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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 167 से 171 // भगवान वैद्य ‘प्रखर’

प्रविष्टि क्रमांक - 167


1. रिटायर्ड

-भगवान वैद्य ‘प्रखर’

“चाचाजी, मुझे दो लाख रुपयों की सख्त जरूरत है। दो-एक साल में लौटा दूंगा।”

“एकदम ऐसी भी क्या जरूरत आन पड़ी, बकाराम ?”

“जरूरत के लिए आपकी बहू अर्थात रोहा, मेरी पत्नी जिम्मेवार है, चाचाजी। मैं तो वास्तु-पूजन करके मकान में शिफ्ट हो जाना चाहता हूं। लेकिन वो कहती है, पूरा काम हुए बिना घर में प्रवेश नहीं करेगी। सब हो गया है। बस, किचन का काम बाकी है। ... मॉड्युलर- किचन चाहिये होता है न , आजकल ! उसी के लिए पैसे कम पड़ गये।”

“लेकिन एकदम मेरा नंबर कैसे लग गया? और भी तो कई लोग हैं तुम्हारे!”

“चाचाजी, जिनसे मांग सकता था, उन रिश्तेदारों से पहले ही ले चुका हूं। मेरे जैसे नौकरीपेशा के लिए मकान बनाना भारी मामला है। एक मित्र से मांगे तो उसने भी हाथ ऊपर कर दिये। कह रहा था, उसने अभी-अभी एक फ़्लैट बुक किया है।”

इस बीच चाय आ गयी। बकाराम चाय पीने लगा। उसके पारिवारिक संबंध है, सिसोदिया(चाचाजी) जी से।उनकी सिफारिश के कारण ही मौजूदा नौकरी मिली थी उनके विभाग में, बकाराम को। रिटायरमेंट के बाद भी बकाराम ने संबंध बनाये रखे थे, सिसोदिया जी से।

“आपकी कार नहीं दिखायी दे रही है?” चाय पीते-पीते बकाराम बोला।

“उसमें कुछ प्रॉब्लेम चल रहा था। ड्राइवर गैरेज में छोड़ आया है। ...चौदह साल हो गये खरीदने को। रिटायरमेंट को दो साल बाकी थे तब खरीदी थी।”

“लेकिन अब भी चल रही है!”

“हां...इमरजंसी के लिए रख छोड़ी है। कहीं जाना हो तो ड्राइवर बुला लेता हूं।... मैंने तो कब का चलाना छोड़ दिया है, तुम जानते ही हो!”

“जी...। वो क्या है कि तीस लाख बैंक से कर्ज मिला था।”- बकाराम फिर अपने मुद्दे पर आ गया। “पंदरह इधर-उधर से जुटाये। ...बस, किचन बन गया कि शिफ्ट हो जाता हूं।... किराया बच जायेगा।”

“हां, वही ठीक ही रहेगा।”

“वो आपके यहां ऊपरी माले पर अब कोई किरायेदार नहीं है क्या? बंद-बंद दिखायी देता है, ऊपर ।”

“हां, ऊपर तीन किरायेदार थे । तीनों से खाली करवा लिया। इधर नीचे स्टेशनरी की दुकान थी । उन्होंने भी चौक में बड़ी -सी दुकान ले ली। यहां जगह कम पड़ रही थी उनको। ...मकान पुराना हो चुका है। ऊपर का पिछला हिस्सा इतना जर्जर हो चुका है कि किसी भी समय गिर सकता है।"

“दो साल बाद फिर इमरजेंसी लोन ले पाऊंगा सोसायटी से । तब सबसे पहले आपके चुका दूंगा।”

“बकाराम, एक किस्सा सुनाता हूं, सुनों।...हमारे गांव से कुछ दूरी पर एक बड़ा पुराना तालाब था। नाम था, ‘बड़ा तालाब।’ था भी बहुत बड़ा। विशाल ! किनारे पहाड़ियां थीं। जंगल था। चारों ओर से बहकर पानी आता था, उसमें। कुछ बड़े नाले भी आकर मिलते थे। पूरे साल लबालब रहता था। गांव की दिशा में लंबी-चौड़ी दीवार बना दी गयी थी ताकि गांव में कभी उसका पानी न घुसे। कई सालों बाद, मैं अभी छह माह पहले गया था गांव। ‘बड़ा तालाब’ के किनारे से गुजरा। पानी देखने का मन हुआ तो उसकी दीवार पर चढ़ गया। तालाब में नाममात्र के लिए पानी था। लगा, विशाल आंगन में किसी ने तश्तरी भरकर रख दी है । ... देखकर रोना आ गया। ...अब न जंगल रहा, न नाले । पत्थर और मुरुम निकालने के कारण पहाड़ियां उजड़ गयीं। तालाब के जल-भराव के सारे सोर्सेस ही बंद हो गये ! लेकिन गांव के लोग हैं कि अब भी उसे ‘बड़ा तालाब’ ही कहते हैं। ...रिटायर्ड व्यक्ति की स्थिति उस ‘बड़ा तालाब’ के समान होती है बकाराम ...।” कहकर सिसोदिया जी बकाराम की ओर हताश नजरों से देखने लगे।

चाय समाप्त हो चुकी थी । बकाराम ने कप एक ओर रख दिया। वह उठा, सिसोदिया जी के पांव छुए और चुपचाप बाहर निकल गया। ❏

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प्रविष्टि क्रमांक - 168

2. चमत्कार

-भगवान वैद्य ‘प्रखर’

बैरागी जी मृत्युशैया पर पड़े थे। अपना अंतिम समय निकट जान उन्होंने अपने सेवक से कहा, ‘जाकर मेरे शिष्यों को बुला लाओ।’

सेवक उठकर बाहर चला गया।

बैरागी जी को मृत्यु शैया पर पड़े-पड़े चालीस साल पहले का ‘घुमक्कड़’ याद आया। घुमक्कड़ कभी-कभार किसी गांव में दो-एक दिन टिक जाता। फिर अगला कोई गांव। एक दिन शाम को वह अपने मुकाम पर लौट रहा था कि उसने देखा, एक स्थान पर भीड़ इकट्ठा है। घुमक्कड़ करीब पहुँचा। एक छात्र रास्ता चलते किसी वाहन की चपेट में आकर बुरी तरह जख्मी हो गया था। इसके पूर्व कि कोई उपचार किया जाए, छात्र की मृत्यु हो गयी। पूरा गांव शोक-संतप्त था। घुमक्कड़ को यह जानकर हैरानी हुई कि गांव में कोई स्कूल नहीं है। बच्चों को पढ़ने के लिए बारह-पंदरह किलोमीटर पैदल चलकर पड़ोस के गांव में जाना पड़ता हैं। स्कूल आते-जाते में अक्सर ऐसे हादसे होते रहते हैं।

घुमक्कड़ ने गांव वालों से कहा, ‘आपके गांव में अपना स्कूल होना चाहिए।’

‘स्कूल की इमारत के लिए जमीन कौन देगा?’

‘खरीदेंगे...’

‘खरीदने के लिए पैसे कहाँ से आएंगे...?’

‘दान...चंदा मांगकर जुटाएंगें।’

‘कौन देगा... और क्यों दें? स्कूल बनवाना सरकार का काम है।’

-‘शिक्षकों को वेतन कहाँ से मिलेगा?’ –अगला प्रश्न।

-‘स्कूल कौन चलायेगा? हम लोग अपनी खेती-बाड़ी, काम-धंधें करें कि स्कूल चलाएँ...!’ –फिर प्रश्न।

घुमक्कड़ ने कहा, ‘इस विषय में, मैं सब जानता हूँ। आप लोग केवल सहयोग करिए। मैं यहीं रहकर सब संभाल लूंगा।’

लेकिन गांव वालों के प्रश्नों का अंत न था।

उसके बावजूद घुमक्कड़ ने स्कूल आरंभ करने के लिए खूब प्रयत्न किये पर, उसे निराशा ही हाथ लगी। आखिर एक दिन वह गांव छोड़कर चला गया।

कुछ वर्षों बाद गांव में एक बैरागी आया। उसने एक पेड़ के नीचे अपना आसन जमा लिया। गांव के लोग उसकी वेष-भूषा देखकर उसकी ओर आकर्षित होने लगे। सुबह-शाम महिला-पुरुषों की भीड़ इकट्ठी होने लगी, बैरागी के इर्द-गिर्द। बैरागी ने एक कुटिया बना ली, अपने लिए।

गांव में नवरात्रि का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता था। बैरागी को इसकी भनक लग गयी। उसने अपनी कुटिया में एक अनुष्ठान आरंभ किया । गांव वालों को अपने अनुष्ठान की जानकारी दे दी। कुटिया में सुबह-शाम भजन-कीर्तन की आवाजें गूँजने लगीं। पास-पड़ोस के गांव के लोग भी बैरागी जी के दर्शन के लिए आने लगे। दर्शनार्थियों का तांता लग गया।

अनुष्ठान संपन्न होने को कुछ ही दिन बाकी थे कि एक चमत्कार हो गया। बैरागी जी की कुटिया में जहाँ तुलसी-चौरा था उसके पड़ोस की जमीन में से तीन फीट ऊँची देवी की मूर्ति ‘प्रगट’ हो गयी। चमत्कार की खबर पास-पड़ोस के गावों में आग की तरह फैल गयी।

बैरागी जी के कुटिया-स्थल पर मेला-सा लग गया। गांव-गांव से लोग दर्शनार्थ आने लगे।

बैरागी जी ने प्रस्ताव रखा, ‘देवी का भव्य-मंदिर बनना चाहिए।’

मंदिर-निर्माण के लिए भक्त-जन दान देने लगे। हजार, पांच हजार, दस हजार, इक्कीस हजार, एक लाख...आभूषण...चांदी...सोना...हीरे...जवाहरात... !

दो साल में भव्य मंदिर बनकर तैयार हो गया।

मंदिर में दान की कोई सीमा न रही। बैरागी जी ने दान में प्राप्त रकम से बड़ी-सी जगह खरीदकर उस पर एक स्कूल का निर्माण करवाया। फिर कॉलेज... इंजीनियरिंग, फॉर्मेसी, बी-एड्‍...। अच्छी खासी शिक्षण- संस्थाएँ खड़ी हो गयीं।

शिष्य उपस्थित हो चुके थे। बैरागी जी ने शिष्यों से कहा, ‘जरा करीब आ कर बैठ जाओ, वत्स। अधिक जोर से न बोल पाऊँगा।’

शिष्य घेरा बनाकर बैरागी जी के इर्दगिर्द बैठ गये। बैरागी जी बोले, ‘मेरी अंतिम घड़ी निकट है। एक राज की बात बतलाकर अपना बोझ हलका करना चाहता हूँ। ...देवी का कोई चमत्कार नहीं हुआ था। मैंने ही जमीन खोदकर उसमें दो बोरे चने बिछाए और उस पर मूर्ति रख दी थी। रोज जमीन में जल छोड़ता रहा। चने फूलकर मूर्ति ऊपर आ गयी। मैंने इसे चमत्कार के रूप में प्रचारित कर दिया।

उसके बाद मंदिर बनते देर न लगी और उसके बाद स्कूल...कॉलेज...।

पहले गांव में स्कूल बनवाने का सपना जिसने देखा था, वह घुमक्कड़ मैं ही था...।’ ❏

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प्रविष्टि क्रमांक - 169

3. आदत

-भगवान वैद्य ‘प्रखर’

क्लिनिक में गहमागहमी थी। डॉक्टर को आने में आज देर जो हो गयी थी! उनके आते ही हर कोई अपना नंबर लगाने के जुगाड़ में जुट गया। तभी पुलिस की वर्दी में दो व्यक्तियों ने क्लिनिक में प्रवेश किया। एक हवलदार था और दूसरा कोई बड़ा अधिकारी लग रहा था।

“साहब को अपनी आँखे जँचवानी हैं।” हवलदार ने रिसेप्शनिस्ट से कहा। बड़ा अधिकारी कुछ दूरी पर खड़ा, क्लिनिक का मुआयना करने लगा था।

“पहले कार्ड निकला हुआ है क्या?”

“नहीं, साहब हाल ही में तबादले पर यहाँ आये हैं ।”

“कार्ड बनाना पड़ेगा। बीसवां नंबर है। कार्ड के चार-सौ रुपये...!”

“ड्यूटी छोड़कर आए हैं। मैंने ही नाम सजेस्ट किया, डॉक्टर साहब का । जरा जल्दी नंबर लग जाए तो...!”

“मैं स्वयं कार्ड लेकर भीतर जाऊँगी। वैसे, वे हम लोगों पर नाराज हो जाते हैं, ऐसा करो तो। फिर भी मैं कोशिश करती हूँ।...चार -सौ रुपये!”

“मैं खुद जाकर डॉक्टर साहब से बात करूँ तो?”

“सॉरी...भीतर पेशंट है और उनसे पूछे बिना अगर मैंने आपको जाने दिया तो समझिये, मेरी छुट्टी कर दी जाएगी। बहुत सख्त हैं वे, इस मामले में। चार-सौ रुपये प्लीज...!”

“साहब सिटी पुलिस थाने में थानेदार हैं...माने इन्‌चार्ज...।”

“जी ‌‌ऽ ऽ...चार-सौ रुपये...।”

हवलदार रिसेप्शनिस्ट के सामने से हटकर थानेदार के पास पहुँच गया। थानेदार धीमी आवाज में मोबाइल पर किसी को कोई निर्देश दिये जा रहे थे।

हवलदार को करीब आया देख उन्होंने मन्तव्य जानने के लिए इशारा किया।

“सर, वे चार-सौ रुपये मांग रहे हैं। कहते हैं, कार्ड बनाना पड़ेगा और बिना उसके, डॉक्टर से नहीं मिला जा सकेगा।...मैं अपनी पर्स लाना भूल गया हूँ।”

थानेदार ने फोन बंद कर दिया। पल भर हवलदार को घूरा। फिर अपनी जेब में से पर्स निकालकर चार-सौ रुपये हवलदार के सुपुर्द कर दिये । हवलदार ने रुपये रिसेप्शनिस्ट को सौंपे। उसने झट कार्ड बनाया और कार्ड लेकर भीतर चली गयी। इस बीच थानेदार को फिर फोन आया। अबकी वे जोर-जोर से बातें कर रहे थे, बिना यह ध्यान रखे कि वे ‘क्लिनिक’ में हैं। क्लिनिक में सब लोग उनकी इस बौखलाहट से भौंचक थे।

“सर, दो अर्जेंट पेशंट हैं। उसके बाद साहब को बुला लेंगे डॉक्टर। डॉक्टर साहब ने आप लोगों को बैठने के लिए कहा है। बैठिए...।”

थानेदार के बदले तेवर देखकर हवलदार हैरान था। वह अनुमान लगा रहा था कि फोन पर दूसरी ओर कौन होगा! रिसेप्शनिस्ट पेशोपस में थी कि शोर सुनकर डॉक्टर ने भीतर बुलाकर जवाब-तलब किया तो वह क्या कहेगी! इसी बीच डॉक्टर के कक्ष से उनका सहायक बाहर आया। उसने ‘शोर’ की जड़ देखी और भीतर लौट गया। बेल बजी। रिसेप्शनिस्ट भीतर गयी और दो मिनट में बाहर आ गयी। उसने ड्रॉअर से चार-सौ रुपये निकाले और हवलदार को बुलाकर रुपये सौंपते हुए कहा, “ये रख लीजिये। डॉक्टर ने ‘साहब’ से पैसे लेने को मना किया है।”

हवलदार ने चार-सौ रुपये थानेदार को लौटा दिये। थानेदार ने रुपये जेब में रख लिये। उनकी फोन पर बात जारी रही लेकिन एक चमत्कार हो गया । उनकी आवाज एकदम सामान्य हो गयी थी।❏

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प्रविष्टि क्रमांक - 170

4. हर बार

-भगवान वैद्य ‘प्रखर’

अभी-अभी सुनहरी धूप खिली थी। सड़क पर आवागमन तेजी पकड़ने लगा था। सड़क किनारे के मैदान में उगी झुग्गियों में दिन भर की योजनाओं पर विमर्श चल रहा था। ऐसी ही एक योजना सुनायी दी:

“कल वो सुबह वाले खेल में तो तुमने कमाल कर दिया, बिन्नी...। रस्सा टूट गया तो तुमने कब उसका सिरा थाम लिया और कब उस पर झूल कर आखिरी छोर पर पहुंच गयी, पता ही नहीं चला। दर्शकों को लगा, वह तुम्हारे खेल का ही हिस्सा है। कितनी तालियां बजी, बाप रे...! सब से ज्यादा रकम मिली उस शो में ।”

“नीचे गिरती तो मैं मर ही जाती मम्मी...। बाबा और भैया ने रस्सा खूब ऊंचाई पर बांधा था। नीचे देखो तो चक्कर आता था।”

“अरे तो बांस की कैंची का एक बांस ऐन समय पर टूट गया था बिटिया, इस कारण बाबा ने दूसरा छोर पेड़ पर लटका दिया था। ...पर आज ऐसा नहीं होगा। बाबा दूसरे नये बांस खरीद लाये हैं। आज रविवार है। मार्केट में चार-पांच जगह रस्सी लगाएंगे। बाबा ने ढोल भी खूब सेंक लिये हैं। भैया और बाबा जम के ढोल बजाएंगे। तुम छड़ी पकड़कर नाचते-नाचते आराम से रस्सी पार करना। जल्दी मत करियो। लोग-बाग सांस रोककर देखते रहते हैं। जितना अधिक समय लगाओगी रस्सी पार करने में, उतना अधिक असर होता है लोगों पर और उतनी ही उनकी जेब ढीली होती जाती है। और हां, कित्ती भी ऊंचाई हो, जमीन की ओर मति देखियो। वाही से आंखों के आगे अंधेरा छाने लगता है और तोल बिगड़ जाता है।” कहते-कहते मम्मी ने दो चाकलेट और बढ़ा दिये, बिन्नी की ओर।

बिन्नी का मन नहीं हुआ चाकलेट उठाने का। उसने एक बार ऊपर उठते सूरज की ओर देखा मानों उससे कुछ ऊर्जा बटोर रही हो। फिर कहा, “मम्मी, आप लोग हर बार मुझे ही क्यों चढ़ाते हों, रस्सी पर ? कभी भैया को क्यों नहीं चढ़ाते?”

“पूरे टोले में देखा है क्या कभी किसी लड़के को रस्सी पर खेल दिखाते? बड़ी स्यानी बनती है...! चल झट नहा ले। मैं गरम पानी निकाल देती हूं।” मम्मी ने कहा और उठकर बाहर खुले में जल रहे चूल्हे के नीचे की आंच तेज कर दी।।”❐

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प्रविष्टि क्रमांक - 171

5. अनुरोध

-भगवान वैद्य ‘प्रखर’

पिछवाड़े की नाली में एक कुत्ता मरा पड़ा था। हमेशा लाइब्रेरी के लिए घर से पत्रिकाएं लेकर जानेवाला अशोक आया तो मैंने उससे कहा, ‘‘यार अशोक, कोई स्वीपर हो तो भेज देना। एक कुत्ता मरा पड़ा है। जितने पैसे कहेगा, मैं दे दूंगा उसे। जल्द निकालना जरूरी है। नहीं तो बास मारने लगेगा।

“ठीक है, साहब।” कहकर अशोक चला गया।

दोपहर करीब बारह बजे मुंह पर कपड़ा लपेटे एक लड़का आया। उसने सौ रुपये लेकर कुत्ता हटाने की बात की तो मैं तुरंत तैयार हो गया। उसने पतलून फोल्ड की और नाली में उतरकर कुत्ता निकाल लिया।

“साब, इसे दूर ले जाकर डालना होगा नहीं तो बास मारेगा।”

“हां, दूर ...उधर रेल्वे लाइन के पार ले जाकर डाल दो।”

“जी, आप पैसे दे दीजिए...।”

मैंने श्रीमती जी को आवाज दी। उसने लड़के को पैसे दे दिये।

लड़के ने कुत्ते को उठाकर साइकिल के कैरियर पर रखा और जाने लगा। इस बीच श्रीमती जी ने मेरे कान में कहा, “यह लड़का कोई और नहीं, वो अशोक ही है।”

“क्या कहती हो...अशोक यह काम नहीं करेगा।”

“मैंने पैसे देते वक्त उसके हाथ देखे । दोनों हाथों में छह-छह उंगलियां हैं। मैंने अशोक के हाथ देखे हैं। मुंह ढंक के और मेक-अप करके आया है इस कारण आपने नहीं पहचाना।”

लड़का साइकिल पर बैठता कि मैंने उसे आवाज दी,“सुनो, तुम्हारी एक रस्सी यहां छूट गयी है...अशोक!”

“नाम सुनकर लड़का कुछ चौंका। फिर रस्सी उठाने को बढ़ा ही था कि मैंने उसके कंधे पर हाथ रख दिया। “अशोक ...तुम अशोक ही हो न...!”

उसकी आंखों में आंसू उमड़ आये। कहने लगा, “सा’ब , मैं ऊंची जात का हूं। यहां पढ़ने के लिए अपने मामा के घर रहता हूं।फीस... किताबों के लिए पैसे चाहिये होते हैं इसलिए ...। किसी से कहना नहीं साहब नहीं तो मेरे मामा मुझे घर से निकाल देंगे...।” और मैं कुछ कहूं इसके पूर्व अशोक निकल गया। ।”❐

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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2479728433764899705

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  1. रचनाएं सही ढंग से प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद.

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  2. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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