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प्राची अक्टूबर 2018 : कहानी // हेलमेट // देवेन्द्र कुमार मिश्रा

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कहानी हेलमेट देवेन्द्र कुमार मिश्रा सबलसिंह ने मोटर साइकिल घर से बाहर निकाली। पत्नी को आवाज दी, ‘‘जल्दी चलो।’’ उन्हें अस्पताल जाना था पड़ोसी ...

कहानी

हेलमेट

देवेन्द्र कुमार मिश्रा

सबलसिंह ने मोटर साइकिल घर से बाहर निकाली। पत्नी को आवाज दी, ‘‘जल्दी चलो।’’ उन्हें अस्पताल जाना था पड़ोसी को देखने। पड़ोसी से उनके सम्बन्ध बहुत अच्छे तो नहीं थे। कई बार बच्चों को लेकर, कूड़ा-करकट फेंकने को लेकर उनका झगड़ा हो चुका था। इसे झगड़ा भी नहीं कह सकते पूरी तरह से। बहस में तू-तू-मैं-मैं की स्थिति बनी थी कई बार। सबलसिंह अपने नियम से चलते थे। कचरा अपने घर के सामने फेंकते थे। पड़ोसी रामफल शर्मा का कहना था, ‘‘या तो आप कचरा जलाइये या कचरा गाड़ी आती है नगर पालिका की, उसमें डालिये। हवा चलने पर कचरा उड़कर मेरे घर में आता है।’’

‘‘मैं कचरा गाड़ी का रास्ता देखता रहूँ सारा दिन। कभी भी आ जाते हैं। फिर एक मिनट के लिए भी नहीं रुकते।” सबलसिंह ने कहा।

‘‘तो कचरा पेटी में डालिए.’’ रामफल शर्मा ने कहा.

"कचरा पेटी घर से एक किलोमीटर दूर है। क्या वहाँ तक कचरा लेकर जाऊँ? ये क्या बात हुई?”

"तो जला दीजिए।”

"आपको क्या तकलीफ है? ज्यादा उपदेश मत दीजिए। आपके अलावा किसी और को तकलीफ नहीं होती। आप मुझसे जलते हैं।”

"मैं क्यों जलूंगा?”

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"पिछली बार बच्चों के झगड़ने पर मैंने आपके बच्चे को डांट दिया था, इसलिए।”

"बच्चे हैं, साथ खेलेंगे तो लड़ेंगे भी और फिर साथ खेलेंगे। आपने मेरे बच्चे को डांटा। मैंने तो कुछ नहीं कहा। लेकिन आपके बच्चे को मैंने डांटा तो आप लड़ने आ गये थे।”

"मेरे बच्चे को डांटने का अधिकार किसी को नहीं है। उसके माता-पिता हैं अभी।”

"फिर आपने मेरे बच्चे को क्यों डांटा? उसके माता-पिता भी जिन्दा हैं।”

"उसी बात का तो आप बदला लेते रहते हैं। कभी कचरे की आड़ में, कभी नाली सफाई के नाम पर।”

"मैं ऐसा आदमी नहीं हूँ। सही को सही, गलत को गलत कहता हूँ। ये मेरा स्वभाव है।”

"आप अपना स्वभाव बदलिये। सही, गलत कहने वाले आप कौन होते हैं?” फिर शर्मा जी कुछ कहते। सबलसिंह उसका उत्तर देते। बात से बात निकलती और बहस बढ़ती जाती। व्यर्थ का तनाव बढ़ता। मन में खटास आती।

शर्माजी अस्पताल में थे। मुहल्ले के सभी लोग देखने जा चुके थे। सबलसिंह की पत्नी ने कहा- "दूर-दूर के लोग मिलकर आ गये हैं। हमारे तो पड़ोसी हैं। मनुष्यता और पड़ोसी धर्म के नाते हमें उन्हें देखने चलना चाहिए।” सबलसिंह को बात ठीक लगी। उन्होंने कहा- "आज शाम ही चलते हैं।’’ और सबलसिंह ने मोटर साइकिल स्टार्ट की। पत्नी बाहर आई तो पति से कहा- "आप हेलमेट तो लगा लीजिए।”

"अभी पुलिस की चेकिंग नहीं चल रही है। तुम बैठो।”

"हेलमेट पुलिस से बचने के लिए नहीं, हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी है।”

"तो तुम क्या समझती हो? हेलमेट लगाने से एक्सीडेंट नहीं होते। उल्टा हेलमेट लगाने से कुछ सुनाई नहीं देता। न पीछे आने वाली गाड़ियों के हार्न। तुम कुछ कहोगी। मैं कुछ कहूँगा तो आपस की बातचीत भी नहीं सुनाई देगी। सिर पर बोझ की तरह लगता है हेलमेट। और मान लो एक्सीडेन्ट हो गया। सिर भर बच गया और हाथ-पैर और बाकी के शरीर में गहरी चोटें लगीं तो क्या हेलमेट बचा लेगा? पुलिस तो नये-नये नियम बनाती रहती है. पब्लिक से जुर्माना के नाम पर अपनी जेब भरने के लिए।”

"सिर सबसे नाजुक हिस्सा है। इसलिए हेलमेट जरूरी है।”

"पढ़ी लिखी बीवियों का यही तो नुकसान है। उपदेश बहुत देती हैं। तुम बैठो ना।”

"उपदेशो ही मूर्खाणां प्रकोपाय न शांतये” पत्नी रमादेवी ने धीरे से कहा।

"क्या कहा?”

"कुछ नहीं चलिए।”

पत्नी रमादेवी मोटर साइकिल के पीछे बैठ गई। सबलसिंह ने गियर में गाड़ी डाली। एक्सीलेटर दिया और मोटर साइकिल को अस्पताल की ओर मोड़ दिया।

गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी उन्होंने। पत्नी ने कहा- "धीरे चलिए। मोटर साइकिल है। शहर में हैं। हवाई जहाज की तरह मत चलाइये।”

"मैं इसी तरह चलाता हूँ। आप शांति से बैठी रहिये।”

उन्हें दायें मुड़ना था। गाड़ी थोड़ी धीमी की और दायीं तरफ घुमा दी। तभी पीछे से कोई जोर से चीखा। चीख के साथ उसकी गाड़ी के ब्रेक की आवाज आई। पीछे वाले की मोटर साइकिल सबलसिंह की मोटर साइकिल से टकराते-टकराते बची। वह आदमी चीखा- "मुड़ते समय इन्डीकेटर नहीं दे सकते।”

सबलसिंह भी चीखे, "शहर में इतनी तेज गाड़ी क्यों चलाते हो कि कन्ट्रोल न हो सके?”

"गलती तुम्हारी थी. तुम्हें इन्डीकेटर देना चाहिए।”

पीछे वाली मोटर साइकिल पर तीन लोग बैठे हुए थे। सबलसिंह ने कहा- "एक तो नियम विरुद्ध चलते हो। एक बाइक पर तीन सवारी गैर-कानूनी है। चलना है थाने। सामने बोर्ड पर लिखा है- धीरे चलिए और आप सौ की स्पीड से चल रहे हैं।”

वह आदमी थोड़ा डर गया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। बिना कुछ बोले वह निकल गया।

पत्नी रमादेवी ने कहा- "दूसरों की गलती तो आप तुरन्त पकड़ लेते हैं और अपनी गलती का क्या? आप भी तो स्पीड में चल रहे थे। आपने भी तो मुड़ने का इन्डीकेटर नहीं दिया था।”

सबलसिंह ने कहा- "ऐसा करना पड़ता है। सामने वाले की गलती निकालना जरूरी है। नहीं तो वो चढ़ बैठता हमारे ऊपर।”

सबलसिंह ने गाड़ी की स्पीड फिर बढ़ा दी। सामने चौक पर उन्होंने देखा। पुलिस की गाड़ी वाहनों की चेकिंग कर रही थी।

उन्होंने गाड़ी धीमी की और वापस मोड़ दी। "क्या हुआ?” रमादेवी ने पूछा।

"सामने चेकिंग चल रही है। दूसरे रास्ते से चलना होगा।”

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"आपके पास गाड़ी के कागजात तो हैं।”

"हां हैं, लेकिन तुम इन पुलिस वालों को नहीं जानती। न जाने किस बात का चालान काट दें। इनका तो काम ही है। गाड़ी अपनी, लाइसेंस भी है। फिर भी हमें ही चोरों की तरह छिपकर, रास्ता बदलकर निकलना पड़ता है। ऐसा है कानून हमारे देश का।” कहते हुए सबलसिंह ने बाइक मोड़ी और दूसरे रास्ते की ओर घुमा दी। ये रास्ता लम्बा था लेकिन पुलिस के चालान से बचने के लिए सबलसिंह को दूसरा लम्बा रास्ता मंजूर था।

"अगर इस रास्ते के किसी चौक पर पुलिस वाले वाहन चेकिंग करते मिल गये, तब क्या करोगे? है कोई तीसरा रास्ता भी।” पत्नी रमादेवी ने कहा।

"शुभ-शुभ बोलो.” सबलसिंह ने कहा।

आगे गाड़ी रोकनी पड़ी। सुनसान रास्ता था। सामने कुछ लड़के खड़े थे पूरा रास्ता रोके हुए।

"पुलिस से बचोगे तो गुंडों में फंसोगे। जो कुछ पास में है सब निकालकर रख दो। नहीं तो लाश मिलेगी दोनों की।” कहते हुए एक मजबूत कद-काठी के मवाली टाइप आदमी ने चाकू निकालकर सबलसिंह पर तान दिया। न भागने का कोई रास्ता था और न ही दूर-दूर तक उन्हें कोई नजर आ रहा था। शेष मवाली ने सबल की घड़ी, मोबाइल, पर्स और चाकूधारी ने रमादेवी का मंगलसूत्र और हाथ में पहनी सोने की अंगूठी उतार ली। दोनों पति-पत्नी थर-थर कांप रहे थे।

"चलो भागो यहां से। पुलिस में शिकायत की तो खैर नहीं तुम्हारी।” चाकूधारी मवाली ने कहा।

रमादेवी गुस्से में चीख पड़ीं, "हजार-पाँच सौ के चालान से बचने के चक्कर में लाख रुपये का सामान चला गया।”

"शुक्र है जान बच गई और बाइक भी। चलो निकलते हैं। अस्पताल से वापसी पर रिपोर्ट दर्ज करेंगे।” सबलसिंह ने कहा।

वे अस्पताल पहुंचे। सबलसिंह अब कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे। सो उन्होंने बाइक अस्पताल के स्टैण्ड पर खड़ी कर दी। उनके पास बाइक का इन्श्योरेन्स नहीं था। करवाया ही नहीं था उन्होंने व्यर्थ मानकर। अस्पताल में शर्माजी से मिले। हालचाल पूछने पर शर्माजी ने बताया कि उन्हें फर्स्ट स्टेज का कैंसर है।”

"व्यर्थ के शौक से खर्चा भी और बीमारी। अब तो तम्बाकू, सिगरेट बन्द कर दो।” सबलसिंह ने यहां भी अपना ज्ञान बघारा। लेकिन पीड़ित शर्माजी ने इसका बुरा नहीं माना और कहा- "मैं तो शुरूआती स्टेज पर हूँ। दो-चार लाख का खर्चा करके बच भी जाऊंगा शायद। मैंने तो तोबा कर ली। तुम भी बन्द कर दो शराब। इस अस्पताल में शराब से बीमार कई लोग भर्ती हैं।”

"मैं कौन सी रोज पीता हूँ?”

"जहर थोड़ा भी बहुत होता है।”

शर्माजी और सबलसिंह यहां भी बहस करने लगे। पत्नी रमादेवी ने इशारा किया, तब शांत हुए। इसके बाद वे पुलिस चौकी गये। रिपोर्ट लिखाई। हवलदार ने सबसे पहला प्रश्न पूछा- "पत्नी के साथ उस सुनसान रास्ते से गये ही क्यों थे?” झूठा-सच्चा उत्तर देकर वे वापस लौटे। इस तरह दिन दहाड़े लुटने से उन्हें स्वयं पर गुस्सा आ रहा था। इस गुस्से में गाड़ी की रफ्तार बढ़ती गई। पत्नी रमादेवी उन्हें गाड़ी धीरे चलाने के लिए कहती रहीं। लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वे बस यही सोच रहे थे कि अब पत्नी के लिए मंगलसूत्र, अंगूठी फिर से बनवानी पड़ेगी। घड़ी, मोबाइल तो खैर वे खरीद लेंगे। पर्स में भी हजार-पाँच सौ रुपये पड़े थे। उसका भी कोई गम नहीं था। लेकिन यदि हेलमेट लगा लेता तो क्या चला जाता? थोड़े से पैसे से बचने के चक्कर में लंबा नुकसान उठाना पड़ा। पता नहीं लूट की चीजें मिलेंगी भी या नहीं। कल खबर अखबार में आयेगी। लोग दस सवाल पूछेंगे। हेलमेट रखा तो था घर पर। कम से कम परिवार के साथ चलते समय तो सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। पत्नी क्या सोच रही होगी मेरे बारे में. घर में लोग अलग डांट-फटकार करेंगे। बच्चे भी डांटेंगे और माता-पिता भी।

सामने से तीव्र रफ्तार से एक बाइक पर तीन लड़के आ रहे थे। उनकी बाइक सौ से भी ऊपर की स्पीड में होगी। सबलसिंह ने तेजी से हॉर्न बताया। सामने वाला बाइकर संभल तो गया, फिर भी संभलते-संभलते हल्के से दोनों की बाइक आपस में टकरा गईं। लड़के की स्पोर्टस बाइक थी। चौड़े पहिये थे। थोड़ा सा संतुलन बिगड़ा, लेकिन बाइक वाले लड़के ने संभाल ली। वे भाग निकले। लेकिन सबलसिंह नहीं संभाल पाये। उनकी गाड़ी गिरी। काफी दूर तक घिसटी। पत्नी की चीख सुनी उन्होंने। वे गाड़ी के नीचे दबे पड़े थे। पत्नी उनसे थोड़ी दूर बेहोशी की हालत में पड़ी थीं।

आते-जाते लोगों में से कुछ उन्हें शराबी, तेज स्पीड से चलने का अंजाम कहकर निकल रहे थे। कुछ लोगों ने अपने मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने शुरू कर दिये। धीरे-धीरे भीड़ इकट्ठा हो गई। सबलसिंह को बहुत पीड़ा हो रही थी। वे सोच रहे थे ये कैसे लोग हैं जो दुर्घटनाग्रस्त लोगों की मदद करने की बजाय मोबाइल से फोटो खींच रहे हैं। वीडियो बना रहे हैं। ठोकर मारने वाले तो भाग निकले। क्या मैंने भी किसी दुघर्टनाग्रस्त व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार किया था। हाँ, किया था। वे मदद की गुहार लगा रहे थे। भीड़ इस बात पर टीका-टिप्पणी कर रही थी कि गलती किसकी है। इनकी या उन लड़कों की। समय खराब होता है तो कुछ भी हो सकता है। पुलिस को खबर की जाये या एम्बुलेंस को। पता नहीं औरत जिन्दा भी है या मर गई। पुलिस की झंझट में कौन पड़े? इन्हें भी देखकर चलना चाहिए।

वीडियो अपलोड करके वाट्स-एप, फेसबुक पर भेज दिये गये थे। और सबलसिंह को अपने से ज्यादा लोगों की भीड़ कमजोर, हृदयहीन और निर्बल नजर आ रही थी।

तभी भीड़ को चीरते हुए एक आदमी आया। उसने भीड़ को डांटते हुए कहा- "शर्म नहीं आती आप लोगों को। घायलों की मदद करने की जगह तमाशा बना रखा है।” फिर उस आदमी ने अपने साथियों को पुकारा। सबने मिलकर सबलसिंह को मोटर साइकिल से निकाला। उनकी बेहोश पत्नी को अपनी गाड़ी में लिटाया और अस्पताल चलने के लिए कहा। सबलसिंह के हाथ-पैर में मामूली चोट थी। पत्नी को होश आ चुका था। उनकी कमर में चोट लगी थी। डॉक्टर ने कहा- "घबराने की कोई बात नहीं है। सब ठीक है। अच्छा है सिर में चोट नहीं लगी। वरना बचना मुश्किल था।”

और सबलसिंह सोच रहे थे। काश उन्होंने हेलमेट लगाया होता तो ये सारी झंझट ही न होती।

संपर्कः भरत नगर, चन्दन गांव,

छिन्दवाड़ा (म. प्र.)

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रचनाकार: प्राची अक्टूबर 2018 : कहानी // हेलमेट // देवेन्द्र कुमार मिश्रा
प्राची अक्टूबर 2018 : कहानी // हेलमेट // देवेन्द्र कुमार मिश्रा
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