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पुस्तक समीक्षा *बालकों के लिए सुंदर प्रस्तुति : "मुझे भी सिखाना"*

पुस्तक समीक्षा

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*बालकों के लिए सुंदर प्रस्तुति : "मुझे भी सिखाना"*

कृत्ति - "मुझे भी सिखाना" (बाल कहानियां)

रचनाकार:  गोविंद शर्मा

प्रकाशक:  साहित्य सागर प्रकाशन, धमाणी मार्केट की गली,चौड़ा रास्ता, जयपुर (राजस्थान),

प्रकाशन वर्ष: 2018

पृष्ठ: 112

मूल्य: 175 रूपये (सजिल्द)


साहित्य का प्रथम श्रोता बालक होता है। इस कथन का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति जब अपनी जीवन यात्रा प्रारंभ करता है, तब वह शिशु रूप में होता है। शिशु को जब माँ लोरी सुनाती है और वह लोरी सुनते सुनते सो जाता है, तब वह साहित्य से, संगीत से परिचित होता है।यही परिचय आगे चलकर उसे साहित्य से जोड़ता है। शिशु साहित्य का प्रथम आस्वादक हैं। यही शिशु जब कुछ बड़ा हो जाता है, तब वह कुछ न कुछ गुनगुनाने लगता है, गाने लगता है, उसे दोहराने लगता है। दोहराते दोहराते उसे कुछ पंक्तियां याद हो जाती है, और यही क्रम उसे धीरे-धीरे साहित्य की ओर ले जाता हैं ,वह अक्षर ज्ञान प्राप्त करता है और इसी क्रम में वह जो साहित्य पढ़ता है, उसे बाल साहित्य कहा जा सकता है।

   " बाल साहित्य", साहित्य की एक प्रमुख व विशिष्ट विधा हैं कविता व कहानी के रूप में बाल साहित्य प्रांरभ से ही बच्चों व किशोरों के बीच लोकप्रिय रहा है। मनुष्य के जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा बचपन को माना गया हैं। बच्चों का अपना एक विराट संसार है। उसका कोई ओर-छोर नहीं है। प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार श्री गोविंद शर्मा वर्षों से बाल साहित्य का सृजन कर रहे हैं। अब तक आपकी बालसाहित्य की लगभग 30 कृतियां प्रकाशित हो चुकी है। कई कृतियां सम्मानित, चर्चित हो चुकी हैं। बालसाहित्य की आधारभूत आवश्यकता है- मनोरंजन कौतूहल, भाषा की सरलता,सहजता एवं कहानी में अंतर्निहित अच्छे विचार ओर ज्ञान। श्री गोविंद शर्मा जी की बाल कहानियों  में इन तत्वों का भरपूर समावेश हैं।

   आपके सद्यः प्रकाशित बाल कहानी संग्रह ‘मुझे भी सिखाना’ में 27 नई कहानियां संग्रहीत हैं। चार खंडों में विभक्त ये कहानियां पर्यावरण संरक्षण, अंधविश्वास से दूर रहने, संस्कारी बननें, स्वच्छता अपनाने, मुसीबत में धैर्य व बुद्धि का उपयोग करने की सीख के साथ बालकों का मनोरंजन भी करती हैं। शीर्षक कहानी ‘मुझे भी सिखाना’ बिना सोचे-समझे हर किसी बात का विरोध नहीं करने की सीख देती है तो ‘शहद की मक्खी’ कहानी के माध्यम से स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश दिया गया है। कहानी ‘धन्यवाद राजू’ एवं ‘रंगदार सबक’ मानवीयता ,संस्कार व संवेदनाओं को अपनाने की सीख देती हैं। ‘जल कंजूस’ जल संरक्षण के बारे में सावचेत करती है तो ‘चौकीदार’ कहानी मुसीबत के समय बुद्धि व धैर्य से काम लेने का संदेश देती हें। ‘दादी के कौव्वे’ सजगता की सीख देते है।‘फर्ज अपना-अपना’ कहानी में मुसीबत के वक्त मित्रों की मदद करने का पाठ पढाती है तो ‘समझदारी का टैक्स’ कहानी में मनोरंजक तरीके से राज द्वार प्रजा को परेशान नहीं करने का रोचक संदेश दिया गया है।

  ‘मुझे भी सिखाना’ की ‘समय की पाबंदी’,‘काम का नाम’, ‘लाटरी बाबा’, ‘आजादी के दीवाने’ , ‘खबर का असर’, ‘गुस्सा और दोस्ती’, ‘पंछी एक डाल के’, ‘ऐसे बने दोस्त’,‘मिस्टर आकाश ’आदि सभी कहानियां रोचक, प्रेरक और मनोरंजक है जिन्हें बालक आसानी से आत्मसात करते हैं। श्री गोविंद शर्मा शिक्षाविद् हैं ओैर बाल मनोविज्ञान के पारखी भी। आपकी बाल कहानियां एक नई वैज्ञानिक चेतना से युक्त होती है।

बालकों के लिये लिखने के लिए बहुत आवश्यक है कि हम स्वयं को उनके अनुभवों से गुजारें, उनकी जिज्ञासाओं को जानें, उनके मनोविज्ञान को समझें। समय काल के अनुरूप उनके मानसिक क्षितिज में प्रवेश करें, उन्हें अपने मानस में आत्मसात करें, कुछ उनसे लें और तब अपने को उन- अनुभव - अनुभूतियों से गुजारने के बाद जब कहानी सृजित होगी, तब वह वास्तविक रूप से उन बालकों के लिये होगी, उनकी कहानी होगी। उनकी कल्पनाशीलता तथा ज्ञान को बढाने वाली होगी। "मुझे भी सिखाना" बाल कहानी संग्रह की कहानियां इस कसौटी पर खरी उतरती है।

     श्री गोविंद शर्मा के इस कहानी संग्रह ‘मुझे भी सिखाना’ की रूचिकर और आकर्षक प्रस्तुति के लिए चित्रों का कुशल संयोजन भी इस संग्रह का सबल पक्ष है। ‘गागर में सागर’ समेटे इस संग्रह की छपाई, कागज, साज-सज्जा, मुख पृष्ठ, फ्रूफ जरा भी शिकायत का मौका नहीं देते और यह किताब पाठक के चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान छोड़ती है। आशा है यह बाल कहानी संग्रह बच्चों के बीच लोकप्रिय बनेगा और हिन्दी बालसाहित्य की विशिष्ट विरासत भी । शुभकामनाएं।

समीक्षक:

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राजकुमार जैन राजन

चित्रा प्रकाशन

आकोला -312205, (चित्तौड़गढ) राजस्थान

मोबाइल: 9828219919

ईमेल:  rajkumarjainrajan@gmail. com

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