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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 48 // नास्तिक // डॉ. चन्द्रा सायता

प्रविष्टि क्रमांक - 48

डॉ. चन्द्रा सायता

नास्तिक

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        " सुखी । चल जल्दी से नहा धोकर तैयार हो जा। आज ग्यारस है, आज तो चला चल मंदिर।"

   मां की रोज रोज की ऐसी बात सुनकर सुखी हंसा, पर बोला कुछ नहीं।

     मां बड़बड़ाते हुए मंदिर जाने की तैयारी करने लगी।" कितना ही बोलूं इसे, पर मजाल है जो मंदिर जाने के लिए हां कर दे। नास्तिक कहीं का।"

   मां दरवाजा भिड़ा कर चली गई। सुखी बिस्तर पर ही लेटा रहा ।वह हौले हौले गुनगुनाने लगा---

  ' कृष्णा काहे देर की आवन को।

मैं तरसूं तव दरसन पावन को ।'

   इतने में दरवाजा खुलने की आहट सुनाई दी।

   " कौन है?"  सुखी का स्वर टूटा।

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  " अम्मा पूजा के फूल यहीं भूल गईं थीं। पूजा केसे करतीं?  तू भजन गा रहा था! कितनी मीठी आवाज है तेरी।" पड़ोस में रहने वाली रमैया ने कहा।

    ' ठीक है ,ले जा।' कहकर सुखी फिर से वही भजन गुनगुनाने लगा।

  रमैया को बहुत आश्चर्य हुआ-- " सुखी। तू कान्हा को मानता है , फिर कृष्ण के मंदिर क्यों नहीं जाता?"

      रमैया की बात सुनकर सुखी ठीक वैसे ही हंसा, जैसे वह अपनी मां की बात पर हंसा था।

   रमैया अड़ गई, बोली---" आज तो तुम्हें बताना ही होगा कि तू मंदिर क्यों नहीं जाता?*

सुखी ने आती हुई आवाज की दिशा की ओर मुंह फेरते हुए कहा।--- " अब तू ही बता रमैया। मंदिर में जाकर तुम सब कान्हा की वह मूरत देखते हो, जिसे किसी

कलाकार ने अपनी कल्पना से गढा होता है------पर मेरे कान्हा का रूप तो मेरी कल्पना है। फिर मैं यहां बैठा- बैठा उसी को क्यों नहीं देखूं?"

   रमैया की आंखें नम हो उठी और पूजा के फूल लेकर वह सुखी के प्रकाशहीन नेत्रों की ओर निहारती हुईं बाहर निकल गई।

...

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 4358087144553953041

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  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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