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अनुपमा ठाकुर की लघुकथाएं

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संतुष्टि

संध्या समय में अपनी बेटी को ट्यूशन छोड़ कर लौटते समय मुझे अचानक से याद आया कि मेरे चश्मे की डंडी निकल गई है, सामने ही चौक पर चश्मे की दुकान थी, मैंने गाड़ी स्टैंड पर लगाई और पर्स से चश्मा निकालने लगी, चश्मा तो मेरे हाथ जल्दी ही लग गया परंतु उसकी डंडी हमेशा की तरह पर्स के अन्य सामानों में कहीं खो गई थी। दो मिनट पर्स का सामान उथल-पुथल करने पर मन में विचार आया कहीं डंडी घर पर ही तो नहीं भूल गई,  फिर लगा नहीं डंडी तो मैंने खुद अपने हाथ से चश्मे के साथ ही रखी थी। मस्तिष्क में यह द्वंद चल ही रहा था कि डंडी हाथ लग गई। दुकान पर एक अधेड़ सा व्यक्ति चश्मा पहने खड़ा था । दुकान पर बिल्कुल शांति थी । मैंने उसे चश्मा बताते हुए कहा -"इस की डंडी निकल गई है, क्या आप बैठा कर देंगे ?" उस व्यक्ति ने बिना कुछ कहे मेरे हाथ से चश्मा लिया और मुआयना करने लगा । दुकान पर बिल्कुल शांति थी, ऐसा लग रहा था जैसे दुकान में ज्यादा ग्राहक आते नहीं है। मैं दुकान में रखे चश्मे और गोगल्स को निहारने लगी । फिर उस व्यक्ति की ओर देखा, उसने डंडी के अंदर से बहुत ही बारीक स्प्रिंग निकाली और फिर से सही ढंग से रखकर उसे जोड़ने लगा। मेरे मन में आया कितना बारीक काम होता है यह। बारीक बहुत ही बारीक स्प्रिंग जिसे घुमा कर वह बार-बार जांचने लगा फिर दोनों डंडियों को उसने कस कर बैठा दिया और मुझे दिया, मैंने लगा कर देखा तो अच्छी से बैठ रहा था, मैंने पूछा कितने रुपए हुए ?वह दो क्षण मौन रहा। मैं मन ही मन में सोच रही थी, यह तो अब अच्छा मुंह फाडेगा और कम कम से कम ₹50 तो जरुर लेगा परंतु उसने- ""कहा कुछ भी नहीं।"" कुछ नहीं ! मैं आश्चर्य चकित रह गई । दस मिनट परिश्रम करने के बाद उससे इस उत्तर की मुझे अपेक्षा नहीं थी । मैंने कहा अपना जो भी मेहनताना है मुझे बताइए । उसने कहा,  " इतने छोटे से काम के क्या पैसे लेना?"  मुझे अच्छा नहीं लग रहा था मैंने जबरदस्ती उसके हाथ में ₹20 का नोट थमा दिया और निकल पड़ी। मैं बहुत देर तक सोचती रही सचमुच कुछ लोग अभावों में भी संतुष्टि और संपन्नता का जीवन जीते हैं।

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मौन

’’ओहो, घटस्थापना के लिए केवल चार दिन शेष है और तुम्हारा नंबर फिर से आ गया।’’ शालिनी ने झल्लाते हुए कहा।

हां, मम्मी जी, यह सब मेरे हाथ में थोड़ी ही ना है, मीना शांत रहकर बोली।

देखो, तुम दो¨ दिन के लिए अपने मामा के घर जा कर रहो, यहां वहां बार-बार हाथ लगेगा। शालिनी का स्वर अभी भी रोबीला था।

मम्मी जी, पर उनके घर की पवित्रता का क्या? और वो सामने ही रहते हैं इसलिए क्या बार-बार उनको तंग करना ठीक है? मीना बिल्कुल बेबस होकर बोलने लगी। क्यों! उन्होंने कुछ कहा? शालिनी ने क्रोध पूर्ण नेत्रों से देखते हुए पूछा।

’’कहा कुछ नहीं पर मुझे यह सब अच्छा नहीं लग रहा है।’’ मीना रुआंसी हो गई।

देखो! तुम्हारी मर्जी यहां बैठकर छुआछूत करो या फिर .....(तभी फोन की घंटी बजती है)

हाँ! हेलो स्मिता कैसी हो बेटा?

मैं ठीक हूं मां, मैं आज रात औरंगाबाद आ रही हूं।

अचानक कैसे?

औरंगाबाद में मेरा एक सेमिनार है माँ, सो आज रात ही मैं आ रही हूं।

’’अरे वाह। भैया आ जाएगा तुम्हें लेने के लिए’’ शालिनी की खुशियों का कोई ठिकाना नहीं रहा।

(रात 11-00 बजे) भाभी कहां है ? स्मिता ने आश्चर्य से पूछा

’’सामने अपने मामा जी के घर गई है।’’

क्यों!

’’बाहर हो गई है ना।’’

मां, तुम भी ना! अभी भी इन सब बातों में विश्वास करती हो।

’’हां, हां, जमाना बदल गया होगा पर भगवान थोड़ी ही न बदले।’’ 

’’माँ मैं निकलती हूं सेमिनार से चार बजे तक लौट आऊंगी।’’

’’ठीक है,

शाम चार बजे..

’’माँ एक गड़बड़ हो गई।’’

’’क्या हुआ?’’

’’मेरा भी नंबर आ गया।’’

ओ माता! यह सब क्या हो रहा है?

जा, अंदर के कमरे में जाकर नहा ले।

क्यों मां? मुझे कहीं नहीं भेजोगी

शालिनी बिल्कुल मौन खड़ी रही।

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कष्ट

रेखा बार -बार घर से बाहर आकर उस मजदूर को निहार रही थी जो घर के सामने बन रही सड़क पर पत्थर फैलाने का कार्य कर रहा था।

उसके मन में बार-बार एक ही प्रश्न उठ रहा था, एक अकेला व्यक्ति, लगातार सुबह से दोपहर हो गई पत्थरों से भरा टोकरा उठा -उठा कर रास्ते पर डाले जा रहा है, कैसे? इतना कष्ट कैसे कर लेते हैं ये लोग? इतना दुबला- पतला व्यक्ति, क्या थकान नहीं हो रही है होगी इसे? वह बार-बार रुक- रुक कर कार्य कर रहा है, हे ईश्वर! क्यों कोई इतना मजबूर है।’’

रेखा के अन्तर्द्वन्द में यह सब चल ही रहा था कि तभी उसकी छोटी बेटी वहाँ आ गई, वह भी उस मजदूर को देखने लगी। तभी उसने कहा, ’’मम्मी देखो ना यह अकेला ही पत्थर बिछा रहा है।’’

रेखा ने कहा, ’’क्या करेगा,  पढ़ा- लिखा जो नहीं है इसीलिए इतनी मेहनत करनी पड़ रही है।

रेखा ने अपने बेटी से कहा जाओ और अंकल से पूछो पानी चाहिए क्या, और चाय पिएंगे क्या ?

बेटी खुश- खुशी लौट आई और कहा, ’’हाँ मम्मी’’

रेखा ने खुशी-खुशी चाय बनाई और सोचने लगी, "इतनी तो मदद मैं कर सकती हूं पर फिर यह सोच कर निराश हुई कि एक दिन चाय पिलाने से उस मजदूर का कष्ट कम नहीं हो जाएगा, पर क्या किया जा सकता है? कष्ट तो सभी को करना है ही, किसी को शारीरिक कष्ट तो किसी को मानसिक कष्ट।"

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