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कहानी -- दूसरा राज महर्षि --- अरुण अर्णव खरे

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कहानी

दूसरा राज महर्षि

--- अरुण अर्णव खरे --

शहर के लगभग सभी मुख्य चौराहों पर लगे राज महर्षि के बड़े-बड़े होर्डिंग्स को जब भी अनुरीता देखती उसके मन में एक ही ख़्याल आता कि कब उसका बेटा बड़ा होगा और वह उसकी तस्वीर इन होर्डिंग्स पर चमकते हुए देखेगी। राज महर्षि उस वर्ष का आई०आई०टी० टॉपर था। पहली बार शहर के किसी लड़के ने इतनी बड़ी सफलता हासिल की थी। अनुरीता का बेटा शौर्य तब छोटा ही था और नौवीं में पढ़ रहा था। पढ़ने में वह भी बहुत होशियार था और अब तक किसी भी इम्तिहान में दूसरे नम्बर पर नहीं आया था। इसी कारण अनुरीता बड़े-बड़े सपने देखने लगी थी। उसने अपने मन की बात को शौर्य से छुपाना भी उचित नहीं समझा। वह सोचती थी कि शौर्य को अभी से प्रेरित करने के लिए जरूरी है उससे अपने मन की बात कह दी जाए ताकि उसे पता रहे कि उसकी मंजिल क्या है। एक दिन जब दोनों न्यू मार्केट से ऑटो में लौट रहे थे तो अनुरीता ने सेकेण्ड स्टॉप पर लगे होर्डिंग की ओर इशारा करते हुए कहा - "शौर्य।। उधर देखो।। एक दिन मैं भी तुझे वहीं पर देखना चाहती हूँ।। आज से तू दूसरा राज महर्षि।। "

"माँ मेरा नाम शौर्य है" अनुरीता का बेटा तुनक गया।

"हाँ बेटा।। तू शौर्य ही है।, और होर्डिंग पर भी तेरा नाम ही लिखा होगा।। कुछ इस तरह से।। शहर का दूसरा राज महर्षि।। शौर्य आनंद" यह कहते हुए अनुरीता की आँखों में सौ केंडिल पॉवर की चमक उभर आई, पर शौर्य के चेहरे से लग रहा था कि माँ का बार-बार उसे राज महर्षि कहना पसन्द नहीं आया था।

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समय अपनी चाल चलता रहा। शौर्य ने नौवीं मे भी टॉप किया। दसवीं के बोर्ड एग्जाम में उसे पूरे राज्य में तीसरा स्थान मिला। गणित में उसे पूरे सौ मॉर्क्स मिले थे। अनुरीता ने मानो दुनिया ही जीत ली। वह आसमान में उड़ते हुए इतनी ऊंचाई तक पहुंच गई थी कि उसे इन्द्रधनुष भी अपने पैरों के नीचे दिखाई देने लगा। उसे पूरा विश्वास हो चला था कि शौर्य की तस्वीर एक दिन होर्डिंग्स पर ज़रूर जगमगाएगी। उसे जब भी मौक़ा मिलता वह शौर्य को राज महर्षि की याद दिलाना नहीं भूलती। अपनी खुशी और सपने को बाँध पाना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। जाने अनजाने उसने कितने ही लोगों को इस बारे में बता दिया था। कुछ लोगों ने तो उसकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया तो कुछ ने उसे - "हाँ।। हाँ।। क्यूँ नहीं।। शौर्य तो बहुत होशियार लड़का है।। वह ज़रूर टॉप करेगा" जैसी बातें कर अनुरीता का उत्साह बनाए रखा। कुछ ने मन ही मन उस पर व्यंग्य बाण भी चलाए - "बहुत उड़ रही है अभी से।। देखना एक दिन मुँह दिखाने से भी कतराएगी।।।"

अनुरीता की बेसब्री दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। ये समय इतना धीरे-धीरे क्यूँ चल रहा है।।। शौर्य तो अभी ग्यारहवीं मे ही पढ़ रहा है।। दो साल और इंतजार करना है उसे अभी तो।। चौराहों पर लगे राज महर्षि के पोस्टर भी धुँधलाने लगे थे पर अनुरीता के मन मे अंकित राज की छवि अब भी वैसी दमक रही थी।। जैसी कोचिंग सेंटर के ऊपर लगे निओन लाइट वाले होर्डिंग में दमका करती थी।

उस दिन शौर्य अनुरीता पर बड़ा नाराज़ हुआ जब उसने सरिता और रश्मि आण्टी से माँ को कहते सुन लिया था - "मैं बहुत बेसब्री से उस दिन का इन्तजार कर रही हूँ जब मेरा शौर्य दूसरा राज महर्षि बनकर इस शहर की हर गली में चर्चा का केन्द्र बनेगा।" सरिता तिवारी और रश्मि सिन्हा अनुरीता की पक्की सहेलियाँ थी और उस दिन मधु सुगवेकर की किटी-पार्टी से लौटते हुए घर पर रुक गईं थीं।

"अनुरीता।। हम सबकी इच्छा है शौर्य ऐसी सफलता प्राप्त करे।। पर उस पर इसके लिए अभी से दबाव बनाना ठीक नहीं है" - रश्मि ऑण्टी ने कहा था।

"रश्मि।। मैं नहीं मानती तुम्हारी बात को।। शौर्य को पता होना चाहिए कि उसका लक्ष्य क्या है।। हम क्या सोचते हैं।। हमारे सपने क्या हैं - हमारी अपेक्षाएं क्या हैं -- यदि उसे अभी से सचेत नहीं करेंगे तो फिर वह कैसे अपने उद्देश्य को समझेगा और प्राप्त करेगा" - अनुरीता के हाव-भाव से लग रहा था कि उसे रश्मि की बात पसन्द नहीं आई है।

"तुम तो बुरा मान गई अनुरीता।। मेरा मतलब ये नहीं था"।। रश्मि ने कहा - "मैं तो केवल इतना कहना चाह रही थी।। कि शौर्य पर राज महर्षि बनने का एक्स्ट्रा प्रेसर न बनाया जाए।। उससे अपेक्षा रखो लेकिन अपेक्षाओं का बोझ उस पर मत लादो।।"

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रश्मि और सरिता के जाने के बाद चाय के प्याले उठाते हुए अनुरीता बड़बड़ाती जा रही थी - "मुझे सीख दे रहीं हैं -- मेरे बेटे से जलती हैं दोनो -- रश्मि ने तो अपने बेटे को कॉमर्स दिलाया है -- मैथ्स लेकर पढ़ पाना हरेक के बस की बात नहीं है -- सरिता की बेटी तो और आगे जा रही है -- उसे फाईन आर्टस से बेहतर कोई और विषय ही नहीं मिला -- दिनभर कागजों पर रंग उड़ेलती रहती है।। कैसी विचित्र-विचित्र आकृतियां बनाती है -- उफ। "

"माँ मैं शिखर के यहाँ जा रहा हूं -- बहुत दिनों से टेबल टेनिस नहीं खेला है -- एक घण्टे में लौटूंगा -- " कहते हुए शौर्य ने अपनी सायकिल बाहर निकाली और चला गया।

कुछ दिनों बाद शौर्य की बर्थ डे पार्टी में आए उसके दोस्तों - अनुज, मनीष और सौम्या से भी अनुरीता ने वही सब कह डाला, जो अनेक बार वह अपनी सहेलियों से कह चुकी थी - "देखना तुम लोग -- शौर्य राज महर्षि का रिकॉर्ड भी एक दिन तोड़ कर दिखाएगा -- सारे शहर में उसके पोस्टर्स लगे होंगे--|" उस समय तो उन्होंने - "हाँ आण्टी।। आप सच कह रही हैं।। सर को भी शौर्य पर पूरा भरोसा है" कहकर अनुरीता के मन की बात कर दी पर बाद में वे भी शौर्य को राज -- राज कह कर बुलाने लगे। सुन कर शौर्य तिलमिला कर रह जाता।। माँ पर उसे ग़ुस्सा भी बहुत आता।। पर उसे पता था कि माँ से कहने का कोई फ़ायदा नहीं है। पापा की पोस्टिंग भुवनेश्वर में हो जाने के कारण वह दो माह में बमुश्किल चार-पाँच दिनों के लिये घर आ पाते थे। शौर्य से उनकी ज्यादा बात नहीं हो पाती थी -- "पढ़ाई कैसी चल रही है -- अपना व माँ का ठीक से ध्यान रखना-- उनको परेशान मत करना -- कोचिंग मिस मत करना -- सात बजे तक घर आ जाया करो --" जैसे संवाद ही दोनों के मध्य होते थे।

शौर्य को भी राज महर्षि अब चुनौती लगने लगा था। जब भी वह रिलेक्स मूड में होता, बरबस ही राज महर्षि के बारे में सोचने लगता।। यदि वह सचमुच राज महर्षि नहीं बन पाया तो।। माँ तो टूट ही जाएगी।। कितना अपमानित महसूस करेगी वह।। सरिता और रश्मि आण्टी कितने चटकारे ले-ले कर माँ की हँसी उड़ाएँगी। मेरे दोस्त भी मन ही मन बहुत खुश होंगे।। मनीष तो ख़ासतौर पर -- जिसने मेरा मज़ाक़ बनाने के उद्देश्य से पहली बार मुझे स्कूल में पीछे से "ओए राज" कह कर पुकारा था और खिलखिलाकर उपेक्षापूर्ण ढंग से हँस दिया था । इसके बाद तो उसके क्लासमेट्स उसे इसी नाम से बुलाने लगे थे। कितना असहज हो जाता है वह यह नाम सुनकर।। शौर्य का अस्तित्व ही नहीं बचा हो जैसे।

इसी मानसिक उधेड़-बुन में डूबता उतराता शौर्य अपने को बहुत अकेला महसूस करने लगा था। पढ़ने बैठता तो किताबों के बीच से निकल कर राज महर्षि उसके सामने खड़ा हो जाता। कभी उसे लगता राज महर्षि पढ़ाई में उसकी मदद कर रहा है।। कठिन से कठिन सवाल वह चुटकी में हल कर लेता।। तो कभी उसे इसके उलट महसूस होने लगता -- जब आसान से सवाल भी उसे उलझा कर रख देते।। उसे लगता राज महर्षि दूर खड़ा-खड़ा उस पर हँस रहा है। वह राज महर्षि नाम की इस पहेली से जितना दूर रहना चाहता था वह उतना ही निकट आकर उसे अपनी गिरफ्त में ले लेती।

शौर्य ने स्वयं को स्कूल और कोचिंग तक ही सीमित कर लिया था। घर आने के बाद वह अपने को कमरे में बन्द कर लेता और पढ़ने के लिए बैठ जाता। दो महीने से ऊपर हो गए थे वह न शाम को और न ही छुट्टी वाले दिनों में किसी दोस्त से मिलने गया था।। टेबल टेनिस खेलने का उसका शौक़ तो बहुत पीछे छूट गया था। टीवी देखे हुये भी उसे एक अर्सा हो गया था - उसे ना ही लॉफ्टर शो से दिलचस्पी रह गई थी और ना ही तारक मेहता का उल्टा चश्मा आकर्षित करता था। मोबाइल में भी उसने पिछले एक माह में एक बार भी नेट-पेक नहीं डलवाया था। अनुरीता बहुत खुश थी कि शौर्य उसके सपने के लिए कितनी जी तोड़ मेहनत कर रहा है। पढ़ाई में इतना खोया रहता है कि खाने के लिए नख़रे करना भी भूल गया है।। लौकी और गिल्की की सब्ज़ियाँ तक चुपचाप खा लेता है।। अनुरीता उसकी सेहत को लेकर चिन्तित भी रहती।। उसे बीच बीच में उसकी मन पसन्द चीज़ें बनाकर खिलाती रहती पर अनुरीता के मन में यह कभी नहीं आया कि वह शौर्य को कभी-कभी बाहर घूमने, दोस्तों से मिलने या थोड़ा बहुत खेलने के लिए कहे।

ग्यारहवीं की स्थानीय परीक्षा में शौर्य पहले स्थान से खिसक कर तीसरे स्थान पर आ गया। हमेशा खेल-कूद में मस्त रहने वाले तन्मय चतुर्वेदी ने आश्चर्यजनक रूप से सातवें स्थान से छलांग लगाते हुए टॉप किया था और सौम्या हमेशा की तरह दूसरे स्थान पर ही थी। शौर्य को पता था कि उसके पेपर्स उतने अच्छे नहीं गये हैं - हर पेपर में समयाभाव के कारण वह ५ से १० अंकों के प्रश्न हल ही नहीं कर पाया था। पर अनुरीता शौर्य के रिजल्ट से ज्यादा विचलित नहीं थी - उसे लगता था कि आई०आई०टी० की तैयारी में अधिक ध्यान देने के कारण ही शौर्य पहले स्थान पर नहीं आ सका है।

रिजल्ट से शौर्य खुश नहीं था। जीवन में पहली बार वह प्रथम आने से वंचित रहा था -- और वह भी सीधे तीसरे नम्बर पर जा पहुंचा था। तन्मय जिसे कभी कोई बहुत सीरियस्ली नहीं लेता था सीधा टॉप कर गया था। शौर्य को लगने लगा था कि उसके साथ सब कुछ ठीक नहीं है। उसकी याददाश्त उसका साथ नहीं दे रही है -- कई बार आसान से फार्मूले तक उसे समय पर याद नहीं आते और छोटे-छोटे सवालों को हल करने में भी उसे अधिक समय लग जाता है। वह किताबों में और ज्यादा दिमाग खपाने लगा -- हर समय उसे लगता रहता कि राज महर्षि उसके आसपास रहकर उसकी हर गतिविधि पर नजर रखे हुए है -- कई बार तो वह देर रात तक कुर्सी पर बैठा इसी उधेड़बुन में खोया रहता कि कहीं राज महर्षि उसकी राह कठिन बनाने कोई खेल तो नहीं खेल रहा -- फिर उसे दूसरे ही क्षण अपने पागलपन पर हँसने की इच्छा होती -- लेकिन उसकी हँसी तो जैसे बहुत पीछे कहीं छूट चुकी थी। अधरों पर आने से पहले ही हँसी अन्दर ही अन्दर घुटकर दम तोड़ देती।

समय जैसे-जैसे बीत रहा था शौर्य का आन्तरिक डर बढ़ता जा रहा था - उसे अपनी असफलता का डर बुरी तरह सताने लगा था -- किताबें खोलते ही अक्षरों के स्थान पर उसे अब राज महर्षि के साथ-साथ रश्मि और सरिता आण्टी के चेहरे भी दिखाई देने लगे थे -- उसे लगता ये सभी उसकी असफलता का जशन मनाने इकट्ठे हो गये हैं। मनीष भी दूर से उसे कितनी अजीब और मजाक बनाने वाली निगाहों से देख रहा है -- वह कितना खुश लग रहा है -- लगता है उसे अपने फेल हो जाने का उतना दुख नहीं पहुंचा है जितना उसके असफल हो जाने से उसे खुशी मिली है। इन सबके बीच माँ का उदास पीला चेहरा देखकर उसका मन उसे धिक्कारने लगता -- उसका मन होता कि तकिए में मुँह छुपाकर रो ले -- पापा प्रकट होकर जरूर उसे ढाढ़स बंधाते -- अभी राह खत्म थोड़े हुई है -- अगले साल और तैयारी से परीक्षा देना -- अमिताभ बच्चन की वह सीख भी उसके मन- मष्तिस्क पर उभरती, जो उन्होंने टी०वी० पर किसी कार्यक्रम में दी थी - सम्भवतया कौन बनेगा करोड़पति में -- "कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती / लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती।"

१२वीं के इम्तहान सिर पर थे लेकिन शौर्य इम्तहान देने के लिए स्वयं को तैयार नहीं कर पाया था। आधे से ज्यादा कोर्स का वह रिवीजन ही नहीं कर सका। कई दिनों से उसके सिर में दर्द हो रहा था -- नींद भी उसकी पूरी नहीं हो रही थी -- साथ ही राज महर्षि कभी भी अचानक आकर उसका रहा सहा आत्म विश्वास हिलाकर चला जाता था।

पहला पेपर देकर वह वापस आ रहा था कि रास्ते में सायकिल से गिर गया। गिरते ही वह बेसुध हो गया। उसके दोस्तों ने उसे अस्पताल पहुँचाया और अनुरीता को खबर दी। उसका हीमोग्लोबिन गिरकर नौ रह गया था -- वजन भी ५१ किलो से घट कर ४४ किलो रह गया था। अनवरत मानसिक तनाव की काली रेखाओं ने उसके चेहरे को मलीन बना दिया था। वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहा था। अनुरीता इस स्थिति में अपने बेटे को देखकर सिहर गई -- यदि सिस्टर ने उसे संभाला नहीं होता तो वह नीचे गिर गई होती। डाक्टर ने शौर्य को कम से कम एक सप्ताह अस्पताल में रखने को कहा -- उसे नींद पूरी ना होने की वजह से सायकियाट्रिक एण्ड न्यूरोलॉजिकल डिस ऑर्डर हुआ था -- अनुरीता तो जैसे यह सुनकर निढाल हो गई -- उसे लगा किसी उपग्रह ने उसे अंतरिक्ष में ले जाकर छोड़ दिया है -- राज महर्षि के होर्डिंग के टुकड़े भी उसके साथ-साथ शून्य में घूम रहे हैं।


परिचय :

अरुण अर्णव खरे

२४ मई १९५६ को अजयगढ़, पन्ना (म०प्र०) में जन्म। भोपाल विश्वविद्यालय से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक। सम्प्रति लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग से मुख्य अभियंता पद पर कार्यरत रहते हुए सेवा निवृत।

कहानी और व्यंग्य लेखन के साथ कविता में भी रुचि। कहानियों और व्यंग्य आलेखों का नियमित रूप से देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं सहित विभिन्न वेब पत्रिकाओं में प्रकाशन। एक व्यंग्य संग्रह - "हैश, टैग और मैं" और एक कहानी संग्रह - "भास्कर राव इंजीनियर" सहित दो काव्य कृतियाँ - "मेरा चाँद और गुनगुनी धूप" तथा "रात अभी स्याह नहीं" प्रकाशित। कुछ सांझा संकलनों - गीतिका लोक, साहित्य सागर, सत्यम प्रभात, प्रेम काव्य सागर, प्रतिबिम्ब (लघुकथा), उत्कर्ष काव्य संग्रह, सहोदरी लघुकथा, व्यंग्य के नव स्वर, व्यंग्य प्रदेश : मध्य प्रदेश, व्यंग्यकारों का बचपन आदि में भी कविताओं, कहानियों तथा व्यंग्य आलेखों का प्रकाशन। "गीतिका है मनोरम सभी के लिए" (मुक्तक संग्रह), अट्टहास के मध्यप्रदेश विशेषांक और पर्तों की पड़ताल के व्यंग्य विशेषांक का सम्पादन। कथा-समवेत द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में कहानी "मकान" पुरस्कृत। एक व्यंग्य उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य। गुफ़्तगू सम्मान इलाहाबाद सहित दस-बारह सम्मान। इनके अतिरिक्त खेलों पर भी छ: पुस्तकें प्रकाशित। भारतीय खेलों पर एक वेबसाइट www.sportsbharti.com का संपादन। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी वार्ताओं का प्रसारण।

गया प्रसाद स्मृति कला, साहित्य व खेल संवर्द्धन मंच का संयोजन एवं अट्टहास पत्रिका के म०प्र० प्रमुख। वर्ष 2017 में अमेरिका में काव्यपाठ। वर्ष 2015 में भोपाल तथा 2018 में मॉरिशस में सम्पन्न 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रतिभागिता।

पता - डी-1/35 दानिश नगर, होशंगाबाद रोड, भोपाल (म०प्र०) 462 026

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