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लघुकथाएँ // औरत की परिभाषा और लक्ष्मण रेखा // अमिताभ कुमार "अकेला"

अमिताभ कुमार "अकेला"

औरत की परिभाषा

पति शराबी था और दिनभर इधर-उधर आवारागर्दी करता फिरता। छोटे-छोटे बच्चों की भूख उससे देखी नहीं जाती और वह दूसरों के घरों में झाड़ू - पोंछा करके किसी तरह उन सबका पेट पाल रही थी। कई घरों में पूरा दिन झाड़ू पोंछा करते - करते मारे थकान के वह अधमरी सी हो जाती।

रात के दस बजने को आये। बच्चों के साथ वह गहरी नींद में थी। नशे में लड़खड़ाता पति घर आया और झकझोर कर उसे नींद से जगाया। बगैर उसकी सहमति के पति अपनी शारिरिक जरुरतों की पूर्ति करने लगा। खटपट की आवाज से उसका साल भर का दुधमुंहा बच्चा जाग गया और रोने लगा। उसने उसे भी उठाकर अपनी छाती से लगा लिया। स्तनपान करते हुये बच्चा चुप हो गया।

खाली नेत्रों से वह एकटक छत को घूरते हुये औरत की परिभाषा खोजने का असफल प्रयास करने लगी। उस क्षण वह एक औरत होने के साथ-साथ अपने बच्चे की क्षुधा को शांत करती एक माँ और एक आज्ञाकारी पत्नी भी थी जिसका शराबी पति उसका बलात्कार कर रहा था........



लक्ष्मणरेखा

रात के नौ बजने को आये। मंजरी गद्देदार पलंग पर सोने का असफल प्रयास कर रही थी। कुछ ही क्षण बाद सेठ आया और बिस्तर पर एक तरफ ढ़ेर हो गया। पूरा कमरा शराब की भद्दी बदबू से भभक उठा। एकबारगी मंजरी का मन न जाने कैसा - कैसा हो गया और जी में आया कि बेसिन में मुँह लटकाकर उल्टी कर दे। किन्तु यह कोई एक रोज का मामला तो था नहीं। धीरे - धीरे वह इसकी अभ्यस्त हो चुकी थी और इस बदबू के साथ जीने की जैसे आदत सी पड़ चुकी थी। हालात से समझौता करके एक तरह से उसने जैसे हथियार डाल दिये थे।

कुछ ही क्षण में सेठ के खर्राटे भरने की आवाज आने लगी और बगल में प्यासी....... छटपटाती....... मंजरी उन दिनों को कोसने लगी जब वह अपने से अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ ब्याह दी गई थी। विवाह के बाद से उसे कभी सेठ से वह सुख नहीं मिला जिसकी कामना एक विवाहिता के मन में रहती है। यहाँ तक कि सेठ उसे आज तक मातृत्व का सुख भी नहीं दे सका - ताकि बच्चे की किलकारी के बीच मंजरी की पीड़ा दब कर रह जाये। एकाध बार चुपके से डॉक्टर से सम्पर्क करने पर ज्ञात हुआ - मंजरी में कोई दोष नहीं। वो तो उसका पति ही सक्षम नहीं।

किन्तु किस मुँह से वह इसकी चर्चा सेठ से करती......? सेठ के व्यवहार से भी लगता था कि उसे अपनी कमजोरी के बारे में सबकुछ ज्ञात है। तभी तो सेठ मंजरी के प्रश्नवाचक निगाहों का सामना करने से कतराता था। उसके माता - पिता तो इतने बड़े घर में मंजरी को भेजकर स्वयं को खुशकिस्मत ही समझ रहे होंगे - किन्तु उन्हें क्या पता कि स्त्री के सारे सुख पैसे से नहीं खरीदे जा सकते...? माना कि आज उसके पास भौतिकता की सभी चीजें उपलब्ध हैं और जो नहीं है वह उसके एक इशारे पर उपलब्ध हो जाता है। किन्तु किसे पता है कि भरे यौवन की दहलीज पर मचलती मंजरी की चाहत क्या है.....? एक क्षण के लिए यदि मान भी लिया जाये कि कोई मंजरी की चाहत को समझता भी है तो क्या अपने समाज की ऐसी व्यवस्था है जो उसे वह सब उपलब्ध करा सके....? 
ओह, स्त्री होना कितना कष्टकर है......? इस बात को मंजरी से बेहतर भला कौन समझ सकता है....? विवाह के बंधन में बंधी मंजरी को आखिर कब तक अपने अरमानों का गला घोंटना पड़ेगा....?  कब तक वह ऐसे ही अधूरी रहेगी.....? किन्तु वह कर भी क्या सकती है....? चुपचाप से सारा गरल पीते हुए जीने को बाध्य है। हर क्षण उसे अपनी इच्छाओं और कामनाओं का गला घोंटना ही पड़ेगा।

किन्तु, हमेशा तो ऐसे जीवन नहीं जिया जा सकता। उसकी अपनी भी तो इच्छायें हैं जिनके साथ वह जीना चाहती है।  सेठ तो उसकी प्यास कभी नहीं बुझा सकता तो क्या वह जीवन भर यूँ ही अधूरी और प्यासी तड़पती रहेगी.....? उसके पति की अक्षमता की सजा वह क्यों भुगते.....? विवाह के बाद से ही उसने स्वयं से बीस वर्ष बड़े सेठ को अपने पति के रुप में हृदय से कभी स्वीकार नहीं किया। सेठ के पौरुषत्व की कमी की बलि वह अपनी जवानी चढ़ाकर क्यों चुकाये....?

नहीं, वह अब और ज्यादा सहन नहीं कर सकती और जब कोई बंधन कैद बन जाये तो उसे तोड़ देना ही ठीक रहता है। पिछले कुछ दिनों से सेठ के नये ड्राइवर के आँखों की भाषा वह बखूबी समझने लगी है। बीस वर्ष का गबरू जवान उसे भी सम्मोहित करने लगा है।

मंजरी ने देखा - सेठ अभी भी नशे में धुत्त गहरी निद्रा में था। वह पलंग से उठी....... बाथरूम में जाकर फ्रेश हुयी......धीमे से दरवाजा खोला और स्वयं तथा सेठ के बीच की लक्ष्मणरेखा को लाँघते हुये ड्राइवर के कमरे की तरफ बढ़ गयी........


अमिताभ कुमार "अकेला"
जलालपुर, मोहनपुर, समस्तीपुर

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