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हिन्दी नाटकों में मूल्य विघटन // डॉ. संतोष रामचंद्र आडे

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डॉ. संतोष रामचंद्र आडे

संत रामदास महाविद्यालय

घनसावंगी जि. जालना. महाराष्ट्र

adesr08@gmail.com

भूमिका

स्वातंत्र्योत्तर भारतीय परिवेश पर दृष्टि डालने से यह तथ्य सामने आया है, कि इस परिवेश में जहां एक और पुरातन प्रवृत्तियां सुरक्षित है। वहीं दूसरी ओर आधुनिकता और पुनरुत्थान की प्रवृतियॉं भी विविध रूपों में विकसित हुई है। इस परिवेश में आज व्यक्ति के सामने मूल्यों का संकट अपने आप में एक ज्वलंत समस्या है। मूल्य संकट की यह समस्या मुख्य रूप से नई पीढ़ी के समक्ष है। शिक्षाऍं नए विचारों की प्रचार-प्रसार तथा आजादी के बाद बदलते परिवेश में नई पीढ़ी यह अनुभव करने लगी है, कि परंपरागत मूल्यों और आदर्शों उसकी समस्याओं का समाधान कर सकने में असमर्थ हुए थे। फलस्वरूप उसमें नये जीवन मूल्यों की खोज शुरू की, लेकिन चारों ओर एक विषा और धुरीहीन परिवेश में मूल्यों के अभाव में वह भटक गई। वह अजीब विरोधाभास की स्थितियो के संघर्षपूर्ण तनाव में जीने लगी। अतः मूल्य, क्रांति, निरर्थकता की पीड़ा और दो परियों के संघर्ष से जहॉं सामाजिक जीवन में टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई, वही व्यक्ति वैचारिक द्वंद्व की स्थिति में जीने लगा।

स्वातंत्र्योत्तर भारतीय परिवेश में मूल्य संक्रमण की स्थिति बड़ी तेजी से विकसित हुई है। यद्यपि मूल्य विघटन की यह प्रक्रिया बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही आरंभ हो गई थी, किंतु स्वाधीनता के बाद यह प्रक्रिया कुछ अधिक गतिशील दिखाई देती है। फलस्वरूप संबंधों का सहज स्वाभाविक रूप विकृत होता चला, रिश्तो में दरार पड़ गई और पुरातन जीवन मूल्य आधुनिकता से टकराकर या तो नष्ट हो गए, या नया चोला धारण करने के लिए बाध्य हो गए। यह मूल्य विघटन की शुरुआत थी। बाद में पंचवर्षीय योजनाओं की विफलता से उत्पन्न हताशा और राजनायिकों के क्रियाकलापों से मोहभंग ने मूल्य संक्रमण में विशेष योग दिया। अनेक पुरातन मूल्य जिस आदर्श पर आस्था और अभिजात्य गौरव के प्रति मोहब्बत, स्वाधीनता संघर्ष की प्रेरक शि बने थे, कालांतर में वे सब कुछ कुंठा और घुटन में बदल गये। ''आदर्श का अर्थ बदल गया सेवा त्याग शब्द भी खोखले हो गए। गबन ढाका और कत्ल जैसे शब्द अब हमें चौकाते नहीं अनशन सत्याग्रह सत्ता हड़ताल अछूत शब्द हो गए। सर्वोदय पदयात्रा और भूदान पाखंड के पर्याय हो गए।”4 वस्तु तथा मूल्य परिवर्तन एक ऐसी ऐतिहासिक प्रक्रिया है, युगीन परिस्थितियों के अनुरूप ही सामाजिक संबंध भी परिवर्तित होते रहते हैं और किसी समय अत्यंत सार्थक लगने वाले जीवन मूल्य धीरे-धीरे अर्थहीन होने लगते हैं। भारतीय स्वतंत्रता, भारतीय समाज में नवीन मूल्यों के उत्सव रहे है, जो कि एक लंबी परिवर्तन की प्रक्रिया का परिणाम है। हिंदी के स्वतंत्रत नाटकों में मूल्यों के विघटन और नवीन मूल्यों की स्पष्टता से उत्पन्न परिस्थितियों को और उपाय किया गया है। योग सफेद होने का कारण ही नाटकों में सामाजिक यथार्थ, आधुनिकता बोध और मूल्यों के विघटन की सश अभिव्यक्ति मिलती है।

मूल्य विघटन की इन स्थितियों के चित्रण में हमें नाटककारों के दो वर्ग स्पष्टता से प्राप्त होते है। एक वर्ग उदयशंकर भट्ट, विनोद रस्तोगी, विष्णु प्रभाकर, जयश्री, नाटककारों का है। जो प्राचीन मूल्यों पर बल देते हैं। उनके नाटकों की कथावस्तु और चरित्र मोहन राकेश, सुरेंद्र वर्मा, 'मुद्राराक्षस' रमेश बक्षी और मृदुला गर्ग जैसे नाटककारों का है। योजना पुराने मूल्यों की प्रासंगिकता को अभिव्यक्त करती है। तो दूसरा वर्ग जो पुराने मूल्यों की निरर्थक था को व्यक्त करते हुए नए मूल्यों की स्थापना पर बल देते हैं। इन नाटककारों के दृष्टिकोण में अत्याधुनिकता का प्रबल आग्रह, नवीनता के नाम पर आयातित विचार एवं चतुर्दिक विसंगत परिवेश के प्रति आक्रोश की भावना मुखय रूप से दिखाई देती है।

पारिवारिक विघटन के रूप में :-

ᅠस्वातंत्र्योत्तर परिवर्तित भारतीय परिवेश में संयु परिवारों का विघटन बड़ी तेजी से हो रहा है। पारिवारिक विघटन की इस प्रक्रिया में मूल्य बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। पारिवारिक सदस्यों में रुचि, विद्या और वैचारिक भिन्नता इतनी अधिक बढ़ गई है, कि उनमें पारस्परिक सहयोग प्रेम एवं समन्वय की भावना क्षीण होती जा रही है। 'अलग-अलग रास्ते', 'आधे-अधूरे', 'चिंधियों की झालर', 'तीसरा हत्ती' और 'अपनी-अपनी दुनिया' नाटकों में नाटककारों ने पारिवारिक विघटन के मूल्य को उत्तरदाई ठहराया है

उपेंद्रनाथ अश्क की 'अलग-अलग रास्ते', की रानी, पूर्ण और राज के दो अलग-अलग रास्ते होने का कारण उनका वैचारिक मतभेद और दृष्टिकोण की भिन्नता है। 'खंडित यात्राएं' में सुरेंद्र बाबू का सुखी परिवार महेन, बिना और नंदिता के नए मूल्यों के स्वीकरण में मोह विघटित हो जाता है। 'आधे-अधूरे' और 'अपनी-अपनी दुनिया' इंद्रजीत भाटिया का परिवार व्यक्ति स्वातंत्र्य पर बल देने के कारण धन्य-धन्य हो जाता है। 'अपनी-अपनी दुनिया' में पुरुष और स्त्री के अतिरिक्त राकेश, सुभाष और प्रभा भी घर से परेशान है, घर की खोज जारी है, घर में अजनबीयत का जो रूप ले लिया है। उससे व्यक्ति की अस्मिता खो गई है। जबकि स्वातंत्र्य खतरे में पड़ गया है। और घर का मिथ टूट गया है। हरवंश की पहली पत्नी कांचन की मृत्यु हो चुकी है और सौतेली मां के अधिक नियंत्रण के कारण उसका बड़ा लड़का राकेश घर छोड़कर भाग गया है। हरवंश की वर्तमान पत्नी दोनों बच्चे सुभाष और प्रभा को पूरी स्वतंत्रता है। इतनी ही वह ऊछंख लताए, स्वच्छंदता और उदंडता का पर्याय बन गई है। सुभाष अपने मां बाप से ऐसे बात करता है, कि जैसे भी उसके नौकर हो घर खरीद गुलाम हो, नारी भी दबंग है और इन सब में बेचारा पुरुष पीस रहा है। घर की बिगड़ते हालात के लिए पुरुष नारी को भूला नहीं देता है, और नारी, पुरुष सभी एक दूसरे से असंतुष्ट है।

नई पीढ़ी के विद्रोह और दिशाभ्रांत रूप में :-

पुरानी पीढ़ी ने आदर्श की नई पीढ़ी के यथार्थ को, पुरानी पीढ़ी ने नैतिकता को, और नई पीढ़ी ने निजी आकांक्षा और वरुण की स्वतंत्रता को, लेकर अपने-अपने लिए युवॉं में जो बंद घरे बना ली, उससे भी एक दूसरे के लिए इतनी सुंदर वहीं निरर्थक और निर्मल हो गए हैं, कि वे एक दूसरे को समझ नहीं पाते। हिंदी के प्रायः सभी नाटककारों ने नई पीढ़ी के विद्रोही रूप को अभिव्यक्ति देने के लिए कथावस्तु और पात्रों की योजना की है। नरेश मेहता की 'खंडित यात्राऍ' का महेन पुराने मूल्यों के प्रति आस्था नहीं है, और पापा सुरेंद्र बाबू की संस्तुष्टि से मिलने वाली रास्ता और प्रतीक नौकरी को छोड़कर पत्रकारिता का स्वतंत्र व्यवसाय ग्रहण करता है। इतना ही नहीं उनका प्रबल विरोध के बावजूद बिना से प्रेम करता है। जीवन के समस्त पुराने मूल्यों को अस्वीकार करने की उसकी प्रबल आकांक्षा इन शब्दों में व्यक्त हुई है  ''वीणा! मैं सब कुछ अस्वीकार ना चाहता हूं। मैं किसी आदर्श मूल्य परंपरा को नहीं स्वीकारता था। यह सब भुखमरे हुए शेर है”5 उसकी इस अस्वीकार की पृष्ठभूमि में से क्लास पर नए मार्ग पर चलने की उत्कट इच्छा है।'' मैं इन विक्टोरियन युग की चीजों की तलाश को नहीं खो सकता। मैं अपना मार्ग चाहता हूं, अपनी प्राप्ति चाहता हूं।”6 वह वैवाहिक जीवन और संतान उत्पति में विश्वास नहीं करता, टूटते परिवेश के विवेक और दीप्ति 'खंडित यात्राएं' की महेन तथा नंदिता की भि पुराने मूल्यों और परंपराओं को अस्वीकार करते हुए अपना रास्ता अपने आप ढूँढ निकालने का संकल्प करते हैं।

वे अस्तित्व को बनाए रखने की समस्या से आक्रांत है। सामाजिक विसंगतियों और अस्पष्ट जीवन मूल्य उन्हें खंडित कर के रख देते हैं। सुरेंद्र बाबू का यह कथन ''महेंन नायक जरूर है, लेकिन कायर है, आज वह विरोध कर रहा है, कल वह समझौता करेगा”7 उस स्थिति की और संकेत करता है, जिसमें मूल्यों की पारस्परिक विरोधाभास हो, फिर भी जीती और अनिर्णायक मनुष्य की ओर से गुजरते हुए आज की पीढ़ी जीवन निर्माण की प्रक्रिया से समझौता कर लेती है।

दया प्रकाश सिन्हा के ''ओह, अमेरिका मैं युवा पीढ़ी की दिशा भ्रम स्थिति और मौलिकता का उच्चटन है। इस प्रकार अमृता राय का ''सिंधियों की झालर'' भी आदर्श यु, दिशाहीन, लक्ष्य, भ्रष्टाचार, भौगोलिक, नई पीढ़ी का जीता जागता चित्र है। अपने-अपने स्वार्थों के लिए समाज के सभी वगोर्ं द्वारा युवा पीढ़ी को आत्मविश्वास है, और गुमराह करने का जो षडयंत्र देश में चल रहा है, उसे अनावृत करते ही त्रिशंकु तथा सभ्य सांप में देखने को मिलते हैं। स्वतंत्र भारत की नई पीढ़ी की दिशा, भ्रष्टता, लक्ष्य, भ्रष्टाचार, परिवर्तित जीवन मूल्य एवं मानसिक विघटनं के लिए उत्तरदाई है।

वैवाहिक और काम संबंधों के क्षेत्र मे :-

स्वातंत्र्योत्तर भारतीय परिवेश में जीवन मूल्यों में सर्वाधिक परिवर्तन लक्षित होता है। विवाह तथा काम संबंधों के क्षेत्र में स्थापित पुरानी परंपराएं टूटी है। नया दृष्टिकोण और नई मान्यताएँ स्थापित हुई है। व्यक्ति स्वतंत्र की भावना बलवती होने के कारण वैवाहिक संबंधों के निर्धारण में नई पीढ़ी ने सामाजिक परंपराओं का पूर्ण निषेध किया है। और विवाह को जन्म-जन्मांतर का संबंध ना मानकर एक समझौता मात्र माना है। आज की युवा पीढ़ी विवाह के बिना शारीरिक संबंधों की स्थापना में विश्वास करने लगी है। 'युगे युगे क्रांति' के अनिरुद्ध के शब्दों में नई पीढ़ी का आदर्श बोल रहा है ''मैं विवाह में विश्वास न कर, विवाह हमारे समाज में मात्र एक परंपरा का पालन है। उसके पीछे अब जीवन की कोई अनुभूति नहीं रह गई है। और आप जानते हैं, कि अनुभूति के अभाव में परंपराएँ समाप्त हो जाती है। परंपराओं में चिपके रहने से समाज रोगी हो सकता है।”8 बदलते ही जीवन मूल्यों के साथ प्रेम का स्वरूप और परिभाषा बदलती है। प्रेम का स्तर ऊंंचा हो गया है। शरीर स्त्री और पुरुष दोनों शारीरिक भूख को शांत करने के लिए परिजनों तथा बंधनों से मु हो पाती। पति-पत्नी की पारंपरिक रूप को नष्ट करते हुए, मु यौन संबंधों के पीछे भागने लगे हैं। अपनी.-अपनी दमित वैष्णव की संतुष्टि के लिए उपयोगी पुरुष या स्त्री की तलाश करने लगे हैं। और एक जीवन साथी को छोड़कर दूसरे जीवनसाथी की खोज करने में लग गई। स्वतंत्रता हिंदी के अधिकांश नाटक नर-नारी संबंधों और सेक्स समस्या को आधार बनाकर लिखे गए है।

वस्तुतः नर-नारी संबंधों का मूल आधार है। रतिया, काम, सुख इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसी सुख की चाह में कितनी युवतियाँ है, जो ब्याह से पहले कुंवारी नहीं रहती। कितनी निरोधक औषधि के बल पर इस अनुभव की आवृत्ति कर रही है, और कितनी अन्य वाहनों से ऊपर की ओर से जुड़ी हुई है। यह आज का युग यथार्थ है। जिसे बड़ी बेबाकी से सुरेंद्र वर्मा ने पूरे नाटकीयता के साथ इस नाटक में सम्मीलीत किया है। सेक्स के संदर्भ में आज की पीढ़ी के दृष्टिकोण और बनते-बिगड़ते मूल्यों की झलक इस नाटक में है। 'द्रोपदी' में अलका, राजे और अनिल, वर्षा के विवाह पूर्व के संबंध तथा 'आधे-अधूरे' कि बिन्नी का मनोज के साथ भाग जाना। विवाह एवं संबंधित क्षेत्र में बदलते मूल्यों की अभिव्यक्ति की सश प्रमाण हमें और काम संबंधों के क्षेत्र में देखने को मिलते हैं।

नारी की सामाजिक और पारिवारिक स्थिति के रूप में:-

पाद्गचात्य चिंतन धारा नारी शिक्षा, अधिकार समिति की भावनाओं ने नारी स्वतंत्र की भावनाओं को काफी प्रश्रय दिया है, ना ही नई चेतना एवं वैज्ञानिक व्यवस्था के परिणाम स्वरुप आधुनिक नारी में अपने व्यत्वि के संरक्षण के प्रति सजगता बढाई है। अधिकार से चले आते और उसके दुर्गम नियमों के अनुसार के प्रति उसने विद्रोह किया है। किंतु विद्रोह की भावना तक भी पहुंची है। परिणाम स्वरूप नारी की स्थिति परिवार तथा समाज में हास्यास्पद बनी है। 'पार्वती' की गुलाब की कल्पना की प्रतिभा, 'चिराग की लौ' की तारा, 'नगर' की रश्मि प्रभा और 'बिना दीवारों के घर' की शोभा के चरित्र ज्वलंत प्रमाण हमारे सामने प्रस्तुत होते है।

'खंडित यात्राऍ' की नंदिता, पुराने विघटित मूल्यों को अस्वीकार तो करती है, किंतु नऍ को अपनाने का साहस भी उसमें नहीं है। पापा के विरोध करने पर भी वह नवीनता के आवेग में नौकरी तो कर लेती है, किंतु उसे भी छोड़ देती है। इस प्रकार व स्वेच्छा से विवाह करना चाहती है पर शशांक के प्रति प्रेम करके भी उस पर अपने प्रेम की धारा को प्रकट नहीं कर पाती।

राष्ट्रीय जीवन की आदर्शों की क्षेत्र मे :-

व्यत्वि के बाद मूल्यों का सर्वाधिक विघटन हमें राष्ट्रीय जीवन में परिलक्षित होता है। राजनीति और अर्थ इन दो तत्वों की प्रमुखताने राष्ट्रीय जीवन में अल्लडन उत्पन्न किया और पुराने आदर्श तेजी से घटित हुए। राजनीति में नैतिकता का स्थान अवसरवादी का स्वार्थपरता, सत्ताप्राप्ति और धन अनुरूपता ने ले लिया।ᅠपरिणाम स्वरुप भसिाधना की पवित्रता को त्यागकर साध्य प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होने लगा। राजनीति सिर्फ सत्ता और द्रोग, लग्जरी हथियाने का शॉर्टकट बन गई है।”

भौतिक सुखों की लालसा धन संग्रह एवं महत्वकांक्षाओं की पूर्ति की प्रबल कामना ने व्यक्ति को स्वार्थी, आत्मकेंद्रित और व्यक्ति के भाव में बांध दिया है बन गई है। व्यक्ति ने परस्पर त्याग, प्रेम, सहयोग तथा सहिष्णुता के स्थान पर सवार त्रिशा और विद्वेष की अधिकृत है बन गई है। दया, माया, ममता जैसे तर्कसंगत वैज्ञानिक आधार मांग रहे हैं बन गई है।  रूपया तुम्हें खा गया, अपनी कमाई, वसीयत, खंडित यात्राएं,  कुहासा और किरण, रातरानी, आधे अधूरे, द्रोपदी, आदि नाटक व्यक्ति की सार्थकता के कारण नष्ट हुई मानवीय संवेदना एवं शाश्वत मूल्यों की मर्मस्पर्शी रंजना करके सामाजिक जीवन में भ्रष्टाचार, शोषण आदि की प्रवृत्ति, आदि लोकं भावना के कारण दिन पर दिन बढ़ती जा रही है बन गई है।

पुराने मूल्य परंपरा के प्रति मानव का विरोध करना एक अच्छी बात है, और उसके महत्व को स्वीकार भी नहीं किया जा सकता। पर नए मूल्यों के नाम पर सामाजिक विधि, निषेध हो कि पूर्व परीक्षा भी न्यायोचित नहीं कही जा सकती। व्यक्ति स्वतंत्र के नाम पर आवारगी उसे श्रंखला और मनमाने आचरण की प्रशंसा नहीं की जा सकती। वस्तुतः इन नाटकों में न तो प्रवेश के प्रति विवेकपूर्ण प्रतिक्रिया है और ना जीवन मूल्यों के पास के सात न युवा अनुरूप जीवन मूल्यों के तलाश की ललक है। फैशन के अंधानुकरण की प्रवृत्ति समय से आगे बढ़ जाने का भाव है। इन आंखों में जो जीवन दर्शन रखा गया है, वह अभी न तो सर्वमान्य है। परंपरा के विवेश में तो इनका विश्वास है, पर कोई नया जीवन दर्शन, जीवन के कोई ठोस मूल्य उनके पास नहीं है।

वास्तव में आधुनिक और अत्याधुनिक के बीच जहां समय की सापेक्षता का भाव है, वहॉं आयातित विचारों और फैशन के अंधानुकरण की प्रवृत्ति का बोध भी है। आधुनिकता परिवेश के प्रति विवेक पूर्ण प्रतिक्रिया है। उसमें प्रश्न चिन्ह की निरंतरता के साथ जागरूक, बौद्धिक दृष्टि और जीवन मूल्यों के ध्वंस के साथ नए युगानुरुपी जीवन मूल्यों की तलाश की ललक भी अपेक्षित है। आधुनिकता के अंतर्गत वर्तमान को नकार, पर समय से आगे बढ़ जाने का भाव है, फैशन के अंधानुकरण की प्रवृत्ति का वहाँ प्राधान्य है। आयातित विचारों का लेखकों ने निजता का जामा पहनाने में अपनी शान समझता है10 विष्णु प्रभाकर के प्रायः सभी नाटक सनातन मूल्यों और संस्कृति का दर्शन की स्थापना पर बल देते हैं। 'युगे युगे क्रांति' जहॉं विवाह संबंधों की सार्थकता और युगानुरूप उसमें परिवर्तन पर बल देता है। वहीं डॉक्टर में अनिला का चरित्र भारतीय नारी का त्याग, कर्तव्यक्त परायणता और सहिष्णुता का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत कर उन्हें आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा देता है।

टूटते परिवेश में दीप्ति, मनीषा, इंदु आदि का पिता के घर एक-एक कर वापस आ जाना। यह व्यंजीत करता है, कि नई पीढ़ी पुराने मूल्यों और आदर्शों से बहुत कुछ सीख सकती है। अच्छा ग्रहण पढ़ सकती है और यही उसे लक्ष्यहींनता और भटकन से बचा सकते हैं। एक नई पीढ़ी के अधिकांश रचनाकारों की नाट्य रचनाऍ, परंपरा विरोध, नवीनता या परिवर्तित जीवन मूल्यों के नाम पर आस्था, उन्मुक्त, सेक्स, सस्ती और भोंडी आयातित, अस्तित्ववादी दर्शन और व्यक्ति स्वतंत्र की निरंकुशता और चमकीला को अभिव्यक्त करती है। या फिर भारतीय जीवन आदर्शों की आस्तित्ववादी दृष्टिकोण से अवमान प्रस्तुत करती है। कुल मिलाकर नई पीढ़ी के नाटककारों के संबंध में हम डॉक्टर सुंदर लाल कथूरिया के इस कथन से पूर्णता सहमत है कि समसामयिक जीवन के संदर्भ और सामाजिक समस्याओं को उभारने की सार्थक कोशिश, अपेक्षाकृत चर्चित नाटकों में करने की है'' डॉ सुरेशचंद्र और डॉक्टर देवराज पति के नाम सनी है डॉक्टर ने अपने नाटक 'आकाश झुक गया' और डॉक्टर पथिक ने अपने 'मंच से मंच तक' में व्यंग्य और विरोध के धरातल पर मानवता की घातक मूल्यों का विरोध किया है।

1     ᅠᅠᅠसंदर्भ

2    डॉ कुमार विमल, मुल्य परिवर्तन, मानविकी संदर्भ में आलोचना, त्रैमासिक, अक्टूबर-दिसंबर 1969

3    डॉ. लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय, द्वितीय महायुद्ध, उत्तर हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. 31

4    घनश्याम प्रसाद शलभ, सृष्टि की दृष्टि पृ. 57

5    डॉ. विवेक राय,ᅠधर्मयुग पृ. 21

6    खंडित यात्राएं पृ. 34

7    टूटते परिवेश पृ. 54

8    तीसरा हती पृ. 40

9    युगे युगे क्रांति पृ.65

10    सुंदर लाल कथूरिया, साहित्य आधुनिक-अत्याधुनिक पृ. 5

सुंदर लाल कथूरिया, समसामयिक हिंदी नाटक, बहुआयामी व्यत्वि पृ. 129

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