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अर्चना कटारे की कविताएँ

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*सागर की महानता*
~~~~~~~~~~~~~~
सागर जैसे महान बनो सब,
उदधि है गुणों की खान,
जलनिधि सबको अपने में समाहित करता,
यही है उसकी असली पहचान,

चँद दिनों में क्षुद्र नदियां सूखें
खो जाती अपनी  पहचान...
चँद बारिश में उफन जातीं..
कर जाती तूफान...

फले फूले वृक्ष सदा नीचे ही झुकते,
अकडे सीधे सीना तान...,
घाँस कभी न बाढ़ में बहती,
यही उसकी नम्रता की पहचान..,

समुद्र कभी किसी से न लेता,
देना उसकी सदा पहचान,
रत्नों का भँडार भरा है,
कभी न करता वो अभिमान,

हजारों नदियाँ आकर मिलती,
सबको गले लगाता,
खारे मीठे सभी जल  मिला कर ...
खुद खारा हो जाता,

प्रचँड अट्टहास दिन रात करता.....
लहरे ऊँची ऊँची उठती...
प्रलय की ताकत रखता...
पर..मर्यादा में वो रहता...

जल और अँबर मिलते से दिखते,
सूर्य अनुपन छटा बिखेरते,
प्रकृति का मनोरम दृश्य ...
सभी का मन हर लेते,

हम इँसान भी जलधि से सीखें,
सबको आपना बनाना,
दुख सुख जीवन में कितने भी आयें,
हिम्मत कभी न हारना,

पयोधि जैसे अडिग है रहना....
रत्नाकर जैसे अगाध,
सिन्धु जैसे अविरल बहना,
नदीस जैसे महान,

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               *अपनी सभ्यता नहीं*
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क्यों नया वर्ष हम अपनायें,
क्यों हम पश्चिमी सभ्यता अपनायें.....?
ये तो उनके रँग ढंग है
जो सनातन से अनभिज्ञ हैं

है अपनी परम्परा पुरानी
जो अपनी धरती से पायी है
राम कृष्ण सब यहीं हुऐ
यही तुलसी कबीर से ज्ञानी है

हम तो अपनी गौ माता पर जान लुटाते,
वो तो बोटी बोटी खाते हैं,
फागुन बसँत कि स्वागत कर
चैत्र प्रतिपदा मे नव वर्ष मनाते हैं,

क्यों हम किसी नकल करें,
हमारी सँस्कृति  पुरानी है,
कोई इसको खोजे तो...
इसमें भँडार पुराना है,

आयुर्वेद, ऋवेद ,पुराण
  भरे ज्ञान से ,
अनुभव से हमने सीखा है,
यही हमारी त्रषि मुनियों की
तपस्या का फल मिलता है,

विरासत ,ज्ञान के आधारों से
हमने नयी नयी खोजें कर ली हैं
आधार वही है....
तकनीकी बदल डाली है,

भारत से ही सीख सीख कर,
चीख चीख कर बताते हैं,
योग और मँत्रों को ही..
योगा फिटनेस बताते हैं

ऐसी अनमोल विरासत को हम क्यों भूल जाते है...
अपनी सभ्यताको छोड.. पश्चिमी सभ्यता  क्यों अपनाते हैं,

देखो बसँत  की बहार नयी
धरती अँबर दूल्हन सी सजी
ज्यों पूजा की थाल लिये
हर इँसा खुशहाल हुऐ,

आ जायेगी चैत्र प्रतिपदा
तब नव वर्ष मनायेंगे
माता रानी और श्रीराम का
उल्लास से जन्म दिवस मनायेंगे,

हम तो ऊगते सूर्य को अर्द्य देते
तुलसी पूजा निश दिन करते हैं,
सूर्योदय होते मँदिर जाते
भोग लगाकर खाते हैं,

क्यों हम किसी की नकल करें
ये हमारा धर्म और त्योहार नहीँ,
अपने त्यौहार कम पड गये
जो दूसरा धर्म अपनायेंगे..

चैत्र प्रतिपदा को ही नव वर्ष मनायेंगे...

 
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जीवन चक्र
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भोर से पहले गौरैय्या जागी,
बच्चे छोड घरोंदे से निकली
खुद भूखी रह बच्चों को चुगाती,
दाना दाना चोंच में लेकर..
ममता वात्सल्य से भरकर...
धीरे बच्चों के मुख पे डाली...
माँ को आते ही चीं चीं कर
कुछ कहने लगते....
सब अपनी भाषा में कहते...
समय की गति से पँख भी आते....
नन्ही जानों को उडना सिखाती.....
प्रकृति की रीति निभाती...
आत्मनिर्भर होते ही खुद छोड देती...
हम इँसा तो मोह मे फसते...
आखिरी साँस तक चिंता में घुटते....
यही है जीवन का ताना बाना..
  माना सब यहीं रखा रह जाना......
फिर भी सब ऐसा ही करते...
जीवन चक्र ऐसे ही चलता...
आज हम है ,कल कोई और था, कल कोई और होगा...
सत्य यही है ....
फिर भी बोध न होता...
कैसा है अज्ञानी जीवन....
कोई इससे निकल न पाता...
यही है जीवन का ताना बाना...

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*नारी नदी की एक कहानी*

बस ....
सरिता बन बह रही जिन्दगी,
कभी झरने बनकर,कभी पहाडों से टकराकर,
कभी धुआंधार बनकर,
कभी कभी बाढ और सुनामी बनकर,

मैं ही हूँ जो.......
आस पास के वातावरण को
हरा भरा करती,
अनेक कष्टों को सहकर अन्न उपजती,
भूखोँ को तृप्त करती,
प्यासों को संतुष्टि देती,
सुन्दर सुन्दर फूलोँ की छटा बिखेर,
सभी के मन प्रफुल्लित करती,
बस देना मेरी कहानी....

मैं तो ......
अपना कर्तव्य पूरा करती,
कोई मेरे जल में
कपडे ,चमडा धोता
मुझे ही प्रदूषित करता,
मैं निरन्तर, निश्छल बहती रहती,
मूक बन सब यातनाएं सहती,

कोई........
सूर्य अर्क देते,तर्पण करते,
अस्थियाँ प्रवाहित कर जाते
सभी अपना धर्म और कर्म करते,

मैं तो.........
अपना प्रवाह निरन्तर करती,
दिन रात में कभी न देखती,
अनन्त काल से बह रही हूँ और बहती रहूँगी,

मैं ही .......
गँगा, मँदाकनी,सरिता, सरस्वती,
सभी नारी में समाहित हूँ,
मेरी और नारी की एक कहानी,
अपनी जीवन यात्रा पूरी कर.....
सागर में समाहित हूँ,
मेरा नाम ,पहचान खो गयी...

अँत में ......
सागर से पहचानी जाती हूँ,
मै भी एक नारी हूँ......
अपना नाम भी पति से जोड कर....
कुल, वँश, गोत्र तक खो देती हूँ...।
पति के नाम से जानी जाती हूँ.....
सरिता से...........सागर में समाहित हूँ..
नदी...........नारी की एक कहानी।
अँत एक सा पाती हूँ........

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आम का वृक्ष
~~~~~~~~~~~~~~
नहीं चाह मे गुलमोहर बनूं
न चँपा,न चमेली बनूँ
न गुलाब, न ही मोल श्री बनूँ,
न खुशबू से बागों को ही महकाऊँ...
रँग बिरगे छटा लिये...
तितलियों को बुलांऊँ..
न ही अपने सर भौंरो को    गुँजारित देख .............
मन ही मन इठलाऊँ
काँटे चुभ जाने से ...
दिल किसी का न दुखाऊँ.....
न ही पुष्प तोड कर...
देवों पर चढ जाऊँ....
न ही माला बन कर....
चिता पर सजायी जाऊँ...
हाँ तिरंगा मैं लपटकर ...
वीरों की  शोभा बढाऊँ...
पर मेरी तो अभिलाषा है...
आम का वृक्ष बन जाउँ...
पथिक को छाया देकर...
कुछ पल सुकून के दे जाऊँ..
मीठे मीठे फल देकर तृप्त तो कर जाऊँ ...
अपने सदाबहार पत्तों से....
ताजी हवा  दे जाऊँ..
पूजा के लिये कभी कभी..
  बँदनवारे बन जाऊँ..
ऊँची ऊँची डालों पर...
खग के रेन बसेरा बनाऊँ...
सावन आते ही...
झूले भी डाले जायें...
मस्त हो सखियाँ सावन गीत भी गायें.....
बोरे आ जाने कोयल भी मधुर तान सुनायें...
छोटी छोटी अमिंयों से बच्चे खुश हो जायें.....
अपनी सूखी लकडिय़ों से ....
ईंधन भी बन जाऊँ..
हवन करे मेरी लकड़ी से ...
मँदिर तक पहुंच जाउँ...
उस सुगंधित धुँऐ से वातावरण स्वच्छ कर जाऊँ...
बस इतनी अरज हमारी..
बस देना रहे आदत हमारी...
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आज के विषय "एकता " पर एक और प्रयास

*भारत माँ से प्यार करो*
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-जय करो जय कार करो।
पर भारत माता से प्यार करो।।

पशुता छोडो अश्लीलता छोडो।
पर भारत माता से प्यार करो।।

वीर शहीदों के बलिदानों को...
तुम न यूँ बर्बाद करो।।

वीर भगतसिंह, सुखदेव ,बापू।
इनके बलिदानों को याद करो।।

सब धर्मों का स्वागत कर।
अपनी सँस्कृति का गुणगान करो।।

सब धर्मों को नमन कर,
इस 'एकता ' से प्यार करो।।

राम कृष्ण की जन्मभूमि है।
इस पर तुम अभिमान करो।।

गँगा, जमुना, नर्मदा माँ यहाँ हैं।
इस पर भी तुम गर्व करो।।

ईद, दिवाली साथ मनाते।
इन त्योहारों का सम्मान करें।।

इस धरती पर तुमने जन्म लिया।
तुम इसका सम्मान करो।।

अमन,शाँति का वातावरण रहे।
तुम इसका भी प्रयत्न करो।।

हर खेत से सोना उगले।
तुम इस पर भी कर्म करो।।

हर घर आँगन में खुशियां आये।
तुम इस पर भी यत्न करो।।

हर बच्चा पढ लिख कर इन्सान बने।
तुम इसका निर्माण करो।।

जय करो जय कार करो...
पर भारत माता से प्यार करो।।

दुख, दारिद्रय, शोषण ,उत्प्रीरणन।
इनका तुम नाश करो।।

अखँण्ड भारत के सपनों को,
तुम फिर से साकार करो।।

मासूमों और निर्पराधों के खूनों से...
अपने हाथ न लाल करो।।

मँदिर ,मस्जिद और गुरूद्वारों को,
तुम यूँ न बेहाल करो।।

धर्म, जाति और आरक्षण।
इनको बीच न लाकर राज करो।।

स्मगलर, गुण्डे और ताकतवर।
उन पर तुम राज करो।।

भोली भाली जनता है।
इनको न यूँ बर्बाद करो।।

जय करो जयकार करो ।
पर भारत माता से प्यार करो।।


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*धरती माँ की पुकार*

अपने ही देश का हाल देख।
रो पडी धरती माँ,।।
अपनी ही पैदावार देख।
सिसक रही धरती माँ।

राम राज्य में एक का सौ,
कर देती थी।
न्याय, धर्म, सत्य था,
तो मैं ऐसा करती थी।।

आज लोभ,कपट,झूठ का है बोलबाला।
तो मैं भी कहीं बाढ ,कहीं सूखा,
और कहीं दे रही पाला।।

दिखावा,बाहरी आडम्बर,
मिथ्या का है बोलबाला।
ऐसे में गरीब किसान कैसे रहे भोलाभाला।।

मुझको जहरीली दबाई
और पाउडर का छिडकाव ,
कर दे रहे बीमारी।
मझसे अन्न उगकर,
  तुमको देगा कई तरह की बीमारी।।

फलोँ को बडा करने के जोश में  ,
लगा रहे इंजेक्शन।
यही फल खाओगे ,
तो तुमको भी लगेंगे इजेक्शन।।

हरे भरे वृक्ष मत काटो,
  हमको भी होती हैं तकलीफें ।
जान हममें भी है,
महसूस करो हमारी तकलीफें।।

अगर हमको खुश करना है बेटों।
ये चार मँत्र अपनाओ बेट़ों,

पहला मँत्र बृक्ष लगायें,
दूसरा मँत्र खेतों को उपजाऊ बनाये,
तीसर मँत्र जँगलों में मत लगने दो आग,
चौथा मँत्र पेडों में डाल़ो गोबर की खाद,

सभी लोग नारा अपनाओ
हरित क्रांति वापस आओ

जो इन बातोँ को जीवन में लाये।
अन्न धन सब मुझसे पाये।।

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*दहेज के दानव*
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चाहे कितनी योजनाएं हों।

या कितना ही लाभ मिले।

बदल नहीं सकता ,

आज भी कोई जमाने को

बच्चा पैदा होते ही,

बेटी बेटा मे फर्क आ जाता है,

आज भी बैटी होने पर ,

चेहरा उतर जाता है।।

बेटा जन्म होते ही बाजे बजते हैं।

खुशियाँ मनायी जाती हैं।।

दीवालों पर आज भी ,

दूबा लगायी जाती है,

बेटा होने पर गये ,

त्यौहार वापस आते हैं,

बेटी होने पर सब ,

धरे के धरे रह जाते हैं,

बेटी को भी पढा कर।

डाक्टर, इँजीनियर बनाते हैँ,

शौक दोनों के पूरे करते

दोनों को सुयोग्य बनाते हैं,


बेटी जब ब्याह योग्य होती है,

और कमाई लाती है,

तो यही बेटे वाले पूछते,

कितना पैकेज लाती हो,


रँग ,रूप ,हेल्थ, हाइट,

सब गायों की तरह देखते हैँ,

तब भी यह कमाई वाली कन्या,

गुम सुम सी रह जाती है,

जब बात आती दहेज की

तब ये बोली वाले आगे बढ जाते हैं,


इन बोली वालोँ के आगे,

सुयोग्य कन्या पीछे रह जाती है,

माँग पूरी न होने पर,

सुयोग्य कन्या को ,

मार दिया जाता है,

क्यों इन दानवों को आखिर,,,

अपनी कन्या देता है,,,

रह जाने दो ऐसे लडकों को क्वारे,,,

भटकने दो सारों को द्वारे द्वारे,,,,,

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*कोख से बेटी की पुकार*
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रोती बिलखती ,
  पेट में कह रही कन्या।
माँ मुझे एक बार जन्म तो लेने दो।।

मेरी क्या गलती है इतना तो बताओ.....
एक बार जन्म लेने का हक तो दिलाओ......

माँ रोती रोती कहती बेटी से.....

कैसे तुझे बताऊँ........

एक बेटी पहले से है ।
दूसरी कैसे लाऊँ........

बेटी तुझे नहीँ मालूम।
समाज मै फैला है रोग।।
बसे है समाज में कई तरह के ल़ोग।

तेरे बडे होने पर माँगेंगे।
थैला भर भर नोट।।
कहाँ से लाऊँगी ये हजारों के नोट।।

जलती हैं मरतीं है,समाज में बेटियां।
दुनिया के लोग इसमें सेंकते हैं रोटियां।।

मैं तो बस विद्या दे सकती हूँ।
कहाँ से लाऊँगी लाल हरे नोट।।

बेटी सिसक कर कहती है......

माँ मुझे एक बार जन्म तो लेने दो......

आपका नाम रोशन करूँगी.....
पढ लिख कर इँसान बनूँगी.....
चाँद तारोँ को छुऊँगी।
बेटों से ऊँचा बनूँगी.....
डा.,ईजी. या वैज्ञानिक       बनूँगी......
प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनूँगी....
आकाश हो या पाताल सब क्षेत्र सम्भालूँगी.....

समाज में फैला भ्रष्टाचार मिटा दूँगी.....
दुनिया भर की भ्रांतियां मिटा दूँगी.....
अपने क्रांति कारी विचारों से ......
दुनिया बदल डालूँगी......
आपके आँचल तले माँ
सँसार लाकर रख दूँगी....

माँ मुझे एक बार जन्म तो लेने दो.......
माँ मुझे एक बार जन्म तो लेने दो.......
          
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*भारत माँ से प्यार करो*
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जय करो जय कार करो।
पर भारत माता से प्यार करो।।

पशुता छोडो अश्लीलता छोडो।
पर भारत माता से प्यार करो।।

वीर शहीदों के बलिदानों को...
तुम न यूँ बर्बाद करो।।

वीर भगतसिंह, सुखदेव ,बापू।
इनके बलिदानों को याद करो।।

सब धर्मों का स्वागत कर।
अपनी सँस्कृति का गुणगान करो।।

सब धर्मों को नमन कर,
इस एकता से प्यार करो।।

राम कृष्ण की जन्मभूमि है।
इस पर तुम अभिमान करो।।

गँगा, जमुना, नर्मदा माँ यहाँ हैं।
इस पर भी तुम गर्व करो।।

ईद, दिवाली साथ मनाते।
इन त्योहारों का सम्मान करें।।

इस धरती पर तुमने जन्म लिया।
तुम इसका सम्मान करो।।

अमन,शाँति का वातावरण रहे।
तुम इसका भी प्रयत्न करो।।

हर खेत से सोना उगले।
तुम इस पर भी कर्म करो।।

हर घर आँगन में खुशियां आये।
तुम इस पर भी यत्न करो।।

हर बच्चा पढ लिख कर इन्सान बने।
तुम इसका निर्माण करो।।

जय करो जय कार करो...
पर भारत माता से प्यार करो।।

दुख, दारिद्रय, शोषण ,उत्प्रीरणन।
इनका तुम नाश करो।।

अखँण्ड भारत के सपनों को,
तुम फिर से साकार करो।।

मासूमों और निर्पराधों के खूनों से...
अपने हाथ न लाल करो।।

मँदिर ,मस्जिद और गुरूद्वारों को,
तुम यूँ न बेहाल करो।।

धर्म, जाति और आरक्षण।
इनको बीच न लाकर राज करो।।

स्मगलर, गुण्डे और ताकतवर।
उन पर तुम राज करो।।

भोली भाली जनता है।
इनको न यूँ बर्बाद करो।।

जय करो जयकार करो ।
पर भारत माता से प्यार करो।।
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*जिन्दगी*
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जिन्दगी .....
तुम बहुत खूबसूरत हो,
बच्चों की मुस्कान हो।
भूखोँ की रोटी हो,
प्यासों का पानी हो।।

निर्धन का पैसा हो,
बीमारों की दवा हो।
मजदूर की ताकत हो,
वृद्धों की लकड़ी हो।।

सृष्टी का सृजन हो,
तपती धूप मे पेड की छाँव हो।
जाडे की गुनगुनी धूप हो,
सूखे की बारिस हो।।

सुहागिनोँ का सिन्दूर हो,
नारी की शक्ति हो।
तरूणाईयों का यौवन हो
नर्तकियों की घुँघरु हो।।

योगियों की ज्योति हो,
कवियों का भाव हो।
शिल्पियों के कल्पना हो,
ताँत्रिक की साधना हो।।

विद्यार्थियों की मेहनत हो,
सैनिकों का हौसला हो।
खिलाडियों का तमगा हो,
वीरों का झँडा हो।।

बुढापे की आस हो,
मुसाफिरों का ठिकाना हो.
चालक की नजरें हो,
माझी की पतवार हो।।

शराबियों का मैखाना हो,
नशेड़ियों का नशा हो।
जुआरियों की बाजी हो,
चोरों की अँधेरी रात हो।।

जिन्दगी .......
पता नहीं क्या हो.....।
जो भी हो ,
तुम बहुत खूबसूरत हो।।

   नामः अर्चना कटारे
स्थान ःशहडोल म.प्र.
जन्म ः20फरवरी1968
सिहोरा,जिला.जबलपुर

Email archana katate10@.gmail.com

कविता 2501287282958144098

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