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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 84 // उम्मीद // शाद अहमद "शाद"

प्रविष्टि क्रमांक - 84

  शाद अहमद "शाद"

उम्मीद     (लघु कथा)

     चिकित्सक कहते दवाएं भी अपना असर तब दिखाती हैं जब मरीज़ में जीने की उमंग – उम्मीद हो I”

काफी दिनों बाद आज पिता जी की आँखों में उम्मीद की चमक दिखी लेकिन उसकी असली वजह समझते ही परिवार के सभी सदस्यों की आँखें छलक उठीं I"

   पिछले डेढ़ वर्ष से अस्पताल में निर्जीव सी अवस्था में लेटे पिता की सेवा में तीनों बेटों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी I

कुछ माह पूर्व चिकित्सकों के बताने के बाद भी कि “इनकी स्थिति में सुधार की गुंजाईश कम है I” बेटों और परिवार के सभी सदस्यों के अनुरोध पर चिकित्सक प्रत्येक संभव प्रयास कर रहे हैं कि मरीज़ के स्वास्थ्य की स्थिति सामान्य हो सके I

   सभी को रह-रहकर अफ़सोस होता है कि लौंग तक न खाने वाले, नियम-संयम, धर्म–कर्म से रहने वाले, सभी की मदद को आतुर इंसान को केवल अंठावन वर्ष की आयु में ऐसी लाइलाज बीमारी आख़िर क्यों.?

   तीनों बेटे पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़े हो गए I परिवार से मिले संस्कार, अपनी कमाई, बचत और आपसी एका होने की वजह से कभी किसी ने किसी से ये हिसाब नहीं किया कि “इतनी लम्बी अवधि में इलाज के दौरान किसका कितना पैसा खर्च हुआ.? जब जिसके हाथ में जो पर्चा या खर्चा आया ख़ामोशी से कर दिया और बाकी दोनों भाइयों को केवल जानकारी के लिए बता दिया I

इस उम्मीद में एक दिन पिता जी स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी सकेंगे I

    इस दौर में बेटों के लिए नौकरी और व्यवसाय करते हुए पिता जी की सेवा के लिए इतने लम्बे समय तक सेवा के लिए समय निकालना भी आसान नहीं लेकिन आपसी सामंजस्य से पूरे परिवार ने यही प्रयास किया कि “पिता जी को कभी अकेलापन महसूस न हो – अस्पताल स्टाफ के होने के बावजूद उनकी सेवा के लिए परिवार का कोई न कोई सदस्य लगातार बना रहे I”

    उन्हें कई जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे जीवित रखा गया था कि पहली बार देखने वाला शख्स दहल ही जाये I इतने निशक्त और स्थिति इस हद तक ख़राब कि कभी-कभी केवल आँखों के इशारे से टेलिविज़न चलाने के लिए कहते और कुछ देर समाचार चैनल म्यूट की स्थिति में देखने के बाद ज़्यादातर समय कमरे की छत को ताकते रहते I

    चिकित्सक कहते कि “दवा भी अपना असर तब दिखाती है जब मरीज़ में जीने की उमंग – उम्मीद हो लेकिन पिता जी तो जैसे जीवन की आस ही छोड़ चुके थे I”

    अभी समाचार देखते वक़्त उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक दिखाई दी I सभी सदस्य कारण जानने के लिए, किसी अन्जानी उम्मीद में लपक के उनके पास पहुंचे तो उन्होंने आँखों से टेलिविज़न की तरफ़ इशारा किया I समाचार चैनल पर दिखाए गये जिस समाचार को देखकर पिता जी की आँखों में उम्मीद की किरणें दिखीं – उसे देखकर उपस्थित सभी सदस्य अपनी रुलाई न रोक सके I

समाचार की हेड लाइन थी – “इच्छा-मृत्यु को मिली सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी, कहा- हर इंसान को 'सम्मान' के साथ मरने का अधिकार I”


शाद अहमद "शाद"

गज़लकार, कवि, लघुकथा, एवं व्यंग्य लेखक

अध्यक्ष (युवा साहित्य मंच)

पूर्व सचिव (प्रगति लेखक संघ)

सदस्य (प्रगति लेखक संघ)


सलाहकार (New Delhi Public High School)

पूर्व ज़िला समन्वयक (LEPRA India) Akshay India Global Fund Round 9 TB Project

सचिव (टीम - जय हो)

सदस्य (ज़िला टी.बी.फोरम)

सदस्य (मर्सी सोसाइटी)

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"पराए   घर  से  आई  है - पराए  घर  को   जाना  है,

ये रीति और रिवाजों का - बड़ा ही अजब ज़माना है I

जब ससुराल और पीहर - ये  दोनों  ही  पराए हैं,  तो

बेटी का कौन सा आँगन -  बहु  का कहाँ घराना है II"

शाद अहमद "शाद"

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 8822423947064246485

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  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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