लेकिन राजनैतिक सत्ता मुस्लिम शासकों के हाथ में थी पूरा भारत विजेता तुर्कों और पराजित हिन्दुओं के बीच वैमनस्यता और अविश्वास की गहरी खाई में बंट गया था तलवार के बल पर इस्लाम का प्रचार चारों और हो रहा था इतिहासकार बरनी ने लिखा है कि “ सल्तनत काल में वे (हिन्दु) खिराजगुजार कहलाते थे और जब तहसीलदार उनसे चॉदी मांगते तो बीना नानुकुर किये बड़ी नम्रता और आदर से सोना भेंट कर देते थे । और कर वसूल करने वाला अधिकारी उनके मुंह में थूकना चाहे तो उन्हें बिना हिचकिचाहट किये अपना मुंह खोलना पड़ता था।” हिन्दू नारियों के साथ बलात्कार उन्हें दासियां बनाने सैकड़ों मन्दिरों को तोड़ने का क्रम चल रहा था। यह क्रम 11 वीं शताब्दी के प्रारम्भ से लेकर मुगलकाल तक निरन्तर चलता रहा । हिन्दू धर्म संस्कृति का निरन्तर पतन होने लगा यद्यपि भारत में प्राचीन काल से ही सक , हुण , कुषाण मंगोलों ने आक्रमण किया लेकिन मुस्लिम आक्रमण के बाद हिन्दू धर्म और संस्कृति को सबसे ज्यादा आघात पहुंचा लेकिन इतिहास एक गवाह है कि जब जब हिन्दू संस्कृति पर आघात हुआ है इस धरा पर महापुरूषों , देवताओं लोक देवताओं ने अवतार लिया है। 11 वीं शताब्दी से लेकर 15 वीं शताब्दी के मध्य अनेक संतों महात्माओं और लोक देवताओं ने जन्म लिया एक तरफ वीर योद्वाओं शूरवीरों वीरागंनियों ने अपनी मातृ भूमि व हिन्दू धर्म कि रक्षा हेतु निरंतर संघर्ष व प्रतिरोध कर रहे थे वही अनेक संतों महात्माओं और लोक देवताओं ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति एवं भक्ति रस से हिन्दू संस्कृति को बचाने का जीवन पर्यंत प्रयास किया। विशेष कर रातपूताना में गोगाजी तेजाजी पाबुजी जाम्भोजी मल्लिनाथ देव जी कल्लाजी व रामदेव जी जैसे लोक देवताओं ने हिन्दू धर्म को बचाने का और हिन्दू जनमानस के मनोबल को बढ़ाने का प्रयास किया जिसमें बाबा रामदेव ने अपने जन्म से लेकर समाधि तक हिन्दू धर्म के रक्षक के रूप में कार्य किया और आज भी हिन्दू धर्म में सामाजिक समरसता धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक माने जाते हैं । धार्मिक दृष्टि से रामदेव जी को भगवान द्वारकानाथ का अवतार माना जाता है। लेकिन इस शोध पत्र में तौमर वंश के शासक के रूप में सल्तनत काल में बाबा रामदेव भूमिका की विवेचना की जा रही है।

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रामदेव जी का ऐतिहासिक परिचय-- रामदेव जी चंद्रवंशीय तोमर राजपूत थे । दिल्ली के शासक अंगलपाल जिन्होंने दिल्ली का शासन पृथ्वीराज चौहान को दे दिया और अंगलपाल और उनके परिजन दिल्ली त्याग कर अजमेर के पास नरेना नामक स्थान पर आ गये और यही पर उन्होंने अपना ठिकाना बनाया । जब तराईन के अंतिम युद्व में पृथ्वीराज चौहान हार गया और उसकी मृत्यु का समाचार जब अंगलपाल को पता लगा तो वे भी बीमार रहने लगे और उनकी मृत्यु हो गई तब उनके छोटे भ्राता राव रणसी जी इस घटना से इतने दुखी हुऐ कि उन्होंने मुस्लमानों से प्रतिरोध लेने के लिये छापा मार युद्व प्रारम्भ किया मुस्लिम व्यापारियों अमीरों व सामंतों को लूटने व उनकी हत्या करने लगे । अजमेर , मेवाड़ , जोधपुर के क्षेत्र में मुस्लिम व्यापारियों में उनका आतंक था उन्होंने हिन्दुओं को संगठित करने का जीवन प्रर्यंत प्रयास किया वे एक जुझारू योद्वा थे जिन्होंने जीवन पर्यंत मुस्लिम शासकों के विरूद्व संघर्ष किया उनके आठ पुत्र थे अजमल , राजसिंह, सलारसिंह, गजेसिंह, मोरजी, केशपालजी, नेण जी तथा धन रूप जी। उनके आधे पुत्र ग्वालियर कनौज की तरफ चले गये। अजमल जी पोकरण के पास शिवपुरी नामक स्थान पर आ गये यही पर उनका ठिकाना था। उन्हीं के घर दो संतानों का जन्म हुआ बड़ा पुत्र वीरमदेव और छोटा पुत्र रामदेव लोक मान्यताओं के आधार पर अजमल जी को द्वारकाधीश के वरदान से वीरम्देव के रूप में पुत्र प्राप्त हुआ और द्वारकाधीश स्वयं रामदेव जी के रूप में अवतरित हुऐ । भाद्वौपद् शुक्ल द्वितिया विक्रम संवत 1409 को रामदेव जी का जन्म हुआ । बचपन से उन्होंने अपनी आध्यात्मिक शक्ति चमत्कारों और ज्ञान कौशल से एक लोक देवता के रूप में पहचान प्राप्त कर ली और जीवन प्रर्यत हिन्दू धर्म की रक्षा और मानव धर्म हेतु कार्य करते रहे ।


हिन्दू धर्म के रक्षक के रूप में कार्य- रामदेव जी के समय दिल्ली में फिरोज तुगलक का शासन था । जोधपुर में चुन्डा राठौड़ का शासन था फलौदी में उसके भाई जयसिंह का नागौर में सुबेदार जलाल खॉं का शासन था । जैसलमेर में दुधा भाटी का शासन था । गुजरात नागौर मारवाड़ मुल्लतान पर निरंतर मुस्लमानों के आक्रमणों से पश्चिमी राजस्थान में मुस्लिम धर्म का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा था । साथ ही हिन्दुओं में जातीय छुआ-छूत पाखंड कर्मकाण्ड ब्राहमणों और राजपूतों की सामन्तशाही से निम्न हिन्दू जातियां विशेष कर अछूत जातियां शोषित और दमित थीं मुस्लिम शासकों द्वारा निरंतर अत्याचार,हिन्दू देवी देवताओं के अपमान व मुस्लिम मौलवियों सूफी संतों ,व उल्लेमाओं की धर्म प्रचारक नीति से हजारों हिन्दू धर्म छोड़ कर इस्लाम धर्म ग्रहण करने लगे। ऐसे में बाबा रामदेव ने हिन्दू धर्म को बचाने के लिये समकालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए धार्मिक सहिष्णुता कि नीति अपनाई और अवसर आने पर एक योद्धा के रूप में मुस्लिम शासकों के विरुद्ध युद्व भी लड़ा । रामदेवजी के प्रमुख कार्यों को हम निम्न तथ्यों द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं ।

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1. पांच पीरों को चमत्कार - रामदेव जी की आध्यात्मिक शक्ति का बोल बाला पूरे राजपूताना में फैलने लगा हिन्दुओं ने इस्लाम धर्म ग्रहण करना बंद कर दिया हिन्दुओं में पुनः आत्म विश्वास और अपने देवी देवताओं के प्रति आस्था बढ़ने लगी । जब इस बात का पता मुस्लिम उल्लेमाओं को लगा तो तब दिल्ली के वजीर खाने जहॉ के आदेश पर मक्का से पॉंच पीर बुलाये गये जो चमत्कार करना जानते थे और वे रूणीचा में संवत 1427 को आये और रामदेव जी से भेंट की रामदेव जी ने उनका सत्कार किया भोजन के लिये आमंत्रित किया तो उन्होंने कहा कि हम अपने बर्तन मक्का भूल आए है । और हम अपने बर्तन में ही भोजन करते है तब रामदेव जी ने अपने चमत्कार से उनके बर्तन मंगवा दिये तो उन्होने बाबा रामदेव जी को पीरों का पीर मान लिया । इस घटना के बाद हिन्दुओं में अपने देवी देवताओं के प्रति आस्था जागृत हुई देश के लाखों अछूत हिन्दुओं के मन में रामदेव जी के प्रति अटूट श्रृद्वा बढी जिससे पुनः हिन्दुओं में पुनर्गठन का युग प्रारम्भ हुआ । जनता में बढ़ता मनोबल देख राजपूताना के राजपूत शासकों में भी पुनः शौर्य जाग्रत हुआ राठौड़ों और मेवाड़ों ने पुनः अपने खोए राज्य प्राप्त कर लिये। तो उधर जेसलमेर ने राव घड़सि ने पुनः जैसलमेर को प्राप्त कर लिया।

2. अछुत कन्या को बहिन बनाना - मुस्लिम शासकों ने भी हिन्दुओं में फूट डालो राज करो की नीति अपनाई। मुस्लिम मौलवी हिन्दू अछूत जातियों में प्रचार करते थे कि हिन्दू ब्राह्मण और राजपूत आप पर अत्याचार करते हैं । और यदि आप इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेते हो तो आप पर अत्याचार नहीं किया जाएगा । और इसका प्रभाव भी पड़ा और यह सत्य भी है कि तत्कालीन उच्च जाति के लोग निम्न जातियों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार करते थे । और रामदेव जी को यह पता था कि जब तक हिन्दुओं में यह भेदभाव रहेगा हिन्दुओं का पतन होता रहेगा । इसलिए उन्होंने एक अछूत कन्या को अपनी बहिन के रूप में न केवल अपनाया बल्कि उसे राजपरिवार कि सदस्य के रूप में सम्मान दिलवाया और जिसे डाली बाई कहा गया है । लोक मान्यताओं के अनुरूप डाली बाई द्वापर युग कि कुब्जा का अवतार है । जिसने जीवन पर्यन्त रामदेवजी के अवतार कि गाथा का जनजन में प्रचार-प्रसार किया जिससे न केवल लाखों अछूत जातियों के लोग पुनः हिन्दू धर्म कि मुख्य धारा से जुड़े बल्कि इस्लाम धर्म का अहिंसात्मक तरीके से प्रतिकार भी किया गया ।

3. पुगल गढ़ के पड़िहारों से युद्ध - रामदेव जी कि बहिन सुगना का विवाह पुगल गढ़ के कुवंर उदससिंह पड़िहार के साथ हुआ । और पुगलगढ़ का जेसलमेर के भाटीयों के साथ सन्धि थी भाटीयों और फिरोज तुगलक के बीच समझौता था वजीर खाने जहां के कहने पर पड़िहारों ने रामदेव जी का बहिष्कार किया और उनकी बहिन के साथ बुरा व्यवहार किया । तब रामदेव जी ने अपने सेनापति रत्नाराइका के साथ 1432 में ( तुंवर वंश की बही भाट के अनुसार ) आक्रमण किया और अन्त में पड़िहारों ने अपनी गलती स्वीकार कि । साथ ही पड़िहारों को मुस्लिम शासक के चंगुल से मुक्त भी किया ।

4. मुस्लिमशाह को परचा- गोकुलदास कृत श्री रामदेव चौबीस प्रमाण ग्रंथ के अनुसार संवत 1432 में रामदेव जी कि बहिन सुगना अपने ससुरार से सिपेसिलार रत्नाराईके के साथ रूणीचा आ रहे थे तभी रास्ते में जोधपुर के शुबेदार जलाल खां के सिपेसिलार मुस्लिमशाह की टुकडी़ ने इन दोनों को कैद कर लिया तब रामदेव जी ने आक्रमण करके न केवल इनको मुक्त करवाया बल्कि मुस्लिमशाह को मौत के घाट उतार दिया और नागोर पर जलाल खां की सत्ता को समाप्त कर दिया ।

5. जीवित समाधि लेना - सवंत 1442 में भाद्वौपद् शुक्ल दशम् को रामदेव जी ने जीवित समाधि ली। समाधि लेना हिन्दू धर्म की प्राचीन विधि है । हिन्दू धर्म में जीवित समाधी लेने वाले को महायोगी देवता या संत के तुल्य माना जाता है । इस्लाम के धर्म के बढ़ते प्रभाव देवी-देवताओं के प्रति घटते विश्वास के कारण हिन्दू धर्म संकट में आ गया था । रामदेव जी ने अपने 33 साल के जीवन काल में हिन्दुओ में जातीय छुआ-छूत मिटाने तथा धार्मिक सहिष्णुता और हिन्दुओं में घटते मनोबल को उपर उठाने का बहुत प्रयास किया लेकिन फिर भी ब्राह्मणों,राजपूतों व अन्य जातियों में इनका प्रभाव कम देखा तो उन्होने जीवित समाधि लेकर अपने विचारों और संदेशों को जन-जन तक पहुंचाया, बाबा रामदेव ने जीवित समाधि लेकर अपने बलिदान से हिन्दू जन में आध्यात्मिक शक्तियों के प्रति खोये हुए विश्वास को पुनः जागृत किया जो कार्य पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप ने रण के मैदान में अपनी शहादत से किया वही कार्य बाबा रामदेव ने केवल अपने अहिंसात्मक बलिदान से देश के लाखों हिन्दूओं में अपने धर्म की रक्षा हेतु जुनून एवं आत्मबल प्रदान किया और राजपूत शासकों में आपसी फूट को मिटाने का भी कार्य किया। गोपालदास कुत ग्रंथ में लिखा है कि रामदेवजी के समाधि लेने के बाद जोधपुर के राठौड़ों, जैसलमेर के भाटियों, चौहानों में रामदेवजी को एक अवतार के रूप में माना जाने लगा वेदपाठी व शक्ति उपासक ब्राहमणों ने भी रामदेवजी को अवतार के रूप में माना और धीरे-धीरे गुजरात, राजपूताना, भटिण्डा तक रामदेवजी के चमत्कार का प्रचार प्रसार होने लगा तथा हिन्दुओं में पुनजागरण का उदय हुआ हिन्दू शासकों में अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए शौर्य और साहस का संचार हुआ व राजपूत शासकों ने अपने शौर्य से खोए हुए क्षेत्र पुनः जीतना प्रारम्भ किया। तुगलक वंश का साम्राज्य दुर्बल होने लगा ।

इस तरह बाबा रामदेवजी ने सल्तनत काल मैं एक छोटे से ठिकाने से अपने आध्यात्मिक शक्ति, सूझ-बूझ,शौर्य और जीवित समाधि के बलिदान से हिन्दू धर्म कि ऱक्षा और सबल प्रदान किया। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के रूप में कहा जा सकता है कि तत्कालीन राजनैतिक एवम् धार्मिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रामदेवजी ने मुस्लिम शासकों से युद्ध की जगह हिन्दू धर्म के आन्तरिक खोखले ढॉंचे को पुनः संरचित करने का कार्य किया। जो जाति व्यवस्था हिन्दू समाज के लिए कभी कवच का कार्य करती थी विदेशी आक्रमणों का प्रतिकार करने कि शक्ति प्रदान करती थी लेकिन छुआ-छुत व इस्लाम धर्म के प्रचार प्रसार से जाति व्यवस्था हिन्दुओं में आन्तरिक संघर्ष का कारण बन गए । जिसके कारण हिन्दू समाज कई छोटे-छोटे हित समूहों, वंशों ,कुलों और रियासतों में विभाजित हो गया और निजी हितों के कारण आपस में लड़ने लगे थे । जिसका फायदा मुस्लिम शासकों ने उठाया रामदेवजी ने इसी कमी को दूर करने का प्रयास किया और आज एक लोकदेवता समाज सुधारक और धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक के रूप में जन-मानस कि आस्था के केन्द्र है । भारत सरकार पिछले 65 वर्षों में सामाजिक समरसता व धार्मिक सहिष्णुता स्थापित नहीं कर सकी वह कार्य बाबा रामदेवजी ने 15 वी शताब्दी में कर दिखाया और आज भी भादवे के मेले में सभी धर्म और जातियों के परस्पर भाईचारा और सहिष्णुता प्रत्यक्ष रूप से देखी जा सकती है । और राष्ट्र् की विघटनकारी शक्तियों को मुंह की खानी पड़ रही है । अंत में कह सकते हैं कि रामदेवजी सल्तनत काल से लेकर आज तक विदेशी राष्ट्र विरोधी शक्तियों का प्रतिकार कर रहे हैं ।

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