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अफ़साना याद तुम्हारी हो.. राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

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अल्ताफ़ के शोर मचाने से, मरियम बी की नींद खुल गयी ! आँखें मसलकर उसने खुली खिड़की की ओर नज़र दौड़ाई, उसने देखा कि “सूरज की तेज़ किरणें कमरे मे दाख़...

dinesh chanhdhr purohit

अल्ताफ़ के शोर मचाने से, मरियम बी की नींद खुल गयी ! आँखें मसलकर उसने खुली खिड़की की ओर नज़र दौड़ाई, उसने देखा कि “सूरज की तेज़ किरणें कमरे मे दाख़िल हो चुकी है ! फिर वक़्त मालुम करने के लिए, उसने अपनी कमज़ोर नज़र से दीवार घड़ी को देखा..सुबह के आठ बज चुके थे ! इस कारण उसका नेक दख़्तर अल्ताफ़ शोर मचा रहा था कि, ‘दफ़्तर जाने का वक़्त हो गया है, जल्दी करो मुझे देरी हो रही है !’ अब तो इस छोरे ने हल्ला मचाकर, घर को सर पर उठा लिया ! आख़िर, बेचारी मरियम को उठना पड़ा ! बिस्तर उठाकर, जैसे ही आलस मरोड़कर मरियम बी ने अपनी कमर सीधी की ! तभी उसके पास उसकी बेटी हसीना आयी, और उसने कहा “अम्मीजान ! सब्जी पकाकर रख दी है, मैंने ! इधर हमारे भाईजान अब, दफ़्तर जाने के लिए शोर मचाने लगे हैं ! देर हो रही है..अम्मी ! बस, अब रोटियाँ पकानी बाकी रह गयी है ! प्लीज़, आप रोटियाँ पका लेना ! इतनी देर में, मैं स्नान करके आ जाती हूँ !” इतना कहकर, हसीना कपड़े लेकर बाथ-रूम में चली गयी ! उसे कहाँ इतना वक़्त, जो मरियम बी से उसकी तबीयत के बारे में मालूम करें ? कि “उसकी अम्मीजान की तबीयत ठीक है, या नासाज़..?” यह तो अल्लाह मियाँ ही जाने कि, मरियम की तबीयत कैसे है..? हसीना को तो अपने भाईजान के साथ स्कूटर पर सवार होकर, अपने दफ़्तर जाना है ! इसलिए उसे कोई फ़िक्र नहीं, कि ‘अम्मी की तबीयत कैसे है...?’ उसे तो एक ही फ़िक्र है, किसी तरह वक़्त पर अपने दफ़्तर पहुंच जाए ! उन दोनों के जाने के बाद, ख़ुद अम्मी को ही ध्यान रखना है अपनी तबीयत का, या फिर ध्यान रखेंगे पड़ोसी !

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लाचार होकर, बेचारी मरियम हिम्मत करके उठी ! और पाँव रगड़ती हुई, वाश-बेसिन के पास गयी ! फिर हाथ-मुंह धोकर, किसी तरह रसोई के बकाया काम निपटा दिए ! फिर डाइनिंग रूम में आकर, मेज़ पर दस्तरख़्वान सज़ा दिया ! वापस आयी, फिर आले में रखी चटाई उठा लायी ! और उसे खिड़की के पास बिछाकर, उस पर बैठ गयी !

अल्ताफ़ नहा-धोकर आ गया, वहां ! मेज़ के पास रखी कुर्सी खींच कर, उस पर बैठ गया ! फिर “बिस्मिल्लाही रहमान रहीम..” बुदा-बुदा कर, भोजन करना शुरूकिया ! भोजन करता-करता, वह मरियम से कह बैठा “अम्मीजान, मेरे सम्पादक ने मुझे कहा है कि, मैं मंद-बुद्धि रखने वाले बालकों के मां-बाप से मिलकर उनका इंटरव्यू [साक्षात्कार] लेऊँ ! उनसे बात करके उनकी तक़लीफ़ों को मालुम करूँ कि, वे किन-किन तक़लीफ़ों से गुज़र रहे हैं या गुज़र चुके हैं ! अगर यह इंटरव्यू का मेटर सम्पादक को पसंद आ गया तो पूरा इंटरव्यू अख़बार में छपेगा, और मेरी इन्शापर्दाज़ी की ख़ूब तारीफ़ होगी ! इसके बाद में अम्मीजान...”

इधर कारख़ाना का साइरन, सुनाई दिया ! इसकी तेज़ आवाज़ के आगे अल्ताफ़ की आवाज़ दब गयी, वह क्या कह रहा है..? कुछ सुनायी नहीं दिया ! मरियम को इन बातों से कोई लेना-देना नहीं, वह तो झट उठकर उसकी थाली में रोटी सब्जी रखकर मटकी से लोटा भरकर पानी ले आयी ! लोटे को उसके पास रखकर, वापस खिड़की के पास आकर बैठ गयी ! मरियम के इस तरह चुप रहने से अल्ताफ़ के दिल में संदेह पैदा हो गया कि, “कहीं अम्मीजान, उससे नाराज़ तो नहीं है.....?” उनके चुप बैठे रहने से, अल्ताफ़ बार-बार पूछता रहा कि “अम्मीजान, क्या बात है..? आप, चुप क्यों हैं ? कहीं आप, मुझसे नाराज़ तो नहीं हैं...? कहीं, मुझसे कोई ग़लती हो गयी..?”

मगर, मरियम ने उसकी बात पर कोई ध्यान न दिया ! बस वह तो, खिड़की के बाहर चबूतरे पर धान चुग रहे कबूतरों के झुण्डको देखती रही ! थोड़ी देर बाद वापस कारख़ाने का साइरन बजने लगा, तभी हसीना कमरे के अन्दर आकर कहने लगी कि “भाईजान, देरी हो रही है ! आपको मालुम नहीं, पोने दस बज गए हैं ? अब जल्दी आइये, मुझे भी दफ़्तर जाना है...रास्ते में मुझे छोड़ देना !” इतना सुनते ही, अल्ताफ़ कहने लगा कि “अरे हसीना, मैं बस रोटी खाकर हाथ ही धो रहा हूँ, बस तू तो झट टिफ़िन लेकर आ जा बाहर !” फिर क्या..? हसीना तो झट किचन में चली गयी, टिफ़िन तैयार करने ! अब तो अल्ताफ़ के दिल में उतावली मचने लगी, कहीं यह हसीना बाहर आकर खड़ी ना हो गयी हो...? फिर क्या...? झट-पट अल्ताफ़ रोटी खाकर उठा, और वाश-बेसिन के पास जाकर उसने हाथ-मुंह धोये..फिर पास ही खूंटी पर लटकते तौलिये से हाथ-मुंह साफ़ करके वापस खूंटी पर तौलिया लटका दिया ! फिर मरियम से कह बैठा, कि “अम्मीजान जा रहा हूँ दफ़्तर, अब जाकर स्कूटर बाहर निकाल लेता हूँ ! शायद, हसीना बाहर आकर खड़ी हो गयी होगी ? इतना कहकर, अल्ताफ़ पांवों में जूते डालकर बाहर आ गया ! थोड़ी देर बाद, मरियम को स्कूटर स्टार्ट होने की धुर्र-धुर्र की आवाज़ सुनायी दी ! इन भाई-बहन के रुख़्सत होने के बाद, ढर्र-ढर्र की आवाज़ आनी बंद हो गयी ! उनके चले जाने के बाद, मरियम बी का सर खन-खन करने लगा ! वह सोचने लगी, कि “जब इसका छोटा भाई ठहरा, मंद-बुद्धि का...फिर यह मूर्ख बाहर किसके पास जा रहा है..इंटरव्यू लेने ? क्या यह नामाकूल, इतना भी नहीं जानता...? इसका छोटा भाई जो मंद बुद्धि का बच्चा था, तब से उसकी देख-भाल करते-करते मैंने और इसके बाप ने कितनी तक़लीफ़ें उठायी होगी..? क्या, यह जानता नहीं..? इसके भाई को, लम्बे वक़्त से संभाला है ! यह छोरा, २० साल का हो गया...! मगर, यह पहले जैसा ही रहा ! इसमें, कोई बदलाव नहीं ! फिर भी, इसकी देख-रेख करती कई तकलीफ़ें उठायी है मैंने ! भाई की देख-भाल करनी तो दूर, तू तो इसके इलाज़ के लिए मना करता रहा...? और साथ में नीम की पत्तियों की तरह कड़वा बोलकर, मेरी तक़लीफ़ें अलग से बढ़ा दी तूने ! अरे कुत्तिया के ताऊ, इलाज़ के पैसे मैं खर्च करती थी, फिर क्यों तेरी काली ज़बान बाहर निकालता था...? मदद करनी तो दूर रही, तू तो मुझे यह सुनाता आया, कि “यह नूरा तो मेरी प्रगति का दुश्मन है..?” अरे, ओ दोज़ख के कीड़े ! जब कभी तेरे भी औलाद होगी, फिर इस तरह बोलना तेरी औलाद के लिए ! बड़ा आया है राक़िम बनकर, लोग क्या देखेंगे तेरी इन्शापर्दाजी..? तू तो ऐसा मूर्ख है, जिसे मालुम नहीं बगल में क्या है..? वाह रे, वाह ! बगल में छोरा, और गाँव में ढिंढोरा..? पूरी रात नूरे के पलंग के पास बैठकर, सर पर रखी ठंडी पट्टी को कई बार बदलती रही ! न मालुम कितनी रातें, जागकर बिताई होगी मैंने ? मेरे लिए, करवट लेना तो दूर..मगर, तुम दोनों भाई-बहन के खर्राटों के कारण मेरी इन आँखों की नींद कोसों दूर चली गयी ! तुम दोनों तो आराम से नींद लेते रहे रात को, तुम्हें क्या पत्ता...? बीती रातों में नूरे की तबीयत नासाज़ थी, या..?” सोचती-सोचती, मरियम का सर-दर्द बढ़ने लग़ा ! फिर क्या..? आख़िर, माइंड डाइवर्ट करने के लिए वह उठी ! आले में रखे रेडयो को ओन करके, वापस नीचे चटाई पर बैठ गयी ! इस वक़्त, मरूवाणी कार्यक्रम चल रहा था, गायिका फ़तेह कुमारी व्यास की आवाज़ में गीत सुनायी देने लगा ! वह भजन गा रही थी याद तुम्हारी हो, आज़ प्रभु आयी” इस मुखड़े को सुनते ही, उसे बीती हुई घटनाएं यादआने लगी ! ये सारी घटनाएं, उसकी आँखों के आगे चल-चित्र की तरह घूमने लगी !

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मरियम बी के शौहर गफ़्फ़ूर मियाँ सेल-टेक्स महकमें में एकाउंटेट थे ! जामिया इस्लामिया स्कूल में ख़ुद मरियम, उर्दु-अध्यापिका के पद पर काम करती थी ! सास-ससुर के इन्तिकाल के वक़्त, यह अल्ताफ़ ख़ुद दो साल का था ! उनके इन्तिकाल के बाद इस नूरे का जन्म हुआ ! बचपन में यह नूरा पढ़ाई में बहुत होश्यार था ! इसे चालीस तक के पाहड़े, मुख-ज़बानी आते थे ! तब इसकी पढ़ाई की ओर लगन देखकर, मदरसा के मौलवी साहब ने यह एलान किया था “यह छोरा, सेकंडरी बोर्ड मे ज़रूर अव्वल आएगा !” इस कारण उस वक़्त मौलवी साहब नेआश्वासन देते हुए कहा, ‘बच्चे की पढ़ाई कभी छुड़ाना मत, मैं ज़रूर इसका दाख़िला अलीगढ़ मुस्लिम युनीवरसिटी में ज़रूर करवा दूंगा !’ और साथ में, यह यह भी कह दिया “इस बच्चे को, मैं वज़ीफ़ा ज़रूर दिला दूंगा ! वज़ीफ़ा दिलाने की जिम्मेवारी, उनकी ख़ुद की होगी !” इस तरह इन लोगों की सुखद ज़िंदगी चल रही थी, मगर इनके ईर्ष्यालु रिश्तेदारों व पड़ोसियों को इनकी सुखद ज़िंदगी पसंद नहीं आयी ! इन ईर्ष्यालु लोगों ने, जैसे ही यह सुना कि “छोरे ने तीसरी का दर्ज़ा पास कर लिया है, और उसे अंजुमन कमेटी ने वज़ीफ़ा देने की घोषणा की है” सभी, जल-भुन गए ! इस बच्चे की सफ़लता, इन बिरादरी वालों अच्छी लगने का तो सवाल ही नहीं ! वे सभी ईर्ष्यालु रिश्तेदार, समाज में इनके ख़िलाफ़ तरह-तरह की बातें फैलाने लगे ! और इनके मिलने वालों को, इनके ख़िलाफ़ सच्ची-झूठी बातें सिखाकर आपस में लड़ाने लगे ! इन लोगों को झगड़ा करते देखकर, ये दूर बैठे रिश्तेदार तालियाँ पीटकर ख़ुश हो जाया करते ! इन झगड़ों में उलझे रहने से, ये दोनों पति-पत्नी अपने बच्चों की तरफ़ ध्यान नहीं दे पाए ! ध्यान न दिए जाने से, बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा ! एक दिन नूरा जब स्कूल से आया, उसका बदन तवे के माफ़िक जल रहा था ! उस मासूम को बुख़ार में पाकर, मरियम ने उसको ले जाकर पलंग पर सुलाया ! फिर, डॉक्टर साहब को बुलाने के लिए अल्ताफ़ को भेजा !

डॉक्टर साहब ने आकर उसकी जांच की, व बुख़ार उतारने की गोलियां और पीने की दवाई दी ! इस तरह, वह चार दिन तो चंगा रहा ! मगर, बाद में एक दिन छोड़कर उसे फिर एकान्तर बुख़ार आने लगा ! धीरे-धीरे यह बुख़ार उतरने की जगह, एकांतर बुख़ार रहने लगा ! अक्सर रात के वक़्त इस बच्चे का बुख़ार, तेज़ हो जाया करता ! कभी १०४ या १०५ डिग्री तक, यह बुख़ार चढ़ जाता ! बुख़ार बराबर रहने से, नूरे का शरीर बहुत कमज़ोर हो गया ! ऐसा लगता, कि इस बच्चे का खून किसी ने चूस लिया है..? रफ़त: रफ़त: इस बीमारी ने, उसके दिमाग़ परअसर कर डाला ! इस तरह उसकी हालत और ख़राब हो गयी, और उस पर कोई दवा-दारु का कोई असर नहीं हो रहा था ! इस तरह उसे, धीरे-धीरे नींद में बड़बड़ाने की आदत अलग से हो गयी ! कभी-कभी तो वह भरी नींद में चमक कर उठ जाता, तब किसी को अपने पास नहीं पाता तो अम्मी-अब्बू को आवाज़ देता हुआ सबको उठा देता ! घर वालों को, क्या उठाता...? वह तो अपने पड़ोसियों की नींद भी, ख़राब करने लगा ! इस कारण गफ़्फ़ूर साहब और उनकी बीबी मरियम को बारी बांधकर, रात को नूरे के पास रहना पड़ा ! इस तरह अब नूरे के पास किसी एक को, बैठे रहने की मज़बूरी बन गयी ! स्थिति इतनी बिगड़ गयी कि, अब दोनों में से एक को स्कूल या दफ़्तर से छुट्टी लेकर इसके पास बैठना पड़ता ! आख़िर परेशान होकर इन दोनों ने निर्णय ले लिया, कि ‘अब हमेशा के लिए, एक को तो इसके पास रहना ही है !’ बस, फिर क्या ? मरियम वोलूंटरी रिटायरमेंट लेकर, घर पर बैठ गयी ! यह आख़िर तज़वीज़ बहुत सोच-समझकर लिया गया, क्योंकि बेचारे नूरे की हालत एक यतीम बच्चे की तरह बन गयी थी ! उसको न तो दिन में चैन, और न रात को..हर वक़्त अब्बू या अम्मी में से किसी को उसके पास रहना बहुत ज़रूरी हो गया !

यह अल्ताफ़, इस नूरे से क़रीब चार बरस बड़ा होगा..! इस कारण वह तो परिस्थितियों को देखकर, संभल गया ! वह कभी-कभी ख़ालाजान के घर पर भी रह जाया करता, या फिर कभी भुआ के घर ! इस वक़्त, इसका भी स्कूल जाना भी बंद हो गया ! जब कभी मरियम इन दिनों को याद करती, तब उसके बदन के रौंगटे खड़े हो जाया करते ! मरियम के लिए इन गर्दिश दिनों को गुज़ारना, कोई आसान काम नहीं था ! इधर डॉक्टरों के चक्कर बंद हुए नहीं, और उधर सारी जमा-रक़म इस नूरे के इलाज़ में लग गयी ! ऐसे वक़्त में, हसीना का जन्म हुआ !

नूरे के इलाज़ के लिए, मरियम हर उपाय को आज़मा चुकी...किसी के बताये किसी एक उपाय को भी, उसने नहीं छोड़ा ! मगर, कोई उपाय क़ामयाब नहीं हुआ ! यह तो ख़िलक़त का नियम है, ऐसे वक़्त कई मिलने वाले या इनके अड़ोसी-पड़ोसी मुफ़्त में सलाह दिए बिना रह नहीं पाते ! कहा जाता है कि, ‘हिन्दुस्तान में सलाह देने वाले डॉक्टरों की कोई कमी नहीं, जबअसाध्य रोग का मामला पैदा हो जाता है....तब अपने-आप, इसकी रफ़्तार और अधिक बढ़ जाया करती है !’ इस मामले में भी, ऐसा रहा ! कभी तो पड़ोसन फ़रीदा बीबी कह जाती कि, “अरे नूरे की अम्मी, मस्तान बाबा की मज़ार पर जाकर चादर चढ़ा कर आ जाओ ! अल्लाह के मेहर से, छोरे को ज़रूर आराम मिलेगा !” कभी इसके शौहर के ख़ास दोस्त अल्लानूर साहब, अलग से फ़रमा कर चले जाते कि “अजी ओ, गफ़्फ़ूर मियां ! बराबर सत्रह जुम्मे-रात तुम्हें गंगाणी गाँव जाना होगा, वहां इकबाल बाबा की मज़ार पर जाकर..मत्था टेक कर आना है..! तब बाबा आप पर मेहरबान होगा, और छोरे को ज़रूर दवा कार करेगी...मियां, ध्यान रखना !” इस तरह इन लोगों की सलाह मानती-मानती, आख़िर वह थक गयी बेचारी ! मगर एक भी सलाह काम न आयी, ना तो किसी फ़कीर बाबा के ताबीज़ काम आये, और न किसी डॉक्टर की दवा काम आयी ! यही कारण था ‘बेचारी पैसों से अलग धुल रही थी, और इधर एक भी छुट्टी उसके अवकाश खाते में न रही !’ इसी वज़ह से उसे, आख़िर में निर्वेतन भी रहना पड़ा ! जिसका परिणाम यह हुआ, दफ़्तर से ग़ैर हाज़र रहने के नोटिस आने लग गए ! फिर परेशान होकर, उसने नौकरी से वोलूंटरी रेज़िगनेशन दे दिया !

अब ख़ाली एक तनख़्वाह से घर-खर्च चलाना बहुत कठिन हो गया, इधर डॉक्टर की फीस और दवाइयों का ख़र्च नासूर में खुज़ली आने के समान हो गया ! बेचारे गफ़्फ़ूर साहब दफ़्तर जाने के पहले व दफ़्तर से आने के बाद, व्यापारियों की दुकानों पर बही-खाते भरने चले जाते...इस तरह इस पार्ट-टाइम से, उनको थोड़ा-बहुत सहारा मिला ! इस पैसों की दौड़ में वे अपने खाने-पीने का ध्यान नहीं रख पाए, जिससे उनका बदन कमज़ोर होता गया ! बेचारे गफ़्फ़ूर साहब ‘घाणी के बैल’ की तरह काम करने लगे, समय के पहले उनके सर के सारे बाल सफ़ेद हो गए ! बदन के कमज़ोर होने से, नाना प्रकार की बिमारियों ने आ घेरा ! पेट के रोग हो जाने से, उन्हें मज़बूर होकर डॉक्टर की सलाह पर उबली हुई सब्जियां व बिना घी की खिचड़ी से काम चलाना पड़ता ! पांच वक़्ती नमाज़ी होने के कारण, उन्होंने कभी हराम का पैसा किसी से लेना मंजूर नहीं किया ! यह तो ख़ुदा जानता है, ईमानदारी की कमाई से घर चलाना कितना मुश्किल होता है !

ऐसी परिस्थितियों में, मरियम अपना ख़्याल कैसे रख पाती..? वह तो नूरे के ग़म में डूबकर, अपने-आपको भूल गयी..फिर अपने शरीर का ख़्याल, कैसे रखती ? उसे तो अपने शरीर का भान न के बराबर था, बस ख़ाली नूरे का ख़्याल रखती हुई एक तरह से अपने घर में ही कैद हो गयी ! यदा-कदा उसे बिरादरी के काम से बाहर जाना पड़ता, तो उस वक़्त जानबूझकर यह नूरा शैतानी करने बैठ जाता ! अगर उसे मरियम फ़टकार देती, तो वह ज़्यादा शैतानी करने लगता ! फिर क्या...? जो भी चीज़ उसके सामने होती, उसे उठाकर फेंक देता या तोड़-फोड़ डालता ! धीरे-धीरे इसकी फ़ितरत, बच्चों की तरह शैतानी करने की बन गयी ! मां-बाप के अलावा किसी के हाथ में नहीं, इसको वश में रखना ! मां-बाप दोनों का ध्यान नूरे की तरफ़ रहने से, बेचारा अल्ताफ़ और हसीना मां-बाप के प्यार से मरहूम हो गए ! घर की ऐसी दशा देखकर, उन दोनों ने अपने-आपको संभाल लिया ! दोनों बच्चे काफी मेहनती निकले, इस तरह बराबर पढ़ाई में तरक़्क़ी करते रहे ! अल्ताफ़ ने पत्रकारिता का कोर्स कर डाला, और एक नामी अख़बार के दफ़्तर में उसने नौकरी जोइन कर ली ! उसकी क़ाबिलियत देखकर, कई अख़बारों में उसकी तहरीरे छपने लगी ! अब वह ख़ुद अपने नाम से, पहचाने जाने लगा ! मगर घर की ऐसी स्थिति को देखकर, उसने कभी अपने सर्कल के लोगों को अपने घर बुलाने की ग़लती नहीं की ! इस पत्रकारिता के धंधे में लेख लिखने के लिए, उसे एकांत की बहुत ज़रूरत बनी रहती ! मगर घर में ख़ाली दो बेड-रूम ही थे..अलग से कोई कमरा था, नहीं ! तब उसने एक कमरे को, लिखने-पढ़ने का कमरा बना डाला !

कहा जाता है कि, ‘मंद-बुद्धि के इंसान की बुद्धि, और बालक की बुद्धि एकसी होती है !’ नूरे की उम्र भले बढ़ती गयी, मगर उसकी बुद्धि का विकास नहीं हुआ ! उसकी बुद्धि एक बालक की बुद्धि के बराबर ही रही, बस यह स्थिति घर वालों के लिए एक समस्या बन गयी ! बीस साल का नूरा, बच्चों जैसी हरक़तें करता रहा, समझाने पर भी वह समझ नहीं पाता..कि, ‘उसको क्या करना चाहिए..?’ अल्ताफ़ और उसके बीच में तो छत्तीस का आंकड़ा बना रहता, उसको अल्ताफ़ को खिज़ाने में बहुत आनंदआता था ! इस कारण इन दोनों के बीच, अक़सर जंग मची रहती ! जैसे ही काम करने के लिए अल्ताफ़ अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करता, और यह नादान नूरा जाकर उसके कमरे का दरवाज़ा ज़ोर-ज़ोर से खटखटाना चालू कर देता ! जैसे ही वह दरवाज़ा खोलता, उसी वक़्त यह नूरा बन्दूक की गोली की तरह कमरे में घुस जाता ! फिर क्या ? उस बेचारे अल्ताफ़ की चीजें उठा-उठाकर, फेंकने लग जाता ! मना करने पर, वह अल्ताफ़ की क़ीमती चीज़ों को तोड़-फोड़ डालता ! ऐसे वाकयों को देखकर, मरियम अपना सर पकड़ कर बैठ जाती, इसके सिवाय वह बेचारी क्या कर सकती थी..? कभी घर का मुख्य दरवाज़ा खुला रह जाता तो, आफ़त सर पर मंडराने लग जाती..यह कमबख़्त , खुला दरवाज़ा पाकर दौड़ पड़ता बाहर ! फिर क्या..? किसी पड़ोसी के घर का दरवाज़ा खुला पाकर वह झट घुस पड़ता उसके अन्दर ! अन्दर जाकर पड़ोसियों के सामान को तोड़-फोड़ डालता, या उनकी चीज़ों को तितर-बितर कर डालता ! पड़ोसी आख़िर पड़ोसी ठहरे, वे नुक़सान को काहे बरदाश्त करेंगे..? बेचारी मरियम को हर नुक़सान का हर्ज़ाना भरना पड़ता, इस तरह मरियम एक तरह से कांटों की सेज़ पर बैठी थी..न जाने कब यह नूरा कौनसी हरक़त कर बैठे..? उस नादान को वह घर में अकेला भी छोड़कर जा नहीं सकती थी, अगर वह चली जाती तो..वह घर के अन्दर दरवाज़े की चिटकनी लगाकर बैठ गया तो, वह क्या कर पायेगी..? ख़ुदा न करे, अगर यह नूरा किचन में चला गया, और इसके हाथ लग जाए कोई माचिस..ख़ुदा रहम, कहीं गैस के चूल्हे का स्विच ओन करके माचीस जला दी तो..पूरा घर जला डालेगा...! बस इसी वहम के मारे मरियम कहीं भी जा नहीं पाती, आख़िर बेचारी घर में कैद होकर रह गयी ! इस तरह के मामलों में, लोगों की हफ्वात और सलाहों का क्या कहना..? इन लोगों को उनकी हर्ज़-मुर्ज़ को दूर करना तो दूर, वे तो उनकी तक़लीफ़ें बढ़ाते हुए उनको महज़ून पाकर ख़ुश हो जाया करते ! इन लोगों में से कोई कहता था कि “छोरे को अमुख संस्था में दाख़िला दिलवा दो, कुछ काम सीख जाएगा ! फिर क्या..? इसकी ताकत, सही जगह काम आ जायेगी !” दूसरा कोई यह सलाह दे बैठता, कि “छोरे को किसी तुज़ुर्बा रखने वाले साइकोलोजिस्ट को दिखला दो !” लोगों की अनाप-शनापबातें सुनकर, मरियम और गफ़्फ़ार साहब का दिल जल उठता कि “आज़ वह दिन आ गया, जब हमें ऐसे लोगों से ऐसी-वैसी बातें सुननी पड़ रही है ..?” मगर ये दोनों पति-पत्नि धीरज धारण कर लेते, और उनके बताये उपायों को आजमा बैठते ! मगर, उन्हें कोई फ़ायदा उन्हें नज़र नहीं आया..ख़ाली पैसों की बरबादी के अलावा कुछ नज़र नहीं आया !

यों तो मरियम बहुत धीरज रखने वाली थी, मगर कई बार ऐसी स्थिति आ जाती..जब उसके शिकिस्ता दिल पर मरहम लगाने की ठौड़ घर के सदस्य ही नमक लगा बैठते ! तब बर्दाश्त करने की हिम्मत, उसमें न रहती..तब उसकी सूरत रोनी बन जाती, बस उस वक़्त उसके सिसकने का ही इंतज़ार रहता था ऐसे लोगों को ! आख़िर बेचारी अपने दोनों ऊंचे करके, ख़ुदा से कहती “ए मेरे परवरदीगार, किस जन्म के पापों की सज़ा तू मुझे इस जन्म में दे रहा है ? अब अगर तू सुख नहीं दे सके, तो कम से कम मुझे मौत तो दे दे !”

धीरे-धीरे वक़्त बितता जा रहा था, छोरी हसीना ने बारवी दर्जे का इम्तिहान दिया, उसका रिजल्ट आने का उसे इंतज़ार था ! उसने बहुत मेहनत की, इस कारण उसे हर विषय मे उच्चतम अंक आने की उम्मीद थी ! मगर, उसकी उम्मीद नाउम्मीद में बदल गयी..वह साधारण अंकों से पास हुई ! अब उसे दूसरी फ़िक्र हुई, कि ‘अब उसको, कोलेज में दाख़िला कैसे मिलेगा..?’ उसको मानसिक तनाव से गुज़रते देखकर, नूरे के सिवाय घर के सभी मेंबर इस वक़्त ग़मगीन थे ! जिससे घर का वातावरण, बोझिल हो उठा ! खाने की मेज़ के पास बैठे गफ़्फ़ूर साहब, मरियम, अल्ताफ़ और हसीना बेदिली से खाना खा रहे थे, उनका एक-एक निवाला गिटना बहुत मुश्किल हो गया ! मगर, इस वाकये से नूरे को क्या फ़र्क पड़ता..? घर की तरफ़ लापरवाह होकर, वह तो डटकर खाना खा रहा था ! चारों तरफ़ सन्नाटा छा गया, कोई एक-दूसरे से बात नहीं कर रहा था ! ऐसा बोझिल वातावरण, नूरे को कैसे अच्छा लगता..? बस, फिर क्या ? सबका ध्यान अपनी तरफ़ लाने के लिए, पास पड़ी कटोरी चमच से बजाता गया ! इस तरह वह सबका ध्यान भंग करता हुआ, इस छाये सन्नाटे को तोड़ने लगा ! चमच बजाने के उपरांत भी किसी का नहीं बोलना, उसको कुछ अजीब लगा ! आख़िर अपनी तरफ़ ध्यान आकर्षित करने के लिए, वह “हा हू” की आवाज़ निकालता हुआ ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा ! नूरे का बेवक्त हंसना, हसीना को कैसे अच्छा लगता ? बस, फिर क्या ? गुस्से से काफ़ूर होकर झट, पास रखी ग्लास को उसने आंगन पर दे मारी ! फिर, उस नूरे को फ़टकारती हुई कह बैठी “यह सब तेरे कारण ही हुआ, नूरे ! पागल न होते हुए भी, सारे दिन करता रहता है पागलपन की हरक़तें ! अब मेरा कोलेज में दाख़िला नहीं हुआ, तो उसका जिम्मेदार तू ख़ुद होगा..!” इतना कहकर, हसीना रूठकर चली गयी, दूसरे कमरे में ! अब ऐसे माहौल में, किसको खाना-पीना अच्छा लगे ? नूरे को छोड़कर, सबने खाना छोड़ दिया ! बेचारे मरियम और गफ़्फ़ूर साहब, लाचारगी से एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे !

इस तरह, दो-तीन दिन तक किसी ने नूरे से बात नहीं की ! नहीं बतलाने पर, नूरा शैतानी हरक़त करने पर उतर आया ! आख़िर उसने सोच लिया था कि, किसी तरह सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींच लेगा ! किसी का न बतलाया जाना, उसे बहुत अख़र रहा था ! फिर क्या ? दिमाग़ में शैतानी ख़्याल आते ही वह, जा घुसा अल्ताफ़ के कमरे में ! वहां मेज़ पर रखे काग़ज़ों को फाड़कर, वहीं बिखेर डाले ! फिर चुपके से, कमरे से बाहर निकल आया ! थोड़ी देर बाद अल्ताफ़ किसी कार्य वश अपने कमरे में आया, और उसने जैसे ही छत-पंखा चालू किया...पंखा चलते ही, काग़ज़ों के टुकड़े उड़कर उसके मुंह पर छा गए ! बिना आंधी चले, ये कागज़ के टुकड़े पूरे कमरे में बवंडर की तरह छाने लगे !

कमरे से बाहर आकर, वह मरियम के ऊपर अपना गुस्सा उतारने लगा ! वह क्रोधित होकर कह बैठा “अम्मीजान ! आपने इस नूरे को बिगाड़ डाला, हम दोनों भाई-बहन का जीना दुश्वर कर डाला ? या तो अब इस घर में नूरा रहेगा, या हम दोनों भाई-बहन ! अब यह आख़िर तज़वीज़ आपको लेना है, कौन इस घर में रहेगा ? आप जानती नहीं, हम दोनों भाई-बहन को कितनी तकलीफ़ें उठानी पड़ती है...इसकी झूठी पागलपन की हरक़तों से..?”

बेचारी मरियम, क्या कर पाती..? वह इन दोनों भाई-बहन को, कैसे समझायें कि “यह नूरा उम्र में ज़रूर बीस साल का हो चुका है, मगर इसके दिमाग़ का विकास एक व्यस्क के समान नहीं हुआ ! उसकी अक्ल तो अभी भी, पांच साल के बच्चे का समान है ! इसलिए आप दोनों को अपने भाई पर तरस खाना चाहिए, आख़िर यह नूरा तुम दोनों का सगा भाई जो है...पराया बच्चा नहीं है !” घर में तो ये तक़लीफ़ देने वाले किस्से अक्सर होते रहते, मगर मरियम को बाहर भी कहाँ चैन..? इस छोरे की हरक़तों के कारण, बाहर बिरादरी में उसे अक्सर ताने सुनने पड़ते ! उसे ऐसा लगने लगा, अब ये रोज़ आने वाली तक़लीफ़ें उसका नसीब बन गयी ! वह इस छोरे की बचकानी आदतों से बाज़ आ गयी, क्रोध के कारण वह अपने दिमाग़ को काबू में रखना मुश्किल हो गया ! घर में तो वह रोज़ धमीड़ा लेती रही है, मगर अब बाहर बिरादरी में बेचारी मरियम की ख़ैर नहीं ! हर जगह नूरे के पागलपन के किस्से, सुनती-सुनती वह परेशान हो गयी ! उसका मग़ज़ क्रोध के मारे, बहुत गर्म हो गया !इस ख़िलक़त में, औरत की बेबसी को कौन जाने..? गुस्से में आपा खोकर वह उठी, और सोच लिया उसने “आज़ का यह किस्सा हद से बाहर हो गया, अब तो झगड़े की मूल को बाहर निकालकर फेंकना ही होगा !” इस तरह उसका गुस्सा आना, यही दिखला रहा था कि ‘बर्दाश्त करने की सीमा, अब ख़त्म हो चुकी है !’ इस ख़िलक़त में, औरत की बेबसी को किसने पहचाना है ? आख़िर होना वही था, अब वह अपने शरीर पर नियंत्रण रख नहीं पायी ! एकाएक, वह बेनियाम होकर उठी ! और नूरे को पकड़कर, उसे पीटती गयी ! हाथ से थप्पड़े, मुक्के, लातें..जैसे-जैसे, उसके हाथ-पाँव चलते गए ! वह उसे, पीटती गयी ! पीटते-पीटते आख़िर वह थक गयी और उसकी सांसें धौंकनी तरह चलने लगी ! बस, फिर क्या ? वह तो ख़ुद अपने गालों पर ही, जोर-जोर से थप्पड़ मारने लगी ! कभी वह अपना सर धुन लेती, तो कभी अपनी छाती पीटने लगती ! इस तरह चिल्लाती हुई, बाल बिखोरकर उन बालों को खींचने लगी ! इसके साथ उसकी चीख़ें, आसमान में गूंज़ने लगी ! वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाती हुई कहती गयी, कि ‘नूरे को मार दो, मुझे मार डालो..तब तुम लोगों का कलेजा ठंडा होगा !’

यह स्वांग देखकर, नूरा तो झट डरकर भागा ! जीने की सीढ़ियां चढ़कर, मुंडेर पर चला आया ! फिर उनको चिढ़ाने के लिए नीचे चौक में देखता हुआ, ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता हुआ कहने लगा ‘आ जाओ आ जाओ, ऊपर ! ऊपर आकर मुझे पीट लो !’ यह मंज़र देखकर, गफ़्फ़़ूर साहब के पाँव धूज़ने लगे ! वे सोचने लगे कि ‘यह छोरा है, मंद बुद्धि का ! छत्त पर बिंडी बनी हुई नहीं है ! कहीं इस छोरे का पैर चूक गया तो, यह सीधा आकर इस चौक में गिरेगा !’ फिर क्या ? गफ़्फ़़ूर साहब झटपट जीने की सीढ़ियां चढ़कर, पहुँच गए मुंडेर पर ! गफ़्फ़़ूर साहब को देखते ही, वह नूरा बचकानी हरक़त करने लगा ! उनको चिढ़ाता हुआ, वह पीछे खिसकने लगा ! और साथ में बोलता गया, कि “अब्बाजान ! मैं तो यह गया, ख़ुदा के घर ! फिर, मेरे जाने के बाद आप-सब ख़ुश रहना !” कहीं उनका बेटा पीछे खिसकता-खिसकता, मुंडेर से नीचे न गिर जाय...? इस डर को दिल में समाये, गफ़्फ़़ूर साहब ने अपने पांवों को रफ़्तार दी ! और उसके पास जाकर, उस नूरे को छत की ओर धकेल दिया...मगर ख़ुद अपने बदन का, संतुलन खो बैठे ! फिर क्या ? बेचारे छत से नीचे गिर पड़े, इतनी ऊंचाई से गिरने के कारण वे बेहोश हो गए ! और साथ में उनके सर में, हेमरेज अलग से हो गया ! चार दिन तक बेचारे गफ़्फ़़ूर साहब अस्पताल में भर्ती रहे, पांचवी रात वे निकाल नहीं सके....और उनका इन्तिकाल हो गया ! इस तरह, इस हादसे से उनकी मौत हो जाना..नूरा के लिए इस मंज़र को भूलना कठिन हो गया ! अब्बा हुज़ूर की मौत ने, उसके दिमाग़ को झंझोड़ डाला ! नूरे का दिल सहम उठा ! तब से यह नूरा गुमसुम रहने लगा, अब वह किसी से बात नहीं करता ! बस रात को सोते वक़्त वह मरियम के पास चला आता, और उसकी गोद में अपना सर रखकर लेटा-लेटा कहता कि, ‘अम्मी ! मुझे अब्बाजान की, बहुत याद आ रही है ! अब आप मुझे वही भजन सुनाओ, जो आप अब्बा को याद करते गाया करती हैं ! गाओ ना, अम्मी ! वही भजन “याद तुम्हारी हो...”

इतना सुनते ही, मरियम की आंखों के सामने गफ़्फ़़ूर साहब का चेहरा छा जाता ! और उनकी याद में, अबसारों से अश्क बहने लगते ! तब वह अपनी नम आँखों से, नूरे का भोला चेहरा देखने लगती ! उस चेहरे को देखते-देखते, उसे गफ़्फ़़ूर साहब की याद और सताने लगती ! फिर क्या ? गफ़्फ़़ूर साहब को याद करती हुई, वह रुन्दते गले से आकाशवाणी गायिका फ़तेह कुमारी व्यास का गाया भजन गाने में लीन हो जाती याद तुम्हारी हो, आज़ प्रभु आयी ! आज़ प्रभु आयी ! सांवरी सूरत तेरी, मोहनिया मूर्तियां तेरी ! ओ माधुरी मूर्तियां मोरे मन में बसे हो ! !!याद !! आंखों के झरने बहते, हे री केवोनी कैसे ? क्यूं तो सांवरिया मोसे, प्रीत लगाई ! !! याद !! इतना तरफ़ाना मुझे, इतना बिसराना मुझे ! क्यूं तो सांवरिया मोरी, सुध बिसराई !! याद !! रमते तुम आँख मिचोली, रमते तुम फ़ाग रमोली ! भर दे मेरी प्रेम की झोली, कृष्ण मुरारी !! याद !!”

ठंडी रात में, इस भजन के सुर वातावरण में दर्द भर देते थे ! वह गाती-गाती, अपनी सुध-बुद्ध खो देती ! दिन बीतते गए, गफ़्फ़़ूर साहब की याद में मरियम रोती रहती या फिर चुप्पी साध लेती ! इधर यह नूरा भी हो गया शांत, अब न तो वह किसी से बोलता और न करता शैतानी ! और अल्ताफ़ के कमरे में जाना तो दूर रहा, वह तो उधर मुंह भी नहीं करता !

यह वाकया देखकर, अल्ताफ़ के दिल में भय समा गया, वह बार-बार मरियम के पास आता और उसके पास बैठकर उससे पूछने बैठ जाता ! कि, उसमें आये इस बदलाव का क्या कारण है ? मगर मरियम उसे कुछ भी नहीं बताती, बस अपना मुंह फेरकर बैठ जाती ! अम्मीजान के ऐसे रुख़े व्यवहार को देखते, दोनों भाई-बहन परेशान हो उठे ! उनके अंतर्मन में वहम का कीड़ा रेंगने लगा ! वे दोनों सोचने लगे कि, ‘कहीं उन दोनों ने कोई चुभती बात ,अम्मीजान को तो नहीं कह डाली ? या उन दोनों भाई-बहन से कोई ऐसी ग़लती तो नहीं हो गयी, जिसके कारण उनकी अम्मीजान के दिल को चोट पहुँची हो ? और वह इस दु;ख को झेल न सकी, और वह सदमे में चली गयी हो ?’ तब बेचारेअल्ताफ़ ने कई बार अम्मी के पांवों पर गिरकर माफ़ी मांग ली, मगर उस पर कोई असर नहीं ! मरियम का व्यवहार वही रहा, वह बस अपना सारा ध्यान नूरे पर देती रही..घर के किसी अन्य सदस्य से उसे कोई सारोकार नहीं रहा !

दिन बीतते गए, एक दिन हसीना ने आकर मरियम को ख़ुश ख़बरी दे डाली “अम्मीजान ! अब लड्डू खिलाओ ! अब्बाजान के स्थान पर मेरी सरकारी नौकरी, मृतराज्य कर्मचारी आश्रित कोटे में लग गयी है !” मगर मरियम कुछ नहीं बोली, उसे नफ़रत से देखती हुई वहां से उठ गयी और जा पहुँची नूरे के पास ! उसके पास बैठकर उसका सर सहलाने लगी !

नौकरी लगने के बाद, हसीना की दिनचर्या बदल गयी ! इस कारण अब वह, अपनी अम्मीजान की तरफ़ ध्यान देना कम कर दिया ! अल्ताफ़ तो पहले से ही, ध्यान कम देता था ! उसे क्या मालुम...’नूरा और मरियम की तबीयत कैसे है ?’ इस तरफ़ ध्यान देने से, उसे कोई सारोकार नहीं ! अब रमज़ान का पाक महिना आ गया, भीषण जानलेवा गर्मी, ऊपर से मरियम के रोज़े चल रहे थे ! धीरे-धीरे, रमज़ान कि छठी रात आयी ! मरियम के लिए वह काली रात, आमवस्या बन गयी ! उस रात नूरा का बदन, गर्म तवे की तरह गर्म हो गया ! इस बुख़ार ने, उसके बदन में काफ़ी कमज़ोरी ला दी ! उसने जैसे ही उसके सर पर हाथ रखा, और उसे सहलाती हुई वह घबरा गयी ! फिर क्या ? घबराकर उसने हसीना और अल्ताफ़ को आवाज़ दी, मगर उसकी आवाज़ कौन सुने ? दोनों भाई-बहन तो, खूंटी तानकर सो रहे थे ! आख़िर उसने नूरे के सर को अपनी गोद में उठाकर, उसके सर पर ठंडी पट्टी रखने लगी ! ठंडी पट्टी रखते ही नूरे ने अपनी आँखें खोली, और बेचारा कातर सुर में अपनी अम्मी से इतना ही बोल पाया कि “अम्मीजान ! अभी मुझे, अब्बाजान की बहुत याद आ रही है ! मुझे ऐसा लगता है कि, जन्नत में अब्बू मुझे याद कर रहे हैं ! अब तो अम्मीजान, मझे ख़ुदा अपने पास बुला ले..कितना अच्छा हो...” बेचारा इससे आगे, बोल नहीं पाया ! क्योंकि, मरियम ने उसके लबों पर पर हाथ रख दिया ! उसके लबों पर अपना हाथ रखकर, वह कहने लगी “बेटे, ऐसी अशुभ बातें नहीं करनी चाहिए ! तू यह तो सोच बेटा, मैं तेरे बिना किसके लिए ज़िंदा रहूँगी ?” इतना कहकर, उसने नूरे के लबों से हाथ हटाकर, उसका मासूम चेहरा देखने लगी ! उसके चेहरे पर, नूर छाया हुआ था ! वह मरियम से, वापस कहने लगा “अम्मीजान ! आप एक बार मुझे वही भजन सुना दीजिये ना, जो आप अब्बू को याद करती हुई गाया करती हैं ! इसके बाद, मैं आपसे कभी नहीं कहूंगा...” इसके आगे, बेचारा नूरा बोल न पाया ! बदन में अब इतनी ताकत, अब रही कहाँ ? उसको एक-एक शब्द कहने में, कष्ट होने लगा ! उसकी ऐसी स्थिति देखकर, मरियम का दिल हलक़ में आ गया ! वह उसके ललाट को दबाती हुई, अपने अवरुद्ध गले से इस ठंडी रात में गायिका ‘फ़तेह कुमारी व्यास’ का गाया हुआ भजन मीठे सुर में गाने लगी “याद तुम्हारी हो, आज़ प्रभु आयी..आज़ प्रभु आयी ! घट के भीतर तुम, दर्शन मैं पाऊं तेरा ! यूं तो सांवरिया...” दिल-ए-दर्द के मारे, गाती हुई मरियम की आँखों से आंसू गिरने लगे ! इस तरह उसका दिल का दर्द इन आंसूओं के रूप में बाहर निकलने लगा ! इस ठंडी रात में ये दर्द भरे सुर, दूर-दूर तक जाने लगे ! गाते-गाते मरियम को मालुम ही न पड़ा कि रात काफ़ी बीत गयी, और मस्जिद में मुल्ला भी आ गया ! मस्जिद, में रोशनी फ़ैल गयी ! पाक रमज़ान का महिना चल रहा था, अत: तड़के तीन बजे मस्जिद से मुल्ला सहरी करने के वक़्त का एलान करने लगा ! वह लाउडस्पीकर से ज़ोर-ज़ोर से कह रहा था कि “ मोमिनों ! खाना-पीना कर लो, सेहरी का वक़्त हो गया है !” मुल्ले की तेज़ आवाज़ मरियम के कानों में गिरी, उसने चमककर दीवार-घड़ी की तरफ़ देखा....घड़ी में, सुबह के तीन बजे थे ! उसने अपनी गोद में नूरे को चुप-चाप लेटे देखा, उसको फ़िक्र हुई कि ‘कहीं नूरे की तबीयत, और ज़्यादा तो नहीं बिगड़ गयी ?’ वह नूरे को निहारती-निहारती, उसके बदन को सहलाने लगी ! उसके बदन को हाथ से सहलाते हुए, उसे ऐसा लगने लगा कि ‘उसका बदन बर्फ़ की भाँति, ठंडा होता जा रहा है !’ यह एहसास होते ही, उसका कलेज़ा हलक़ में आ गया ! घबराकर, उसने नूरे की साँसें व नाड़ संभाली ! न तो साँसे चल रही थी, और न नाड़ ! यह एहसास होते ही, उसके मुख से चीख़ निकल उठी ! इस चीख़ के साथ, उसके बदन को झटका लगा ! और, उसकी आँखें खुल गयी ! इस तरह चेतन होते ही, उसने सामने देखा, जहां आले में रखा रेडिओ अब प्रोग्राम बंद हो जाने के कारण ज़ोर-ज़ोर से घर्र-घर्र की आवाज़ करता नज़र आया ! मरूवाणी कार्य-क्रम ख़त्म हो गया, उदघोषक जाने के लिए विदाई ले चुका था ! जिससे यह रेडिओ घर्र-घर्र की आवाज़ करने लगा ! दीवार का सहारा लेकर मरियम खड़ी हुई, मगर उसके स्वीच की तरफ़ हाथ बढ़ाते ही...उसे ज़बरदस्त ज़ोर का चक्कर आया ! और उसका सर घूमने लगा, इधर उसकी छाती में ज़ान-लेवा दर्द उठने लगा ! कमज़ोरी के के कारण उसके बदन में अब इतनी ताकत रही नहीं, कि ‘वह उसे बर्दाश्त कर सके !’ बस, वह चिल्लाकर ज़मीन पर गिर पड़ी ! छाती में उठ रहे दर्द के कारण वह बिना पानी की मछली की तरह तडफ़ने लगी ! धीरे-धीरे उसकी आँखों की मांसपेशियां, कमज़ोर होती गयी ! अब उसे कमरे की हर वस्तु का रंग, हरा-हरा नज़र आने लगा ! मुंह से निकल रही आवाज़ बंद हो गयी, उधर पड़ोसी के घर में चल रहे टेप-रेकर्ड में, फ़तेह कुमारी का गायिका का गाया भजन “याद तुम्हारी हो..” उसके कानों में गिरने लगा ! तभी उसकी आँखों के सामने, तेज़ रोशनी फ़ैल गयी ! और उसे ऐसा लगा कि, कहीं दूर से नूरा अपनी बाहें फैलाए हुए उसे पुकारता हुआ उसके पास आ रहा है..उसके नज़दीक आते ही उसके कमज़ोर बदन की तमाम पीड़ा ख़त्म हो गयी, और वह बहुत हल्कापन महशूस करने लगी ! अब उसका कमज़ोर बदन से नाता टूट गया, और वह नूरे की ओर रूह की ओर खींची हुई जाने लगी ! उसकी रुह ने नूरे की उस रूह को, वात्सल्य में डूबकर गले लगा लिया ! फिर उसकी रूह ने पीछे मुड़कर देखा, तो क्या देखा ? कि, उसका बेज़ान शरीर वहां पड़ा है...जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं रहा ! तभी उसे ऐसा खींचाव महसूस हुआ और उसे लगा कि ‘उसकी रूह जन्नत से आ रही उस रोशनी की तरफ़ बढ़ गयी..और वह जन्नत की दिशा में जाने लगी !’ फिर उसे जो रोशनी दिखाई दे रहा थी, वह लुप्त हो गयी ! मरियम का शरीर ठंडा होकर, पीला पड़ने लगा ! इतने में कमरे के दरवाज़े पर, दस्तक हुई ! और उस आवाज़ के पीछे, किसी के पुकारने की आवाज़ आयी “क्या बात है, दुल्हन ? ख़ैरियत है ?” मगर, यहाँ ज़वाब देने वाला अब है कौन ? ज़वाब न मिलने पर, किसी के चलने की आहट हुई !

मरियम की चीत्कार सुनकर, पड़ोसी रफ़ीक मियाँ की दादी सबीना बीबी अटकाए हुए दरवाज़े को खोलकर घर में दाख़िल हुई ! उसके पीछे-पीछे, रफ़ीक मियाँ भी दाख़िल हो गए ! दाख़िल होने के बाद वे जैसे ही दोनों कमरे में आये, वहां उनको मरियम बी का बेज़ान शरीर पड़ा नज़र आया ! सबीना बीबी ने पास आकर मरियम की नाड़ संभाली, और साँसों की गति जानने के लिए उसके नाक के नीचे हाथ रखा ! मगर न तो मरियम की साँसें चल रही थी, और न नाड़ ! बेचारी सबीना बीबी घबराकर ज़ोर से चिल्ला उठी, उसकी चीख़ सुनकर कमरे के दरवाज़े के पास खड़े रफ़ीक मियाँ झट उसके पास आये ! अवरुद्ध गले से सबीना बीबी कह रही थी “हंस तो उड़ गया, और मिट्टी रह गयी रे रफ़ीक ! ए मेरे मोला, बेचारी बादक़िस्मत अबला ने क्या सुख देखा इस ज़िंदगी में ? अल्लाह, उसकी रूह को जन्नत में आला मुक़ाम नसीब करें !”

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कमरे की खुली खिड़की से सबीना ने बाहर झाँककर देखा, बाहर चबूतरे पर बिख़रे अनाज के दानों को कबूतरों का झुण्ड चुग रहा था ! थोड़ी सी आहट पाकर वह कबूतरों का झुण्ड, एक साथ फरन्नाटे की आवाज़ करता हुआ आसमान की ओर उड़ चला ! सबीना बीबी को ऐसा लगा कि, ‘वह झुण्ड मरियम की पाक रूह के दीदार करने, आसमान में उड़ता जा रहा है !’ तभी पड़ोसी के घर से, टेप रिकर्ड पर चल रहे भजन की आवाज़ गूंजने लगी “याद तुम्हारी हो..” उस गीत के सुर सबीना बीबी के मानस में छाने लगे, उसे ऐसा एहसास होने लगा ‘मानों ख़ुद मरियम बीबी, उसके सामने वह भजन गा रही है ?”

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राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

निवास -: अँधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, वीर-मोहल्ला, जोधपुर !

dineshchandrapurohit2@gmail.com

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. मां अपना प्यार अपने मंद बुद्धि के पुत्र पर किस सीमा तक बरसाती है, वह उसके लिए परिवार और समाज से संघर्ष करती हुई अपना जीवन बिता देती है । इस कहानी को पढ़ें और मां की ममता और त्याग को समझें । अगर आपको यह कहानी पसंद आये तो आप ज़रूर अपने विचार रचनाकार में प्रस्तुत करें ।
    शुक्रिया ।
    दिनेश चंद्र पुरोहित (अफ़साना निग़ार)

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नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,348,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,865,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,24,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,659,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,703,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,186,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: अफ़साना याद तुम्हारी हो.. राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित
अफ़साना याद तुम्हारी हो.. राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित
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रचनाकार
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