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कहानी // दांव // महेन्द्र सिंह

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दांव सुबह-सुबह तिकोने पार्क से ढोलकी, मंजीरे, खंजड़ी, घंटी और कीर्त्तनिये चिमटे के बजने की आवाज आने से मेरी नींद खुल गई। प्रभातफेरी के पहले द...

महेन्द्र सिंह

दांव

सुबह-सुबह तिकोने पार्क से ढोलकी, मंजीरे, खंजड़ी, घंटी और कीर्त्तनिये चिमटे के बजने की आवाज आने से मेरी नींद खुल गई। प्रभातफेरी के पहले दिन सेवादारों ने " सतनाम, वाहे गुरू" के उदघोष के बाद गुरू गोविंद सिंह जी के दोहे का गान शुरू कर दिया था -

"जो लड़े दीन के हेत

सूरा सोइ

सूरा सोइ

पुर्जा - पुर्जा कट मरे

कबहुं न छाड़े खेत

सूरा सोइ

सूरा सोइ"..

ढोलकी, मंजीरे, खंजड़ी, घंटी और चिमटे के संगीत से मिल कर 'सूरा सोइ' की सेवादारों के सामूहिक स्वरों में टेक मन में ओज एवं उत्साह भर दे रही थी। थोड़ी देर बाद, "वाहे गुरू, वाहे गुरू"की टेक का आना शुरू हो गया। सिक्खों की प्रभातफेरी हमारी इमारत से आगे निकल गई।

नौ-सवा नौ के करीब घर के दरवाजे पर ताला लगाने के बाद मैं बख्शी साहब का हाथ पकड़ कर सीढ़ियां उतरने लगा। वह अपनी लाठी के सहारे मेरे साथ-साथ एक-एक सीढ़ी उतरते जाते थे। पांच मिनट में हम पुलिया पर पहुंच गए। संयोग से विक्रम हमें तुरंत मिल गया। विक्रम चालक बाजार के रास्ते से आटो को ले जा रहा था। यह मुख्य सड़क से थोड़ा छोटा रास्ता था। पर इसमें भीड़ बहुत रहती थी। इस पर बख्शी साहब ने कहा -

"बेटा बाज़ार वाला रास्ता मत पकड़!"

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आटोचालक थोड़ा जल्दी में था। वह नाराज़गी जताते हुए बोला - "उस रास्ते के दस रुपये फालतू लगेंगे!"

"काके, जिंदा रहेगा तब न पैसे लेगा..। "

बख्शी साहब की टिप्पणी इतनी सटीक थी कि आटोचालक से कुछ कहते न बना। आटोरिक्शा अस्पताल के दरवाजे के सामने रूक गया। मैं उसका किराया देने लगा। पर बख्शी साहब ने मुझे रोक दिया। बख्शी साहब आटोचालक को उसकी मांग के अनुसार किराए से दस रुपये अधिक देते हुए बोले - "रख ले बेटा.. तुझे भी अपने बीवी - बच्चों को पालना है।" आटोचालक बख्शी साहब को कृतज्ञ दृष्टि से देखते हुए आगे चला गया।

वैष्णवी के पापा अस्पताल के गलियारे में बिजूका की तरह खड़े हो रखे थे। उन्हें देख कर मुझे उनके घर में आए आई.सी.आई.सी.आई. के एजेंट का ध्यान आ गया। मैं दीपक जी से बोला - "सुबह आपको कोई एजेंट पूछ रहा था। पर आपके घर पर ताला लगा हुआ था।" इस पर वह बोले - "शायद, मां - बाबूजी छत पर बैठे होंगे। "

दीपक अग्रवाल निराश तो थे ही, अपने मन का गुबार निकालते हुए वह कहने लगे - "कुछ समझ में नहीं आ रहा है। एक परेशानी दूर होती है, तो दूसरी आ खड़ी हो जाती है। हमने तो थोड़ी - बहुत दुनिया देख ली है। इसमें हमसे कोई न कोई गलती हुई ही होगी। पर इसकी सज़ा हमारी बेटी को क्यों मिल रही है? इसमें इस बेचारी नन्हीं सी गुड़िया का क्या कुसूर है? इसने ऐसा कौन सा पाप कर दिया कि भगवान इसको इतनी बड़ी सज़ा दे रहे हैं। जो भी दुख उन्हें देना चाहिए था, मुझे देना चाहिए था। मेरी बेटी को वह क्यों कर दुख दे रहे हैं? लोग - बाग पता नहीं ऐसा क्यों बोलते हैं कि बच्चों में भगवान बसते हैं!"

अग्रवाल जी के निराशाजनक विचार सुन कर बख्शी साहब एक बुजुर्ग की हैसियत से समझाते हुए उनसे कहने लगे-

"न राजे कुफ़्र नहीं बोलते!"

"मेरा जीवन तो राख हो रहा है!"

"बेटा, यह सब तो हुक्म से होता है! हुक्म से ही लोगों को सुख - दुख मिलता है। दुख मिलने पर घबराना नहीं चाहिए। "

"नौकरी का कोई ठिकाना है नहीं और ऊपर से यह मुसीबत और गले आन पड़ी है।"

"बेटा, तू चिंता न कर। अभी तो मैं हूं न ... ये भी तो मेरी पोती जैसी ही है। "

"पोती" कहते - कहते बख्शी साहब की आंखें भर आईं। उनकी भरी आंखें देख कर वैष्णवी के पापा भी भावुक हो गए।पर अचरज की बात है कि लाख चाहने के बावजूद उस समय मेरी आंखें छलकी नहीं। मेरी परदुखकातरता को यह क्या हो गया था? मेरे सामने ही बख्शी साहब तन, मन और धन से वैष्णवी का उपचार करने के लिए प्रतिश्रुत हो गए थे और मैं अपनी ओर से उन्हें कोई पेशकश करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पा रहा था।

अस्पताल में हमारा पूरा दिन खर्च हो गया था। मैं आटोरिक्शा में बैठे हुए यही सब सोच रहा था कि बख्शी साहब ने मुझे तंद्रा से बाहर निकालते हुए कहा - "बेटा, गुरुपरब आनेवाला है। अखंडपाठ का इंतज़ाम भी करना होगा।"

बख्शी साहब की बात सुन कर मेरा मन सिकुड़ गया।

हमारी कालोनी में बंगाली, बिहारी, राजस्थानी, पहाड़ी और स्थानीय लोग रहते थे। इनके बाद सिक्खों की संख्या अधिक थी। सिक्खों ने अपनी संस्कृति की पहचान अलग से बना कर रखने का प्रयास शुरू से किया था। वह अपने गुरूओं से जुड़े हुए उत्सवों को श्रद्धा एवं उल्लास से मनाया करते थे। गुरू अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस पर सिक्ख शर्बत बांटा करते थे। कार्त्तिक का महीना आने वाला था। इस महीने में ही गुरुनानक देवजी का प्रकाशोत्सव था। गुरुपरब से तीन सप्ताह पहले उन्होंने प्रभातफेरी निकालना शुरू कर दिया था। गुरुपरब के दिन प्रभातफेरी का निकलना बंद हो जाता था। पवित्र दिवस से तीन दिन पहले अखंड पाठ शुरू हो जाया करता था। इसी दिन पंच प्यारे गुरुग्रंथ साहिब को फूलों से सजा कर जुलूस निकाला करते थे। साथ में धार्मिक संगीत बजता रहता था। कड़ा प्रसाद भी बांटा जाता था। सेवादार गुरुग्रंथ साहिब के जुलूस स्थल की सफाई करते रहते थे। कुछ लोग अपने युद्ध कौशल का परिचय देने के लिए तलवारबाजी और लाठी भी चलाते रहते थे। लंगर का आयोजन भी दिल खोल कर किया जाता था।

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घर आने पर हमेशा की तरह आटोरिक्शा का भाड़ा बख्शी साहब ने दिया। साढ़े सात बज गए थे। विनी घर में लौट आई थी। उसके पास दरवाजे की दूसरी चाबी थी जिससे उसने दरवाजा खोल लिया था।

रात को आपात बैठक में लाला मुकेश, सुरेश जी, वैष्णवी के दादा, राजेन्द्र जी, रावत जी, सपना और मिसेज मालती अग्रवाल के सामने प्राधिकरण के साथ चल रहे अपने 90 मीटर के कॉर्नर प्लॉट के पचड़े की आड़ में नवमी को जागरण कराने की अपनी विफलता को छिपाने का मैंने भरसक प्रयास किया। पर मेरी आपबीती सुन कर लाला मुकेश ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा -"आप घर के लफड़े में उलझे रहे और उधर सरदारों ने प्रभातफेरी निकालनी भी शुरू कर दी।"

"यही तो हमारी कौम की समस्या है। हममें एका नहीं है।" वैष्णवी के दादा ने अफ़सोस प्रकट करते हुए कहा।

"आप यूं ही टसुए बहाते रहिए और वे गुरुद्वारे के लिए ज़मीन भी हासिल कर लेंगे।" मैंने तड़का लगाते हुए कहा।

"मिश्रा जी ठीक कह रहे हैं। हमारी आपस की अनबन का फ़ायदा वे लोग उठा रहे हैं।कल तो बख्शी साहब डेलीगेशन ले कर कमीश्नरी में जाने वाले हैं। " लाला मुकेश ने उन्हें जानकारी देते हुए कहा।

"अच्छा, इसलिए वे लोग टाटा सूमो, क्वेलिस और टेम्पो हायर करने की बात कर रहे थे..।" मैंने बख्शी साहब के साथ हुई सुबह की बात को दोहराहते हुए कहा।

"जी हां..। " मुकेश जी बोले।

"अब हम भी उनसे पीछे नहीं रहेंगे।"

रात्रि बैठक का नतीज़ा यह निकला कि मंदिर निर्माण हेतु युद्ध स्तर पर सभी लोगों ने कार्य भी शुरू कर दिया। वैष्णवी के दादा अपनी शाखा में चंदा - पुस्तिका ले जाने लगे । लाला मुकेश अपने धनाढय ग्राहकों से मंदिर के लिए चंदा लेने लगे । सपना ने स्थानीय केबल चैनल पर मंदिर बनाने का विज्ञापन डलवा दिया। केबल चैनल पर एक छोटी सी बाई-लाइन आने लगी जिसमें हमारी कालोनी में मंदिर बनाये जाने का संकल्प व्यक्त किया गया होता था और उसमें लिखा होता था - "मंदिर निर्माण के लिए भक्तजन कृपया दिल खोल कर दान करें। "मिसेज अग्रवाल कालोनी की इमारतों में जा - जा कर चंदा जुटाने लगीं। रावत जी और राजेन्द्र जी अपने - अपने दफ्तरों में चंदे की पुस्तिकाएं ले जाने लगे। उन्होंने अपने नाते - रिश्तदारों और यार - दोस्तों से मंदिर के लिए चंदा वसूलना शुरू कर दिया। इस धार्मिक कार्य के लिए मैंने अपने संपर्क सूत्रों का इस्तेमाल करना आरंभ कर दिया। हम सब चंदा एकत्र किए जाने की प्रगति से संतुष्ट थे। अपनी योजना के मुताबिक मैंने स्थानीय बैंक में ट्रस्ट का खाता खुलवा दिया। बैंक के वित्तीय लेन - देन पर मेरे, वैष्णवी के दादा जी और सुरेश जी के हस्ताक्षर होने लगे।

वैष्णवी के पापा की ग़ैरहाज़िरी में आई.सी.आई.सी.आई. का एजेंट दो - तीन बार और आया। हर बार उसे उनका घर बंद पड़ा हुआ मिलता था। हमें यह थोड़ा - बहुत अनुमान हो गया था कि मामला क्रेडिट कार्ड की पेमेंट या फिर होम लोन की अदायगी का हो सकता है। मगर इस बारे में हमारी वैष्णवी के पापा से कोई बातचीत नहीं हो पाई थी। इसलिए, हम भी विश्वसनीय रूप से कुछ नहीं कह सकते थे। मगर एजेंट के घर का चक्कर लगाने की बात जान कर वैष्णवी के दादा जी के गाल पर अचरज के थप्पड़ तड़ातड़ पड़ने लगे। उनका चेहरा लाल हो गया। फिर अचानक वैष्णवी के दादा जी को इलहाम हो गया कि उनके पास चंदे के पैसे पड़े हुए हैं और जिंदा रहना ज्यादा जरूरी है! सुदिन आने पर डांड भर कर माफी मांगी जा सकती है! इसके बाद वैष्णवी के परिवार के सदस्यों ने स्वयं को नज़रबंद कर लिया। अब उसके दादा यदाकदा ही शाखा में जाते थे। चंदे की उगाही का उनका काम सुस्त पड़ने लगा। वैष्णवी के पापा ने दाढ़ी रखना शुरू कर दिया। उनकी आंखों में खौफ़, असुरक्षा, लाचारगी और अपमान के मिले - जुले दृश्य बार - बार आने - जाने लगे। फिर धीरे - धीरे वैष्णवी के घर में से चीज़ें कम होने लगीं। किसी दिन उसके घर से फ्रिज, टी.वी. और अलमारी जाते हुए दिखते, तो कभी पलंग, ड्रेसिंग टेबल आदि भागते हुए नज़र आते। अंत में एक दिन ऐसा भी आया जब वैष्णवी के घर के दरवाजे के बाहर एक बड़ा सा ताला टंग गया। उनके औचक प्रस्थान के कुछ दिनों के बाद हमें पता चला कि दीपक अग्रवाल उर्फ वैष्णवी के पापा औने - पौने दामों में अपना मकान स्थानीय प्रापर्टी डीलर को बेच कर चले गए हैं...चंदे की पुस्तिका भी वैष्णवी के दादा अपने साथ ले कर चलते बने थे।

वैष्णवी के परिवार के रहस्यमय परिस्थिति में कालोनी से गायब हो जाने पर मैंने वैष्णवी के दादा के खिलाफ़ पुलिस थाने में शिकायत दर्ज़ करवा दी। इस आशय की सूचना कालोनी के प्रमुख स्थलों पर भी चिपका दी गई। फिर मैं मुकेश जी और राजेन्द्र जी को अपने साथ लेकर सुरेश जी के घर गया और उन्हें ट्रस्ट के बैंकिंग लेन-देन की शक्तियां आपस में बांटने के लिए बड़ी मुश्किल से शीशे में उतार पाया। इस तरह मैं नाग की तरह फन फैला कर ट्रस्ट के खातों की भी रक्षा करने लगा।

चैत्र नवरात्र के ठीक एक सप्ताह पूर्व तिकोने पार्क में सुबह-सुबह घंटी बजने लगी। अभी थोड़ी देर पहले हमारी कालोनी के बच्चे तिकोने पार्क में खेल रहे थे। पार्क में बच्चों ने एक छोटा सा चबूतरा बना दिया था। उन्होंने उस पर हनुमान जी की फोटो रख दी थी। एक मोटा - ताजा लड़का हनुमान बना हुआ था। वह जय श्री राम का उदघोष करता जा रहा था। इसके कुछ समय बाद मुकेश लाला अपनी दुकान से निकल आए । वह हनुमान जी की फोटो के सामने धूपबत्ती जला कर हनुमान चालीसा का पाठ करने लगे। घंटी का स्वर सुन कर हम लोग भी अपने-अपने घरों से निकल आए । करम सिंह और करतार सिंह भी पार्क की ओर चले आए। पर लाला मुकेश पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा। वह अपनी पूजा - अर्चना में लगे रहे। पूजा करने के बाद वह हनुमान जी की फोटो के सामने नतमस्तक हुए और पार्क में बैठ गए। उनके साथ-साथ मैं, सुरेश जी और मेरे दल के अन्य सदस्य भी तिकोने पार्क में बैठ गए।

मेरे प्लॉट में पिछली रात को ईंटें रख दी गई थीं। कुछेक कारसेवक वहां से ईंटें लाने लगे। देखते ही देखते पार्क में ईंट, रोड़ी, बजरी और सीमेंट का ढेर लग गया। पूजा के लिए जो अस्थाई चबूतरा बनाया गया था, उसे यथावत बने रहने दिया गया। तिकोने पार्क में काफी संख्या में लोग उपस्थित होने लगे। मैं लाला मुकेश, सुरेश जी, रावत जी और राजेन्द्र जी के साथ भावी रणनीति पर विचार करने लगा। राजमिस्त्री ने मिट्‌टी खुदवाने का काम शुरू करवा दिया। मजदूर बड़ी मुस्तैदी से ज़मीन खोदने लगे और मिट्‌टी एक तरफ फेंकने लगे। उन्हें आज लगभग तीन फुट की गहराई तक चौरस आकार में ज़मीन खोद डालनी थी। इसके बाद राजमिस्त्री को चबूतरा पक्का करने के काम में लगना था। ईंटों, सरियों और सीमेंट की गुणवत्ता पर लाला मुकेश की मुहर लग ही चुकी थी। निर्माण कार्य के लिए पानी की अस्थाई व्यवस्था मुकेश लाला और सुरेश जी ने कर दी थी। आगे से पानी का टैंकर नियमित रूप से आने की बात भी तय की जा चुकी थी। मैं मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाने की जिम्मेवारी पहले ही उठा चुका था। बस, अब मैंने अपनी महत्वाकांक्षी योजना पर अमल करना आरंभ किया था।

घर से सीढ़ियों से उतरते समय पार्क की गतिविधियों के बारे में बख्शी साहब ने मुझसे जानकारी हासिल करने का प्रयत्न किया था। पर मैंने उनकी जिज्ञासा का शमन करने के बजाए उनकी उपेक्षा करना श्रेयस्कर समझा। बख्शी साहब को यह बात अखर गई कि मैंने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। पहला ख़्याल उनके मन में यह आया कि हो सकता है कि मैं अपनी पत्नी की सेहत को ले कर चिंतित हो रखा हूं। इसलिए, मैंने उनकी बात पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। लेकिन, उन्होंने तो सिर्फ़ पार्क में चल रही गतिविधियों के बारे में मुझसे जानना चाहा था। उन्होंने कोई अनर्गल बात तो मुझसे नहीं पूछी थी। मैंने हमेशा उनके साथ पुत्रवत व्यवहार किया था। मैं गाढ़े समय में बख्शी साहब के काम आता रहा था। फिर मेरा व्यवहार इतना कटु भी न था कि वह उसे दिल पर ले लेते। किन्तु, घर में खाली बैठे रह कर उधेडबुन करते रहने से कहीं अच्छा था कि पार्क में पहुंच कर स्वयं वस्तुस्थिति का जायजा लिया जाए। इसलिए, धीरे - धीरे सीढ़ियों से उतर कर बख्शी साहब पार्क में पहुंच गए।

बख्शी साहब के निर्माण स्थल पर आ जाने से एक तनाव वहां पर पसर गया। बख्शी साहब को सामने आया देख कर मैं झेंपने लगा था। मैं उनसे आंख नहीं मिला पा रहा था। मुझे यह लग रहा था कि वह मुझसे यह पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूंगा कि बेटा! मंदिर निर्माण का कार्य शुरू करने की बात तुमने मुझसे क्यों कर छिपाई? तुमने मेरा विश्वास तोड़ डाला क्योंकि तुम यह बात अच्छी तरह से जानते थे कि मैं कमीश्नरी के चक्कर इसलिए लगा रहा था ताकि गुरूद्वारे के लिए ज़मीन हासिल कर सकूं। तुमने ऐन वक्त पर मुझे धोखा क्यों दे दिया? मेरे जीवन की यह साध लगता है कि अब कभी पूरी नहीं हो पाएगी। तुमने मुझे जीते जी मार डाला। तुममें मैं अपने मृत बेटे की छवि देखा करता था और तुमने ही मेरे साथ इतना बड़ा छल कर डाला।

लाला मुकेश वैसे ही बख्शी साहब से खार खाया करते थे। उन्हें बख्शी साहब की उपस्थिति से बहुत कोफ़्त हो रही थी। मेरी योजना यह थी कि जल्दी से जल्दी मंदिर का ढांचा तैयार कर दिया जाए। एक बार ढांचा बना दिए जाने पर उसका ध्वंस करना आसान न होगा। ढांचे के बिना मेरी भावी योजनाओं का कोई अर्थ न था। मेरी तरह लाला मुकेश भी जलते हुए चूल्हे में अपनी रोटियां सेक लेना चाहते थे। उनकी महत्वाकांक्षा मेरी जितनी बड़ी न थी, पर इसमें उन्हें अपने पौ बारह होते हुए नज़र आ रहे थे। सुरेश जी भी कढ़ाई में अपना सिर डुबो देना चाहते थे।

सुरेश जी और लाला मुकेश बख्शी साहब के पास आ कर खड़े हो गए थे। उनकी अनदेखी करते हुए बख्शी साहब ने मुझसे पूछा - "पुत्तर, तू मुझसे नाराज़ हो गया सी।"

बख्शी साहब की संयमित आवाज से प्रभावित हो कर मजदूर काम छोड़ कर खड़े हो गए और हमें देखने लग गए। मैंने उनकी बात का जवाब देते हुए कहा -

"मैं भला आपसे क्यों कर नाराज़ होने लगा?"

"पुत्तर फिर तूने मेरी बात का जवाब क्यों नहीं दिया? "

करम सिंह समेत कई सिक्खों ने बख्शी साहब को वहां पर खड़ा हुआ देख कर कयास लगाया कि वह किसी गलत बात का विरोध कर रहे हैं। वह उनका साथ देने के लिए पार्क में आ गए।

बख्शी साहब की आत्मीयता से मैं अपनी ही नज़रों में गिर गया था। मेरी हालत पतली होती जा रही थी। मुझे संभालने और अपना रंग दिखाने के इरादे से सुरेश जी बीच में ही बोल पड़े -

"हम यहां पर मंदिर बना रहे हैं। तुम्हें जो करना है, सो कर लो। "

सुरेश जी का तेवर इतना उग्र था कि उनकी ज़बान से निकली चिंगारियां उड़ते - उड़ते युवा सिक्ख करम सिंह के ज़हन को सुलगाने लग गईं। जवानी का खून गर्म होता है। वह तैश में आ कर विवेकशून्य आचरण करने लगता है। तब वह नतीज़ों की परवाह नहीं करता। उस पल विशेष में परिणामों की खबर रखना और लेना फ़िजूल हो जाता है। यह तो बुजदिलों का काम होता है। ऐसे में करम सिंह को चंद युवा सिक्खों को अपने साथ ले कर ज़ंगे - मैदान में कूद पड़ने में कितनी देर लगती -

"ओए तू रौब किसे दिखा रहा है? तू मुझसे बात कर। मैं अभी तेरी बोटी खींच कर निकाल लेता हूं। "

इस समय शांति, धैर्य व संयम से काम लिया जाना चाहिए था। बख्शी साहब ने अपने अनुभव की थाती का इस्तेमाल करते हुए करम सिंह को शांत करने के इरादे से कहा -

"करमा! तू गर्मी मत दिखा पुत्तर।"

पर करमा के सिर पर ज़ुनून सवार हो चुका था। वह बख्शी साहब की बात का जवाब देते हुए बोला - "आप देख नहीं रहे हैं कि यह सुरेश किस तरह से बोल रहा है। पब्लिक प्रापर्टी में मंदिर बनाने चले हैं। पूछो, इससे हमारे बच्चे फिर कहां पर खेलने जाएंगे ?"

"बेटा तू शांत हो जा।" फिर बख्शी साहब गुरु नानक देव जी के एक दोहे को उद्धृत करते हुए बोले -

नानक नन्हे हो रहे, जैस नन्हीं दूब।

और घास जरि जात है, दूब खूब की खूब। ।

बख्शी साहब करमा को समझा रहे थे। लेकिन करतार बीच में हस्तक्षेप करते हुए बोल पड़ा -

"यह बकत दूब बने रहने का नहीं है। शूल हाथ में ले कर दुश्मन का सफाया करने का है। ये लोग समझ रहे हैं कि संख्या में ज्यादा होने के कारण ये हमें दबा देंगे। पर ये लोग यह नहीं जानते कि एक सिक्ख सवा लाख के बराबर होता है।"

बातों ने विवेकहीनता की सीमा लांघ ली थी। करतार सिंह की ललकार सुनकर सुरेश जी के कारिंदे भला कैसे खामोश रह सकते थे। इस स्थिति का पूर्वानुमान लगा कर उन्होंने कुछ युवाओं को पहले ही से तैयार करके रखा हुआ था। उन्हें भी अपनी जवानी का जोश दिखाने के लिए एक मंच सहज रूप में मिल रहा था। वह कैसे इस मौके को हाथ से जाने देते? जवानी की एक छोटी सी गलती ने पहले गाली - गलौज और फिर हाथापाई का रूप ले लिया। सुरेश जी के कारसेवकों और करम सिंह के हिमायतियों के बीच सिरफुटव्वल और जूतमपैजार होने लगा। देखते ही देखते तिकोने पार्क में खून के छींटे बिखरने लगे। शांति के पैरोकार बख्शी साहब को भी लगे हाथ एक शोहदे ने धक्का दे डाला जिससे वह पार्क की ज़मीन पर गिर गए।

सुरेश जी को स्थिति की गंभीरता का अहसास था। वह किसी भी सूरत में उसे पुलिस की जद से बाहर रखना चाहते थे। हाथापाई और मारकुटाई के बाद की स्थिति कहीं अधिक विस्फोटक हो सकती थी। इसलिए, सुरेश जी का साधु दल सामने आ गया। इसका नेतृत्व मैं कर रहा था। सबसे पहले मैंने बख्शी साहब को उठाया। साधु दल के कुछ सदस्य सुरेश जी के कारसेवकों एवं करमसिंह के साथियों के झगड़े को छुड़ा कर बीच - बचाव करने लग गए। हाथापाई बंद होने पर वाक्‌युद्ध शुरू हो गया। दोनों पक्षों की महिलाओं के बीच आरोपों - प्रत्यारोपों का सिलसिला चलने लगा। एक पक्ष की महिला कहती कि यहां पर मंदिर बनेगा, तो फिर हम अपना कीर्त्तन दरबार कहां पर लगाएंगे? हमारे बच्चे पार्क में नहीं तो और कहां पर खेलेंगे? इस पर दूसरे पक्ष की महिला का जवाब आता कि ये लोग तो सुबह - सुबह प्रभातफेरी निकालने लगते हैं। हमारी नींद खराब होती है। अपने मामले में सब सही है, फिर हमें क्यों रोकते हो? हम तुमसे कोई मदद थोड़े मांग रहे हैं। मैंने बख्शी साहब की लाठी बनने का प्रयत्न किया। लेकिन उनकी आंखों में छाई निराशा व हताशा तथा मातमी चेहरे ने मुझे पीछे धकेल दिया। वह लंगड़ाते - लंगड़ाते अपने फ्लैट की ओर चल दिए।

सुरेश जी पर लगाया गया मेरा दांव सही लग गया था। सुरेश जी ने पहली लड़ाई जीत ली थी। आज का सारा काम उनकी योजना के मुताबिक हुआ था। हमारे कारसेवक तिकोने पार्क की मुस्तैदी से निगरानी करने लगे थे। तिकोने पार्क के आस - पास और इमारतों की छतों पर खड़ी भीड़ में मंदिर निर्माण को ले कर चल रही रस्साकस्सी पर बहस होती रही। कालोनी में रहनेवाले समस्त सिक्खों के मन में असंतोष, नाराज़गी, वैमनस्य और शत्रुता के बीज बो दिए गए थे। कोई भी यह महसूस कर सकता था कि खुशनुमा माहौल में जहरीली हवाएं घुलने लगी हैं। बख्शी साहब के जीवन की आस्था खंड - खंड हो चुकी थी। तिकोना पार्क उनकी खंडित आस्थाओं और स्वप्नों का मक़बरा बन चुका था। कालोनी के हालात अनायास ही यह बयान करने लगे थे कि उनकी अनुपस्थिति में ऐसा कुछ घटित हो चुका है जिसकी भरपाई करना संभव नहीं है।

अपने फ्लैट में लौटते वक्त बख्शी साहब के कदम नहीं उठ पा रहे थे। मन का बोझ उठा पाने में देह असमर्थता महसूस कर रही थी। विनी और मेरे प्रति उनका हमेशा से खास लगाव रहा था। वह मुझमें अपने बेटे सुरजीत और विनी में अपनी बहू दीपाली की छवि देखा करते थे। वह मुझसे कहा करते थे कि अगर 84 के दंगों में सुरजीत मरा न होता, तो वह आज तुम्हारे जितना होता। वह भी तुम्हारी तरह लंबा, छरहरा और शर्मीला युवक था। वह अपने बहू - बेटे को सुर (जीत) + दीप (दीपाली) = सुरदीप कह कर बुलाया करते थे। उनकी पत्नी सुरिन्दर की खाली जगह तो कोई भर न सका था, लेकिन वैष्णवी ने आ कर उनकी पोती मुस्की की कमी पूरी कर दी थी। मुस्की हर दम मुस्कराती रहती थी। इसलिए, उन्होंने उसका नाम मुस्की रख दिया था। विनी, वैष्णवी और मुझमें वह अपने परिवार की तस्वीर देख कर संतुष्ट हो जाया करते थे। उसी तस्वीर के आज टुकड़े - टुकड़े हो गए थे। आखिर पराया, पराया ही होता है। वह कभी अपने पेट के जाये की जगह नहीं ले सकता।

बख्शी साहब अपने घर का दरवाजा खोल कर अंदर आ गए थे। उन्हें इस बात का कोई होश न था कि दरवाजा खोलने के बाद बंद भी करना होता है। कमरे की बत्ती जला कर वह अलमारी में रखी हुई एलबम उठा कर ले आए। उनके नयनों से अश्रुधारा बह रही थी। उनकी आंखें एलबम में गढ़ी हुई थीं। वह 31 अक्तूबर, 1984 को अपने भतीजे की शादी के सिलसिले में पंजाब गए हुए थे। दिल्ली में उनकी पत्नी, बहू , बेटा और पोती पंजाबी बाग में मेंहदी रात में गए हुए थे। उस दिन सुबह 9 बज कर 20 मिनट पर देशा की राजधानी दिल्ली में एक बहुत विशालकाय बरगद का पेड़ गिर गया था। उसके नीचे हजारों नव-पल्लवित एवं नव-पुष्पित पौधे आ कर कुचले गए थे। आज उसी दुर्घटना की याद आ जाने पर उनके शरीर के रोएं खडे हो गए थे। उन्हें रह रह कर अपनी पत्नी, अपनी बहू, अपने बेटे और अपनी पोती का आर्तनाद सुनाई दे रहा था। फिर दिन्ली पर बुलडोजर चलने लगे थे। आग में घी डालने का काम अफवाहों ने कर दिया था। हथियारों और मिठाई की सांठ-गांठ ने मातम फैला दिया था। दिल्ली में कर्फ्यू लगा दिया गया था और दिल्ली में फौज़ियों के बूटों की चाप सुनाई देने लगी थी।

हालत की नज़ाकत को भांपते हुए मेंहदी रात के कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया। दंगे की उस भयावह रात को सुरदीप, सुरिन्दर और मुस्की खतरा उठाते हुए मयूर विहार स्थित अपने घर के लिए निकल पड़े। रात में जब वह घर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उनके दरवाजे पर क्रास का चिह्न बना दिया गया है। सुरजीत को खतरा भांपते हुए देर न लगी। इस हालत में वह कुछ भी नहीं कर सकता था। उसने सभी को घर के अंदर बंद कर दिया। रात में दंगाई अपने नापाक़ इरादे को अंज़ाम देने के लिए आ पहुंचे। उनके हाथों में लोहे की छड़ें थीं। पेट्रोल था। मिट्‌टी का तेल था। दंगाइयों ने बख्शी साहब के घर का दरवाजा पीटना शुरू कर दिया। थोड़ी देर में उग्र भीड़ ने उनके घर का दरवाजा तोड़ डाला। दरवाजे के टूटते ही दंगाइयों ने सुरजीत का स्वागत लोहे की छड़ों से किया। उसके सिर पर छड़ों की बौछार होने लगी। सुरिन्दर अपने बेटे को बचाने के लिए दौड़ी, तो उन नरपिशाचों ने उसके सिर पर भी वार करना शुरू कर दिया। उन्होंने उसके सिर से चुन्नी भी उतार कर फेंक दी । दंगाइयों के मंसूबे को दीपाली ने भांप लिया था। उसने स्वयं को अपने बैड रूम में बंद कर लिया। जब दंगाई उसके शयनकक्ष का दरवाजा तोड़ पाने में सफल नहीं हो पाए , तो उन्होंने कमरे में पेट्रोल छिड़क दिया। इस तरह दीपाली और मुस्की को आग में जिंदा जला दिया गया .. । क्षण भर में बख्शी साहब का पूरा परिवार दंगे की भेंट चढ़ गया। सुरजीत और सुरिन्दर के क्षत - विक्षत शव कमरे में पड़े रहे। दीपाली और मुस्की की तो बस राख से ही उन्हें संतोष करना पड़ा। बख्शी साहब के नेत्रों से आंसुओं की धार यथावत बहती चली जा रही थी। आजादी के 37 वर्षों बाद देश की राजधानी में हुए दंगों में उनका परिवार होम हो गया था और वह तिल - तिल कर मरने के लिए छोड़ दिए गए थे। उन्होंने किसी तरह से इस सदमे से अपने को उबार लिया था और वह धर्म - कर्म के कामों में व्यस्त हो गए थे। पर आज उनका वह स्वप्न भी चकनाचूर हो गया था। बख्शी साहब बहुत ज़ब्र कर रहे थे। दर्द हद से गुजरा जा रहा था और बीमारे दिल पर कोई दवा असर नहीं कर पा रही थी.. और अंत में एक क्षण ऐसा भी आया जब तीव्रता इतनी बढ़ गई कि हुचक के रूप में उनकी जिह्वा से निकल पड़ी"ऊई!".. .. और फिर उनकी गर्दन दांई ओर लुढ़क गई।

मालती भाभी और विनी ने अस्पताल से लौटते हुए अस्त-व्यस्त हालत में बख्शी साहब को जाते हुए देख लिया था। विनी ने तिरछी नज़रों से यह भी देख लिया था कि मैं पार्क में खड़ा हुआ हूं। मालती भाभी ने एक बार बख्शी साहब से पूछा भी - "पापा जी .. तबीयत ठीक नहीं है ?" मगर उन्होंने भाभी जी की बात का कोई जवाब नहीं दिया। वे दोनों जब बख्शी साहब के कमरे में घुसे, तो उन्होंने देखा कि बख्शी साहब सोफे पर एलबम ले कर बैठे हुए हैं तथा उनकी गर्दन दांई ओर को झुकी हुई है। अंत समय में बख्शी साहब को पानी तक नसीब नहीं हो पाया था। बख्शी साहब की मृत देह को देख कर मालती भाभी की ज़बान से बरबस निकल पड़ा - "पापा जी..।" तत्पश्चात, मालती भाभी ने उनकी गोद में रखी हुई एलबम हटा कर टेबल पर रख दी। उन्होंने फर्श की सफाई कर दी। फिर, मालती भाभी और विनी, दोनों ने मिल कर उन्हें फर्श पर लेटा दिया। विनी मन ही मन सोच रही थी कि आज उसके सिर पर से पिता का साया उठ गया।

बख्शी साहब की मृत्यु की खबर सुन कर पडोसी उनके फ्लैट में एकत्र होने लगे थे। तिकोने पार्क में भी यह खबर पहुंच गई थी। मगर मैं अभी भी कार सेवकों के साथ तिकोने पार्क में खड़ा हुआ था।

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महेन्द्र सिंह

जन्म : 22 जून, नई दिल्ली

भाषा: हिन्दी (एम.ए.), दिल्ली विश्वविद्यालय ।

पुस्तक: शोर मचाए शोर (पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पुरस्कृत); डूबता सूरज (हिन्दी अकादमी के सहयोग से प्रकाशित काव्य संकलन)।

पुरस्कार : हिन्दी अकादमी की आशुलेखन कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार।

प्रतिनिधि कहानियां : दीया बनाम तूफान ('हाशिये पर भविष्य' विशेषांक नया ज्ञानोदय); कहानी 'क'' और कहानी 'ख' (नया ज्ञानोदय); नाटक जारी है (हंस); मैं पावेल नहीं हूं (पाखी); एक्वेरियम (कथाक्रम); जाननिसारी (परिकथा, जनवरी-मार्च 2017); भोर का तारा (कथाक्रम, अप्रैल-जून, 2017), पॉलीथीन की थैली (दुनिया इन दिनों), दांव (कथाक्रम, अप्रैल-सितम्बर, 2018)

संप्रति : संयुक्त-निदेशक, राज्य सभा सचिवालय ।

संपर्क : फ्लैट नं. ए-8, राज्य सभा आवास, आई.एन.ए. कालोनी, नई दिल्ली-110023

ई-मेल : 226amahenku1969@gmail.com

फेसबुक: singhm403@yahoo.in

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कहानी // दांव // महेन्द्र सिंह
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