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दीवाली विशेष हास्य-व्यंग्य रचना – हमारी वाली दीवाली - मंजुला

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"ऐ जी सुनते हो" हमने बड़े प्यार से इनसे कहा। "हाँ बोलो" इन्होंने पेपर में मुँह घुसाए हुए ही कहा। "वो ना हम ने सोच लि...

manjula

"ऐ जी सुनते हो" हमने बड़े प्यार से इनसे कहा।

"हाँ बोलो" इन्होंने पेपर में मुँह घुसाए हुए ही कहा।

"वो ना हम ने सोच लिया है इस बार हम दीवाली में कोई शौपिंग नहीं करेंगे, जो पुराना सामान है उसे ही री यूज करेंगे और ड़बलू बबलू को भी समझा दिया है वो भी इस बार इकोफ्रेंडली दीवाली मनाएँगै, है ना डबलू बबलू"

"जी मम्मी" डबलू बबलू नें एक स्वर में कहा तो हमारे ऐ जी तो सोफे से कूद ही पड़े खुशी के मारे।

"क्या कह रही हो भागवान क्या सचमुच? मुझे तो मेरे कानों में यकीन ही नहीं हो रहा" हमारे ऐ जी की आँखों में बाई गॉड खुशी के आँसू आ गए।

"हम तो इस बार दीवाली की पार्टी भी नहीं देंगे, बेकार में कितना खर्चा हो जाता है, आपका" हमने आगे कहा।

"अरे बस कर पगली अब रुलाएगी क्या" कहते हुए ये हमारी तरफ बढ़े, वो तो डबलू बबलू थे, वरना ये तो हमारी पप्पी ही ले लेते बाई गॉड।

अगले दिन रविवार था, तो हम सुबह से तैयार हो गए, डबलू बबलू को भी तैयार कर दिया, हमारे ऐजी ने पूछा "कहाँ की तैयारी है मैड़म, बिल्कुल कयामत लग रही हो" , हमने कहा हमें तो शौपिंग करनी नहीं है। लेकिन शगुन के चार दिए तो लेने ही पड़ेंगे, और इसी बहाने बाजार की रौनक भी देख आएँगे।

अरे क्यों नहीं मैडम आप ने हमारे इतने पैसे जो बचा लिए, चलिए हम आपको बढ़िया लंच भी करवाएंगे।

तो ऐसा है जी हम पहुँच गए बाजार, अब हमें लेना तो कुछ था नहीं, मगर बाई गॉड क्या बाजार सजा था , एक से बढ़कर एक चीजें, हर जगह सेल, सेल , सेल और मुफ्त , मुफ्त, मुफ्त का शोर था।

सामने की साड़ी की दुकान पर हमारी नज़र पड़ी, तो हमसे रहा नहीं गया , हमने कहा "ऐजी हमें कुछ लेना तो है नहीं, पर क्या हम बस देख आए, इस बार क्या नया है , वो क्या है ना कि भले न लो लेकिन अपडेट रहना चाहिए"

इन्होंने भी कह दिया "देखना भर है ना, देख लो, देखने में कोई बुराई नहीं है" इतना सुनना था, कि हम तो कूद के पहुंच गए अंदर, बाइ गॉड जब नहीं लेना होता, तभी इतनी सुंदर साड़ियाँ आती है बाजार में, अब हमारा हाल तो ऐसा जैसे प्यासे को कुँए के पास बिठाकर कह दिया हो कि पानी ना पीना, और यहाँ तो कहने वाले भी हम, हाय रे फूटी किस्मत।

फिर दिखी वो वाइन कलर की बनारसी साड़ी जिसकी तलाश हमें जनम जनम से थी, उसे देखकर ऐसा लगा कि उसे सिर्फ और सिर्फ हमारे लिए ही बनाया गया है। हमने उसे हाथ में उठाया , प्यार से सहलाया, मानो पूछ रहे हो "पगली कहा थी इतने दिनों तक "और फिर कंधे पर डालकर आइने के सामने खड़े हो गए। उफ्फ वो फीलिंग हम बयान ही नहीं कर सकते, उस पल बस हम थे और वो बनारसी साड़ी ।तभी शीशे में एक अक्स उभरा, शक्ल जानी पहचानी सी लगी, ओह ये तो हमारे ऐ जी थे, हम तो भूल ही गए थे। फिर याद आया कि हमें तो कुछ खरीदना ही नहीं था। लेकिन ये साड़ी कैसे छोड़ दें, इसके बदले तो कोई हमारी जान ही माँग ले। हमारा बस चलता तो हम उसके लिए वहीं आमरण अनशन पर बैठ जाते। लेकिन जो काम आँखों से हो सकता है उसके लिए पेट को क्यों कष्ट देना। तो जी हम आँखों में ढ़ेर सारा प्यार, और उससे भी ज्यादा रिक्वेस्ट वाले मिश्रित भाव लेकर ऐजी की तरफ पलटे। अजी वो तो ब्रम्हास्त्र था, और कोई चारा नहीं था उनके पास। आखिर वो साड़ी दिलानी ही पड़ी।

हम खुशी खुशी बाहर आए, फिर हमारे अंदर की माँ जाग गई, दीवाली में नई साड़ी पहने और हमारे डबलू बबलू नए कपड़े ना पहने ऐसा कैसे हो सकता है, फिर हमने हमारे दिमाग आए विचार को ठीक वैसे ही ऐ जी के सामने रखा। आखिर हम माँ हैं तो वो भी तो पाss हैं..तो जी हमारे डबलू बबलू के नए कपड़े भी आ गए। अब हम हमारे प्यारे ऐ जी को कैसे छोड़ देते, सो उनके लिऐ भी लिए।

फिर बच्चों को पटाखे की दुकान दिख गई। वो भी बस देखने को गए कि इस बार कौन से नए पटाखे आए है। लेना तो हमें था नहीं, लेकिन क्या करते इस बार हर पटाखा नया सा लगा, चकरी नई, फुलझड़ी नई, बम नए। बच्चे भी क्या करते उन्होंने ऐसे पटाखे कभी देखे ही न थे। तो जी हमारे बच्चे ना बाई गॉड हमपर ही गए हैं, तो उन्होंने भी आँखों की भाषा सीख ली थी, अरे वही प्यार और रिक्वेस्ट के मिक्स भाव वाली। बस थैले भर पटाखे भी आ गए।

फिर बस यूँ ही, वो कर्टन्स, कुशन कवर, शो पीस सब कुछ दिखते गए जो हमारी दीवार और घर से बिल्कुल मैच करते थे। बाई गॉड हमें लेना नहीं था, लेकिन क्या करते जी ऐसी चीज़ें बार बार तो नहीं मिलती ना। फिर हमने कहा अब दोस्तों को देने के लिए गिफ्ट्स भी ले ही लेते है, अब इतना कुछ लिया है कोई तो आए देखने के लिए, वरना लेना बेकार नहीं हो जाएगा। तो जी ऐसा करते करते हमने आलमोस्ट पूरा बाज़ार खरीद लिया। और रात का डिनर करके घर पहुँचे। और जैसे ही कार घर के सामने रुकी हम जोर से चिल्लाए- "हेsssss भगवान! हम शगुन के चार दिए लेना तो भूल ही गए...कोई बात नहीं जी, हम फिर चलेंगे शगुन के चार दिए लेने, है ना ऐ जी"

नहींहींहींssssss...इस बार चिल्लाने की बारी हमारे ऐ जी की थी, और कार के रेड़ियो में पुराना गाना बज रहा था" हम तो गए बाजार, लेने को....... "

तो जी हमारे विचार से, जितनी सेविंग्स करनी है ना, वो साल भर करें, और त्योहार को ना, त्योहार की तरह मनाएं।

आपकी क्या राय है इस बारे में?

©मंजुला

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