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कहानी // मोह मोह के धागे // प्रतिभा परांजपे

मोह मोह के धागे

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कहानी

--- प्रतिभा परांजपे

मोबाइल की टिंग टिंग से सुधीरजी उठ कर हॅाल में आए सुबह के चार बजे हैं, मतलब अर्चना लॅास एंजलिस पहुंच गई, उसी का विडियो कॅाल है।

'कहो बहू ठीक से पहुंच गयीं' ?

'हां पापाजी राहुल आए थे, एयरपोर्ट लेने'

'और पियु ? , उसने परेशान तो

नहीं -- ?'

'नहीं पापा, थोड़ी घबराई सी थी, पर अब ठीक है, अभी सो रही है।'

'चलोअच्छा है।'

'पापाजी, मम्मीजी कैसी हैं ?'

'बेटी, वह अभी सो रही हैं , मैंने उसे नींद की गोली दे दी थी। तुम सुषमा की चिंता मत करो अभी उसे जगा कर परेशान नहीं करते, ठीक है ना ?'

'पर पापाजी, मम्मीजी बहुत upset थीं।'

'थोड़ा वक्त बीतने दो , बस, तुम अपना और पियु का ध्यान रखना। और हां, दो दिन बाद, मैं और सुषमा पचमढी जा रहे हैं। वहां से लौटने पर वो खुद तुम्हें फोन करेगी, ठीक है । रखता हूं।' कह कर सुधीरजी ने फोन कट किया और सोने चल दिये।

बाहर दरवाजे की घंटी से सुषमा की नींद खुली। हडबडा के वह उठ बैठी । बापरे , आठ बज़ गये, पियु को दूध पिलाना है। अचानक याद आया, पियु तो यहां है ही नहीं । वो जड़वत वहीं बैठ गई।

किचन से चाय की खुशबू आ रही थी।

'अरे भई सुषमा , चाय बन गई है। जल्दी से आ जाओ। देखो तो, चाय तुम्हारे टेस्ट की बनी है या नहीं ?'

सुषमा समझ रही थी सुधीर उसे नार्मल करने की कोशिश में लगे हैं , पर वो जो खालीपन अंदर बाहर महसूस कर रही है, उस का क्या?

तैयार हो कर घर से निकलते समय सुषमा के पास बैठते हुए सुधीर बोले 'देखो , सुष, पिछले हप्ते जो मीटिंग मैंने postpone की थी, वो कल है। तो हम दोनों जा रहे हैं, तुम सामान पैक कर लो, हम दोपहर में ही निकल रहे हैं।' सुषमा को कुछ बोलने का मौका ही न देते हुए सुधीर चले गए।

पचमढ़ी के गेस्ट हाउस पहुंचने तक रात होने को आ गई। दोनों खाना खा कर सोने चल दिए। दिन भर की थकान से सुषमा को जल्दी नींद आ गईं।

सुबह कमरे की बेल बजी तो सुषमा बाहर लॅान में आ गई। पचमढ़ी के सुहाने मौसम में भी मन पर छाये अवसाद के बादल छंट नहीं रहे थे। उनकी लाडल़ी पियु, उसके कलेजे का टुकड़ा उससे कोसों दूर है। उसके दुख को समझ कर भी सुधीर अनजान बन रहे थे। वे जानते थे कि यह दु:ख,पूछने से और बढ़ेगा। समय और समझ ही इसका एकमात्र इलाज है।

चाय बाहर लॅान में ही मंगाकर सुधीर फ्रेश हो करआए । दोनों साथ में चाय पीने लगे। 'देखो सुष , नौ बजे नाश्ता कर मैं दो घंटे के लिए मीटिंग अटेंड कर आऊंगा, तब तक तुम नहा कर तैयार हो लो, फिर हम घूमने चलेंगे।'

कहते कहते सुषमा के गालों को हलका सा छू कर सुधीर चले गए।

शाम को मौसम थोड़ा बदल सा गया हवा में ठंडक घुल सी गई थी। घूम कर वापिस होटल पहुंच कर दोनों कमरे में ही बैठ गए। सुषमा अभी भी अनमनी सी लग रही थी।

'क्या बात है सुषमा, थक गई क्या ? बहुत कमज़ोर हो गई हो। खाना खाकर फिल्म देखने चलें क्या?'

'रहने दिजिए , नहीं मन नहीं कर रहा'

'कब तक यूँ मायूस रहोगी सुष, सच बताओ, पियु की याद आ रही है ना ?'

इतना सुनते ही सुषमा अपने आप को रोक नहीं पाई, फूट फूट कर रो पडी।

'मेरी प्यारी बच्ची पता नहीं कैसे रहेगी मेरे बिना ? अर्चना को तो उसके मूड सम्हालना भी नहीं पता।'

'वो सीख लेगी सुश, वो उसकी माँ हैं,वो उसका प्यार है, उसने जन्म दिया है उसे--'

'हाँ हाँ, पता है इतनी सी थी, छह माह की , मैंने भी तो मां जैसा ही पाला है। तभी तो वो मुझे मम्मा कहती है।'

'मानता हूं, तुमने उसे दादी नहीं बल्कि माँ जैसा प्यार दिया। वो मासूम भी तुम्हें माँ समझने लगी थी, पर यथार्थ को तुम कैसे झुठला सकती हो, जो तड़प तुम अब महसूस कर रही हो, उसे अर्चना ने डेढ़ साल तक सहा है , --- और उस विश्वास का क्या जिस के भरोसे उसने अपनी बच्ची को तुम्हें सौंपा था ?'

'पर मैं ने भी उसके पालन पोषण में कोई कमी नहीं की और मैं तो उसके भले के लिए ही कह रही थी, कि अभी उसे वहां न ले जाय।'

'तुमने अपना फर्ज सही निभाया। हम सभी को तुम्हारे इस रूप पर गर्व है पर इस सब में तुम इतना डूब गई कि तुम स्वार्थी बन बैठीं । पियु पर तुम अपना अधिकार समझ बैठी और यही पर तुम मात़ खा गई।'

सुधीर जी की बातों से सुषमा को अपनी ग़लती का अहसास होने लगा। मन में उमड़ रहा आक्रोश आंखों से बह गया।

'आप ठीक कह रहें हैं पियु के प्यार में मैं सचमुच भूल गई कि वो मेरी पोती है और मैं उसकी माँ नहीं हूं , और मैं यहीं पर गलती कर गई। मैंने अर्चना को समझने में भूल की, मुझे उससे क्षमा मांगनी हैं।'

'अरे भई अभी वहां रात होगी हम सारी रात सोये नहीं क्या उन्हें भी सोने नहीं दोगी। अब भई, थोड़ा हमारा भी ख्याल रखियेगा इन दो सालों में हम अपनी सुष को ढूंढ रहे हैं।' सुधीरजी ने छेड़ा तो उनकी और आंखें तरेरती हुई सुषमा बोली 'हम आज वापिस चल रहे हैं ना?'

शाम को सुषमा ने अर्चना को वीडियो कॅाल किया तो अर्चना की गोद में पियु को देख उन्हें संतोष हुआ उन्होंने बातों ही बातों में अर्चना से क्षमा याचना की तो अर्चना ने कहा -

'मम्मीजी आप किस चीज़ का अफसोस मन में लिए हुए हैं , आज मैंने जो भी अर्जित किया है, उसका सारा श्रेय आपको जाता है।softwareका ये advance cource और part time job यहां विदेश में पियु को सम्हालकर मैं नहीं कर पाती।'

'परंतु अर्चना मैं ने तुम्हारे अंदर की माँ की तडप़ को नज़र अंदाज़ किया।

'मम्मी जी, आपने तो प्रियांशी को दादी के साथ साथ माँ की ममता भी दी है ओैर आप चाह रही थीं वो उसकी चिंता में समाहित था। अब मुझे अपनी जिम्मेदारी भी तो निभानी है। राहुल भी इसमें मेरा साथ देंगे आप जैसा पियु का ख्याल रख पाऊँ ये आशीर्वाद दीजिए और हां रात को सोते समय वो आपकी गाईं लोरी, 'नन्ही कली सोने चली' सुने बिना सोती ही नहीं।

कान पकडने का इशारा कर हंसते हुए अर्चना बोली 'सॅारी मम्मी जी वो मैंने चुपके से रिकॉर्ड कर लिया था।'

अर्चना की हँसीं ने मन पर छाये आत्मग्लानि के बादल छंट गये। मन आकाश साफ़ धुला धुला सा हो गया।

'अरे भई हमें भी बोलने का मौका मिलेगा कि नहीं?' 'हां, हां, लीजिए में तो चली। दूध वाला कबसे आवाज़ दे रहा है।

'Thank you पापाजी ' - अर्चना की आवाज़ से खुशी छलक रही थी।

'बहू हम भी आपका एहसान मानते हैं , तुमने रिश्ते के धागे में पड़ने वाली गांठ को समय रहते ही सुलझा लिया, वर्ना ये मोह के रेशमी धागे कही उलझ कर रह जाते या टूट जाते।

'प्रणाम पापाजी' राहुल की आवाज़ पर सुधीर जी ने धीरे से कहा ' एक surprise है , तुम्हारी माँ के लिए तुम्हें बता रहा हूँ , दो महीने बाद तुम्हारी शादी की वर्षगांठ पर हम दोनों वहां आ रहे है।

दोनों तरफ के ठहाके सुन अंदर आती सुषमा भी मुस्कुरा दी।

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  1. कहानी 'ये मोह मोह के धागे' अच्छी लगी दादी का अपनी पोती के प्रती प्रेम और मोह फिर ऊसका दुर जाना खुब अच्छे से वर्णित किया गया है बधाई आगे भी ऐसी ही रचनाए भेजते रहे धन्यवाद

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