---प्रायोजक---

---***---

रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु लघुकथाएँ आमंत्रित हैं.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ [लिंक] देखें. आयोजन में अब तक प्रकाशित लघुकथाएँ यहाँ [लिंक] पढ़ें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

कहानी // प्रतिशोध // ललिता यादव

साझा करें:

प्रतिशोध राजनंदनी और राजमोहिनी दोनों आपस में सहेलियाँ थी। नाम सुनकर तो ऐसा लगता है कि दोनों एक ही घर से संबंधित है, पर ऐसा बिलकुल भी नहीं है...

प्रतिशोध

20180826_092555_resized

राजनंदनी और राजमोहिनी दोनों आपस में सहेलियाँ थी।


नाम सुनकर तो ऐसा लगता है कि दोनों एक ही घर से संबंधित है, पर ऐसा बिलकुल भी नहीं है। राजनंदनी जैसा कि नाम से ही राजकुमारी लगता है यह नाम के ठीक विपरीत राजनंदनी की पैदाइश वक्त के मारे एक गरीब परिवार में हुआ था। गरीबी इतनी की दो -दो दिन भूखे रहना पड़ता था। लेकिन, राजनंदनी दिल की राजकुमारी जरूर थी। उसका अंदाज, उसके ख्वाब उसके सपनों के राजकुमार सब राजघराने से जुड़े होते थे। दरियादिली इतना कि घर में थोड़ा सा भी खाने को हो तो वह सहेली रूपी प्रजा पर सब कुछ लुटा देती थी। गरीबी में पली राजनंदनी समय से पहले ही समझदार हो गई थी। गरीबी ने उसे सबकुछ सिखा दिया था फिर भी वह किसी राजकुमारी से कम नहीं थी। उसका हँसमुख व्यवहार होने के कारण गरीब हो या अमीर सभी के दिलों में वह राज करती थी सभी उसके दोस्त आसानी से बन जाते थे। वह अक्सर अपनी माँ से कहती थी-"माँ देखना एक दिन मैं बड़ी हो जाऊँगी तो बहुत पैसे कमाऊंगी जहाँ देखोगी वहाँ पैसा ही पैसा होगा तुम्हें कोई कमी न होने दूँगी। यह सुनकर माँ उसे गले से लगा लेती।" दरअसल राजनंदनी बचपन से गरीब नहीं थी बल्कि उसके पिताजी की बीमारी के कारण सारी संपत्ति बेचकर भी पिताजी को नहीं बचा पाए थे।

[post_ads]
धीरे-धीरे राजनंदनी बड़ी हो रही थी। जैसे-जैसे राजनंदनी बड़ी हो रही थी उसकी सुंदरता भी उसके साथ दिन दूना रात चौगुना बढ़ती जा रही थी। राजनंदनी की अल्हड़ जवानी लड़कों की नींद उड़ाने के लिए काफी थी, हर कोई उसे अपना बनाने को बेताब था। उसकी माँ को उसके विवाह की चिंता सताने लगी। आए दिन मुहल्ले में लड़कों का जमावड़ा लगा रहता हर कोई राजनंदनी की एक झलक पा लेना चाहता था। कई लड़कों ने तो शादी की बात तक कह डाली पर राजनंदनी ने अभी तक किसी को घास नहीं डाला था। उसने अपनी माँ से स्पष्ट कहा कि - "मुझे इन फालतू लड़कों में कोई इन्टरेस्ट नहीं है मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ।" शुरू-शुरू में तो माँ समाज को लेकर चिंतित रहती थी वह डरती थी कि राजनंदनी पर कोई किसी प्रकार का दाग न लगा दे। कमबख्त जवानी होती ही ऐसी है। लेकिन राजनंदनी की इच्छा के आगे वह मजबूर हो गई।

राजनंदनी अपने ख्वाब के पंखों से उड़ान भरते हुए सी एम डी कॉलेज पहुँच गई। कॉलेज में भी उसका आकर्षक व्यक्तित्व सबको अपनी तरफ आसानी से खींच लेता था। और यहीं उसकी दोस्ती हुई काजल, मनीषा, शिखा, कुन्ती, मधुरानी, एकता और राजमोहिनी से इन सभी सहेलियों में राजमोहिनी कुछ खास करीब थी। राजनंदनी राजमोहिनी के साथ कुछ ज्यादा ही घुलमिल गई थी कारण था राजमोहिनी कि सम्मोहन शक्ति। जो कोई उससे एक बार मिल लेता प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। न जाने उसकी आँखों मे ऐसी कौन सी कशिश थी जो किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। दोनों सहेलियाँ एक दूसरे पर जान छिड़कती थीं। दोनों की सुंदरता देखने लायक थी अंतर था तो बस इतना कि राजमोहिनी अपने दिल का इस्तेमाल ईश्वर के प्रसाद की तरह करती थी। इन्हीं के दोस्तों की लिस्ट में कुछ लड़के अरविंद, कुणाल, प्रतीक, प्रभात, चैतन्य और अंशुमान आदि भी थे। अंशुमान की खासियत ये थी कि वह किसी को भी आसानी से अपना बना लेता था। प्रभात को हर बात में शर्त लगाने की आदत थी। सभी दोस्त आपस में बहुत अच्छे से रहते थे।

राजमोहिनी और राजनंदनी का प्रभाव इनके दोस्तों पर भी था। लड़के दोस्त आपस में कई प्रकार की बातें करते थे उनकी बातों में इनका नाम हमेशा रहता था। एक दिन तो प्रभात ने हद कर दी उसने सभी दोस्तों को चैलेन्ज किया कि इन दोनों को कौन पटा सकता है किसी की भी हिम्मत नहीं हुई तो अंशुमान ने चैलेंज स्वीकार कर लिया। अंशुमान किसी भी चैलेंज को बाएं हाथ का खेल समझता था । उसने इसे भी खेल ही समझा और अपने खेल को अंजाम देना शुरू कर दिया। राजमोहिनी के आकर्षक व्यक्तित्व से वह अच्छी तरह वाकिफ था और राजनंदनी की खूबसूरती से भी। फिलहाल ये दोनों शर्त के सिवाय और कुछ भी नहीं थी।

[post_ads_2]
अंशुमान की खासियत ये थी कि वह किसी को भी अपनी बातों से प्रभावित कर लेता था। न जाने उसके बोल में कौन सी मिश्री डली होती थी कि यदि कोई उससे एक बार बात कर ले तो वह उसे भूल नहीं सकता था। अंशुमान दोनों पर अपनी किस्मत आजमा रहा था। राजनंदनी समझदार थी उसे घर, परिवार, समाज के लोग क्या कहेंगे इसकी पूरी समझ थी। पर राजमोहिनी बिल्कुल बिंदास थी वह कहती भी थी कि-"जवानी ही तो बहकने के दिन है बुढ़ापे में कौन किसको पूछता है। गलती से मिस्टेक जवानी की उम्र में ही की जा सकती है।" अतः राजमोहिनी जवानी के जोश में बहकती जा रही थी। वह अंशुमान के जाल में फंस गई या यूं कहें कि राजमोहिनी ने अंशुमान को अपने जाल में फ़ांस लिया। वैसे भी राजमोहिनी कई लड़कों के दिलों को खिलौने की तरह खेलकर फेंक चुकी थी। अंशुमान भी वही कर रहा था जो राजमोहिनी उसके साथ करना चाहती थी अर्थात दोनों एक दूसरे को धोखा दे रहे थे। अंशुमान राजमोहिनी के प्यार में अपने शर्त को भी नहीं भूला था।

वह राजनंदनी पर भी डोरे डाल रहा था। राजमोहिनी और अंशुमान के प्यार के बारे में राजनंदनी जानती थी। राजमोहिनी के दिलफेंक आदत से भी वाकिफ थी। वह राजमोहिनी को सुधरने के लिए कहती थी पर वह उसकी बातों को हँस कर धुएं में उड़ा देती थी। इधर अब राजनंदनी के लिये भी विवाह के रिश्ते आने लगे। राजनंदनी की माँ सभी रिश्तों को न चाहते हुए भी ठुकराती जा रही थी। कुछ रिश्ते तो इतने अच्छे होते थे कि राजनंदनी की माँ पछता कर रह जाती थी। राजनंदनी की माँ राजनंदनी पर कोई भी रिश्ता थोपना नहीं चाहती थी। अंशुमान ने अपना काम जारी रखा था। आखिर तोता कब तक राम-राम नहीं बोलेगा। समय बहुत बलवान होता है राजनंदनी को ऐसा महसूस हो रहा था कि अब उसे अंशुमान अच्छा लगने लगा है, वह उसकी निगाहों से दूर हो जाना चाहती थी पर जितनी कोशिश करती उतनी ही असफल हो जाती। ऐसा कहाँ होता है कि इंसान जो चाहे पा जाए तकदीर हर किसी के साथ अजब-गजब के खेल खेलती है। जो राजनंदनी कभी किसी लड़के को घास नहीं डालती थी वह कब अंशुमान के दिल की गुलाम हो गई उसे पता ही नहीं चला। इधर राजमोहिनी जो दिलफेंक इंसान थी वह अंशुमान के प्यार को लेकर गम्भीर होती जा रही थी। उसे लग रहा था कि अंशुमान से बेहतर जीवनसाथी और कोई नहीं हो सकता।

अंशुमान जो सिर्फ शर्त जीतने की खातिर आँधी और तूफान से खेल रहा था। धीरे-धीरे राजमोहिनी का अतीत उसके सामने आने लगा और वह अंशुमान की नज़रों से गिरती जा रही थी। जिन लोगों का दिल कभी खिलौने की तरह इस्तेमाल किया था वे अब राजमोहिनी के साथ हुई राज की बातें अंशुमान के सामने ला रहे थे। अंशुमान अब राजमोहिनी से चिढ़ने लगा था। वह उससे छुटकारा पाना चाहता था पर राजमोहिनी किसी भी कीमत पर अंशुमान को खोना नहीं चाहती थी। राजमोहिनी लड़कों के दिलों को कभी भी खिलौने के सिवा कुछ न समझा वही राजमोहिनी का अब जीना हराम हो रहा था। घाट-घाट का पानी पिलाने वाली अब अंशुमान के आंखों की समुद्री लहरों में स्थिरता ढूँढने का प्रयास कर रही थी। इधर राजनंदनी भी बेचैन थी वह अपने को बचाने का जितना प्रयास करती उतना ही उलझती जा रही थी। कहते हैं प्यार और जंग में सब जायज है उसने राजमोहिनी के प्यार वाली बात जानते हुए भी ये गलती कर ही दी। क्योंकि उस समय उसके मन में अंशुमान विराजमान था। उसने सीधे अपनी माँ से बात की और कहा-"तुम मेरे लिए बहुत परेशान रहती हो यदि चाहो तो एक बार अंशुमान को मेरे विवाह के लिए देख सकती हो।" माँ को कोई आपत्ति नहीं थी उसने कहा ठीक है मैं देखती हूँ। और आनन फानन में ये सोचकर कि कहीं राजमोहिनी उससे शादी न कर ले राजनंदनी ने बिना ग्रेजुएशन कम्पलीट किये विवाह के बँधन में बंध गई। अंशुमान राजनंदनी पर डोरे डाल रहा था पर शादी की बात से वह इंकार नहीं कर सका। राजमोहिनी तो ठगी सी रह गई। अब राजमोहिनी और राजनंदनी में बातचीत बन्द हो गया। ये तो होना ही था। पहले दोनों की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी अब उनकी दुश्मनी के किस्से लोगों के चर्चा के विषय थे।

राजनंदनी इकलौती संतान थी। उसकी माँ ने उसे बड़े लाड़ प्यार से पाला था। किसी भी चीज के लिए उसे कभी मना नहीं की थी। अंशुमान को भी शायद इसी चीज का लालच था कि वह इकलौती है तो उसके हर सम्पत्ति पर उसका अधिकार होगा। अंशुमान को इस शादी से बहुत कुछ दान दहेज की आशा थी लेकिन राजनंदनी का विवाह बहुत सादगीपूर्ण ढंग से हुआ था और एक आदर्श विवाह की तरह सिर्फ एक जोड़ी साड़ी में ही वह ससुराल आ गई थी। बस यही बात अंशुमान को खल गई। शादी के दूसरे तीसरे दिन से ही अंशुमान राजनंदनी को ताने मारने लगा। जलील करने लगा। वह जानबूझकर शादी की बात निकालता और दोस्तों के सामने उसे अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था। वास्तविक बात यह थी कि अब अंशुमान शर्त जीत चुका था। अब उसे राजनंदनी आँखों में खटकने लगी थी। जबकि राजनंदनी उसे अपना पति परमेश्वर समझती थी। पति को लेकर वह बहुत उत्साहित थी उसका सपना था कि "उसका पति सिर्फ उसी का हो, उसकी भावना को समझने वाला हो, उसके कदम से कदम मिलाकर चलने वाला हो, वह उसके साथ अपनी एक पहचान बनाना चाहती थी, वह एक ऐसा कंधा चाहती थी जिसमें वह प्यार से अपने को टिका सके।" लेकिन अंशुमान इतना स्वार्थी था कि उसे सिर्फ अपने से मतलब था। वह जितना उसके नजदीक जाती वह उससे उतना ही दूर भागता था। बल्कि राजनंदनी को जलाने के लिए वह उनकी सहेलियों के भी इस्तेमाल करने लगा। राजनंदनी को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे वह तो यह भी नहीं समझ पा रही थी कि उसने गलती कहाँ की है। पर इतना वह जरूर समझ गई थी कि अंशुमान उसके लायक नहीं है वह सिर्फ लोगों का इस्तेमाल करता है। अंशुमान झूठ को सच मे बदलने के लिए कुछ भी कर सकता था उसके लिए माता-पिता के सौगंध या देवी देवता की कसम उसके लिए कोई मायने नहीं रखता था। वह आसानी से गीता पर हाथ रखकर आसानी से झूठी कसमें खा लेता था। और अपने झूठ को सच में बदल लेता था।

इसी सच झूठ के फेर में शादी के तीन साल कब निकल गए पता ही नहीं चला और राजनंदनी दो बच्चों की माँ भी बन गई। अंशुमान की हरकतें राजनंदनी को अंदर से तोड़ रही थी। राजनंदनी ने फैसला कर लिया कि वह इस तरह घुट-घुट कर नहीं जी सकती, लेकिन अंशुमान से अलग होना मतलब अपना घर तोड़ना था और वह अपना प्यारा सा घोंसला किसी भी कीमत पर नहीं तोड़ना चाहती थी। वह बच्चों को उसके प्यार से अलग नहीं करना चाहती थी। क्योंकि अंशुमान बच्चों से बहुत प्यार करता था। आखिर उन बच्चों में अंशुमान का खून था अतः लगाव होना स्वाभाविक था। उसने सोचा जीने के और भी कई तरीके हैं। वह अपनी मंजिल जो अंशुमान के प्यार के कारण अधूरी रह गई थी उसने उसी को आधार बनाया। सर्वप्रथम तो उसने अपना ग्रेजुएशन कंप्लीट किया। और जुट गई प्रशासनिक अधिकारी बनने की तैयारी में। राजनंदनी ने सोचा घर पर शायद उतने अच्छे से तैयारी न कर पाऊँ क्यों न कोचिंग ज्वाइन कर लूं। और राजनंदनी ने आशा कोचिंग सेंटर ज्वाइन कर लिया।

कुछ दिन तो उसका कोचिंग ठीक-ठाक चलता रहा लेकिन कहते हैं जब दुःख का पहाड़ आता है तो वह एक तरफ से नहीं आता वह सब तरफ से आता है। राजनंदनी के साथ भी ऐसा ही हुआ। हुआ यह कि राजमोहिनी वहीं कोचिंग देने के लिए एक टीचर के रूप में वहीं पहुँच गई। जब वह अपना क्लास लेने पहुँची तो राजनंदनी को देखकर वह भी सन्न रह गई। राजमोहिनी में कोई परिवर्तन नहीं आया बल्कि उसकी सुंदरता पहले से अधिक बढ़ गई थी। आसमानी सूट में वह और भी गजब ढा रही थी। कमर तक काले लम्बे बाल उसकी सुंदर काया को और निखार रहे थे। उसने अपना परिचय आकर्षक ढंग से दिया पहली ही नजर में सब मंत्रमुग्ध हो उसकी बातें सुन रहे थे। राजनंदनी का समय काटना मुश्किल हो रहा था। दो दिन तो वह क्लास ही नहीं गई। उसने अंशुमान को भी नहीं बताया था राजमोहिनी टीचर के रुप में उसके कोचिंग सेंटर में आई है। उसे एक बार फिर अपना लक्ष्य याद आया उसने मन को कड़ा किया और फिर से क्लास जाने लगी। वह रोज राजमोहिनी का सामना करने लगी। दुर्भाग्य से एक घटना और घट गट

ी। हुआ यूँ कि अंशुमान कोई लड़की को एडमिशन के लिए कोचिंग सेंटर ले के गया था और वहाँ उसकी मुलाकात राजमोहिनी से हो गई। राजमोहिनी अंशुमान के दिये दर्द को भूल नहीं पाई थी और उसके प्यार को भी औऱ तो और राजमोहिनी अभी शादी भी नहीं की थी। अंशुमान उसे देखा तो देखता ही रह गया। वह उसे पाने के लिए लालायित होने लगा। वह राजनंदनी के ऊपर दबाव बनाने लगा कि वह राजमोहिनी को खाने पर बुलाए। राजनंदनी उनके पहले प्यार के बारे में जानती थी । तो अंशुमान ने अपनी शराफत के लिए ये परिचय भी दिया कि वह दो बच्चों का पिता है पहले की बात और थी। राजनंदनी ने भी सोचा सही बात है अब ये लोग क्या करेंगे । लेकिन कहते है इंसान की फितरत कभी नहीं बदलती। यही बात अंशुमान और राजमोहिनी पर भी लागु हुई ।
राजनंदनी अपना दोस्ती का रिश्ता समझकर उसे निभाना चाहती थी पर राजमोहिनी के अंदर तो कुछ औऱ ही खिचडी पक रही थी। वह राजनंदनी से अंशुमान को छीनना चाह रही थी और अंशुमान से प्यार में धोखा का बदला लेना चाह रही थी। अर्थात वह दोनों से अपना बदला लेना चाह रही थी। अंशुमान तो उस पर पहले से ही लट्टू था।

राजमोहिनी जान बूझकर राजनंदनी को जलाने के लिए अंशुमान से मिलती। राजनंदनी सब जानती थी वह टूट चुकी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने घोंसले को किस तरह बचाए। उसका कोचिंग जाना जारी था वह उनके सामने किसी भी प्रकार से कमजोर नहीं पड़ना चाहती थी। वह जितना उन दोनों को एकसाथ देखती थी उतना ही वह उनसे नफरत करती थी तथा जितना नफरत करती थी उससे कहीं ज्यादा उसका जुनून तैयारी के प्रति बढ़ जाता था। उतना उसका लक्ष्य मजबूत होता जाता था। ऐसा लगता था उन दोनों को साथ देखना राजनंदनी के लक्ष्य प्राप्ति में रामबाण औषधि की तरह कार्य कर रहा था। जिस तरह काली अन्धेरी रात के बाद अवश्य सूर्योदय होता है ठीक उसी तरह राजनंदनी का भी भाग्योदय हो गया। समय बदला राजनंदनी ने पी एस सी की परीक्षा पास की और डिफ्टी कलेक्टर के पद पर आसीन हो गई। राजनंदनी माँ से पैसा कमाने की बात कहती थी वह सपना अब पूरा हो गया था। जितनी बेइज्जती अंशुमान करता था उतना ही अधिक अब वह सम्मानित हो रही थी। राजनंदनी की एक अच्छी पहचान बन गई थी।

अंशुमान दो नाव में पैर रखे हुए था। राजमोहिनी राजनंदनी के घर को उजाड़ने की कोशिश में लगी थी। राजनंदनी के डिफ्टी कलेक्टर बनने के बाद से उसका आत्मविश्वास बढ़ गया था। वैसे भी जब औरत जब अपने में आती है तो किसी का नहीं सुनती है। एक बार तो राजनंदनी ने सोचा कि इन की दुनियां से दूर हो जाऊं पर फिर वह राजमोहिनी की चाल को समझ गई थी कि वह यही तो चाहती है। राजनंदनी ने अपनी चाल का पैंतरा बदल लिया। उसने राजमोहिनी को रास्ते में लाने के लिए अपने एक प्रशासनिक साथी कमलेश तिवारी की मदद ली। कमलेश को अपने घर बर्बाद होने की बात बताई। कमलेश ने उसे वचन दिया कि जो भी वह उसकी मदद जरूर करेगा। एक दिन राजनंदनी ने खुद राजमोहिनी को कमलेश से मिलवा दिया। कमलेश आकर्षक व्यक्तित्व वाला व्यक्ति था। राजमोहिनी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी। और वह एक अधिकारी के पद पर था। राजमोहिनी का अंदाज तो पहले से ही गजब ढाने का था। राजमोहिनी अवसरवादी थी उसने इस सुनहरे अवसर को लपक लिया। अब वह अंशुमान को किसी कचरे से कम नहीं समझ रही थी। वैसे भी अब उसका अंशुमान से मन भर गया था। वह राजनंदनी और अंशुमान के दिल पर दरार डाल चुकी थी। वह अंशुमान से पीछा छुड़ाना चाहती थी।

राजमोहिनी की खूबसूरती में कमलेश भी बहकने लगा था। दोनों जल्द से जल्द एक हो जाना चाहते थे। अच्छी नौकरी की चाह में कमलेश भी घर बसाने में पीछे रह गया था। वह बार-बार राजनंदनी को धन्यवाद देता था कि उसने राजमोहिनी से मिलाया। राजनंदनी की चाल में बड़ी आसानी से राजमोहिनी फँस गई थी उससे अब निकल पाना भी असम्भव था। अंशुमान अब धीरे-धीरे घर की तरफ लौटने लगा था। बच्चों को फिर से प्यार करने लगा था। राजनंदनी और राजमोहिनी दोनों ने अपने अपने फितरत के अनुसार प्रतिशोध लिया था पर राजनंदनी के प्रतिशोध लेने का तरीका आत्मा को सुकून देने वाला था।
                                           डॉ (श्रीमती) ललिता यादव
                                            बिलासपुर छत्तीसगढ़

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच करें : ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=complex$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3864,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2812,कहानी,2137,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,489,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,348,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,18,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,865,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,24,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,659,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,703,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,186,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: कहानी // प्रतिशोध // ललिता यादव
कहानी // प्रतिशोध // ललिता यादव
https://lh3.googleusercontent.com/-cKDLEhEH7-M/XAoeIROSyOI/AAAAAAABFp0/2Qt562IkP8sLurbTWbzyNZPqL72KTbTqgCHMYCw/20180826_092555_resized_thumb3?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-cKDLEhEH7-M/XAoeIROSyOI/AAAAAAABFp0/2Qt562IkP8sLurbTWbzyNZPqL72KTbTqgCHMYCw/s72-c/20180826_092555_resized_thumb3?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2018/12/blog-post_7.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2018/12/blog-post_7.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ