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लघुकथा // टूटती प्रत्यंचा // ज्योत्सना सिंह

सुप्रतीक बाला की कलाकृति


टूटती प्रत्यंचा

साँसों की गिरती -उठती लय-ताल के साथ ही उसके माता-पिता की प्रार्थनाओं का भी उतार-चढ़ाव चल रहा थ।

हर सुबह डॉक्टर के परीक्षण के बाद उसका वो दिन अंतिम दिन हो सकता है कि सम्भावनाओं के साथ बीतता और माता-पिता की एक दिन पहले की बटोरी सारी आशा निराशा में बदल जाती।

सहमी हुई आशा के साथ वे आई॰सी॰यू॰ के प्रतीक्षालय में अपनी प्रार्थना से ईश्वर के दया के क़िले को भेदने के लिये कई-कई मिन्नतों के तीर चलाते।

पर आज उसके पिता से अपनी बेटी का असहनीय दर्द न देखा गया और वह उसकी निरीह आँखो में अपने दर्द से मुक्ति पाने की तड़प को देख ईश्वर से अपनी माँगी मिन्नतों के बदले उसकी मुक्ति की कामनाओं की दुआ करने लगा।

यूँ लगा जैसे उसके साधे सभी तीरों की प्रत्यंचा टूटने लगी हो।

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ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर लखनऊ

लघुकथा 6957597567104618813

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