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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 160 से 162 // डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

प्रविष्टि क्रमांक - 160

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी 

1)

संस्कार

"भैया जी, कुछ रुपये दे दो।" दस-बारह वर्षीय भिखारी लड़के ने अपना झोला संभाल कर गिड़गिड़ाते हुए चमचमाती यूनिफॉर्म पहने लगभग अपनी ही उम्र के दूसरे लड़के के सामने थाली आगे की। लेकिन उस लड़के ने आँखों में कठोरता लाते हुए अप्रत्याशित रूप से थाली के नीचे हाथ घुमा कर दे मारा। थाली में रखे सारे सिक्के और रुपये आसपास की ज़मीन पर बिखर गए और थाली उछल कर दूर जा गिरी।

भिखारी लड़का बुरी तरह चौंक गया। वह थाली के पास दौड़ता हुआ गया और थाली उठाने लगा। उसका हाथ थाली के पास पहुंचा ही था कि किसी ने थाली को ज़ोर से लात मारी। थाली फिर उछल कर दूर जा गिरी। उस भिखारी ने देखा कि लात मारने वाला पहले लड़के जैसी ही यूनिफॉर्म पहने हुए दूसरा लड़का था।

वह फिर भाग कर थाली के पास पहुंचा, वहां लेकिन उन्हीं दोनों की तरह कपड़े पहने तीसरे लड़के ने थाली उठा ली। भिखारी उस लड़के को मुँह बाँये देखता रहा। उस लड़के ने मुस्कुराते हुए अपने दूसरे हाथ को आगे किया, उस हाथ में एक किताब थी। उसने किताब को भिखारी को थमाते हुए कहा, "आज से थाली नहीं इसे अपने हाथ में रखो।"

भिखारी अचंभित था, उसने किताब ली लेकिन साथ ही उस लड़के के हाथ से थाली भी छीन ली। फिर वह लड़खड़ाता हुआ पहले लड़के के पास पहुंचा। वहां ज़मीन पर गिरे सिक्कों और रुपयों को उठाया और उस किताब को पहले लड़के को थमाते हुए बोला, "इसको तुम पढ़ो... ये पढ़ी होती तो थाली और पैसों के साथ ऐसे नहीं करते।"

कहते हुए उसने झोला फिर सम्भाला। तीनों लड़कों ने देखा कि पारदर्शी झोले से कुछ किताबें उनकी तरफ झाँक रहीं थीं।

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प्रविष्टि क्रमांक - 161

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी 

2)

अस्पृश्य प्रकृति

"जय श्री देव..." घर के मुख्य दरवाज़े के बाहर से एक स्त्री स्वर गूंजा।

जाना-पहचाना स्वर सुन कर अंदर बैठी 12-13 वर्षीय लड़की एक बार तो कुर्सी से उछल कर खड़ीं हुई लेकिन कुछ सोचती हुई फिर बैठ गयी।

कुछ क्षणों बाद वही स्वर फिर गूंजा। अब वह लड़की उठकर बाहर चली गयी। लड़की को देखकर

बाहर खड़ी महिला ने पुनः किन्तु पहले से धीमे स्वर में “जय श्री देव” बोलते हुए देवता की मूर्ति रखे एक बर्तन को उसके सामने कर दिया।

बर्तन देखते ही वह लड़की एक कदम पीछे हट गयी और बोली, "आंटीजी आज नहीं दूँगी, आप अगले हफ्ते आना।"

"क्यूँ बिटिया?" महिला ने यह बात सुनकर आश्चर्य से पूछा।

उस लड़की ने कहा "कुछ नहीं आंटी..."

उसी समय उस लड़की की माँ भी बाहर आ गयी।

माँ ने उस महिला के बर्तन में एक सिक्का डाला, उसमें रखी मूर्ति को हाथ जोड़े और फिर फुसफुसाते हुए बोली, "बिटिया पीरियड्स में है, इसलिए भगवान के कार्यों में स्पर्श नहीं करना है।"

वह महिला चौंकी और उसने भी धीमे स्वर में कहा, "हम और हमारी जिंदगी, सब कुछ तो इसी का बनाया हुआ है... फिर भी?"

"क्या करें, रीति-रिवाज हैं... बच्ची का मामला है ना!" माँ ने फीकी सी मुस्कराहट के साथ उत्तर दिया।

उस महिला ने लड़की की माँ की आँखों में झांकते हुए कहा, “मैंने बहुत कोशिश की थी मेहनत कर के घर चलाने की, लेकिन गरीब-अनपढ़ विधवा को अंत में सिर्फ इन्हीं भगवान का सहारा मिला।”

और वह बर्तन में रखी मूर्ति को देखकर बोली, "देव मुझे तो माफ़ कर दोगे? आपको छू रही हूँ... आज मैं भी तो... लेकिन बच्चों का मामला है ना!"

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प्रविष्टि क्रमांक - 162

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी 

3)

कटती हुई हवा

पिछले लगभग दस दिनों से उस क्षेत्र के वृक्षों में चीख पुकार मची हुई थी। उस दिन सबसे आगे खड़े वृक्ष को हवा के साथ लहराती पत्तियों की सरसराहट सुनाई दी। उसने ध्यान से सुना, वह सरसराहट उससे कुछ दूरी पर खड़े एक दूसरे वृक्ष से आ रही थी।

सरसराहट से आवाज़ आई, "सुनो! "

फिर वह आवाज़ कुछ कांपने सी लगी, "पेड़खोर इन्सान... यहां तक पहुंच चुका है। पहले तो उसने... हम तक पहुंचने वाले पानी को रोका और अब हमें...आssह!"

और उसी समय वृक्ष पर कुल्हाड़ी के तेज प्रहार की आवाज़ आई। सबसे आगे खड़े उस वृक्ष की जड़ें तक कांप उठीं। उसके बाद सरसराहट से एक दर्दीला स्वर आया,

"उफ्फ! हम सब पेड़ों का यह परिवार… कितना खुश और हवादार था। कितने ही बिछड़ गए और अब ये मुझ पर... आह! आह!"

तेज़ गति से कुल्हाड़ियों के वार की आवाज़ ने सरसराहट की चीखों को दबा दिया। कुछ ही समय में कट कर गिरते हुए वृक्ष की चरचराहट के स्वर के साथ सरसराहट वाली आवाज़ फिर आई, इस बार यह आवाज़ बहुत कमजोर और बिखरी हुई थी, "सुनो! मैं जा रहा हूँ। मेरे बहुत सारे बीज धरती माँ पर बिखर गए हैं। उगने पर उन्हें हवा-पानी, रोशनी और गर्मी के महत्व को समझाना… मिट्टी से प्यार करना भी। प्रार्थना करना… कि अगली बार मैं किसी ऊंचे पहाड़ पर उगूं… जहां की हवा भी ये… पेड़खोर छू नहीं पाएं। उफ्फ...मेरी जड़ें भी उखड़..."

धम्म से वृक्ष के गिरने का स्वर गूँजा और फिर चारों तरफ शांति छा गयी। सबसे आगे खड़ा वृक्ष शिकायती लहज़े में सोच रहा था, "ईश्वर, तुमने हम पेड़ों को पीड़ा तो दी, पैर क्यों नहीं दिए?"

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परिचय

नाम: डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

सहायक आचार्य (कंप्यूटर विज्ञान)

जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय, उदयपुर (राजस्थान)

पता - 3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर - 5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) - 313002

ई-मेल -chandresh.chhatlani@gmail.com

यू आर एल - http://chandreshkumar.wikifoundry.com

लेखन - लघुकथा, कहानी,  कविता, ग़ज़ल, गीत, लेख, पत्र

मधुमति (राजस्थान साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका), लघुकथा पर आधारित “पड़ाव और पड़ताल” के खंड 26 में लेखक, अविराम साहित्यिकी, लघुकथा अनवरत (साझा लघुकथा संग्रह), लाल चुटकी (रक्तदान विषय पर साझा लघुकथा संग्रह), नयी सदी की धमक  (साझा लघुकथा संग्रह),  अपने अपने क्षितिज (साझा लघुकथा संग्रह), सपने बुनते हुए (साझा लघुकथा संग्रह), अभिव्यक्ति के स्वर (साझा लघुकथा संग्रह), वागर्थ, विभोम-स्वर, नव-अनवरत, दृष्टि (पारिवारिक लघुकथा विशेषांक), दृष्टि (राजनैतिक लघुकथा विशेषांक), हिंदी जगत (विश्व हिंदी न्यास, न्यूयॉर्क द्वारा प्रकाशित), हिंदीकुञ्ज,laghukatha.com, openbooksonline.com, विश्वगाथा, शुभ तारिका, अक्षर पर्व, क्षितिज पत्रिका लघुकथा विशेषांक अंक 9 वर्ष 2018, एम्स्टेल गंगा (नीदरलैंड से प्रकाशित), हिमालिनी (काठमांडू, नेपाल), सेतु पत्रिका (पिट्सबर्ग), शोध दिशा, ककसाड़, साहित्य समीर दस्तक, अटूट बंधन, सुमन सागर त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक राजस्थान पत्रिका, किस्सा-कृति (kissakriti.com), वेबदुनिया, कथाक्रम पत्रिका, करुणावती साहित्य धारा त्रैमासिक, साहित्य कलश त्रैमासिक, मृग मरीचिका, अक्षय लोकजन, बागेश्वरी, साहित्यसुधा (sahityasudha.com),  सत्य दर्शन, साहित्य निबंध, युगगरिमा, युद्धरत आम आदमी, जय-विजय, शब्द व्यंजना, सोच-विचार, जनकृति अंतरराष्ट्रीय ई-पत्रिका, सत्य की मशाल, sabkuchgyan.com, रचनाकार (rachanakar.org), swargvibha.in,hastaksher.com, ekalpana.net, storymirror.com, hindilekhak.com, bharatdarshan.co.nz, hindisahitya.org, hindirachnasansar.com, अमेजिंग यात्रा, निर्झर टाइम्स, राष्ट्रदूत, जागरूक टाइम्स, Royal Harbinger, pratilipi.com, dawriter.com, नजरिया नाउ, दैनिक नवज्योति, एबेकार पत्रिका, सच का हौसला दैनिक पत्र, सिन्धु पत्रिका, वी विटनेस,  आदि में रचनाएँ प्रकाशित

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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 7506443038665416610

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  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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