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कहानी // उत्तर कथा // आशीष दशोत्तर


शेर जब शिकारी के जाल में कैद हो गया तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। अब तक खुद को राजा कहने वाला एक शिकारी के जाल में फँस जाए? कितनी शर्मनाक बात है। अचानक उसे याद आया कि उसने जब उस चूहे को जीवनदान दिया था तब उसने वादा किया था कि संकट की घड़ी में पुकारना मैं चला आऊँगा। उस वक्त शेर ने कहा भी था कि भला एक शेर को किसी चूहे की क्या ज़रूरत पड़ सकती है। मग़र पेट भरा होने और चूहे को मारने में अपनी तौहीन समझते हुए शेर ने चूहे को अभयदान दे दिया था। शेर के मस्तिष्क में वे दृश्य फिल्म की तरह चल रहे थे और शेर मन ही मन यह निश्चय कर चुका था कि उसे अब चूहे को पुकारना ही चाहिए। अपनी शक्ति को भूलकर, अपने पद को कुछ पलों के लिए विस्मृत कर शेर ने चूहे को आवाज़ लगाई। चूहा आराम कर रहा था। अचानक शेर की पुकार सुन करवट बदलकर सो गया। शेर ने फिर आवाज़ लगाई तब चूहा समझ गया कि ‘‘अब मुसीबत में फँस गया लगता है। बच्चू खूब इतराता फिरता था। जंगल का राजा कहता घूमता रहता है। चलो देखें क्या कमाल कर रहा है राजा’’ यह कहते हुए चूहा शेर की आवाज़ की दिशा में चल पड़ा।

वहाँ पहुँचते ही शेर को जाल में कैद देख चूहे की एक पल के लिए हँसी निकल पड़ी मग़र अपनी हँसी को रोकते हुए शेर से मुखातिब हुआ। शेर से पूछा, ‘‘किसने की यह दशा?’’ शेर परेशान तो था ही थोड़ा चिढ़कर बोला, ‘‘उसे तो मैं देख ही लूंगा। पहले तू मेरा ये जाल काट दे।’’

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चूहे को शेर का यह व्यवहार ठीक नहीं लगा। उसने वक्त की नज़ाकत देखते हुए शेर से कहा, ‘‘जाल में क़ैद होने वाले को ऐसे लहजे में बात नहीं करना चाहिए। थोड़ा अनुनय-विनय से काम लें।’’ शेर चूहे की इस हिमाकत पर नाराज़ हुआ मग़र उसने गुस्सा पी लिया। चूहे से विनम्रतापूर्वक बोला, ‘‘मुझे इस क़ैद से बाहर कर दो प्लीज़।’’

एक राजा की इस निरीहता का चूहा कायल हो गया। उसने तत्काल अपने साथियों को बुलाया और शेर का जाल अपने मज़बूत दातों से काट कर उसे आज़ाद कर दिया।

यहाँ से इस कहानी की एक तरह से शुरूआत होती है। चूंकि इससे पहले तक की सभी घटनाओं से पाठक परिचित हैं इसलिए यह उनके लिए नई नहीं थी। मग़र अब जो कहानी सामने आएगी वह वास्तविक कहानी है, जिसे न कभी पढ़ा गया और न ही कभी दादी या नानी ने सुनाया। दादी या नानी की कोशिश हमेशा से कहानी का सुखद अंत करने की रही है, इसलिए इस कहानी का उत्तरार्ध सामने नहीं आ सका।

बहरहाल क़ैद से बाहर आने के बाद शेर को अहसास हुआ कि नेता तिहाड़ से निकलने के बाद इतने प्रसन्न क्यूँ होते हैं? उसके क़ैद के इस प्रथम अनुभव को विस्तृत न करते हुए उस शिकारी को अपनी ताक़त का अहसास कराने का मन ही मन निश्चय किया। शेर ने जाल से आज़ाद होते ही खुली हवा में साँस ली। हालांकि जाल में रहने पर भी खुली हवा उपलब्ध थी फिर भी क़ैद से बाहर आने वाले के लिए ऐसा प्रदर्शन ज़रूरी होता है। क़ैद में तमाम सुविधाओं के बावज़ूद क़ैद, कै़द ही होती है। शेर भी कै़द को महसूस कर चुका था और बाहर आकर उस शिकारी के बारे में सोचने लगा। उसे लगा कि शिकारी पर वार करने के लिए अकेले जाना ठीक नहीं है, इसलिए उसने चूहे को यह प्रस्ताव दिया कि शिकारी के साथ लड़ाई में वह उसके साथ रहेगा। यूं शिकारी से चूहे को कोई खतरा नहीं था और शिकारी ने कभी चूहे को क़ैद करने की कोशिश भी नहीं की थी, पंरतु शेर का आदेश था जो चूहे के लिए बाध्यकारी था। भले ही चूहे ने शेर को जाल से मुक्त किया था मग़र शेर बाहर आकर राजा हो गया था और चूहा उसकी प्रजा। और प्रजा को राज़ा के हर आदेश को मानना ही पड़ता है चाहे वह गलत ही क्यों न हो। यहाँ भी चूहे को शेर के आदेश का पालन करना था मग़र एक चाँस लेते हुए उसने कहा, ‘‘आपकी और शिकारी की लड़ाई में भला मैं क्या करूँगा?’’

इस पर शेर ने आँखे तरेरते हुए कहा, ‘‘क्यों राजा को अकेला जंग में भेजते तुम्हें शर्म नहीं आएगी?’’

चूहा इस पर खामोश हो गया और अधिक न बोलते हुए शेर की बदले की कार्रवाई में शामिल हो गया।

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बदले की कार्रवाई और वह भी शेर के द्वारा अगर इस स्थिति को समझने में कोई परेशानी हो तो इसे सीधे-सीधे यूँ भी समझा जा सकता है कि यह कार्रवाई ठीक वैसी ही कार्रवाई थी, जैसी शक्ति सम्पन्न मुल्क द्वारा अन्य शक्तिहीन समझे जाने वाले देशों पर होती है। तो शेर की इस बदले की कार्रवाई के तहत पहली समस्या यह आई कि शिकारी को ढूंढा कहाँ जाए? चूहा चूंकि शेर के साथ था और शेर के साथ चूहे के अलावा कोई नहीं था इसलिए चूहे का यह कर्तव्य था कि वह समय-समय पर शेर को आवश्यक सलाह देता रहे। चूहा इसका निर्वाह भी कर रहा था और इसी के तहत चूहे ने शेर को यह विनम्र सुझाव दे डाला कि शिकारी को ढूंढने के लिए जंगल-जंगल भटकते हैं, कहीं न कहीं तो दिखेगा ही साला। शेर चूहे के इस सुझाव पर न प्रसन्न हुआ न क्रोधित। कुछ देर चूहे को घूरता रहा फिर बोला, ‘‘तुम जितने छोटे हो, तुम्हारी अक्ल भी उतनी ही छोटी है। अरे, शिकारी को ढूंढने के लिए हम जंगल-जंगल भटकते रहे तो हमारा राम नाम सत्य हो जाएगा मग़र शिकारी नहीं मिलेगा।’’

‘‘तो राजन्, ऐसा करते हैं कि कोई बड़ा सा शिकार सामने रख देते हैं और इंतज़ार करते है। अक्सर घरों में लोग हमें पकड़ने के लिए ऐसा ही प्रयोग करते हैं।’’ चूहे ने यह बात इस विश्वास के साथ कही थी मानो शेर को पंसद आ ही जाएगी। मग़र शेर तो शेर ही होता है। अगर वह किसी की बात मान ले तो खाक शेर रहे। उसने चूहे को डपटते हुए कहा, ‘‘तुम चुप रहो याद। हम उम्रभर भी बैठे रहें न तो कोई शिकारी यहाँ नहीं आने वाला। थोड़ा ऊपर उठकर सोचो। जमीन पर रेंगते-रेंगते तुम्हारी बुद्धि भी रेंगने लगी है। इस बुद्धि का तनिक उपयोग करो। अब तुम शेर के साथ हो। शेर यानी राजा। राजा के किसी अभियान में शामिल होकर ऐसी घटिया सोच रखोगे तो कैसे चलेगा? हमारे स्तर का तो खयाल करो। तुम्हारे विचारों से लगना चाहिए कि तुम हमारे साथ हो।’’ चूहा बेचारा फिर चुप हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि राजा होने से भला कोई ऊँचा कैसे सोचने लगता है? वह मन-मसोसकर रह गया और कोशिश करने लगा कि थोड़ा ऊपर उठकर सोचे और इसके लिए कुछ ऊँची पहाड़ियों पर चढ़कर भी उसने कोशिश की मग़र उसे ऊँचे खयाल नहीं आए तो नहीं आए।

इधर शेर बहुत बेचैन था। अपने ही जंगल में आकर कोई अपने को ही कै़द कर ले, कितनी शर्मनाक बात है। वो तो अच्छा हुआ जब शिकारी ने अपने जाल में फँयाया था तब वहाँ कोई था नहीं। अगर कोई देख लेता और सारे जंगल में यह खबर फैला देता हो राजा की क्या इज्ज़त रहती? सारी प्रजा थू-थू करती। राजा कै़द हो गया। और इससे शर्मनाक स्थिति यह कि एक छोटे से चूहे ने राजा की जान बचाई? वो तो चूहे में विपक्षी नेताओं की तरह के हार्मोन्स नहीं हैं वरना वो इस अवसर का राजनीतिक लाभ उठाते हुए शेर की मिट्टी पलीद कर देता और खुद राजा बन जाता। इस चूहे को साथ में इसीलिए लिया है ताकि कोई इसके कान न भर दे और ना ही ये किसी को यह बता सके कि राजा की जान उसने बचाई है। इस चूहे को तो बाद में देखा जाएगा। फिलहाल शेर के दिमाग़ में वही शिकारी घूम रहा था। अजीब सी शक्ल भी थी उसकी। लम्बे-लम्बे बाल और दाढ़ी इस कदर गुत्थमगुत्था थे कि चेहरा बमुश्किल दिखाई पड़ रहा था। यह तो ठीक हुआ जो वह अपनी बन्दूक भूल आया था और शेर के जाल में फँसते ही बन्दूक लेने भागा। इतनी देर में शेर चूहे की मदद से चकमा देने में कामयाब हो गया। शायद इसकी भनक उसे लग गई होगी। तभी बन्दूक लेने के बाद वो इधर नहीं लौटा। इन शिकारियों का नेटवर्क काफी तगड़ा होता है। शेर की दहाड़ से पहले इनकी खबरें एक दूसरे के पास पहुँच जाया करती है। मग़र जो भी हो शेर को उस शिकारी की जितनी भी सूरत दिखाई दी उसके आधार पर शेर इस स्थिति में था कि शिकारी को अंधेरे में भी पहचान जाए। पर मुसीबत यह थी कि शिकारी को किस तरह ढूंढा जाए। शेर को कई बार उसके दरबारियों ने सलाह दी थी कि अपना खुफिया तन्त्र मजबूत करो, मग़र शेर ने हर बार यह कहते हुए टाल दिया था कि ‘‘हमें इसकी ज़रूरत नहीं।’’ दरबारियों ने यह भी कहा था कि अपना नेटवर्क तगड़ा होना चाहिए पर शेर को इसमें कुछ संदेह लगा। शेर को लगा कि ऐसी व्यवस्था कर दरबारी राजा की ही निगरानी करना चाह रहे हैं, सो शेर ने इधर भी ध्यान नहीं दिया। खैर।

अभी शिकारी को ढूंढना एकमात्र लक्ष्य था और चूहा उसके साथ था। उसने चूहे की तरफ नज़र घुमाई और कहा, ‘‘कुछ सूझा कि नहीं।’’

‘‘क्या कहूँ, ऊपर उठकर सोच ही नहीं पा रहा हूँ।’’

‘‘क्यों, जब तू मेरे सिर पर चढ़ गया था, तब किसने तुझे ऐसी सलाह दी थी?’’

‘‘किसी ने नहीं, मैं तो यूँ ही घूमता हुआ पहुँच गया था बस।’’

‘‘घूमता हुआ?’’ शेर को लगा यह उसकी विशाल काया की तौहीन हो रही है, सो उसने तत्काल बात पलटते हुए कहा, ‘‘अच्छा, नीचे का ही कोई आइडिया हो तो बता?’’

चूहे ने कहा ‘‘एक रास्ता समझ में आता है।’’

‘‘वह क्या?’’ शेर बोला।

चूहे ने कहा, ‘‘आप राजा हैं। आप अगर शिकारी को ढूंढते फिरे तो आपके पद के खिलाफ होगा। मग़र मैं तो चूहा हूँ। मैं ऐसा करता हूँ कि जंगल-जंगल घूमकर यह पता करता हूँ कि शिकारी अभी कहाँ छिपा बैठा है। वैसे भी मैंने सुना है बाह्म जगत में राजाओं के लिए मुखबिरी का काम चूहे ही करते आए हैं। कई मुल्कों की तो सुरक्षा व्यवस्था ही चूहों के भरोसे है।’’

शेर को आश्चर्य हुआ, ‘‘वह कैसे?’’

‘‘वह ऐसे कि चूहे दूसरे मुल्क में घुसकर उन्हें खोखला कर देते हैं, और फिर आपकी तरह वहाँ का राजा उन पर आक्रमण कर देश को अपने कब्जे में ले लेता है। यानी वहाँ का राजा भी बन जाता है।’’

शेर को पहली बार चूहे की बुद्धिमत्ता का अहसास हुआ। चूहे के जनरल नॉलेज और आई.क्यू. पर शेर आश्चर्यचकित था। उसने सोचा कि चूहे का यह प्रस्ताव ठीक लगता है। इससे अपना राजसी ताना-बाना भी बना रहेगा और शिकारी का पता भी चल जाएगा। मग़र संशय एक ही था। कभी यह विपक्षियों के सम्पर्क में आ गया और उन्हें शेर के क़ैद होने वाली बात बता दी तो गड़बड़ हो जाएगी। शेर ने सोच-विचार करते हुए चूहे से कहा, ‘‘तुम्हारा यह प्रस्ताव ठीक लगता है मग़र’’

‘‘मग़र क्या?’’ चूहे ने पूछा।

‘‘तुम इसका ज़िक्र बाहर कहीं न करना। शिकारियों का नेटवर्क तगड़ा होता है। उधर तुमने पता किया और इधर बताने आए तब तक शिकारी किसी दूसरे जंगल में गायब हो सकता है।’’

चूहा शेर की बात समझ गया और उसने विश्वास जताया कि वह इस घटना का कहीं ज़िक्र नहीं करेगा। कोई पूछेगा तो भी नहीं बताएगा कि वह शिकारी को ढूंढ रहा है।

शेर से इजाज़त लेकर चूहा शिकारी की खोज में निकल पड़ा। यह चूहे का टूर प्रोग्राम था और चूहा इसका आनंद उसी अंदाज़ में ले रहा था जिस तरह एक सरकारी कर्मचारी लेता है। घूमते-घूमते एक जगह चूहे ने देखा कि शेर के बताए हुलिए के मुताबिक एक शिकारी बैठा हुआ है। शेर ने जैसा बताया था वैसा ही शिकारी को पाया और तत्काल दौड़ लगा दी शेर की तरफ। हाँफते-हाँफते शेर के पास पहुँचा। चूहे को इतना घबराया हुआ देख, शेर ने सोचा कि हो न हो शिकारी इधर ही आ रहा है। वह अपनी मांद में घुस गया। चूहा सामान्य हुआ तब शेर को आवाज़ देकर बाहर बुलाया।

चूहे ने कहा, ‘‘डरने की बात नहीं, शिकारी इधर नहीं आ रहा।’’ शेर ने चूहे की इस प्राथमिक सूचना पर संतोष व्यक्त करते हुए ऐसा प्रदर्शन किया, जैसे वह बिल्कुल भयभीत न हों। उसने कहा, ‘‘अरे शिकारी से कौन डरता है? हम तो बैठे ही शिकारी का शिकार करने के लिए हैं। वो तो हम आवश्यक कार्य से माँद में गए थे।’’

चूहा भी चूहा था। हर प्राणी की नब्ज़ जानता था। बोला, ‘‘आप तो राजा हैं। आपको किसका भय। मग़र वो शिकारी आपसे डर कर दूसरे जंगल में छिपा हुआ है।’’

‘‘अच्छा? कौन से जंगल में?

‘‘छोटा जंगल, जो हमारे पड़ोस में ही है, वहाँ बैठा देखा मैंने उसे।’’ चूहे ने जानकारी दी।

‘‘तो चलो उसे मार गिराते है।’’ शेर की आँखों में खून तैर गया।

चूहे ने कहा, ‘‘राजन्, यह जोश का काम नहीं है। शिकारी को मारना इतना आसान नहीं है।’’

‘‘क्यों? हम राजा हैं।’’ शेर ने गर्व के साथ दहाडते हुए कहा।

‘‘जी ज़रूर। आप राजा हैं मग़र अपने जंगल के। वह शिकारी उस छोटे जंगल में छुपा हुआ है। वहाँ के राजा ने उसे शरण दे रखी है। हालांकि वह दुनिया के सामने नकारता है। कहता है कि उसने किसी शिकारी को शरण नहीं दी है, मग़र हकीकत सभी जानते हैं।’’ चूहे ने एक साँस में सब कह दिया।

‘‘है तो क्या? हम शक्तिशाली राजा हैं। हम जिस पर चाहें आक्रमण कर सकते हैं।’’ शेर ने दंभ करते हुए कहा।

‘‘भूल जाइए महाराज।’’ चूहा बोला, ‘‘आप ऐसा सोचते हैं, मग़र सच यही नहीं है। इस तरह अचानक आक्रमण करने से कई तरह के सवाल खड़े हो सकते हैं। जीवन अधिकार, जंगल संघ जैसी कई संस्थाएँ खड़ी हो जाएँगी।’’

‘‘तुम उनकी छोड़ो।’’ शेर ने इत्मीनान से कहा, ‘‘वे तो सारी संस्थाएँ हमारी ही बनाई गई है, जो सिर्फ और सिर्फ हमारे ही हित में बोलती रही है। आगे भी वे हमारे पक्ष में बोलने के लिए वचनबद्ध है।’’

‘‘मग़र यह सीधे-सीधे किसी दूसरी सल्तनत पर हमला माना जाएगा, जिसके परिणाम गंभीर भी हो सकते है।’’ चूहे ने सलाह दी।

शेर ने कहा, ‘‘फिर तुम ही बताओ हम क्या कर सकते हैं? हमें हर हाल में शिकारी को मारना है।’’

‘‘कूटनीति’’ चूहा बोला

‘‘कूटनीति?’’ शेर ने आश्चर्य से पूछा।

‘‘जी राजन्। इस शिकारी का शिकार करने के लिए हमें कूटनीति का ही सहारा लेना पड़ेगा।’’ चूहे ने समझाया।

शेर ने कहा, ‘‘यार तुम्हारी बात हमें गले नहीं उतर रही है। हम राजा हैं और किसी को मारने में इस कूटनीति का सहारा लें? यह ठीक होगा?’’

‘‘सब ठीक होगा राजन्। आजकल सब कुछ कूटनीति के जरिये ही हो रहा है। और फिर आपको कुछ नहीं करना है। आप तो यहाँ टी.वी. स्क्रीन पर बैठकर देखिएगा बस। बाकी सारा काम मैं सम्भाल लूँगा।’’ चूहे ने फिर विस्तार से शेर के कान में योजना कही।

कुछ समय बाद शेर ने टी.वी. स्क्रीन पर देखा कि पड़ौसी जंगल में चमत्कारिक ढंग से घुसकर चूहे की कूटनीति ने शिकारी को मार गिराया है। पड़ौसी जंगल के राजा को इसकी खबर भी नहीं लगी। इस तरह अन्य जंगल की ‘कूटनीति’ के देश में घुसने पर वहाँ का राजा शर्मसार है। उसने अपने कूटनीतिज्ञों से विचार विमर्श शुरू कर दिया है। इधर राजा अपने सथियों के साथ शिकारी की मौत का जश्न मना रहा है। शिकारी के हिमायती अपना प्रदर्शन करने में जुटे हैं। राजा ने चूहे का अपना मुख्य रणनीतिकार बना दिया है। राजा अब बेखौफ हो गया है। उसे अब संतोष है। वह अब छोटे-छोटे जंगलों पर कब्ज़ा करने की योजना बनाने में जुट गया है। चूहे की सलाह पर उन जंगलों में चूहे छोड़ दिए गए हैं ताकि वहाँ की ज़मीन को खोखली किया जा सकें।

यह उत्तरकथा आधुनिक दादी-नानी के लिए है। यदि उन्हें टेलीविजन स्क्रीन से वक्त मिले और बच्चे होमवर्क से मुक्त हों तो यह उत्तरकथा सुनाई जा सकती है।

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संक्षिप्त परिचय

नाम - आशीष दशोत्तर

जन्म - 05 अक्टूबर 1972

शिक्षा - 1. एम.एस.सी. (भौतिक शास्त्र)

2. एम.ए. (हिन्दी)

3. एल-एल.बी.

4. बी.एड

5. बी.जे.एम.सी.

6. स्नातकोत्तर में हिन्दी पत्रकारिता पर विशेष अध्ययन।

प्रकाशन - 1 मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा काव्य संग्रह-खुशियाँ कैद नहीं होती-का प्रकाशन।

2 ग़ज़ल संग्रह 'लकीरें',

3 भगतसिंह की पत्रकारिता पर केंद्रित पुस्तक-समर में शब्द-प्रकाशित

4 नवसाक्षर लेखन के तहत पांच कहानी पुस्तकें प्रकाशित। आठ वृत्तचित्रों में संवाद लेखन एवं पार्श्व स्वर।

5. कहानी संग्रह 'चे पा और टिहिया' प्रकाशित।

पुरस्कार - 1. साहित्य अकादमी म.प्र. द्वारा युवा लेखन के तहत पुरस्कार।

2. साहित्य अमृत द्वारा युवा व्यंग्य लेखन पुरस्कार।

3. म.प्र. शासन द्वारा आयोजित अस्पृश्यता निवारणार्थ गीत लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत।

4. साहित्य गौरव पुरस्कार।

5, किताबघर प्रकाशन के आर्य स्मृति सम्मान के तहत

कहानी, संकलन हेतु चयनित एवं प्रकाशित।

6. साक्षरता मित्र राज्य स्तरीय सम्मान

सम्प्रति - आठ वर्षों तक पत्रकारिता के उपरान्त अब शासकीय सेवा में।

संपर्क - 12@2,कोमल नगर,बरबड़ रोड

रतलाम (म.प्र.) 457001

E-mail- ashish.dashottar@yahoo.com

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