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फिर नीलकंठ हो जाएं! // मिहिर

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फिर नीलकंठ हो जाएं! नीलकंठ अर्थात शिव। वह स्वरूप, जो वास्तव में शिव है, सुंदर है, और जगत का सत्य है। आखिर क्या हैं नीलकंठ? और क्या है उनकी म...

फिर नीलकंठ हो जाएं!

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नीलकंठ अर्थात शिव। वह स्वरूप, जो वास्तव में शिव है, सुंदर है, और जगत का सत्य है।

आखिर क्या हैं नीलकंठ? और क्या है उनकी महत्ता? कौन थे शिव? और क्या था उनका अभिप्राय?

भारतीय संस्कृति में शिव की महत्ता कब से चली आ रही है यह शोध का विषय हो सकती है। किंतु उनका स्थान क्या है, इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती। शिव अनेकों रूपों में, अनेकों युगो से भारतभूमि ही नहीं बल्कि सकल विश्व के आदिस्रोत और आदिदेव रहे हैं, सभ्यता के जनक रहे हैं। एशिया का कोई ऐसा भूभाग नहीं है जहां महाकालेश्वर की कोई प्रतिमा न पाई गई हो। अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया तक शिव की मूर्तियां मिली है।

आखिर कौन हैं शिव? यह प्रश्न बार-बार उठता है। और नीलकंठ क्या थे? सनातन भारतीय संस्कृति मैं विश्व शांति और विश्व कल्याण के बीज जिन्होंने बोये- वही परम भगवान महादेव शिव हैं। शिव का अर्थ ही है कल्याणकारी । वे शिव जिन का प्राचीन रूप पशुपतिनाथ है। केवल मनुष्य ही नहीं, जीव जगत के कल्याणकारी महादेव शिव-शंभू। पर्यावरण से प्रेम और मनुष्यता का उच्च आदर्श देने वाले शिव। पर्यावरण के प्रति भारतीय संस्कृति में मौजूद सतर्कता और सम्मान का जैसा भाव है वैसा अन्यत्र नहीं। यही भाव हमें नीलकंठ के निकट ले जाता है। संसार के कल्याणार्थ विष को पीने वाले वही भगवान शिव हमारे आदिदेव हैं।

जब देव और असुरों के समुद्र मंथन से हलाहल नामक विष निकला तो उसे धारण कर शिव ने ही पर्यावरण प्रेम की मर्यादा स्थापित की। आज के परिपेक्ष में देखें तुझे समुद्र मंथन समुद्र का और संपूर्ण जगत के प्राकृतिक संसाधनों का उपशोधन और दोहन था। जिसका परिणाम एक ओर तो अमृतकारी था, वहीं दूसरी ओर विषदाई। किंतु जैसा कि सदा होता आया है, अमृत तत्वको पाने के लिए तो होड़ मच गई, किंतु विष का कोई उपाय नहीं किया जा सका। यह भगवान शिव ही थे जिन्होंने इस मृत्युकारी भयानक विष (प्रदूषण) का शमन किया और उसे कंठस्थ कर लिया। पर्यावरण के प्रति जागरूकता का भारतीय संस्कृति का यह पहला अमिट दर्शन है। ऐसे हैं भगवान शिव।

यही नहीं, कलयुग के त्रास देने पर और पाप के बढ़ने से कल्पवृक्ष धरती में समा गए। पृथ्वी ने औषधियों को हर लिया। चारों ओर त्राहि त्राहि मच गई। कदाचित यह  भूमि प्रदूषण का कोई रूप था। तब इन्हीं भगवान शिव की प्रेरणा पर चंद्रमा ने तप किया। धरती ने पुनः औषधियों को जन्म दिया। अर्थात यह की वृक्षारोपण की प्राचीन परंपरा का जन्म हुआ। और प्रेता यही शिव थे जिन्होंने कालांतर में औषधियों का दैहिक विकारों और व्याधियों को दूर करने में प्रयोग किया। इस तरह आयुर्वेद का जन्म हुआ।

मानव कल्याण हेतु सारा समय व्यतीत करने वाले शिव श्मशान में वास करते हैं। चिंतन, मनन करते हैं। और सदा मानव कल्याण हेतु प्रस्तुत रहते हैं। जब रोगों के नाश का उपाय किया तो स्वाभाविक प्रश्न यह भी उठा की रोगों की उत्पत्ति और उसका मूल क्या है? श्मशान में नित नहीं चिताओं की भस्म धारण करने वाले शिव ने मानव शरीर में ही व्याधियों का मूल खोज निकाला। मानव की जटिल संरचना में 72000 नाडियां पल-पल वेगवान रहती है और जीवन तत्व का प्रवाहण करती है। इतना जान लेने पर इन्हीं भगवान शिव ने योग का प्रयोग किया। सर्वप्रथम इसे स्वयं सिद्ध किया, तदुपरांत मनीषियों- ऋषियों को इसका मूल मंत्र दिया। नृत्य में शरीर के विविध अवयवों में उत्सृजित ऊर्जा का उन्हें अनुमान था। अतः नृत्य के नायक योगीराज तो वे थे ही, नटराज भी कहलाये।

किंतु व्याधियों का अंत नहीं। मानव जीवन करुणा, पीड़ा, दुख, नाश आदि की पुरानी चक्की पर पिसता रहा और उसका क्षय होता रहा। शिव का करुणाकण महक गया। अंतर पसीज उठा। योग और आयुर्वेद की विद्या भी अधूरी थी क्योंकि सामान्य जन के लिए वह साध्य न थी। फिर मनन हुआ। फिर मंथन हुआ। और शिव के अश्रु से रुद्राक्ष का जन्म हुआ। फिर विविध रत्नों की भी उत्पत्ति हुई। व्याधियों का जन्म ग्रहों के द्वेष अथवा बैर भाव से होता है। यह जान लेने वाले भी भगवान भोलेनाथ ही थे। इस तरह रत्नों का ज्ञान भी मनीषियों को दिया तथा स्वयं रुद्राक्ष को धारण किए रहे और संचार के कल्याण हेतु जटिल कर्मों का संपादन करते रहे।

निरंतर साधना, निरंतर तप, निरंतर शोध, और निरंतर ज्ञान। फिर वही नित्य की दिनचर्या चल पड़ी। आंखों में वही कल्याण के भाव, मानव कल्याण की चिंता, सृष्टि के नाश का दुख। और उस दुख के वशीभूत उनका तन मन उद्वेलित हो उठा। हृदय के स्पंदन को तन के कंपन से एकाकार कर उस करुणा और उस दुख को कम करने का प्रयास किया। इस तरह भगवान नटराज एकांत में ही नृत्य करते रहे। सदियां बीत गई। मनुष्य का पतन पुनः आरंभ हो गया। शिव की पीड़ा बढ़ गई। एक समूचा युग बीत गया था।

अंततः एक दिन अंतः करण में प्रकाश हुआ। कोई विचार कौंध गया। मन ही मन हर्षित होते हुए नए सिरे से नाच उठे। इस बार शिव का डमरू बोल उठा तथा पहले नाद प्रकट हुआ फिर स्वर और अंत में शब्द। मानव कल्याण का एक नया मंत्र उन्हें मिल गया और यह वास्तव में मंत्र ही था - शब्दों से उत्पन्न होने वाले नाद की अभिव्यंजना। शब्द की ध्वनि का अंतः करण पर जैसा सुखद आघात होता है, उससे भी कई दोषों का शमन होता है। और जगत कल्याण के लिए यह सबसे सरल माध्यम भी था। मंत्र का प्रयोग कोई भी कर सकता था। यहीं से पंचाक्षरी बीज मंत्र का आविर्भाव हुआ और देखते ही देखते सारा संसार इससे परिचित हो गया। "ओम नमः शिवाय" का मंत्र दसों दिशाओं में गूँजने लगा। शब्दों की समूची वर्णमाला रच डाली। ए ओSग, ज ब ग ड द रा, आदि संस्कृत के प्रथम व्याकरण का प्रस्फुटन हुआ।

लोक परंपरा में चला आ रहा वेद, आयुर्वेद आदि का ज्ञान जो की अज्ञान के अंधकार में डूबता जा रहा था उसे शब्दों में बांधकर शिव ने अमर कर दिया तथा इसे लिपि बद्ध करने का कार्य शिवपुत्र गणेश ने किया। भाषा के साथ अशुद्धियां सामान्य सी बात है और उच्चारण की शिथिलता मंत्रकी शक्ति का नाश, बल्कि कई बार विपरीत असर भी करती है। जैसा कि वृत्रासुर द्वारा यज्ञ में " शत्रु इंद्र" के स्थान पर " इंद्रशत्रु" शब्द का प्रयोग करते हुए समास की गलती से उसका स्वयं का नाश हो गया। व्याकरण और पुनः उसका भाष्य लिखे जाने की आवश्यकता हुई। शिव ने प्रेरित किया, मनीषियों ने लिखा।

ऐसे थे भगवान महाकालेश्वर नीलकंठ, जिन्हें हम उनके प्राचीनतम रूप में पशुओं से घिरा पाते हैं। जो उनके पशु प्रेम का द्योतक है। उनकी करुणा का साम्राज्य इतना बड़ा है की उसमें सभी समाहित हैं। भेद- विभेद कभी जाना ही नहीं। संसार भर की अपेक्षित, दीन और दलित वर्गों का एकीकरण किया और उन्हें शक्ति संपन्न " गण" बना दिया। यही उनकी लोकप्रियता का सबसे सटीक कारण और उदाहरणहै। कदाचित यही वो कारण था विष्णु की पूजा तथाकथित शक्ति संपन्न और सभ्य जातियां अधिक करती थी जबकि शिव की पूजा सभी वर्गों में समान थी। अनेक असुरों तथा राक्षसों ने भी शिव भक्ति का प्रचार किया। इनमें नहुष, बाली तथा रावण आदि नाम लिए जा सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि विष्णु ने सदा देवों का ही पक्ष लिया किंतु शिव निष्पक्ष रहे। असुर जातियों के उत्पाती स्वभाव को देखते हुए कदाचित विष्णु उन पर नियंत्रण चाहते थे जबकि शिव अपनी शक्ति का मानव मात्र के कल्याण में उपयोग करना चाहते थे।

ऐसा नहीं है कि उन्होंने असुरों और उत्पातियों को बढ़ावा दिया। जब असुरो ने शक्ति का दुरुपयोग किया तो उन्होंने उन्हें ताड़ना दी। शुक्राचार्य तक ने संजीवनी विद्या का दुरुपयोग किया तो उन्हें समूचा निगल गए। भयंकर, महाप्रलयंकारी दिव्य अस्त्रों का दुरुपयोग रोकने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किया। उन्होंने मनुष्य मात्र का कल्याण किया चाहे वह असुर हो, मानव हो, दानव हो, दैत्य हो, राक्षस हो, देव, किन्नर, गंधर्व या यक्ष हो। 12 देवासुर संग्राम हुए जिनमें जन धन की अपार हानि हुई। शिव इनमें अधिकतर तटस्थ ही बने रहे। किंतु सृष्टि नाश ( पर्यावरण नाश) के प्रति वे सदा चिंतित रहे। जबकि विष्णु ने प्रथम दृष्टया देवों का साथ दिया। शिव की निष्पक्षता ने उन्हें सबसे अलग और सब से महान सिद्ध किया। इस निष्पक्षता का तथाकथित सभ्य जातियों ने उपहास भी उड़ाया। शिव पूजकों (मुख्यतः शबर, किरात, वानर, रिक्ष आदि गण) को लिंग पूजक कह कर अपमानित किया। शिव को भांति भांति से तिरस्कृत किया गया।  यज्ञ भाग से भी वंचित कर दिया गया। प्रजापति ब्रह्मा ने उन्हें यज्ञ में नहीं बुलाया। स्वयं शिव अपने विवाह में गणों को भोज देकर उपहास का पात्र बने। कवियों ने तो इस पर कवित्त ही रच डाले। लेकिन शायद ही कोई उस भावना को समझ पाया जो उनके हृदय मे व्याप्त सभी वर्णों और संस्कृतियों के उद्धार का हेतु थी।

शिव के ही प्रयासों से देव और असुर परस्पर युद्ध छोड़कर भूमि के संसाधनों के दोहन के रचनात्मक कार्यों के लिए सहमत हुए। समुद्र मंथन की विराट परियोजना का आरंभ हुआ। बाद के स्मृति कारों ने इस कथा में भी शिव को नेपथ्य में ही डाल दिया था। और विष्णु की लीला कह कर प्रचारित करने की कोशिश की। किंतु शिव द्वारा विषपान की घटना ने सब की आंखें खोल दी। देव असुर अभी उनके आगे नतमस्तक हुए और अपनी भूल पर लज्जित हुए।

12 महा विनाशकारी महायुद्ध के बाद भी धरती की अनमोल संपदा का संहारक कार्यों में लगाया जाना शिव को नहीं रुचा। वे युद्ध जोकि जातीय स्वाभिमान के लिए लड़े जाते थे और इनमें मुख्यतयः राजवंशों का ही हित अथवा कटुता निहित होती थी। यही राजवंश कुल तथा जाति के नाम पर युद्ध के लिए जनमत तैयार करते थे। इस व्यवस्था का अंत करने के लिए शिव ने गणतंत्र की परंपरा का सूत्रपात किया। यही नहीं इन गणतन्त्रों को शक्ति संपन्न भी बनाया। शिवपुत्र गणेश गणपति कहलाये। गणों को त्रिशूल जैसा शस्त्र दिया जो तलवार से कहीं अधिक घातक होता था। इस तरह शक्ति संतुलन का प्रयास किया।

पर्यावरण और मानव जाति की हित साधक यही भगवान शिव पुनीत गंगा को पृथ्वी पर लाए। जो देव लोक (कदाचित साइबेरिया) में कहीं बहती थी। तथा इसे कल्याणकारी बनाए रखने के लिए अपनी जटाओं (हिमालय की उपत्यकाओं) में समेट लिया। जहां हिमालय की वन संपदा और औषधियों से पुनीत हुई देव लोक की यह भीषण नदी अन्य गणों के कल्याणार्थ मनुलोक मैं प्रवाहित हुई।

यह कहना मुश्किल है कि वे कोई शरीरी जीव थे अथवा अशरीरी। किंतु इस चर्चा का कोई औचित्य भी नहीं। भारतीय जनमानस में उनकी जो अमिट छाप है और भारतीय संस्कृति मैं जो उनका  तत्व है वही हमारा प्राण है। जिस शिव का नाम ही कल्याणकारी है तथा जिन्हें हमें नटराज, नीलकंठ, रूद्र, महाकाल, पशुपति आदि अनेक रूपों में जानते हैं वे अशरीरी हो तो भी भारत की ही नहीं विश्व की सनातन आत्मा है। भारतीय संस्कृति में निहित " वसुधैव कुटुंबकम" तथा " सर्वे भवंतु सुखिनः" का यह कल्याणकारी तत्व ही तो शिव है। और "तेन त्यक्तेन भुंजीथा" कि हमारी त्याग में भोग और भोग में त्याग की प्रवृत्ति नीलकंठ है। श्मशान में रहने वाले, गले में सर्प अर्थात मृत्यु को धारण करने वाले, बगल में पार्वती अर्थात जीवन को धारण किए शिव ही तो संस्कृति है। भारतीय संस्कृति के अशरीरी, अचिंतन आधार। सभी का कल्याण चाहने वाले। सभी के दुख में भागीदार। मनुष्य मात्र की समानता के पक्षधर। प्रकृति( पार्वती) के पुरुष। सृष्टि के सृष्टाकार।

तो क्या यह संभव नहीं विश्वकी प्राचीनता में सर्वाधिक प्राचीन, उदारता में सर्वाधिक उदार, कल्याण में सर्वाधिक कल्याणकारी हमारी संस्कृति पुनः शिवमय हो उठे और हम फिर नीलकंठ हो जाएं!

- मिहिर

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रचनाकार: फिर नीलकंठ हो जाएं! // मिहिर
फिर नीलकंठ हो जाएं! // मिहिर
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रचनाकार
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