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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 212 व 213 // पवन जैन

प्रविष्टि क्रमांक - 212

पवन जैन

पक्के सबूत


उसने अपनी पत्नी से अंतरंग क्षणों में उसे चिढाने तथा नीचा दिखाने  हेतु पूछा: "तुम्हारे पास भी  मी टू  पर कुछ कहने को है."

थोड़ी देर चुप्पी के बाद उसकी पत्नी ने सिर ऊपर उठाया  और बोली "सुन सकोगे?"

"हाँ, हाँ, सुनाओ."

"सिर्फ चटखारे लेने के लिए नहीं मैंने पक्की कानूनी कार्रवाई करने के लिए अपने बचपन के मित्र को बुलाया जो अब फेमस वकील है, पर उसकी कलम ही नहीं चली, क्योंकि उसे याद आ गया कि जब बचपन में वह मेरे साथ छुपा-छुपी  खेलता था तब जानबूझकर उसने न जाने कितनी बार ..."

"अब तो उनके चेहरे भी भूल गई हूँ जो ट्रेन में स्कूल जाते समय अनजान बनते हुए मेरे बढ़ रहे उभारों को टटोलने की कोशिश करते थे. रिश्तेदारों की शादियों में मिले कई करीबी भी उस लिस्ट का हिस्सा है.

मर्द तो मर्द जनानियां भी कम नहीं हैं इस मामले में, सुहागरात की चादर पर  दाग न देखकर ननदों की नजरों ने कितने सवाल किये थे. उन बहनों के भाई तुम, क्या कम हो? मेरे मना करने के बावजूद, मेरी मर्जी के खिलाफ कितने बार तुमने रौंदा है.

तुम्हारा यह बेटा भी क्या कम है जो गोदी में चढ़ कर लाते मारता है, जिनसे जीवन रस ले रहा है."

"बताईये किस अदालत में दाखिल करूं अपना मुकदमा जहाँ से बिना गवाह के न्याय मिल सके तुम्हारे अहं को चोट पहुंचाये बिना."


***

प्रविष्टि क्रमांक - 213

पवन जैन

एक टोकरी सब्जी


पति से लड़ -झगड़ कर, फिर तर्क- वितर्क से समझा- बुझा का उसने निर्णय कर ही लिया कि सब्जी बेचने वह खुद ही शहर जायेगी.

शाम को ही सब्जियां तोड़ कर टोकरी तैयार कर ली थी. सुबह जल्दी से घर का काम निपटा कर आठ बजे की पेसेंजर पकड़ ली.

टोकरी से झांकती ककड़ी को निकालते हुए रेलवे पुलिस के सिपाही ने पूछा "यह किसकी टोकरी है?"

सिर ऊपर कर मरी आवाज में बोली "मेरी है." नजरों के वार को झेलते हुए गाड़ी की खड़र-बड़र में विचारों के झोंकों संग आगे बढ चली.

फुटपाथ पर टोकरी रखकर बैठने को हुई कि पीछे से आवाज गूंजी:

"ऐ बाई!  इधर कहाँ बैठ रही मेरी दुकान के सामने?"

"दुकान से इतने दूर सड़क पर तो बैठे है."

"सामने से थोड़ा एक तरफ हठ जाओ."

इसमें ही भलाई समझ थोडा  बाजू में खिसक गई.

"क्या लाई हो दिखाओ तो जरा?" नई सूरत और ताजी सब्जी देख दुकानदार नरम पडा़.

सवा किलो ककड़ी को एक किलो तुलवा कर, अभी देते है का आश्वासन देकर वापिस अपनी दुकान जमाने में लग गया.

एक अधेड़ नजरों से उसका जायजा लेने लगे और छोटी ककड़ी उठा कर मुंह में डालते हुए "ककड़ी क्या भाव? ताजी है ...,नई आई हो...! " प्रश्नों को उछाल दिया.

"ये लो बाई बैठकी की रसीद."

नगरपालिका कर्मचारी ने रसीद बढाते हुए कहा.

"बैठते ही जा रहे भईया, अभी बोहनी  तक नहीं हुई."

नई बहिन को देखकर उसने भी नरमी दिखाई, "थैली में आधा किलो ककड़ी डाल दे, अभी आते हैं, तब तक फुटकर रखना."

अपनी टोकरी की सब्जियां  सजाते हुए सोच रही सुबह से ढाई किलो ककड़ी निकल गई एक पैसा नहीं मिला.

ग्राहकों के मोल भाव, जुमले और नसीहते सुनते - सुनते टोकरी खाली होने लगी.

दिनभर की धूप से सब्जी को तो बचाये रही पर शाम होते खुद ही कुम्हलाने लगी लिजलिजी छुअन और टटोलती नजरों की जलन से.

पेट में दो समोसे डाल कर सपनों की डोर पकड़े  वापसी को शाम की गाड़ी में सवार हो गई.

उसके कानों में वह जुमले अभी भी गूंज रहे "किसानों को सीधे खरीदार से जुड़ना चाहिये, किसानों को लागत मूल्य का दो गुना मिलना चाहिये, छोटे किसानों से मोलभाव नहीं करना चाहिये...."

घर पहुँच कर नीची नजरों से, सब्जियों की बिक्री से मिले चंद रूपये पति के हाथ पर रख दिये, पर सब्जियों के साथ और क्या बेमोल बिक गया बता न सकी.

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पवन जैन, जबलपुर।

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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 522948076505507045

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  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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  2. दोनों कथाएँ बहुत बढ़िया हैं

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  3. राममूरत 'राही'12:28 pm

    शानदार सहज सरल लघुकथाएं

    उत्तर देंहटाएं

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