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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 49 से 52 // जितेन्द्र कुमार गुप्ता

प्रविष्टि क्रमांक - 49

जितेन्द्र कुमार गुप्ता

"अंतर "
“माँ, नींद नहीं आ रही। कहानी कहो न।" पांच  साल के सोनू ने बिस्तर पर लेटे -लेटे माँ,मधु से मनुहार की। आतँकियों से मुठभेड़ में शहीद हुए लेफ्टीनेंट अरूण की पत्नी थी मधु। पति की मृत्यु के बाद मिले रूपये घर बनवाने में खत्म हो गये। घर में बुढ़े सास-ससुर भी थे । बस, पेंशन पर  किसी तरह गुजारा हो रहा था। नन्हा सोनू हालात रोज देखता और जल्दी से जल्दी बड़ा होकर माँ के लिये , दादा-दादी के लिये कुछ करना चाहता था। बेटे को पढ़ा- लिखा कर फौजी बनाना ही सपना था इसलिये रोज पति की बहादुरी के किस्से सुनाती और रोज हंसकर पूछती,"मेरा राजा बेटा क्या बनेगा?" पहले तो  सोनू झट से ,कभी फौजी,कभी डॉक्टर,तो कभी-कभी पायलट कह देता था।

आज भी सुबह जब मधु ने हंसकर पूछा," मेरा राजा बेटा क्या बनेगा ?"
"सोचूंगा।" सोनू का जवाब अचकचा गया था  मधु को। मन में कुछ खटक रहा था। अचानक सोनू उठकर बैठ गया।
"मैने सोच लिया माँ। क्या बनना है बड़े होकर।  खूब पैसे कमाऊंगा। फिर हम सब खूब आराम से रहेंगे।" सोनू की आँखों में चमक थी।
"अच्छा वो कैसे?"
"आतंकी बनकर सरेन्डर कर दूंगा।"
मधु सन्न थी और सोनू की निगाह अटकी थी, अखबार में छपी न्यूज पर..
सीमा पर हुए शहीद की शहादत को दस लाख  और सरेन्डर करने वाले आतंकी को दो करोड़...। अंतर का दायरा बहुत बड़ा था।

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प्रविष्टि क्रमांक - 50

जितेन्द्र कुमार गुप्ता

"भविष्य के सपने"


"अरे, अरे ! देखो, देखो। वो देखो । कैसा सुखद दृश्य है!” जंगल के कुछ छोटे-बड़े जानवर अचरज से एक दूसरे से कह रहे थे।
"कहाँ, कहाँ ?" कौतूहल भरी आवाजें उठी।
"अरे वहाँ, टीले के पेड़ पर।"
उत्सुकता से सब उधर देखने लगे ।
दूर टीले के एक ऊँचे पेड़ पर चार विशाल गिद्ध बैठे थे। उनमें से एक ने एक छोटे ,मासूम से पक्षी को अपने पंखों से ढंक रखा था।
" ओह जन्मजात दुष्ट गिद्धों ने मासूम चिरैया को पंखों में ढंका हुआ है। देखो, देखो।"
"पर वे उसे मार क्यों नहीं रहे है?” 
" वाह ,वाह। लगता है रामराज ,सतयुग आने वाले हैं ।"
"अरे मूर्खों, पक्का, चुनाव आने वाले है।" 

उल्लुओं ने आँखें हुए घुमाते कहा।

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प्रविष्टि क्रमांक - 51

जितेन्द्र कुमार गुप्ता

"शिकार या शिकारी ?"


"ऐ सुन न यार, नई मूवी लगी है ,बड़ी धांसू रिपोर्ट है उसकी !" शालू ने अपनी दोस्त पिंकी की आँखों में शरारत से देखते हुए मुस्कुरा कर कहा। दोनों एक ही ऑफिस में काम करती थी और गहरी दोस्त थी।
" हाँ यार सुना तो मैंने भी है। क्या कहती है ?" पिंकी की आँखें भी चमक उठी।
"देखना तो है पर बकरा ढूँढना पड़ेगा।"
"तो लगा न कुछ जुगाड़ ! तू तो मास्टर है ऐसे में।"
"चल देख वो आ रहा है मुर्गा ।"अचानक सामने से कमल जी को आते देख शालू मुस्कुरा उठी ।
ऑफिस में कमल सर की छवि  शर्मीले से दब्बू इंसान की थी जिसे सेल्फी लेने का शौक था।
"हाय कमल सर कैसे है ? हमारे साथ सेल्फी लेंगें ?" शालू को तिरछी नजरों से देखते हुए मुस्कुरा कर कहा।
" हाँ,हाँ ।"कमल खुश होकर बोल उठा ।
" मगर आपको हमें आज मूवी दिखाना होगी । "
" जरूर ।"
कमल ने फटाफट दस बारह दोनों के साथ और अलग  अलग फोटो ले लिये ।
"पक्की जुगाड़ू है तू ।" दोनों मुस्कुरा रही थी ।
और उधर….
"हाँ मणि दो नई तितलियों की फोटो की जुगाड़ जम गई है । चिपका दे साईट पर ।" कमल भी मोबाईल में देखते हुए  मुस्कुरा रहा था ।
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प्रविष्टि क्रमांक - 52

जितेन्द्र कुमार गुप्ता

"राहत"


"अब क्या करें भाई ।" छोटे ने दोनों भाईयों की ओर देखकर पूछा।

रामलाल जी के तीनों बेटे अस्पताल में थे । रामलालजी तीन दिन से गंभीर बीमार होकर भर्ती थे । आज डॉ. ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था और अब उनके अंतिम संस्कार हेतु तीनों में विचार चल रहा था

"मैं पिछले साल भर से बाबूजी को पास रखे हुए हूँ । डॉ. ,दवाइयों का खर्च सब उठाया पर अब ये..।" छोटे ने मझले की तरफ देखकर कहा।

" अरे तो साल भर से पहले तो माई बाबूजी दोनों ही मेरे साथ थे न । मैं भी सब कर चुका । अब हैसियत नहीं है।" मझले से दो टूक कहकर मुँह बड़े की ओर घुमाया।

" अरे मुझे तो कहना ही मत । तुम दोनों को पढ़ाना -लिखाना,  शादी ब्याह सब मैंने ही कराई । अब तो...।" उसने भी कठोर शब्दों में पल्ला झाड़ लिया।

"सुनिये आप रामलालजी के बेटे है न? इन फार्मस पर साईन कर दें।"

" क्या है ये ,कैसे फार्मस है?"

"जी आपके पिताजी ने पाँच वर्ष पूर्व ही अपनी संपूर्ण देह हमारी संस्था के माध्यम से मेडिकल कॉलेज को दान कर दी थी और ऐसे दानदाताओं के अंतिम संस्कार का पूर्ण खर्च हमारी संस्था ही वहन करती है ।आपके सहमति के हस्ताक्षर चाहिये।"

तीनों कुलदीपकों ने राहत की साँस लेकर हस्ताक्षर कर दिये।

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जितेन्द्र कुमार गुप्ता

सी5 पंचदीप निकुंज नंदानगर
इन्दौर म.प्र. 452011

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 727443774802336995

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  1. विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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