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प्राची अक्टूबर 2018 : धरोहर रानी केतकी की कहानी // सैयद इंशा अल्ला खां ‘इंशा’

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धरोहर रानी केतकी की कहानी सैयद इंशा अल्ला खां ‘इंशा’ आत्मकथ्य यह वह कहानी है कि जिसमें हिंदी छुट और न किसी बोली का मेल है न पुट. सिर झुकाकर ...

धरोहर

रानी केतकी की कहानी

सैयद इंशा अल्ला खां ‘इंशा’

आत्मकथ्य

यह वह कहानी है कि जिसमें हिंदी छुट

और न किसी बोली का मेल है न पुट.

सिर झुकाकर नाक रगड़ता हूं उस अपने बनानेवाले के सामने जिसने हम सब को बनाया और बात में वह कर दिखाया कि जिसका भेद किसी ने न पाया। आतियां जातियां जो साँसें हैं, उसके बिन ध्यान यह सब फाँ से हैं। यह कल का पुतला जो अपने उस खिलाडी की सुध रक्खे तो खटाई में क्यों पड़े और कड़वा कसैला क्यों हो। उस फल की मिठाई चक्खे जो बड़े से बड़े अगलों ने चक्खी है। देखने को दो आँखें दीं और सुनने को दो कान। नाक भी सब में ऊँची कर दी मरतों को जी दान।।. मिट्टठ्ठी के बसान को इतनी सकत कहाँ जो अपने कुम्हार के करतब कुछ ताड़ सके। सच है, जो बनाया हुआ हो, सो अपने बनाने वाले को क्या सराहे और क्या कहें। यों जिसका जी चाहे, पड़ा बके। सिर से लगा पांव तक जितने रोंगटे हैं, जो सबके सब बोल उठें और सराहा करें और उतने बरसों उसी ध्यान में रहें जितनी सारी नदियों में रेत और फूल फलियां खेत में हैं, तो भी कुछ न हो सके, कराहा करें। इस सिर झुकाने के साथ ही दिन रात जपता हूं उस अपने दाता के भेजे हुए प्यारे को जिसके लिए यों कहा है- जो तू न होता तो मैं कुछ न बनाता_ और उसका चचेरा भाई जिसका ब्याह उसके घर हुआ, उसकी सूरत मुझे लगी रहती है। मैं फूला अपने आप में नहीं समाता, और जितने उनके लड़के वाले हैं, उन्हीं को मेरे जी में चाह है। और कोई कुछ हो, मुझे नहीं भाता। मुझको उम्र घराने छूट किसी चोर ठग से क्या पड़ी! जीते और मरते आसरा उन्हीं सभों का और उनके घराने का रखता हूं तीसों घड़ी। डौल डाल एक अनोखी बात का एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढ़ी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिंदणी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो। अपने मिलने वालों में से एक कोई पढ़े-लिखे, पुराने-धुराने, डाँग, बूढ़े
धाग यह खटराग लाए। सिर हिलाकर, मुंह थुथाकर, नाक भी चढ़ाकर आखें फिराकर लगे कहने- यह बात होते दिखाई नहीं देती। हिंदणीपन भी निकले और भाखापन भी न हो। बस जैसे भले लोग अच्छे आपस में बोलते चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँह किसी की न हो, यह नहीं होने का। मैंने उनकी ठंडी साँस का टहोका खाकर झुंझलाकर कहा- मैं कुछ ऐसा बढ़-बोला नहीं जो राई को परबत कर दिखाऊं, जो मुझ से न हो सकता तो यह बात मुँह से क्यों निकलता? जिस ढब से होता, इस बखेडे को टालता। इस कहानी का कहने वाला यहाँ आपको जताता है और जैसा कुछ उसे लोग पुकारते हैं, कह सुनाता है। दहना हाथ मुँह फेरकर आपको जताता हूँ, जो मेरे दाता ने चाहा तो यह ताव-भाव, राव-चाव और कूंद-फाँद, लपट झपट दिखाऊँ जो देखते ही आपके ध्यान का घोड़ा, जो बिजली से भी बहुत चंचल अल्हडपन में है, हिरन के रूप में अपनी चौकड़ी भूल जाए। टुक घोड़े पर चढ़ के अपने आता हूं मैं। करतब जो कुछ है, कर दिखाता हूं मैं उस चाहने वाले ने जो चाहा तो अभी। कहता जो कुछ हूं। कर दिखाता हूं मैं अब आप कान रख के, आँखें मिला के, सन्मुख होके टुक इधर देखिए, किस ढंग से बढ़ चलता हूं और अपने फूल के पंखड़ी जैसे होंठों से किस-किस रूप के फूल उगलता हूँ।

(रचनाकाल : 1800 ई.)

कहानी के जीवन का उभार और बोलचाल की दुलहिन का सिंगार

किसी देश में किसी राजा के घर एक बेटा था। उसे उसके माँ-बाप और सब घर के लोग कुंवर उदैभान करके पुकारते थे। सचमुच उसके जीवन की जोत में सूरज की एक ड्डोत आ मिली थी। उसका अच्छापन और भला लगना कुछ ऐसा न था जो किसी के लिखने और कहने में आ सके। पंद्रह बरस भरके उसने सोलहवें में पाँव रक्खा था। कुछ यों ही सी मसें भीनती चली थीं। पर किसी बात के सोच का घर-घाट न पाया था और चाह की नदी का पाट उसने देखा न था।

एक दिन हरियाली देखने को अपने घोड़े पर चढ़ के अठखेल और अल्हड़पन के साथ देखता भालता चला जाता था। इतने में जो एक हिरनी उसके सामने आई, तो उसका जी लोट पोट हुआ। उस हिरनी के पीछे सब छोड़ छाड़कर घोड़ा फेंका। कोई घोड़ा उसको पा सकता था? जब सूरज छिप गया और हिरनी आँखों से ओझल हुई, तब तो कुंवर उदैभान भूखा, प्यासा, उनींदा, जंभाइयाँ, अँगड़ाइयाँ लेता, हक्का बक्का होके लगा आसरा ढूंढ़ने। इतने में कुछ एक अमराइयां देख पड़ीं, तो उधर चल निकला_ तो देखता है वो चालीस-पचास रंडियां एक से एक जोबन में अगली झूला डाले पड़ी झूल रही हैं और सावन गातियां हैं। ज्यों ही उन्होंने उसको देखा- ‘तू कौन?’ ‘तू कौन?’ की चिंघाड सी पड़ गई। उन सभी में एक के साथ उसकी आँख लग गई।

कोई कहती थी- ‘यह उचक्का है।’

कोई कहती थी- ‘एक पक्का है।’ वही झूले वाली लाल जोड़ा पहने हुए, जिसको सब रानी केतकी कहते थीं, उसके भी जी में उसकी चाह ने घर किया। पर कहने-सुनने की बहुत सी नांह-नूह की और कहा- ‘इस लग चलने को भला क्या कहते हैं! हक न धक, जो तुम झट से टहक पड़े। यह न जाना, यह रंडियां अपने झूल रही हैं। अजी तुम तो इस रूप के साथ इस रव बेधड़क चले आए हो, ठंडे ठंडे चले जाओ।’

तब कुंवर ने मसोस के मलीला खाके कहा- ‘इतनी रुखाइयां न कीजिए। मैं सारे दिन का थका हुआ एक पेड़ की छांह में ओस का बचाव करके पड़ा रहूंगा। बड़े तड़के धुंधलके में उठकर जिधर को मुंह पड़ेगा चला जाऊंगा। कुछ किसी का लेता देता नहीं। एक हिरनी के पीछे सब लोगों को छोड़ छाड़ कर घोड़ा फेंका था। कोई घोड़ा उसको पा सकता था? जब तलक उजाला रहा उसके ध्यान में था। जब अंधेरा छा गया और जी बहुत घबरा गया, इन अमराइयों का आसरा ढूंढ़ कर यहां चला आया हूं। कुछ रोकटोक तो इतनी न थी जो माथा ठनक जाता और रुका रहता। सिर उठाए हां पता चला आया। क्या जानता था - वहां पदिमिनियां पड़ी झूलती पेंगें चढ़ा रही हैं। पर यों बढ़ी थी, बरसों मैं भी झूला करूंगा।’

यह बात सुनकर वह जो लाल जोडे वाली सबकी
सिरधरी थी, उसने कहा- ‘हाँ जी, बोलियां ठोलियां न मारो और इनको कह दो जहां जी चाहे, अपने पड़े रहें, और जो कुछ खाने को मांगें, इन्हें पहुंचा दो। घर आए को आज तक किसी ने मार नहीं डाला। इनके मुंह का डौल, गाल तमतमाए और होंठ पपड़ाए, और घोड़े का हांफना, और जी का कांपना और ठंडी सांसें भरना, और निढाल हो गिरे पड़ना इनको सच्चा करता है। बात बनाई हुई और सचौटी की कोई छिपती नहीं। पर हमारे इनके बीच कुछ ओट कपड़े लत्ते की कर दो।’

इतना आसरा पाके सबसे परे जो कोने में पांच सात पौदे थे, उनकी छांव में कुंवर उदैभान ने अपना बिछौना किया और कुछ सिरहाने धरकर चाहता था कि सो रहें, पर नींद कोई चाहत की लगावट में आती थी? पड़ा पड़ा अपने जी से बातें कर रहा था। जब रात सांय-सांय बोलने लगी और साथ वालियां सब सो रहीं, रानी केतकी ने अपनी सहेली मदनबान को जगाकर यों कहा- ‘अरी ओ! तूने कुछ सुना है? मेरा जी उस पर आ गया है_ और किसी डौल से थम नहीं सकता। तू सब मेरे भेदों को जानती है। अब होनी जो हो सो हो_ सिर रहता रहे, जाता जाय। मैं उसके पास जाती हूं। तू मेरे साथ चल। पर तेरे पांवों पड़ती हूं कोई सुनने न पाए। अरी यह मेरा जोड़ा मेरे और उसके बनाने वाले ने मिला दिया। मैं इसी जी में इस अमराइयों में आई थी।’

रानी केतकी मदनबान का हाथ पकडे हुए वहां आन पहुंची, जहां कुंवर उदैभान लेटे हुए कुछ-कुछ सोच में बड़-बड़ा रहे थे। मदनबान आगे बढ़के कहने लगी- ‘तुम्हें अकेला जानकर रानी जी आप आई हैं।’

कुंवर उदैभान यह सुनकर उठ बैठे और यह कहा-

‘क्यों न हो, जी को जी से मिलाप है?’ कुंवर और रानी दोनों चुपचाप बैठे_ पर मदनबान दोनों को गुदगुदा रही थी। होते-होते रानी का वह पता खुला कि ‘राजा जगत परकास की बेटी है और उनकी मां रानी कामलता कहलाती हैं। उनको उनके मां बाप ने कह दिया है- एक महीने अमराइयों में जाकर झूल आया करो। आज वहीं दिन था_ सो तुमसे मुठभेड़ हो गई। बहुत महाराजों के कुंवरों से बातें आई, पर किसी पर इनका ध्यान न चढ़ा। तुम्हारे धन भाग जो तुम्हारे पास सबसे छुपके, मैं जो उनके लड़कपन की गोइयां हूं। मुझे अपने साथ लेके आई हैं। अब तुम अपनी बीती कहानी कहो- तुम किस देस के कौन हो।’

उन्होंने कहा- ‘मेरा बाप राजा सूरजभान और मां रानी लक्ष्मीबास हैं। आपस में जो गठजोड़ हो जाय तो कुछ अनोखी, अचरज और अचंभे की बात नहीं। यों ही आगे से होता चला आया है। जैसा मुँह वैसा थप्पड़। जोड़ तोड़ टटोल लेते हैं। दोनों महाराजों को यह चितचाही बात अच्छी लगेगी, पर हम तुम दोनों के जी का गठजोड़ चाहिए।’

इसी में मदनबान बोल उठी-‘ सो तो हुआ। अपनी अपनी अंगूठियां हेर-फेर कर लो और आपस में लिखौती लिख दो। फिर कुछ हचर-मचर न रहे।’

कुंवर उदैभान ने अपनी अंगूठी रानी केतकी को पहना दी और रानी ने भी अपनी अंगूठी कुंवर की उंगली में डाल दी और एक धीमी सी चुटकी भी ले ली। इसमें मदनबाल बोली- ‘जो सच पूछा तो इतनी भी बहुत हुई। मेरे सिर चोट है। इतना बढ़ चलना अच्छा नहीं। अब उठ चलो और इनको सोने दो_ और रोएं तो पड़े रोने दो।’

बातचीत तो ठीक हो चुकी थी। पिछले पहर से रानी तो अपनी सहेलियों को लेके जिधर से आई थी, उधर को चली गई और कुंवर उदैभान अपने घोड़े की पीठ लगाकर अपने लोगों से मिलके अपने घर पहुँचे। कुंवर जी का अनूप रूप क्या कहूं! कुछ कहने में नहीं आता. न खाना, न पीना, न लग चलना, न किसी से कुछ कहना, न सुनना. जिस ध्यान में थे, उसी में गूंथे रहना, और घड़ी-घड़ी कुछ कुछ सोच सोच सिर धुनना.

होते-होते इस बात का लोगों में चरचा फैल गया. किसी किसी ने महाराज और महारानी से भी कहा- ‘दाल में काला है. वह कुंवर उदैभान जिससे तुम्हारे घर का उजाला है, इन दिनों कुछ उसके बुरे तेवर और बेडौल आंखें दिखाई देती हैं. घर से बाहर तो पांव नहीं धरता. घर वालियां जो किसी डौल से कभी बहलाती हैं तो और कुछ नहीं करता, एक ऊंची सांस लेता है और जो बहुत किसी ने छेड़ा, तो छपरखट पर जाकर अपना मुंह लपेट के आठ-आठ आंसू पड़ा रोता है. यह सुनते ही मां-बाप दोनों कुंवर के पास दौड़े आये. गले लगाया, मुंह चूंबा, पांवों पर बेटे के गिर पड़े, हाथ जोड़े और कहा- ‘जो अपने जी की बात है, सो कहते क्यों नहीं? क्या दुखड़ा है, जो पड़े-पड़े कराहते हो? राजपाट जिसको चाहो दे डालो. कहो तो (तुम) क्या चाहते हो? तुम्हारा जी क्यों नहीं लगता? भला वह है क्या, जो हो नहीं सकता, मुंह से बोलो, जी को खोलो और जो कहने में कुछ सोचते हो, तो अभी लिख भेजो. जो कुछ लिखोगे ज्यों की त्यों वहीं करने में आएगी. जो तुम कहो कुएं में गिर पड़ो तो हम दोनों अभी कुएं में गिर पड़ते हैं, जो कहो सिर काट डालो तो सिर अपने अभी काट डालते हैं.’

कुंवर उदैभान, जो बोलते ही न थे, उन्होंने लिख भेजने का आसरा पाके इतना बोले- ‘अच्छा आप सिधारिए. मैं लिख भेजता हूं. पर मेरे उस लिखने को मेरे मुंह पर किसी ढब से न लाना. नहीं तो मैं बहुत लजियाऊंगा. इसीलिए तो मुख बात हो के मैंने कुछ न कहा.’ और यह लिख भेजा- अब जो मेरा जी नथों में आ गया और किसी ढब से न रहा गया और आपने मुझे सौ-सौ रूप से खोला और बहुत-सा टटोला, तब तो लाज छोड़ के हाथ जोड़ के मुंह को फोड़ के चिंचिया के यह लिखता हूं. दोहा अपनी बोली का-

चाह के हाथों किसी को सुख नहीं,

है भला वह कौन जिसको दुख नहीं.

यह उस दिन जो मैं हरियाली देखने को गया था, वहां जो मेरे सामने एक हिरनी कनौतियां उठाये हुए हो गयी थी, उसके पीछे मैंने घोड़ा बग फुट फेंका था. जब तक उजियाली रही, उसी की धुन में भटका किया. जब अंधेरा हो गया और सूरज डूबा, तब जी मेरा बहुत ऊभा. सुहानी सी अमरीयां तक के मैं उनमें गया, तो उन अमरियों का पत्ता-पत्ता मेरे जी का गाहक हुआ. वहां का यह सौहला है, कुछ रंडियां झूला डाले झूल रही थीं. उन सबकी सिरधरी कोई ‘रानी केतकी’ महाराजा जगत परकास की बेटी हैं. उन्होंने यह अंगूठी अपनी मुझे दी और मेरी अंगूठी उन्होंने ले ली और लिखावट भी लिख दी. तो यह अंगूठी उनकी लिखावट समेत मेरे लिखे हुए के साथ पहुंचती है. आप देख लीजिए और जिसमें बेटे का जी रह जाय वह कीजिए.’

महाराज और महारानी उस बेटे के लिखे हुए पर सोने के पानी से यों लिखते हैं- ‘दोनों ने उस अंगूठी और लिखावट को अपने आंखों से मला. अब तुम जी में कुछ कुढ़ो पचो मत. जो रानी केतकी के मां-बाप तुम्हारी बात मानते हैं तो हमारे समधी और समधिन हैं, दोनों राज एक हो जाएंगे और कुछ नाह नूह की ठहरेगी तो जिस डौल से बन आवेगा, ढाल तलवार के बल तुम्हारी दुल्हन हम तुमसे मिलावेंगे. आज से उदास मत रहा करो. खेलो, कूदो, बोलो-चालो, आनन्द करो, हम अच्छी घड़ी शुभ महूरत सोच के तुम्हारे ससुराल में किसी बाम्हन को भेजते हैं, जो बात चित चाही ठीक कर लावे.’ बाम्हन जो शुभ घड़ी देख के हड़बड़ी से गया था उस पर बड़ी कड़ी पड़ी. सुनते ही रानी केतकी के बाप ने कहा- ‘उन के हमारे नाता नहीं होने का. उनके बाप दादे हमारे बाप दादों के आगे सदा हाथ जोड़ के बातें किया करते थे, और टुक जो तेवरी चढ़ी देखते थे, बहुत डरते थे. क्या हुआ जो अब वह बढ़ गये और ऊंचे पर चढ़ गये? जिसके माथे हम बायें पांव के अंगूठे से टीका लगावे वह महाराजों का रामा हो जाये-किस का मुंह जो यह बात हमारे मुंह पर लावे.’ बाम्हन ने जल भुनके कहा- ‘अगले भी ऐसी ही कुछ विचारे हुए हैं और भरी सभा में यही कहते थे, हम में और उनमें कुछ गोत की तो मेल नहीं है, पर कुंवर की रट से कुछ हमारी नहीं चलती, नहीं तो ऐसी ओछी बात कब हमारे मुंह से निकलती?’ यह सुनते ही उस महाराज ने बाम्हन के सिर पर फूलों की छड़ी फेंक मारी और कहा- ‘जो बाम्हन के हत्या का धड़का न होता, तो तुमको अभी चक्की में ढलवा डालता. इसको ले जाओ और एक अंधेरी कोठरी में मूंद रखो.’ जो इस बाम्हन पर बीती, सो सब कुंवर उदैभान के मां बाप ने सुनते ही लड़ने की ठान, अपना ठाठ बांध कर, दल बादल जैसे घिर जाते हैं, चढ़ आया. जब दोनों महाराजों में लड़ाई होने लगी, रानी केतकी सावन भादों के रूप में रोने लगी, और दोनों के जी पर यह आ गयी- ‘यह कैसी चाहत है_ जिसमें लोहू बरसने लगा और अच्छी बातों को तरसने लगा.’

कुंवर ने चुपके से यह कहला भेजा- ‘अब मेरा कलेजा टुकड़े-टुकड़े हुए जाता है। दोनों महाराजाओं को आपस में लड़ने दो। किसी डौल से जो हो सके, तो मुझे अपने पास बुला लो। हम तुम मिलके किसी और देस निकल चलें_ होनी हो सो हो, सिर रहता रहे, जाता जाय।’ एक मालिन, जिसको फूलकली कर सब पुकारते थे, उसने उस कुंवर की चिट्ठी किसी फूल की पंखड़ी में लपेट लपेट कर रानी केतकी तक पहुंचा दी। रानी ने उस चिट्ठी को अपनी आंखों से लगाया और मालिन को एक थाल भरके मोती दिए_ और उस चिट्ठी की पीठ पर अपने मुंह की पीक से यह लिखा- ‘ऐ मेरे जी के ग्राहक, जो तू मुझे बोटी बोटी कर चील-कौवों को दे डाले, तो भी मेरी आंखों चैन और कलेजे सुख हो। पर यह बात भाग चलने की अच्छी नहीं। इसमें एक बाप-दादे के चिट लग जाती है_ अब जब तक मां बाप जैसा कुछ होता चला आता है उसी डोल से बेटे-बेटी को किसी पर पटक न मारें और सिर से किसी के चेपक न दें, तब तक यह एक जो तो क्या, जो करोड़ जी जाते रहें तो कोई बात है रुचती नहीं।’ यह चिट्ठी जो बिस भरी कुंवर तक जा पहुंची, उस पर कई एक थाल सोने के हीरे, मोती, पुखराज के खचाखच भरे हुए निछावर करके लुटा देता है। और जितनी उसे बेचैनी थी, उससे चौगुनी पचगुनी हो जाती है और उस चिट्ठी को अपने उस गोरे डंड पर बांध लेता है।

आना जोगी महेंदर गिर का कैलास पहाड़ पर से और कुंवर उदैभान और उसके मां-बाप को हिरनी हिरन कर डालना

जगत परकास अपने गुरू को जो कैलाश पहाड़ पर रहता था, लिख भेजता है- ‘कुछ हमारी सहाय कीजिए। महाकठिन बिपता भार हम पर आ पड़ी है। राजा सूरजभान को अब यहां तक भावभिक लिया है, जो उन्होंने हम से महाराजों से डौल किया है। कैलास पहाड़ जो एक डौल चाँदी का है, उस पर राजा जगत परकास का गुरू, जिसको महेंदर गिर सब इंदरलोक के लोग कहते थे, ध्यान ज्ञान में कोई 90 लाख अतीतों के साथ ठाकुर के भजन में दिन रात लगा रहता था। सोना, रूपा, तांबे, रांगे का बनाना तो क्या और गुटका मुंह में लेकर उड़ना परे रहे, उसको और बातें इस इस ढब की ध्यान में थीं जो कहने सुनने से बाहर हैं। मेंह सोने रूपे का बरसा देना और जिस रूप में चाहना हो जाना, सब कुछ उसके आगे खेल था। गाने बजाने में महादेव जी छूट सब उसके आगे कान पकड़ते थे। सरस्वती जिसकी सब लोग कहते थे, उनने भी कुछ कुछ गुनगुनाना उसी से सीखा था। उसके सामने छः राग छत्तीस रागिनियां आठ पहर रूप बंदियों का सा धरे हुए उसकी सेवा में सदा हाथ जोड़े खड़ी रहती थीं। और वहां अतीतों को गिर कहकर पुकारते थे- भैरोगिर, विभासगिर, हिंडोलगिर, मेघनाथ, केदारनाथ, दीपकसेन, जोतिसरूप सारंगरूप। और अतीतिनें उस ढब से कहलाती थीं- गुजरी, टोडी, असावरी, गौरी, मालसिरी, बिलावली। जब चाहता, अधर में सिंघासन पर बैठकर उड़ाए फिरता था और नब्बे लाख अतीत गुटके अपने मुंह में लिए, गेरुए वस्तर पहने, जटा बिखेरे उसके साथ होते थे। जिस घड़ी रानी केतकी के बाप की चिट्ठी एक बगला उसके घर पहुंचा देता है, गुरु महेंदर गिर एक चिग्घाड़ मारकर दल बादलों को ढलका देता है। बघंबर पर बैठे भभूत अपने मुंह से मल कुछ कुछ पढ़ंत करता हुआ बाण घोड़े भी पीठ लगा और सब अतीत मृगछालों पर बैठे हुए गुटके मुंह में लिए हुए बोल उठे- गोरख जागा और मुंछदर जागा और मुंछदर भागा। एक आंख की झपक में वहां आ पहुंचता है जहां दोनों महाराजों में लड़ाई हो रही थी। पहले तो एक काली
आंधी आई_ फिर ओले बरसे_ फिर ट्यिस्त्री आई। किसी को अपनी सुध न रही। राजा सूरजभान के जितने हाथी घोड़े और जितने लोग और भीड़भाड़ थी, कुछ न समझा कि क्या किधर गई और उन्हें कौन उठा ले गया। राजा जगत परकास के लोगों पर और रानी केतकी के लोगों पर क्योड़े की बूंदों की नन्हीं-नन्हीं फुहार सी पड़ने लगी। जब यह सब कुछ हो चुका, तो गुरुजी ने अतीतियों से कहा- ‘उदैभान, सूरजभान, लछमीबास इन तीनों को हिरनी हिरन बना के किसी बन में छोड़ दो_ और जो उनके साथी हों, उन सभों को तोड़ फोड़ दो।’ जैसा गुरुजी ने कहा, झटपट वही किया। विपत का मारा कुंवर उदैभान और उसका बाप वह राजा सूरजभान और उनकी मां लछमीबास हिरन हिरनी बन गए। हरी घास कई बरस तक चरते रहे_ और उस भीड़ भाड़ का तो कुछ थल बेड़ा न मिला, किधर गए और कहां थे बस यहां की यहीं रहने दो। फिर सुनो। अब रानी केतकी के बाप महाराजा जगत परकास की सुनिए। उनके घर का घर गुरु जी के पांव पर गिरा और सबने सिर झुकाकर कहा- ‘महाराज, यह आपने बड़ा काम किया। हम सबको रख लिया। जो आप न पहुंचते तो क्या रहा था। सबने मर मिटने की ठान ली थी, हम पापियों से कुछ न चलेगी यह जान ली थी। राज पाट सब हमारा आप निछावर करके जिसको चाहिए दे डालिए. हम सब को अतीत बना के अपने साथ लीजिए, राज हम से नहीं थम सकता. सूरजभान के हाथ से आपने बचाया. कोई उन का बचा चन्द्रभान चढ़ आवेगा, तो क्योंकर बचना होगा? अपने आप में सकत नहीं, फिर ऐसे राज का फटे मुंह कहां तक आपको सताया करेंगे.’ यह सुनकर जोगी महेंदर गिर ने कहा- ‘तुम सब हमारे बेटा-बेटी हो, आनन्न करो, दन्दनाओ, सुख चैन से रहो, ऐसा वह कौन है जो तुम्हें आंख भरकर और ढब से देख सके? यह बघम्बर और भभूत हमने तुम्हें दिया. आगे जो कुछ ऐसी गाढ़ पड़े, तो इस बघम्बर में से एक रोंगटा तोड़कर आग पर धर के फूंक दीजिए. वह रोंगटा फूंकने न पावेगा तो हम आन पहुंचेंगे. रहा भभूत तो इसलिए है, जो कोई चाहे जब उसे अंजन करे वह सब कुछ देखे और उसे कोई न देखे जो चाहे करे.’ गुरू महेंदर गिर जिनके पांव पूजिए और धन महाराज कहिए उन से तो कुछ छिपाव न था. महाराज जगत परकास उन को मोरछल करते हुए रानियों के पास ले गये. सोने रूपे के फूल (हीरे मोती) गोद भर भर सबने निछावर किए और माथे रगड़े. उन्होंने सब की पीठें ठोंकी. रानी केतकी ने भी दंडवत की, पर जी ही जी में बहुत-सी गुरूजी को गालियां दीं. गुरूजी सात दिन सात रातें वहां रुक के राज जगत परकास को सिंगासन पर बिठाकर के अपने उस बघम्बर पर बैठ उसी डौल से कैलास पहाड़ पर जा धमके. राजा जगत परकास अपने अगले से ढब राज करने लगे.

रानी केतकी का मदनबान के आगे रोना और पिछली बातों का ध्यान करके जी से हाथ धोना. अपनी बोली के दोहों में-

रानी को बहुत सी बे कली थी

कब सूझती कुछ बुरी भली थी.

चुपके-चुपके कराहती थी

जीना अपना न चाहती थी

कहती थी कभी- ‘अरी मदनबान

है आठ पहर मुझे यही ध्यान

यां प्यास किसे भला किसे भूख

देखूं हूं वही हरे-हरे रूख

टपकेगा डर है अब ये कहिए

चाहत का घर है अब ये कहिए

अमरियों में उन का यह उतरना

और रात का सायं-सायं करना

और चुपके से उठ के मेरा जाना

और तेरी वह चाह का जताना

उन की वह उतार अंगूठी लेनी

और अपनी अंगूठी उन को देनी

आंखों में मेरी वह फिर रही है

जी का जो रूप था वही है.

क्योंकर उन्हें भूलूं, क्या करूं मैं?

अब मैंने सुना है, हे मदनबान

बन बन के हिरन हुए उदैभान

चरते होंगे हरी हरी दूब

कुछ तू भी पसीज, सोच में डूब

मैं अपनी गई हूं चौकड़ी भूल

मत मुझको सुंघा वह डहडहे फूल

फूलों को उठा के यहां से ले जा

सौ टुकड़े मेरा हुआ कलेजा

बिखरे जी को न कर इकट्ठा

एक घास का ला के रख दे पट्ठा

हरियाली उसी को देख लूं मैं

कुछ और तो तुझको क्या-क्या कहूं मैं

इन आंखों में है भड़क हिरन की

पलकें हुई जैसी घास बन की

जब देखिए डबडबा रही हैं

ओसें आंसू की छा रही हैं

यह बात तो जी में गड़ गयी है

एक ओस सी मुझ पे पड़ गयी है.’

इसी डौल से जब अकेली होती थी, तब मदनबान के साथ ऐसे ही कुछ मोती पिरोती थी.

भभूत मांगना रानी केतकी का अपनी मां रानी कामलता से आंख मिचौली खेलने के लिए और रूठ रहना, और राज जगत परकास का बुलाना और प्यार से कुछ-कुछ कहना और वह भभूत देना

एक रात रानी केतकी ने अपनी मां रानी कामलता को भुलावे में डाल के यह पूछा- ‘गुरुजी गुसाईं महेंदर गिर ने जो भभूत मेरे बाप को दिया था, वह कहां रखा हुआ है और उससे क्या होता है?’ उसकी मां ने कहा- ‘मैं तेरे वारी! तू क्यों पूछती है?’ रानी केतकी कहने लगी- ‘आंख मिचौवल खेलने के लिए चाहती हूं, जब अपनी सहेलियों के साथ खेलूं और चोर बनूं, तो कोई मुझको पकड़ न सके.’ रानी कामलता ने कहा, ‘यह खेलने के लिए नहीं है ऐसे लटके किसी बुरे दिन के सम्हाल को डाल रखते हैं क्या जाने, कोई घड़ी कैसी है, कैसी नहीं.’ रानी केतकी अपनी मां की इस बात से अपना मुंह थुथा के रूठ गयी और दिन भर खाना न खाया. महाराज ने जो बुलाया, तो कहा मुझे रुच नहीं. तब रानी कामलता बोल उठी- ‘अजी तुमने कुछ सुना भी या नहीं. बेटी तुम्हारी आंख मिचौवल खेलने के लिए वह भभूत गुरुजी का दिया हुआ मांगती थी. मैंने न दिया और कहा- ‘लड़की यह लड़कपन की बातें अच्छी नहीं. किसी बुरे दिन के लिए गुरुजी दे गये हैं. इसी पर मुझसे रूठी है. बहुतेरा बहलाती फुसलाती हूं, मानती नहीं.’

महाराज ने कहा- ‘भभूत तो क्या, मुझे अपना जी भी उससे प्यारा नहीं। मुझे उसके एक पहर के बहल जाने पर एक जी तो क्या लाख जी हों तो दे डालें।’ रानी केतकी को डिबिया में से थोड़ा सा भभूत दिया। कई दिन तलक भी आंख मिचौवल अपने माँ-बाप के सामने सहेलियों के साथ खेलती सबको हँसाती रही, जो सौ सौ थाल मोतियों के निछावर हुआ किए, क्या कहूँ, एक चुहल थी जो कहिए तो करोड़ों पोथियों में ज्यों की त्यों न आ सके।

रानी केतकी का चाहत से बेकल होना और मदनबान का साथ देने से नहीं करना।

एक रात रानी केतकी उसी ध्यान में मदनबान से यों बोल उठी- ‘अब मैं निगोड़ी लाज से कुट करती हूँ, तू मेरा साथ दे’। मदनबान ने कहा- ‘क्यों कर?’ रानी केतकी ने वह भभूत का लेना उसे बताया और यह सुनाया, ‘यह सब आँख-मिचौवल के झाई झप्पे मैंने इसी दिन के लिये कर रखे थे।’ मदनबान बोली- ‘मेरा कलेजा थरथराने लगा। अरी यह माना जो तुम अपनी आँखों में उस भभूत का अंजन कर लोगी और मेरे भी लगा दोगी तो हमें तुम्हें कोई न देखेगा। और हम तुम सबको देखेंगी। पर ऐसी हम कहाँ जी चली हैं। जो बिन साथ, जोबन लिए, बन-बन में पड़ी भटका करें और हिरनों की सींगों पर दोनों हाथ डालकर लटका करें, और जिसके लिए यह सब कुछ है, सो वह कहाँ? और होय तो क्या जाने जो यह रानी केतकी है और यह मदनबान निगोड़ी नोची खसोटी उजड़ी उनकी सहेली है। चूल्हे और भाड़ में जाय यह चाहत जिसके लिए आपकी माँ-बाप को राज-पाट सुख नींद लाज छोड़ कर नदियों के कछारों में फिरना पड़े, सो भी बेडौल। जो वह अपने रूप में होते तो भला थोड़ा बहुत आसरा था। ना जी यह तो हमसे न हो सकेगा। जो महाराज जगत परकास और महारानी कामलता का हम जान-बूझकर घर उजाड़ें और इनकी जो इकलौती लाडली बेटी है, उसको भगा ले जायें और जहाँ तहाँ उसे भटकावें और बनासपत्ति खिलावें और अपने घोड़े को हिलावें। जब तुम्हारे और उसके माँ बाप में लड़ाई हो रही थी और उनने उस मालिन के हाथ तुम्हें लिख भेजा था जो मुझे अपने पास बुला लो, महाराजों को आपस में लड़ने दो, जो होनी हो सो हो_ हम तुम मिलके किसी देश को निकल चलें_ उस दिन समझीं। तब तो वह ताव भाव दिखाया। अब जो वह कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप तीनों जी हिरनी हिरन बन गए। क्या जाने किधर होंगे। उनके ध्यान पर इतनी कर बैठिए जो किसी ने तुम्हारे घराने में न की, अच्छी नहीं। इस बात पर पानी डाल दो_ नहीं तो बहुत पछताओगी और अपना किया पाओगी। मुझसे कुछ न हो सकेगा। तुम्हारी जो कुछ अच्छी बात होती, तो मेरे मुँह से जीते जी न निकलता। पर यह बात मेरे पेट में नहीं पच सकती। तुम अभी अल्हड़ हो। तुमने अभी कुछ देखा नहीं। जो ऐसी बात पर सचमुच ढलाव देखूँगी तो तुम्हारे बाप से कहकर यह भभूत जो बह गया निगोड़ा भूत मुछंदर का पूत अवधूत दे गया है, हाथ मुरकवाकर छिनवा लूँगी।’ रानी केतकी ने यह रूखाइयाँ मदनबान की सुन हँसकर टाल दिया और कहा- ‘जिसका जी हाथ में न हो, उसे ऐसी लाखों सूझती हैं_ पर कहने और करने में बहुत सा फेर है। भला यह कोई अँधेर है जो माँ बाप, रावपाट, लाज छोड़ कर हिरन के पीछे दौड़ती करछालें मारती फिरूँ। पर अरी ते तो बड़ी बावली चिड़िया है जो यह बात सच जानी और मुझसे लड़ने लगी।’

रानी केतकी का भभूत लगाकर बाहर निकल जाना और सब छोटे बड़ों का तिलमिलाना

दस पन्द्रह दिन पीछे एक दिन रानी केतकी बिन कहे मदनबान के वह भभूत आँखों में लगा के घर से बाहर निकल गई। कुछ कहने में आता नहीं, जो मां-बाप पर हुई। सबने यह बात ठहराई, गुरूजी ने कुछ समझकर रानी केतकी को अपने पास बुला लिया होगा। महाराज जगत परकास और महारानी कामलता राजपाट उस वियोग में छोड़ छाड़ के पहाड़ की चोटी पर जा बैठे और किसी को अपने आंखों में से राज थामने को छोड़ गए। बहुत दिनों पीछे एक दिन महारानी ने महाराज जगत परकास से कहा- ‘रानी केतकी का कुछ भेद जानती होगी तो मदनबान जानती होगी। उसे बुलाकर तो पूछो।’ महाराज ने उसे बुलाकर पूछा तो मदनबान ने सब बातें खोलियाँ। रानी केतकी के माँ बाप ने कहा- ‘अरी मदनबान, जो तू भी उसके साथ होती तो हमारा जी भरता। अब तो वह तुझे ले जाये तो कुछ हचर पचर न कीजियो, उसके साथ हो लीजियो। जितना भभूत है, तू अपने पास रख। हम कहाँ इस राख को चूल्हे में डालेंगे। गुरूजी ने तो दोनों राज का खोज खोया-कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप दोनों अलग हो रहे। जगत परकास और कामलता को यों तलपट किया। भभूत न होता तो ये बातें काहे को सामने आतीं।’

मदनबान भी उनके ढूँढने को निकली। अंजन लगाए हुए रानी केतकी रानी केतकी कहती हुई पड़ी फिरती थी। बहुत दिनों पीछे कहीं रानी केतकी भी हिरनों की डारों में उदैभान, चिंघाड़ती हुई आ निकली. जो एक न एक को ताड़ कर यों पुकारा, ‘अपनी-अपनी आंखें धो डालो.’ एक-एक डेरे पर बैठकर दोनों की मुठभेड़ हुई. गले मिल के ऐसी रोइयां जो पहाड़ों में कूक-सी पड़ गयी.

दोहा अपनी बोली का-

छा गयी ठंडी सांस झाड़ों में

पड़ गयी कूक-सी पहाड़ों में.

दोनों जनियां एक टोले पर अच्छी-सी छाना ताड़ के आ बैठियां अपनी-अपनी बातें दोहराने लगीं.

बातचीत मदनबान की रानी केतकी के साथ

रानी केतकी ने अपनी बीती सब कही और मदनबान वही अगला झींकना झींका की, और उन के मां-बाप उन के लिए जो जोग साधा और जो विरोग लिया था सब कहा. जब मदनबान यह सब कुछ कह चुकी, तो फिर हंसने लगी. रानी केतकी यह लगी पढ़ने. दोहे अपनी बोली के-

हम नहीं हंसने से रोकते, जिसका जी चाहे हंसे

है वही अपनी कहावत-आ फंसे जी आ फंसे

अब तो सारा अपनी पीछे झगड़ा झांटा लग गया

पांव का क्या ढूंढ़ती है? जी में कांटा लग गया.

मदनबान से कुछ रानी केतकी के आंसू पोंछते से चले उन्ने यह बात ठहरायी, ‘जो तुम कहीं ठहरो, तो मैं तुम्हारे उन उजड़े हुए मां-बाप को चुपचाप यहीं ले आऊं और उन्हीं से उस बात को ठहराऊं. गुसाई महेंदरगिर, जिसके यह सब करतूत हूं, वह भी उन्हीं दोनों उजड़े हुओं की मुट्ठी में है. अब भी मेरा कहा जो तुम्हारे ध्यान चढ़े तो गये हुए दिन फिर-फिर सकते हैं, पर तुम्हारे कुछ भावें नहीं, हम क्या पड़े बकते हैं.’ मैं इस पर बेड़ा उठाती हूं. बहुत दिनों में रानी केतकी ने उस पर अच्छा कहा और मदनबान को अपने मां-बाप के पास भेजा और चिट्ठी अपने हाथों से लिख भेजी, जो आपसे कुछ हो सके, तो उस जोगी से यह ठहरा के आवें.

महाराजा और महारानी के पास मदनबान का फिर आना और चित-चाही बात का सुनाना

मदनबान रानी केतकी को अकेला छोड़कर राजा जगत परकास और रानी कामलता जिस पहाड़ पर बैठे हुए थे, वह छट से आदेश करके आ खड़ी होती है और कहती है, ‘लीजिए! आपका घर नये सिरे से बसा और अच्छे दिन आये, रानी केतकी का एक बाल भी बांका नहीं हुआ, उन्हीं के हाथ की यह चिट्ठी लाई हूं. आप पढ़ लीजिए. आगे जो चाहिए सो कीजिए.’ महाराज ने इसी बघंबर में से एक रोंगटा तोड़कर आग पर धर दिया. बात की बात में गुसाईं महेंदर गिर आ पहुंचे और जो कुछ यह नया सांग जोगी और जोगिन का आया था आंखों देखा. सब को छाती से लगाया और कहा- ‘बघम्बर तो इसीलिए मैं सौंप गया था, जो तुम पर कुछ होए तो उसका एक रोंगटा फूंक दीजो. तुम्हारे घर की यह गत हो गयी. अब तक तुम क्या कर रहे थे और किन नींदों में सोते थे? पर तुम क्या करो? यह खिलाड़ी जो जो रूप चाहे सो दिखावे, जो जो नाच चाहे सो नचावे. भभूत लड़की को क्या देना था? हिरन हिरनी उदैभान और सूरजभान उस के बाप को एक लक्ष्मीबास और उसकी मां को मैंने किया था, मेरे आगे फिर उन तीनों को जैसा का तैसा करना कुछ बड़ी बात न थी. अच्छा, हुई सो हुई अब चलो उठो, अपने राज पर बिराजो और ब्याह के ठाठ करो. अब तुम अपनी बेटी को समेटो, कुंवर उदैभान को मैंने अपना बेटा किया उसको लेके मैं ब्याहने चढूंगा.’ महाराज यह बात सुनते ही अपने राज की गद्दी पर आ बैठे और उसी घड़ी कह दिया, सारी छतों को और कोठों को गोटे में गढ़ दो और सोने रुपये के रुपहले सुनहरे सेहरे सब झाड़ और पहाड़ों पर बांध दो, और पेड़ों में मोती की लड़ियां गूंथो, और कह दो, चालीस दिन चालीस रात तक जिस घर में नाच आठ पहर न रहेगा, उस पर बाल वाले से मैं रूठ रहूंगा और जानूंगा, यह मेरे दुख-सुख का साथी नहीं.’ छः महीने जब कोई चलने वाला कहीं नहीं ठहरे और रात दिन चला जाये इस फेर-फेर में वह राज था, सब कहीं यहीं डौल हो गया.

जाना महाराज और महारानी और गुसाई महेंदर गिर का रानी केतकी के लेने के लिए

फिर गुरुजी और महाराज और महारानी, मदनबान के साथ यहां आ पहुंचे जहां रानी केतकी चुपचाप सोन खींचे हुए बैठी थी. गुरुजी ने रानी केतकी को अपनी गोद में लेके कुंवर उदैभान का चढ़ावा चढ़ा दिया और कहा, ‘लो! तुम अपने मां-बाप के साथ अपने घर सिधारो. अब मैं अपने बेटे कुंवर उदैभान को लिए हुए आता हूं.’

गुरुजी गुसाई, जिनको दंडवत है, सो तो वो सिधारते हैं. आगे जो होगी सो कहने में आवेगी. यहां की यह धूमधाम और फैलावा ये ध्यान कीजिए.

महाराज जगत परकास ने अपने सारे देश में, कहा यह पुकार दे, ‘जो यह न करेगा उसकी बुरी गत होगी. गांव-गांव में आने साम्हने तिरपोलिए बना-बना के सूहे कपड़े उस पर लगा दो, और गोट धनुक की और गोथेरू रूप, हली सुनहरी और किरनें और डांग टांक रखो, जितने बढ़, पीपल के पुराने-पुराने पेड़ जहां-जहां हों उन पर गोटे के फूलों के सेहरे बड़-बड़ ऐसे जिसमें सिर से लगा जड़ तक उनकी थलक और झलक पहुंचे बांध दो.’ चूंकि पौधों ने रंगा के सोहे जोड़ पहने सब पांव में डालियों ने तोड़े पहने, बूटी-बूटी ने फूल फल के गहने जो बहुत न थे तो थोड़े-थोड़े पहने. जितने डहडहे और हिरयावत में लहलहे पांव थे, सबने अपने-अपने हाथ में चहचही मेहंदी की रचाकर सजाकर और जहां तलक नवल ब्याही दुल्हिन नन्हीं-नन्हीं फलियां कीं और गुटागिन नई-नई कलियों की जोड़े पंखुरियों के पहने हुई थी, सब ने अपनी-अपनी गोद सुहाग प्यार के फूल और फलों से भर ली. और तीन बरस का पैसा, जो लोग दिया करते थे उस पर राजा के राज भर में जिस-तिस ढब के हुआ, खेती-बाड़ी करके हल जोत के और कपड़ा लत्ता बन के, सो सब इन को छोड़ दिया जो अपने पैरों में बनावे के ठाठ करे और जितने राज भर में कुवें थे खंडसालों की खंडसालें (ले जा) उन में उंड़ेली गयीं और सोर बनों में और पहाड़ तलियों में लालटेनों की झमझमाहट रातों को दिखायी देने लगी. और जितनी झीलें थीं उन सब में कुसुम और टेसू और हर सिंगार पड़ गया, और केसर भी थोड़ी-थोड़ी घोलने में आ गयी, और फुनगे से लगा जड़ तलक जितने झाड़ झंखाड़ों में पत्ते और पत्ती बँधी थीं, उनपर रूपहरी सुनहरी डाँक गोंद लगाकर चिपका दिया और सबों को कह दिया जो सही पगड़ी और बागे बिन कोई किसी डौल किसी रूप से फिर चले नहीं। और जितने गवैये, बजवैए, भांड़-भगतिए रहस धारी और संगीत पर नाचने वाले थे, सबको कह दिया जिस जिस गाँव में जहाँ हों अपनी अपनी ठिकानों से निकलकर अच्छे-अच्छे बिछौने बिछाकर गाते-नाचते धूम मचाते कूदते रहा करें।

ढूँढ़ना गोसाई महेंदर गिर का कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप को, न पाना और बहुत तलमलाना

यहाँ की बात और चुहलें जो कुछ हैं, सो यहीं रहने दो। अब आगे यह सुनो। जोगी महेंदर और उसके 90 लाख जतियों ने सारे बन के बन छान मारे, पर कहीं कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप का ठिकाना न लगा। तब उन्होंने राजा इंदर को चिट्ठी लिख भेजी। उस चिट्ठी में यह लिखा हुआ था- ‘इन तीनों जनों को हिरनी हिरन कर डाला था। अब उनको ढूँढ़ता फिरता हूँ। कहीं नहीं मिलते और मेरी जितनी सकत थी, अपनी सी बहुत कर चुका हूं। अब मेरे मुंह से निकला कुँवर उदैभान मेरा बेटा मैं उसका बाप और ससुराल में सब ब्याह का ठाट हो रहा है। अब मुझपर विपत्ति गाढ़ी पड़ी जो तुमसे हो सके, करो।’

राजा इंदर चिट्ठी को देखते ही गुरू महेंदर को देखने को सब इंद्रासन समेट कर आ पहुँचे और कहा- ‘जैसा आपका बेटा वैसा मेरा बेटा। आपके साथ मैं सारे इंद्रलोक को समेटकर कुँवर उदैभान को ब्याहने चढूँगा।’ गोसाई महेंदर गिर ने राजा इंदर से कहा- ‘हमारी आपकी एक ही बात है, पर कुछ ऐसा सुझाइए जिससे कुँवर उदैभान हाथ आ जावे।’

राजा इंदर ने कहा- ‘यहां जितने गवैए और गायनें हैं, उन सबको साथ लेकर हम और आप सारे बनों में फिरा करें। कहीं न कहीं ठिकाना लग जाएगा।’ गुरू ने कहा- ‘अच्छा।’

हिरन हिरनी का खेल बिगड़ना और कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप का नए सिरे से रूप पकड़ना

एक रात राजा इंदर और गोसाई महेंदर गिर निखरी हुई चाँदनी में बैठे राग सुन रहे थे. करोड़ों हिरन राग के ध्यान में चौकड़ी भूल आस पास सर झुकाए खड़े थे। इसी में राजा इंदर ने कहा- ‘इन सब हिरनों पर पढ़ के मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ़ के एक छींटा पानी का दो।’ क्या जाने वह पानी कैसा था। छींटों के साथ ही कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जनें हिरनों का रूप छोड़ कर जैसे थे वैसे हो गए। गोसाई महेंदर गिर और राजा इंदर ने उन तीनों को गले लगाया और बड़ी आवभगत से अपने पास बैठाया और वही पानी घड़ा अपने लोगों को देकर वहाँ भेजवाया जहाँ सिर मुंड़वाते ही ओले पड़े थे। राजा इंदर के लोगों ने जो पानी की छीटें वही ईश्वरोवाच पढ़ के दिए तो जो मरे थे सब उठ खड़े हुए_ और जो अधमुए भाग बचे थे, सब सिमट आए। राजा इंदर और महेंदर गिर कुँवर उदैभान और राजा सूरजभान और रानी लक्ष्मीबास को लेकर एक उड़न-खटोलों पर बैठकर बड़ी धूमधाम से उनको उनके राज पर बिठाकर ब्याह का ठाट करने लगे। पसेरियन हीरे-मोती उन सब पर से निछावर हुए। राजा सूरजभान और कुँवर उदैभान और रानी लछमीबास चितचाही असीस पाकर फूली न समाई और अपने सो राज को कह दिया- ‘जेवर भोरे के मुंह खोल दो। जिस जिस को जो जा उकत सूझे, बोल दो। आज के दिन का सा कौन सा दिन होगा। हमारी आँखों की पुतलियों से जिससे चैन है, उस लाडले इकलौते का ब्याह और हम तीनों का हिरनों के रूप से निकलकर फिर राज पर बैठना।’

पहले तो यह चाहिए जिन जिन की बेटियाँ बिन ब्याहियाँ हों, उन सब को उतना कर दो जो अपनी जिस चाव चीज से चाहें_ अपनी गुड़ियाँ सँवार के उठावें_ और तब तक जीती रहें, सब की सब हमारे यहाँ से खाया पकाया रींधा करें। और सब राज भर की बेटियाँ सदा सुहागनें बनी रहें और सूहे रातें छुट कभी कोई कुछ न पहना करें और सोने रूपे के केवाड़ गंगाजमुनी सब घरों में लग जाएँ और सब कोठों के माथे पर केसर और चंदन के टीके लगे हों। और जितने पहाड़ हमारे देश में हों, उतने ही पहाड़ सोने रूपे के आमने सामने खड़े हो जाएँ और सब डाँगों की चोटियाँ मोतियों की माँग ताँगे भर जाएँ_ और फूलों के गहने और बँधनवार से सब झाड़ पहाड़ लदे फँदे रहें_ और इस राज से लगा उस राज तक अधर में छत सी बाँध दो। और चप्पा चप्पा कहीं ऐसा न रहें जहाँ भीड़ भड़क्का धूम
धड़क्का न हो जाय। फूल बहुत सारे बहा दो जो नदियाँ जैसे सचमुच फूल की बहियाँ हैं यह समझा जाय। और यह डौल कर दो, जिधर से दुल्हा को ब्याहने चढ़े सब लाडली और हीरे पन्ने पोखराज की उमड़ में इधर और उधर कबैल की टट्टिठ्ठयाँ बन जायँ और क्यारियाँ सी हो जायें जिनके बीचों बीच से हो निकलें। और कोई डाँग और पहाड़ी तली का चढ़ाव उतार ऐसा दिखाई न दे जिसकी गोद पंखुरियों से भरी हुई न हों।

राज इंदर का कुंवर उदैभान के ब्याह का ठाट करना

राज इन्दर ने कह दिया ‘वह रंडियां चुलबुलियां जो अपने जीवन के मध में उड़चलियां हैं, उनसे कह दो सोलह सिंगार बाल-बाल गंज मोती पिरोओ. और अपने-अपने अचरज और अचम्भे के उड़न-खटोलों के इस राज से ले के उस राज तलक अधर में छत-सी बांध दी, पर कुछ ऐसे रूप से उड़ चलो जो उड़न खटोलों की क्यारियां और फुलवारियां सी सैकड़ों कोस तक हो जायें और ऊपर ही ऊपर मृदंगा, बीन, जलतरंग, मुंह चंग, घुंघरू, तबले, कटताल और सैकड़ों इस ढब के अनोखे बाजे बजते आयें. और उन क्यारियों के बीच में हीरे, पुखराज, अनबिंधे मोतियों के झाड़ और लालटेनों की भीड़ भाड़ की झमझमाहट दिखायी दे और उन्हीं लालटेनों में से हथफूल फुलझड़ियां, जाही, जूहियां, कदम, गेंदा, चंदेली, इस ढब से छुटे जो देखतों की छातियों के किवाड़ खुल जायें, और पटाखे जो उछल-उछल के फूटें, उन में से हंसते सितारे और बोलते पखरुटे ढुल-ढुल पड़ें. और जब तुम सबको हंसी आवे, तो चाहिए उस हंसी से मोतियों की लड़ियां झड़ें जो सब के सब उन को चुन-चुन के राज के राजे हो जावें. डोमिनयों में रूप में सारंगियां छेड़-छेड़ सोहलें गाओ, दोनों हाथ हिलाओ, उंगलियां नचाओ, जो किसी ने न सुने हों वह ताव-भाव, आव जाव, राव चाव दिखाओ, ठुड्डियां कंपकंपाओ और नाक भवें तान-तान भाव बताओ, कोई फूटकर रह न जाओ. ऐसा जमाव लाखों बरस में होता है, जो जो राजा इन्दर ने अपने मुंह से निकाला था आंख की झपक के साथ वो हीं होने लगा. और जो कुछ उन दोनों महाराजों ने इधर-उधर कह दिया था, सब कुछ उसी रूप में ठीक-ठाक हो गया. जिस बियाह ने की यह कुछ फूलावट और जमावट और रचावट ऊपर तले इस जमघट के साथ होगी, उस का और कुछ फैलावा कैसा कुछ होगा, वह ध्यान कर लो.

ठाठ करना गुसाई महेंदर गिर का

जब कुंवर उदैभान को इस रूप से ब्याहने चढ़े और वह बाम्हन जो अंधेरी कोठरी में मूंदा हुआ था, उस को भी साथ ले लिया और बहुत से हाथ जोड़े और कहा, ‘बाम्हन देवता, हमारे कहने सुनने पर न जाओ, तुम्हारी जो रीत होती चली आयी है, बताते चलो.’ एक उड़न-खटोले पर वह भी रीत बताने को साथ हुआ. राजा इन्दर और गुसाई महेंदर गिर ऐरावत हाथी पर झूमते झामते देखते भालते सारा अखाड़ा लिये चले जाते थे. राजा सूरजभान दूल्हा के घोड़े के साथ माला जपता हुआ पैदल था. इतने में एक सन्नाटा हुआ, सब घबरा गये. इस सन्नाटे में से वह जो जोगी के नब्बे लाख अतीत थे, सबके सब जोगी बने हुए सैली तागी बघम्भरों पर आ धर के लोगों के जीवन में जितनी उमंगें छा रही थीं, वह चौगुनी पंचगुनी हो गईया. सुखपाल और चंडोलों और रथों पर जितनी रानियां महारानी लछमी बास के पीछे चली आतियां थीं सबको गुदगुदियां सी होने लगीं. इसमें कहीं भरतरी का सांग आया, कहीं जोगी जयपाल आ खड़े हुए, कहीं महादेव और पारवती दिखायी पड़े, कहीं गोरख जागे, कहीं मुछन्दर नाथ भागे, कहीं मच्छ, कच्छा बाराह सम्मुख हुए, कहीं परसुराम, कहीं बावनरूप, कहीं हरिनाक्स और नरसिंघ, कहीं राम, लछमन और सीता साम्हने आये, कहीं रावन और लंका का बखेड़ा सारे का सारा दिखाई देने लगा, कहीं कन्हैया जी का जन्माष्टमी में होना और वासुदेव का गोकुल को ले जाना उनका उस रूप से बढ़ चलना और गायें चरानी और मुरली बजानी और गोपियों से घूमें मचानी और और राधिका का रास और कुबजा का बस कर लेना, और उस कन्हैया से जो-जो कुछ हुआ था सबका सब ज्यों का त्यूं आंखों में आना और दरबार का जाना और यहां सोने के घर बनाना और फिर बिरिज कोन आना और सोलह सौ गोपियों का तिलमिलाना, साम्हने आ गया. उन गोपियों में से ऊधो का हाथ पकड़ के एक गोपी के इस कहने ने सबको रुला दिया, जो इन ढब से बोल के रुंधे हुए जी को खोलती थी.

गीत

जब छाड़ करीले की कुजन को हरदरबार का जीव मा जाय छिये.

कल धूत के धाम बनाये गहने, महराजन के महाराज भये.

तुज मोर मुकुट और कामरिया कछू और ही नाते जोर लिये.

धरे रूप नये किये नियह, नये और गय्या चराइयों भूल गये.

अच्छापना घाटों का कोई क्या कह सकें

जितने घाट दोनों राज की नदियों में थे, पक्की चांदी के थक्के से होकर लोगों को हक्का-बक्का कर रहे थे. निवाड़, मौलिए, बजरे, लचके, मोरपंखी, सोनामुखी, स्यामसुन्दर, रामसुन्दर और जितनी ढब की नावें थीं, सुथरे रूप में सजी सजायी, कसी कसायी सौ-सौ लचके खातियां, आतियां, जातियां, लहरातियां, पड़ी फिरतियां थीं. उन सब पर यही गवैय्ये, कनचनियां, रामजनियां और डोमनियां खचाखच भरी अपने-अपने करतब में नाचती, गाती-बजाती, कूदती-फांदती, धूमें मचातियां, अंगड़ातियां, जम्हातियां, उंगलियां नचातियां उछली पड़तियां थीं. और कोई नाव ऐसी न थी जो सोने रूपे के पत्तरों से मंडी हुई और असावरी में ढपी हुई न हो और बहुत-सी नावों पर हिंडोले भी उसी ढब से, उन पर गायनें बैठी झूलती हुई सोहले केदारे और बागेसरी कान्हड़ में गा रही थीं, दिल बादल से निवाड़ों ऐसे सब झीलों में भी छा रहे थे.

आ पहुंचना कुंवर उदैभान का ब्याह के ठाठ के साथ दुल्हन की ड्योढ़ी पर

इस धूमधाम के साथ कुँवर उदैभान सेहरा बाँधे दूल्हन के घर तक आ पहुँचा और जो रीतें उनके घराने में चली आई थीं, होने लगियाँ। मदनबान रानी केतकी से ठठोली करके बोली- ‘लीजिए, अब सुख समेटिए, भर भर झोली। सिर निहुराए, क्या बैठी हो, आओ न टुक हम तुम मिल के झरोखों से उन्हें झाँकें।’ रानी केतकी ने कहा- ‘न री, ऐसी नीच बातें न कर। हमें ऐसी क्या पड़ी जो इस घड़ी ऐसी झेल कर रेल पेल ऐसी उठें और तेल फुलेल भरी हुई उनके झाँकने को जा खड़ी हों।’ मदनबान उसकी इस रूखाई को उड़ान घाई की बातों में डालकर बोली. बोलचाल मदनबान की अपनी बोली के दोहों में-

यों तो देखो वा छड़े जी वा छड़े जी वा छड़े

हम से जो आने लगी है आप यों मुहरे कड़े

छान मारे बन के बन थे आपने जिनके लिये

वह हिरन जोबन के मद में हैं बने दूल्हा खड़े

तुम न जाओ देखने को जो उन्हें क्या बात है

ले चलेंगी आपको हम हैं इसी धुन पर अड़े

है कहावत जी को भावै और यों मुड़िया हिले

झांकने के ध्यान में उनके हैं सब छोटे बड़े

साँस ठंडी भरके रानी केतकी बोली कि ‘सच! सब तो अच्छा कुछ हुआ पर अब बखेड़े में पड़े.

वारी फेरी होना मदनबान का रानी केतकी पर और उसकी बास सूँघना और उनींदेपन से ऊंघना

उस घड़ी कुछ मदनबान को रानी केतकी का झांझें का जोड़ा और भीना भीनापन और अँखड़ियों का लजाना और बिखरा बिखरा जाना भला लग गया, तो रानी केतकी की बास सूँघने लगी और अपनी आँखों को ऐसा कर लिया जैसे कोई ऊँघने लगता है। सिर से लगा पाँव तक वारी फेरी होके तलवे सुहलाने लगी। तब रानी केतकी झट एक धीमी सी सिसकी लचके के साथ ले ऊठी : मदनबान बोली- ‘मेरे हाथ के टहोके से, वही पांव का छाला दुख गया होगा जो हिरनों की ढूँढ़ने में पड़ गया था।’ इसी दुःख की चुटकी से रानी केतकी ने मसोस कर कहा- ‘कांटा अड़ा तो अड़ा, छाला पड़ा तो पड़ा, पर निगोड़ी तू क्यों मेरी पनछाला हुई।’

सराहना रानी केतकी के जोबन का

रानी केतकी का भला लगना लिखने पढ़ने से बाहर है। वह दोनों भौवों की खिंचावट और पुतलियों में लाज की समावट और नुकीली पलकों की रुँधावट हँसी की लगावट और दंतड़ियों में मिस्सी की ऊदाहट और इतनी सी बात पर रुकावट है। नाक और त्योरी का चढ़ा लेना, सहेलियों को गालियाँ देना और चल निकलना और हिरनों के रूप में करछालें मारकर परे उछलना कुछ कहने में नहीं आता।

सराहना कुँवर जी के जोबन का

कुँवर उदैभान के अच्छेपन का कुछ हाल लिखना किससे हो सके। हाय रे उनके उभार के दिनों का सुहानापन, चाल ढाल का अच्छन बच्छन, उठती हुई कोंपल की काली फबन और मुखड़े का गदराया हुआ जोबन जैसे बड़े तड़के धुंधलके हरे भरे पहाड़ों की गोद से सूरज की किरनें निकल आती हैं। यही रूप था। उनकी भींगी मसों से रस टपका पडता था। अपनी परछाँई देखकर अकड़ता. जहाँ जहाँ छाँव थी, उसका डौल ठीक ठीक, उनके पाँव तले जैसे धूप थी।

दूल्हा उदैभान का सिंहासन पर बैठना

दूल्हा उदैभान सिंहासन पर बैठा, और इधर उधर राजा इंदर और जोगी महेंदर गिर जम गए और दूल्हा का बाप अपने बेटे के पीछे माला लिये कुछ गुनगुनाने लगा। और नाच लगा होने और अधर में जो उड़नखटोले राजा इंदर के अखाड़े के थे। सब उसी रूप से छत बाँधे थिरका किए। दोनों महारानियाँ समधिन बन के आपस में मिलियाँ चलियाँ और देखने दाखने को कोठों पर चन्दन के किवाड़ों के आड़ तले आ बैठियाँ। सांग संगीत, भँड़ताल, रहस हँसी होने लगी। जितनी राग रागिनियाँ थीं, यमन कल्यान, सुध कल्यान, जजवंती, कान्हड़ा, खंचाव, सोहनी, परज, विहाग, सोरठ, कालिगड़ा, भैरवी, खटललित भैरों, रूप पकड़े हुए सचमुच के जैसे गाने वाले होते हैं, उसी रूप में अपने अपने समय पर गाने लगे और गाने लगियाँ। उस नाच का जो ताव भाव रचावट के साथ हो, किसका मुंह जो कह सके? जितने महाराजा जगत परकास के सुखचैन के घर थे, माधो बिलास, रसधाम, किसन निवास, मच्छी भवन, चंदर भवन सबके सब लप्पे लपेटे और सच्ची मोतियों की झालरें अपनी अपनी गाँठ में समेटे हुए एक भेस के साथ मतवालों के बैठनेवालों के मुँह चूम रहे थे। बीचों-बीच उन सब घरों के एक आरसी धाम बनाया गया था, जिसकी छल और किवाड़ और आंगन में आरसी छत, कहीं लकड़ी ईंट पत्थर की पुट एक ऊंगली के पौरे भर न थी. चांदनी का जोड़ा पहने हुए चौदहवीं रात जब घड़ी छः एक रात रह गयी, तब रानी केतकी-सी दुल्हन को उसी आरसी भवन में बिठा कर दूल्हा को बुला भेजा. कुंवर उदैभान कन्हैया बना हुआ सिर पर मुकुट धरे सेहरा बांधे उसी तड़ावे और जमघट के साथ चांद-सा मुखड़ा लिये जा पहुंचा. जिस-जिस ढब से बाम्हन और पण्डित कहते गये और जो-जो महाराजों में रीतें होती चली आतियां थीं, उसी डौल से उसी रूप से भंवरी गठजोड़ा सब कुछ हो लिया.

दोहे अपनी बोली के-

जब उदैभान और रानी केतकी दोनों मिले

आस के जो फूल कुम्हलाए हुए थे फिर खिले

चैन होता ही न था जिस एक को उस एक बिन

रहने-सहने सो लगे आपस में अपने रात दिन

ऐ खिलाड़ी, यह बहुत था कुछ नहीं थोड़ा हुआ

आन कर आपस में जो दोनों का गठ जोड़ा हुआ

चाह के डूबे हुए, ऐ मेरे दाना सब तिरें

दिन फिरे जैसे उन्हों के वैसे सबके दिन फिरें

वह उड़न खटोले वालियां जो अधर में छत बांधे हुए थिरक रही थीं, भर-भर झोलियों और मिठाइयों हीरे और मोतियों से निछावर करने के लिए उतर आइयां और उड़न खटोले ज्यों के त्यों अधर में छत बांधे हुए खड़े रहे. दूल्हा-दूल्हन पर से सात बारी फेरे होने में पिस-पिस गइयां और उन सभी को एक चक्की-सी लग गयी. राजा इन्दर ने दूल्हन की मुंह दिखाई में एक हीरे का इकडाल छपरखट और एक पेढ़ी पुखराज की दी और एक पारजात का पौधा जिससे जो फल मांगिए सो ही मिले, दूल्हन के साम्हने लगा दिया, और एक कामधेनु गाय की पठिया भी उस के नीचे बांध दी, और इक्कीस लौंडियां उन्हीं उड़नखटोले वालियों में से चुन के अच्छी-सी अच्छी, सुथरी से सुथरी गाती बजातियां, सीती पिरोतियां, सुघड़ से सुघड़ सौंपी और उन्हें कह दिया, ‘रानी केतकी छुट उन के दूल्हा से कुछ बातचीत न रखियो, तुम्हारे कान पहले ही मरोड़े देता हूं, नहीं तो सबकी सब पत्थर की मूरतें बन जाओगी और अपना किया आप पावोगी.’

और गुसाई महेंदर गिर जी ने बावन तौले पाव रत्ती जिसे कहते हैं और सुनते हैं उसके अेक्कीस मटके आगे रखे और कहा, ‘यह भी एक खेल है, जब चाहिए तो बहुत सा तांबा गला के एक इतनी-सी चुटकी छोड़ दी जाएगी, कंचन हो जायेगा.’ और जोगी जी ने यह सभी से कह दिया, ‘जो लोग उन के ब्याह में जागे हैं, उन के घरों में चालीस दिन रात सोने की टिड्डियों के रूप में हुन बरसें और जब तक जियें किसी बात को फिर न तरसें.’

नौ लाख निन्नानवे गायें सोने रूपे की सिंगोटियों की जड़ाऊ गहना पहने हुए घूंघरू झंझनातियां, बाम्हनों को दान हुई और सात बरस का पैसा सारे राज को छोड़ दिया गया. बाईस से हाथी और छत्तीस से ऊंट रूपों के तोड़े लदे हुए लुटा दिए. कोई इस भीड़-भाड़ में दोनों राज का रहने वाला ऐसा न रहा जिसको घोड़ा, जोड़ा रूपा का तोड़ा सोने के जड़ाऊ कड़े की जोड़ी न मिली हो.

दूल्हा-दूल्हन के पास किसी का मजाक न था जो बिन बुलाये चली जाये, बिने बुलाये दौड़ी आगे तो वही आये और हंसाये तो वही हंसाये. रानी केतनी के छेड़ने को उन के कुंवर उदैभान को कुंवर केवड़ा जो कहके पुकारती थीं और उसी बात को सौ-सौ रूप से संवारती थीं.

दोहे अपनी बोली के-

घर बसा जिस रात उन्हों का तब मदनबान उस घड़ी

कह गयी दूल्ही दूल्हन को ऐसी सौ बातें कड़ी

बास पाकर केवड़े की केतकी का जी खिला

सच है, इन दोनों जनों को अब किसी की क्या पड़ी

क्या न आयी लाज कुछ अपने पराये की? अजी

थी अभी उस बात की ऐसी भला क्या हरबड़ी

मुस्करा कर तब दुल्हन ने अपने घूंघट से कहा

मोंगरा सा हो कोई, खोले जो तेरी गुलझड़ी

जी में आता है तेरे हांठों को मल डालूं अभी

बिल बे, ऐ रंडी, तेरे दांतों की मिस्सी की धुड़ी!

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रचनाकार: प्राची अक्टूबर 2018 : धरोहर रानी केतकी की कहानी // सैयद इंशा अल्ला खां ‘इंशा’
प्राची अक्टूबर 2018 : धरोहर रानी केतकी की कहानी // सैयद इंशा अल्ला खां ‘इंशा’
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