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हास्य - व्यंग्य // क्रीम नहीं, डिब्बी बिकती है // सुरेश खांडवेकर

सुरेश खांडवेकर


आपने दो तीन किश्तों में पैकेजिंग के बारे में पढ़ा। व्यंगाराम क्या जाने पेकेजिंग की बारीकियां! यहां तो आम आदमी से खास बातें होती है। आम आदमी भी खास बातें जानता है और अपनी खास राय रखता है, इसलिए उत्पादक भी अपना माल बेचने के लिए चारों ओर घूमते रहते हैं। एक उत्पादक पिछले 20 सालों से फेस क्रीम बना कर बेच रहा है। उसे दस साल से देख रहा हूं गोरेपन की क्रीम से सांवलापन आ गया। अभी भी उसे अपने उत्पाद पर भरोसा नहीं है, पर पेट के खातिर चलाया उद्योग चल पड़ा। अब रुक नहीं सकता। ग्राहकी लगातार बढ़ रही है।

धड़ाधड़ बिक रही क्रीम की मलाई से डिब्बी ने लगातार नये-नये रूप धारण किये। डिब्बी पिछले दस सालों में दुल्हन की तरह संवरती गयी। आम आदमी भी जानता है कि सब कुछ बेकार है। इसके बावजूद वे कुछ खुद को कभी आसपास वालों को अपनी आधुनिकता और शौकीन मिजा़ज़ का दिखावा करता है। ड्रेसिंग टेबल तो आम आदमी के पास होता ही नहीं, बेचारा एक शीशे को ही अपना सब कुछ समझता है और वही उसके सामने श्रृंगार के साधन होते हैं। जिसमें और चीजों के अलावा परफ्रयूम्ड क्रीम भी होती है। थोड़ी देर की समझो या दिनभर की समझो चेहरे पर समाजवादी शोषण के बावजूद ताजगी बनी रहती है।

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घने लम्बे बालों वाला तेल बेचते-बेचते उत्पादक खुद के बाल उड़वा लेता है। तो खरीदार की बात छोड़ दो। लेकिन सबकी आस है और आस जैसे बिल्कुल आसपास है। तेल के फार्मूले में जितना परफ्रयूम का बदलाव हुआ उतना किसी अन्य चीज का नहीं। बदलाव हर साल डिब्बी में हुआ है। यानी 20 सालों में डिब्बी में जो बदलाव हुआ उसे आप देख सकते हैं। दस साल पुराना डिजाईन तो आप पहचान भी नहीं पायेंगे।

यही नहीं क्रीम और तेल की हर दो साल बाद एक स्पेशल क्वालिटी भी बन जाती है, अब फार्मूले में कितना अंतर होता है या इस पर कितने वैज्ञानिक प्रयोग होते हैं इसको तो छोड़ दीजिए। लेकिन डिब्बी बनाने से पहले और बाद में कितनी खोज बिन होती है इसका आपको अन्दाजा नहीं है। इतना ही काफी है कि इस मसले पर उत्पादक, डिजाईनर और प्रिंटर जमीन आसमान एक कर देते हैं। तब कहीं सही नतीजे पर पहुंचते हैं।

खाली वक्त पर लंदन, पेरिस, हांगकांग, मिलान, अमेरिका और न जाने कहां-कहां कि डिब्बियां सामने आ जाती है। एक के बाद एक नमूना पेश किया जाता है और घण्टों बजाय फार्मूले के डिब्बी पर बहस चलती है। डिब्बी की कमी को खोजा जाता है। इसकी स्टाईल अच्छी है, इसकी ये लाईन अच्छी है। इसका ये कलर अच्छा है, लेकिन लंदन की डिब्बी पर फोटो लाजवाब है, हांगकांग की डिब्बी पर फूल की पत्ती गजब की मालूम पड़ती है। अमेरिका की डिब्बी में क्रीम को इस्तेमाल करने के ढंग बहुत अच्छा है। डिब्बी के भीतर रखी पर्ची की बात चली तो सब उछल पड़ते। इतना गजब का चित्रांकन और मेटर की क्या कहने! किसी की लिखावट ली, स्टाईल ली, रंग लिया, ट्यूब लिया। ढंक्कन पर माथापच्ची हुई। भीतर की पर्ची के कागज पर मर गये। ये कागज आयेगा कहां से। किसी से फूल, किसी की पत्ती ली किसी से इलुस्ट्रेशन लिया और अंत में क्रीम की डिब्बी तैयार। हमने उत्पादक से पूछा की क्रीम कैसी है? उसने उछल कर कहा कि अब यह क्रीम सबको पीछे छोड़ देगी। लेटेस्ट फार्मुलेशन से तैयार की है। उसने दो डिब्बियां पेश कि हमने वहीं पर उसकी क्रीम को तर्जनी पर फैलाया, सुंघा और तुरंत कहा, ‘‘आपके पहले वाले क्रीम से इसमें खास फर्क नहीं लगता।’’

उसने बार-बार मुझे समझाया, जताया कि बहुत फर्क है। मैं नहीं माना तब उसने हल्के से समझाया, ‘‘असल में फार्मुलेशन में बहुत माईनर चेंजज होती है, इसे बनाने वाला और बेचने वाला ही समझता है। असल में हमारे देश में क्रीम नहीं बिकती, बिकती है डिब्बी।’’

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