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लघुकथा // मी टू // ज्योत्सना सिंह

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मी टू

स्त्री विमर्श पर जतिन चंद्रा की नई पत्रिका का विमोचन समारोह की गहमागहमी पूरे शबाब पर थी और हो भी क्यूँ न बड़े ग्रूप की पत्रिका थी सभी हाई सोसाइटी प्रोफ़ाइल लोगों का जमावड़ा था। वहाँ एकत्रित हर इन्सान के चेहरे का रंग अनोखा था।एक साहब ने बधाई देते हुए कहा।

“क्या डॉटर को लॉंच कर रहें है इस प्रोजेक्ट से “

“नहीं बेटी का ऐम्बिशन तो आपकी फ़िल्म इंडस्ट्री है और वो सेल्फ़ मेड गर्ल है।बना लेगी अपना मक़ाम।”

तभी कुछ और लोग भी पत्रिका और जतिन चंद्रा के तारीफ़ों के पुल बाधने लगे।

“चंद्रा डियर बहुत सक्सेस रहेगी आपकी मैगज़ीन आज कल नारी विमर्श एक चर्चित टॉपिक है।अरे ये तो बताओ रेप ही छापोगे या कुछ और भी?”

और एक ज़ोरदार ठहाका हाल में गूँज उठा”

“नहीं,नहीं आप कहें तो आपके कारनामे भी छपवा दूँ।”

आँख मारते हुए चंद्रा ने एक कुटिल मुस्कान बिखेरी तभी एक सिने तारिका नशे में लड़खड़ाते क़दमों से आ बोली।

“चंद्रा डीयर ये कस्टिंग क़ाउच और मी टू वाला क़ालम तो बड़ा हाट है।बड़े बड़े नाम है इसमें।”

चंद्रा ने उन्हें एक स्पर्श देते हुए कहा।

“आप कहे तो आपको भी मी टू कहने का मौक़ा दूँ।”

तभी उनकी बेटी ने एक फ़ाइल दिखाते हुए कहा

“पापा! माई ड्रीम्ज़ आर गोइंग टू फ़ुलफ़िल बट आई वॉंट टू से मी टू।”

--

ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर

लखनऊ

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