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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 38 // आदर्श बहू // दीपक गिरकर

 

प्रविष्टि क्रमांक - 38

आदर्श बहू

मैं और मेरे पड़ोसी रमेश बाबू सुबह की सैर करके आ चुके थे. मेरे घर के ड्राइंग रूम में बैठकर हम दोनों आज का समाचारपत्र पढ़ने में मशगूल हो गये थे. मेरी धर्मपत्नी और हमारे छोटे बेटे की पत्नी, जिसकी शादी हुए अभी दो माह ही हुए थे, मॉर्निंग वॉक से आ गई थी. वे दोनों किसी बात पर खिलखिलाकर घर में घुसी. कुछ समय पश्चात हमारी नयी बहू चाय बनाकर ले आई.

“ बिटिया तुम भी आदर्श बहू का तीन माह का कोर्स क्यों नहीं कर लेती? हमारी बहू ने तो यह कोर्स कर भी लिया है. " रमेश बाबू ने हमारी छोटी बहू को सलाह दी.

“ हां, अंकलजी मुझे मालूम है कि विश्वविद्यालय ने आदर्श बहुएं तैयार करने का तीन माह का शॉर्ट टर्म कोर्स प्रारंभ किया है. चाचाजी, इस घर में मम्मीजी और पापाजी है और ये दोनों ही मेरे लिए आदर्श है. मुझे तो आदर्श बहू का प्रशिक्षण घर पर ही मिल रहा है. ”

बहू मेरी ओर मुख़ातिब हुई " मैंने सच कहा है न पापाजी? ”

मैं सिर्फ़ मुस्काराकर ही रह गया क्योंकि कुछ बोलता, उसके पूर्व ही रमेश बाबू के घर से सास-बहू के लड़ने-झगड़ने की आवाज़ स्पष्ट रूप से सुनाई देने लगी थी.

--

दीपक गिरकर

लघु कथाकार

28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,

इंदौर- 452016


मेल आईडी : deepakgirkar2016@gmail.com

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 7097443911064367730

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