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कहानी -- मकान --- अरुण अर्णव खरे

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डोरबेल की आवाज सुनकर मनोहर लाल ने दरवाजा खोला तो सामने खड़े अपरिचित व्यक्ति ने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया। बोला - "मैं सुखवानी प्रापर्टीज से आया हूँ -- आपका मकान देखने -- किसी ग्राहक से सौदा करने से पहले मकान का मूल्यांकन करना जरूरी है"

"ये मकान तो मेरा है और मैं तो इसे बेचना नहीं चाहता -- आपको कोई गलतफहमी हुई है" - मनोहर लाल ने आश्चर्य से आगंतुक की और देखते हुए कहा।

"सी-१४२ कंचन बाग, यही पता दिया था हमें मकान देखने के लिए"

"पता तो यही है - आपके साथ किसी ने मजाक किया है - मुझे ये मकान नहीं बेचना है"

"मयंक बंसल का मेल आया था हमारे पास कि पन्द्रह दिनों में उन्हें मकान बेचना है"

मयंक बंसल का नाम सुनते ही मनोहर लाल को चक्कर सा आ गया। आगंतुक ने उन्हें पकड़ा और किसी तरह अन्दर ले जाकर सोफा पर बैठाया। कुछ देर में जब मनोहर लाल संयत नजर आने लगे तो वह कल या परसों फिर आने का कह कर वापस चला गया।

मनोहर लाल अन्यमनस्क होकर पलंग पर लेट गए। उनकी तन्द्रा को नेत राम ने आकर भंग किया - "बाबू जी कपड़े और पानी रख दिया है आप नहा लीजिए - पूजा का सामान और फूल भी ले आया हूँ "

"अरे तू आ गया - मेरी झपकी लग गई थी"

"बाबू जी कुछ तबीयत खराब है क्या"

"नहीं रे -- तू बाजार गया था सामान लाने तो पेपर पढ़ कर बस यूँ ही लेट गया था"

मनोहर लाल ने नहाकर प्रतिदिन की तरह गायत्री मंत्र का जाप किया और शिव पुराण के इक्कीस श्लोक पढ़े। खाना खाकर जैसे ही वह अपने कमरे में आराम करने आए सुबह वाला प्रसंग फिर उनकी आँखों के सामने आकर खड़ा हो गया। मयंक पन्द्रह दिनों में ये मकान बेचना चाहता है -- उसे ध्यान नहीं क्या कि अभी मैं जिन्दा हूँ और इसी मकान में रह रहा हूँ -- अमेरिका में रहते हुए कैसे बेंचेगा मकान -- आखिर क्या है उसके मन में और क्या चाहता है। मुझसे तो उसने इस बारे में बात ही नहीं की और सीधे प्रापर्टी डीलर को मकान देखने भेज दिया।

इसी उधेड़बुन में उनकी आँख लग गई जब आँख खुली तो नेतराम चाय लिए पास ही खड़ा था। घड़ी देखी छह बज रहे थे।

"बाबू जी आज बहुत देर तक सोये रहे आप -- थके-थके भी लग रहे हैं -- चाय पी लीजिए फिर हाथ-पैर दबा देता हूँ"

"नहीं नेत राम -- मैं अब ठीक हूँ -- चाय पीकर थोड़ा टहलने चलते हैं"

मनोहर लाल रोज ही नेत राम के साथ टहलने जाते थे। सतहत्तर साल की उमर में नेत राम उन्हें अकेले नहीं जाने देता था -- जब भी वह कहीं जाते नेत राम उनके साथ जाता था। आज मनोहर लाल का मन टहलने जाने का नहीं था लेकिन कुछ तो क्रम भंग न करने की इच्छा और कुछ क्लान्त मन को शाम की शीतलता से ठण्डक पहुँचाने की चाहत उन्हें ले गई।

नेतराम डिनर की तैयारी कर रहा था कि मयंक का फोन आ गया - "पापा जी कैसे हैं आप - मैं आज सुबह ही बोस्टन से बंगलौर आया हूँ कम्पनी के काम से - एक सप्ताह का काम है इसके बाद एक सप्ताह की छुट्टी ले ली है तब आता हूँ मैं आपसे मिलने"

"मैं भला-चंगा हूँ बेटा - नेत राम हमारा पूरा ख्याल रखता है - आज कोई प्रापर्टी डीलर आया था तुम्हारा नाम लेते हुए"

"हाँ मैने ही बोला था उसे कि मैं भारत आ रहा हूँ तो वह मकान देख कर आकलन कर ले -- मेरे सामने ही मकान का सौदा हो जायेगा तो अच्छा रहेगा"

"पर बेटा तुमने मुझसे पूछा तक नहीं कि मैं क्या चाहता हूँ - अभी तो मैं यहाँ रह रहा हूँ - नेत राम भी साथ में रहता है"

"पापा ठीक है ना -- नेतराम अपनी व्यवस्था कहीं न कहीं कर लेगा -- बार-बार तो मैं यहाँ आ नहीं सकता -- अभी आया हूँ तो सोचा ये काम भी निपटाता चलूँ"

"और मेरे बारे क्या सोचा है मैं कहाँ रहूँगा"

"पापा आप कैसी बातें कर रहे हैं - आप मेरे साथ चलेंगे -- मैं वहाँ आकर आपके वीसा रिन्यूवल के लिए फार्म भर दूँगा -- जब तक आपका वीसा रिन्यू होगा आप किसी ओल्ड एज होम में रह लेना -- वहाँ देखभाल भी अच्छे से होती रहेगी"

मनोहल लाल को मयंक की बात का कोई उत्तर देते नहीं बना। वह चुप रहे। कुछ अन्तराल के बाद मयंक की ही आवाज आई - "मैं अभी रखता हूँ पापा - कुछ क्लाइंट गेस्ट आ गए हैं उनके साथ डिनर के लिए जाना है - बाय पापा"

मनोहर लाल ने बड़ी मुश्किल से दो रोटियाँ खाईं - खाईं क्या जबरन ठूँस ली कि नेत राम फिर कुछ पूंछताछ न करने लगे। बिस्तर पर लेटे तो यादों का पिटारा खुलने लगा। जब मयंक जन्मा था तो कैसे इस निर्जीव मकान की दीवालें भी बोलने लगी थीं। दद्दा जी के न रहने के बाद मयंक का आगमन बसंत की तरह था। शारदा ने जब मयंक को अम्मा की गोदी में रखा था तो उन्होंने अम्मा की सूनी आँखों में फिर से इन्द्रधनुष उतरते देखा था। मयंक की किलकारियों ने ही अम्मा के मन में फिर से जीने की ललक जगा दी थी। शारदा की ममता को तो जैसे पूर्णता मिल गई थी। विवाह के आठ साल बाद ईश्वर ने उसकी गोद भरी थी। वह तो एक तरह से बावरी हो गई थी। पल भर के लिए भी मयंक का आँखों से ओझल होना उसे सहन नहीं होता था।

मयंक स्कूल जाने लगा तो शारदा कमरे की दीवारों से बातें करती रहती - दीवारों को छूकर उसके स्पर्श को महसूस करती -- किलकारियों को सुनने की कोशिश करती - जमीन पर लेट कर उसके पदचाप की आहट सुनती।

दिन बीते पर शारदा की दिनचर्या नहीं बदली। मयंक जब इंजीनियरिंग करने पुणे गया तो शारदा छुप-छुप कर महीनों आँसू बहाती रही। उसके पास जैसे कोई काम ही नहीं रह गया -- नितान्त अकेली रह गई। तभी एक दिन मनोहर लाल नेत राम को लेकर घर आए - ६-७ साल का अनाथ बच्चा जो उन्हें सिहोरा रेल्वे स्टेशन पर बेसुध हालत में मिला था। शारदा के लिए वह मयंक तो नहीं बन पाया लेकिन वह उसका पूरा ध्यान रखती। नेतराम भी अपनी उमर से कहीं ज्यादा परिपक्व था। वह भी शारदा की हर बात मानता - सदा उनकी सेवा को तत्पर रहता - बहुत से ऊपरी काम वह स्वयँ कर देता। उसका एडमीशन भी शारदा ने पास के स्कूल में करा दिया - उसका होमवर्क भी वह जाँचती और उसे पढ़ाती भी। मयंक जब भी छुट्टियों में आता तो नेत राम भी शारदा के साथ व्यस्त रहता। भैया से वह गणित के सवाल पूछता और उनके होस्टल के किस्से सुनता।

इंजीनियरिंग करते ही मयंक को एक मल्टी नेशनल कम्पनी में जॉब मिल गई। पहली पोस्टिंग हैदराबाद में मिली। नेतराम और शारदा मयंक के साथ हैदराबाद गए। मनोहर लाल माँ को अकेला छोड़कर नहीं जा सकते थे। वे दोनों तीन दिन वहाँ रहे और एक पी०जी० में उसके रहने की व्यवस्था करने के उपरान्त ही लौटे।

दो वर्ष पश्चात कम्पनी की और से मयंक को एम०आई०टी० से मास्टर्स करने का ऑफर मिला। पूरा खर्चा कम्पनी दे रही थी - सुनहरा अवसर था, मयंक छोड़ना नहीं चाहता था। अम्मा और शारदा उसके अमेरिका जाने के विरुद्ध थे। उनकी नजर में अमेरिका केवल गोरी मेमों का देश था जो उनके संस्कारी लड़के को अपने रूप के मोहपाश में बाँध लेंती। पर मयंक के सामने नया आसमान था। विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में गिने जाने वाले संस्थान में पढ़ने के नाम से ही वह अभिभूत था। मनोहर लाल ने बेटे की इच्छा और उत्साह को देखते हुए अम्मा और शारदा दोनों को मनाया। शारदा तो समझ गई पर शायद अम्मा नहीं समझ पाई। मयंक के जाने के चार महीने पश्चात ही वह चल बसी - शायद अन्दर ही अन्दर घुटती रहीं थी। जरा से ऐशो-आराम की जिन्दगी के चक्कर में मयंक का सात समन्दर पार जाना वह दिल पर ले बैठी थी।

मयंक का मास्टर्स पूरा हुआ तो कम्पनी ने उसे फिलाडेल्फिया के ऑफिस में ही नियुक्ति दे दी - एक लाख डालर से ज्यादा का पैकेज था उसका। इतनी ऊँची छलाँग -- उसने कल्पना भी नहीं की थी। शारदा उसे वापसी के किए गए वादों की याद दिलाती तो वह हँस कर टाल देता। उल्टा उसने उन दोनों को पासपोर्ट बनवाने के लिए विवश किया। इसके बाद तो उसने किसी ट्रेवल-एजेण्ट के जरिए दोनों के वीसा की व्यवस्था भी कर दी -- केवल उन्हें इंटरव्यू की खानापूर्ति के लिए मुम्बई के काउंसुलेट ऑफिस जाना पड़ा। अमेरिका जाते हुए मनोहर लाल मन ही मन बेटे का शुक्रिया कर रहे थे कि उसके कारण उनकी विदेश घूमने की अतृप्त इच्छा पूरी हो रही है। शारदा इस मामले मे निर्विकार थी - उसे केवल मयंक से मिलने की खुशी थी। उसका वश चलता तो वह मयंक को आँचल में लपेट कर वापस ले आती।

दोनों तीन माह अमेरिका में रहे। मयंक ने दोनों की सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा। खूब सैर कराई - न्याग्रा फाल, न्यूयार्क और वाशिंगटन अपने साथ ही घुमाने ले गया। वाशिंगटन के स्पेस और वार म्यूजियम देख कर मनोहर लाल अभिभूत हो गए। लौटने से कुछ दिन पूर्व दोनों को वह एम०आई०टी० केम्पस दिखाने बोस्टन भी ले गया। विश्व प्रसिद्ध हॉवर्ड यूनिवर्सिटी भी उन्होंने देखी। इस सबके बीच उन्होंने महसूस किया कि मयंक अमेरिकी माहौल में रम गया है - साफ-सुथरे परिवेश, नियमित जीवन-शैली, अनुशासित समाजिक-व्यवस्था ने उसे पूरी तरह अपने रंग में सराबोर कर दिया है।

वापसी में शारदा पूरे समय गुमसुम बैठी रही। पन्द्रह घण्टे के सफर में उसने केवल पोटेटो चिप्स खाए और दो बार ओरेंज जूस पिया।

समय अपनी चाल चलता रहा। एम०टेक० करने के बाद मयंक तीन साल में केवल एक बार भारत आया था। शारदा ने बहुत कौशिश की वह कुछ दिन रुके और शादी करके वापस जाए। उसने कुछ लड़कियों के रिश्ते शार्टलिस्ट करके भी रखे थे पर मयंक "अभी कुछ दिन और रुको माँ" कहकर टाल गया।

कुछ महीनों बाद अचानक मयंक का फोन आया - "माँ मैं अगले रविवार को शादी कर रहा हूँ - घबराओ नहीं इण्डियन लड़की है - मेरे साथ काम करती है - देवप्रिया गांगुली नाम है उसका - बहुत दिनों से साथ रह रही थी -- आप लोग आ सकें तो टिकट भेज दूँ"

पता नहीं मयंक गलती से बोल गया था या जानबूझ कर उसने कहा था पर शारदा सुन कर टूट सी गई - उसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। बिना शादी किए साथ-साथ -- राम-राम -- क्या सुना दिया भगवान। मनोहर लाल ने शारदा को किसी तरह समझाया था कि अमेरिका में सब चलता है - वहाँ लिव-इन रिलेशंस को कोई अन्यथा नहीं लेता। बिना शादी के वहाँ बच्चे तक हो जाते हैं -- पर हर तीज-त्योहार पर नियम से वृत रखने वाली शारदा को कहाँ कुछ समझ में आने वाला था। अमेरिका मे चलता होगा यह सब - पर अपना मयंक तो ऐसा नहीं था -- कितने लाड़-प्यार से पाला था -- पता नहीं कहाँ गलती हो गई उसकी परवरिश में -- क्या कमी रह गई हमारे दिए संस्कारों में --। शारदा ने शादी में जाने से इंकार तो कर दिया पर अन्दर ही अन्दर कसमसाती रही -- टूटती रही। मनोहर लाल उसकी मनोदशा समझ रहे थे -- वह खुद भी बेचैन थे पर अपने गम का सैलाब किसी तरह नियन्त्रित किए हुए थे।

इस बीच नेत राम ने बारहवीं कक्षा पास कर ली। उसका एडमीशन भी ऊंटी के होटल मैनेजमेण्ट इन्स्टीट्यूट में हो गया पर उसने जाने से मना कर दिया। मनोहर लाल ने उसे बहुत समझाया पर वह टस से मस नहीं हुआ - यही कहता रहा कि वह कोई छोटी-मोटी नौकरी ढूँढ लेगा पर आप लोगों को छोड़कर कहीं नहीं जाएगा। उसको नहीं उड़ना अनन्त आकाश में कि अपने नीड़ का रास्ता ही भटक जाए। उसे छोटी सी चिड़िया ही बने रहना है जो सदा आँगन में ही फुदकती रहे।

समय पंख लगाए उड़ता रहा। समय ने शारदा को कुछ्-कुछ सम्हाल लिया था पर उसकी सूनी-सूनी आँखों में अब भी मयंक का इन्तजार था कि वह आयेगा - अपने उसी पुराने निश्छल रूप में और लिपट कर माफी माँगेगा। वह शायद आता भी था हर रोज उसके सपनों में -- पर माफी माँगने नहीं -- कुछ और ऊँचाई पर उड़ जाने के लिए - मनोहर लाल ने कितनी ही बार शारदा को सोते-सोते चौंक कर उठते हुए देखा था। वह दिलासा देते रहते और शारदा शून्य में निहारती रहती। शुरु-शुरु में रोज बतियाने वाला मयंक सप्ताह में एक बार बात करने लगा -- फिर क्रम दो हफ्ते में हो गया और अब तो माह भर से ऊपर हो जाता है उसकी आवाज सुनने को कान तरस जाते हैं।

अन्दर ही अन्दर घुलते हुए शारदा ने एक दिन बिस्तर पकड़ लिया। डाक्टर की सलाह पर वह और नेतराम कुछ दिन ऋषिकेश और मसूरी के सुरम्य स्थानों में भी उन्हें सैर कराने ले गए - आबो-हवा बदलेगी तो तबियत बहलेगी पर कुछ खास फर्क नहीं पड़ा। मनोहर लाल ने भाँप लिया था कि शारदा और उनका साथ बस कुछ दिनों का है। उन्होंने मयंक को फोन किया कि माँ की तबीयत बहुत खराब है एक बार आकर उन्हें देख जाए। मयंक ने स्पष्ट तो कुछ नहीं कहा लेकिन उसकी बातों से मनोहर लाल बहुत कुछ समझ गए - "पापा ८-१० दिनों में मेरे प्रोजेक्ट की लॉन्चिंग है -- इस समय बहुत काम है एक बार प्रोजेक्ट हो जाए फिर मैं आता हूँ -- तब तक आप और नेत राम माँ का ख्याल रखना"

दो माह निकल गए। शारदा को आई०सी०यू० में शिफ्ट करना पड़ा। बीस दिन उन्हें वेण्टीलेटर पर रखना पड़ा -- पर इन्तजार की भी कोई सीमा होती है - आत्मा कब तक देह में कैद रहकर मोह-माया में बँधी रहती - मुक्त हो गई। मनोहर लाल अकेले रह गए। नेतराम कई दिनों से अपने शिक्षाकर्मी के पोस्टिंग ऑर्डर का इन्तजार कर रहा था -- वह भी उसी दिन आया और शाम होते-होते अमेरिका से मयंक का फोन भी - "पापा आप दादा बन गए - पोती हुई है"

मनोहर लाल अपने आँसू नहीं रोक पाए। फोन उनके हाथ से छूट गया। नेत राम ने मयंक को सारा किस्सा सुना दिया। वह चुपचाप सुनता रहा - शायद रोया भी हो -- लेकिन देवप्रिया को इस हालत में छोड़कर वह नहीं आ सकता था - नेत राम को अपनी विवशता बताता रहा। प्रोजेक्ट खतम होते ही उसे बोस्टन में कम्पनी के कॉर्पोरेट ऑफिस का हेड बना दिया गया था वह चाह कर भी माँ को देखने नहीं आ पाया था।

कुछ दिनों में मयंक आने वाला है यह सोच-सोच कर मनोहर लाल की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी। शारदा जिस घर में दुल्हन बन कर आई थी उसी की ड्योड़ी से विदा होकर चली भी गई। जिस घर के कौने-कौने में वह मयंक की खुशबू से ही स्वयँ को सुरभित महसूस करती रही उसकी जड़ें तो यहाँ है ही नहीं। नन्हें मयंक की पदचापों के चिन्ह उसकी नजर में कभी धुँधले ही नहीं पड़े थे -- वह उस जमीन को छूकर कितनी ताजगी महसूस करने लगती थी कितना रोमांचित हो जाती थी। पगली थी वह -- समझ ही नहीं पाई कि ये पगचिन्ह नहीं - उसके पंख थे जिनने उसे आसमान में इतनी ऊँचाई पर ले जाकर उड़ना सिखा दिया जहाँ से जमीन दिखती ही नहीं है - फिर जड़ों, अहसासों और संवेदनाओं का क्या --।

मयंक की ट्रेन सुबह पाँच बजे पहुँचनी थी -- राइट टाइम थी। आधे घण्टे बाद वह घर पर था - नेत राम इन्तजार ही कर रहा था। मनोहर लाल के जागने का समय नहीं हुआ था। नेत राम ने मयंक के लिए चाय बनाई। तब तक रोशनी खिड़कियों से झाँकने लगी थी। मयंक ने घर के हर कमरे को जाकर देखा सब कुछ पहले जैसा ही था। दीवारों के रंग फीके पड़ चुके थे। कई जगह से प्लास्टर भी उखड़ा हुआ था। उसने नेतराम से पूछा - "लगता है दो-तीन सालों से पुताई नहीं हुई है -- इस हालत में कौन खरीदेगा इसे - आधी कीमत भी नहीं मिलेगी"

नेत राम ने सुन लिया। कोई उत्तर नहीं दिया। घड़ी देखी - सात बज चुके थे। वह मनोहर लाल के लिए चाय बनाने लगा। मयंक कमरे में रखी चीजों को देखने लगा।

नेतराम ने देखा मनोहर लाल टेबल पर सिर टिकाए बैठे हैं -- उसकी आहट सुनकर भी वह यथावत बैठे रहे। नेतराम ने चाय टेबल पर रख दी और उन्हें हिलाते हुए बोला- "बाबू जी चाय"

मनोहर लाल का सिर एक ओर लुड़क गया। शरीर ठण्डा हो चुका था। वह रोने लगा। मयंक दौड़ कर ऊपर आया। मनोहर लाल दुनिया छोड़कर जा चुके थे। टेबल पर कुछ कागज बिखरे थे - मयंक उठाकर पढ़ने लगा जो उन्होंने नेत राम को सम्बोधित कर लिखे थे - प्रिए नेतराम, मयंक भैया को माँ का कमरा जरूर दिखा देना - वहाँ अब भी उसकी आत्मा बसती है वहाँ की हवा आज भी मयंक की खुशबू से सराबोर है -- उससे कहना एक बार पंख समेटकर आकाश से नीचे उतरे और महसूस करे यह सब -- तुम घर की पुताई करवा देना नहीं तो अच्छी कीमत नहीं मिलेगी -- इस काम के लिए बचत के तीस हजार रुपए तकिए के नीचे रखे हैं -- मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सका -- मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है -- तुम अपनी नौकरी ज्वाइन कर लेना और हाँ मेरे कमरे की अलमारी में शारदा का मंगलसूत्र और कंगन रखे हैं -- उसकी इच्छा थी बहू को देने की - अधूरी इच्छा लिए चली गई -- तुम शीघ्र शादी कर लेना और शारदा की इच्छा जरूर पूरी करना। बेटे मुझे माफ करना -- मैं जीते जी आत्मा और खुशबू का सौदा होते नहीं देख सकता था -- विदा --

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परिचय :

अरुण अर्णव खरे

२४ मई १९५६ को अजयगढ़, पन्ना (म०प्र०) में जन्म। भोपाल विश्वविद्यालय से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक। सम्प्रति लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग से मुख्य अभियंता पद पर कार्यरत रहते हुए सेवा निवृत।

कहानी और व्यंग्य लेखन के साथ कविता में भी रुचि। कहानियों और व्यंग्य आलेखों का नियमित रूप से देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं सहित विभिन्न वेब पत्रिकाओं में प्रकाशन। एक व्यंग्य संग्रह - "हैश, टैग और मैं" और एक कहानी संग्रह - "भास्कर राव इंजीनियर" सहित दो काव्य कृतियाँ - "मेरा चाँद और गुनगुनी धूप" तथा "रात अभी स्याह नहीं" प्रकाशित। कुछ सांझा संकलनों - गीतिका लोक, साहित्य सागर, सत्यम प्रभात, प्रेम काव्य सागर, प्रतिबिम्ब (लघुकथा), उत्कर्ष काव्य संग्रह, सहोदरी लघुकथा, व्यंग्य के नव स्वर, व्यंग्य प्रदेश : मध्य प्रदेश, व्यंग्यकारों का बचपन आदि में भी कविताओं, कहानियों तथा व्यंग्य आलेखों का प्रकाशन। "गीतिका है मनोरम सभी के लिए" (मुक्तक संग्रह), अट्टहास के मध्यप्रदेश विशेषांक और पर्तों की पड़ताल के व्यंग्य विशेषांक का सम्पादन। कथा-समवेत द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में कहानी "मकान" पुरस्कृत। एक व्यंग्य उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य। गुफ़्तगू सम्मान इलाहाबाद सहित दस-बारह सम्मान। इनके अतिरिक्त खेलों पर भी छ: पुस्तकें प्रकाशित। भारतीय खेलों पर एक वेबसाइट www.sportsbharti.com का संपादन। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी वार्ताओं का प्रसारण।

गया प्रसाद स्मृति कला, साहित्य व खेल संवर्द्धन मंच का संयोजन एवं अट्टहास पत्रिका के म०प्र० प्रमुख। वर्ष 2017 में अमेरिका में काव्यपाठ। वर्ष 2015 में भोपाल तथा 2018 में मॉरिशस में सम्पन्न 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रतिभागिता।

पता - डी-1/35 दानिश नगर, होशंगाबाद रोड, भोपाल (म०प्र०) 462 026

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