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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 293 // च से चिड़िया' // प्रतिभा परांजपे

प्रविष्टि क्रमांक - 293

प्रतिभा परांजपे

च से चिड़िया'
आफिस से बाहर निकल, रीना ने स्कूटी स्टार्ट करते हुए समय देखा, ४ : ३० बजे हैं। आज शनिवार है, तो आफिस में हाफ डे था। किराना दुकान से चावल की बैग लेना है । सुबह घर से निकलते समय उसनें दुकानदार से बैग तैयार रखने को कहा था। महीने की दो तारीख है, तो दुकान में भीड़ तो होनी ही थी। रीना यहां वहां का सामान देख टाइमपास करने लगी। बाहरअनाज के बोरे खुले पडे़ थे। उसी में से कुछ अनाज बाहर बिखरा था जिसे चिडियाएं चुग रही थीं। उनकी मस्ती देख रीना ने सोचा वाह, इनके तो मजे हैं । तभी दुकानदार ने आवाज़ दी तो पैसे दे कर बैग स्कूटी पर रखवा कर रीना चल पड़ी ।
चौराहे पर सिग्नल लाल बत्ती दिखा रहा था, रास्ते के उस तरफ शायद दो गाड़ियाँ भिड़ गई थीं, तो वहां भी जाम लगा था। स्कूटी पर बैठे-बैठे रीना ने सोचा उसके पति राकेश और बच्चे राह देख रहे होंगे, तभी पंछियों का एक झुंड उसके ऊपर से चिंचियाता हुआ गुजरा रीना को लगा, काश उसके पंख होते तो वह फुर्र से........तभी सिग्नल हरा हो गया और वह गाड़ियों के रेलें में बहती गई।
रात में रीना किचन के काम खत्म कर रही थी, बाहर हॅाल में मम्मीजी,पापाजी टी.व्ही पर फिल्म देख रहे थे, वही से गाने की आवाज़ आ रही थी, "पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ मस्त गगन में" रीना भी साथ-साथ गुनगुनाने लगी।


काम खत्म कर जब वह अपने कमरे में आयी, देखा राकेश मोबाइल में महीने भर के खर्चे का हिसाब लगा रहे है। महीने की शुरुवात में दूध,पेपर,कामवाली बाई,मोबाइल, टी वी,बच्चों की फीस, घर का लोन देकर जो बचे उस में बाकी खर्च एडजस्ट करना फिर बच्चों की फरमाईशें, सोचते- सोचते रीना को लगा कितना मुश्किल हैं इस सब में उसको अपने लिये कुछ करने के लिये बचता ही कहाँ हैं, कई दिनों से ब्यूटी पार्लर जाने का सोच रही है, पर......तभी उसे याद आया कल रविवार है तो खाने में कुछ स्पेशल डिश बनानी है। उठकर उसने छोले भिगो दिये, उसके बनाए छोले भटूरे सभी को बहुत पसंद है ।
सोने के लिए रीना बेड पर लेटी , तब तक राकेश सो चुके थे। रीना मन ही मन सोचने लगी,रविवार यानी सुबह सभी देर से उठेंगे,  पर उसे तो उसके और राकेश के हप्ते भर के कपड़े , बच्चों के यूनिफार्म तैयार करने होंगे,रोज तो मम्मीजी सुबह किचन संभालती हैं,  एक दिन उन्हें भी आराम चाहिये। रविवार तो बस कहने को छुट्टी का दिन होता हैं उसके बाद तो फिर वही भागम भाग-----,


बाहर हॅाल में सिनेमा खत्म होने को था, वही से गाने की आवाज़ आ रही थीं "पंछी बनूं उड़ती फिरूं" रीना को लगा काश वो भी चिड़िया होती तो कितना चिंतामुक्त होती,  बस रेडिमेड दाने चुगना और मस्ती में उड़ते फिरना। सोचते- सोचते आंखें मुंदने लगी लगा उसका पूरा शरीर हल्का हल्का होते जा रहा है और वह सचमुच एक चिड़िया है, जिसके नन्हे पंख हैं। वह फुर्र से उड़ कर बाहर निकल सामने के पेड़ पर बैठ गई वहां पर अनेक चिड़ियाँ थी कुछ देर बाद सभी एक साथ उड़ चली तो रीना चिडिया भी उनके साथ उड़ने लगी,सभी एक खेत में उतर कर दाने चुगने लगी रीना चिडिया को वे दाने बड़े ही बेस्वाद लगे। अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि कुछ चिड़ियाँ जोर जोर से चिचियांने लगी और उड़ने लगी,एक बड़ी सी बिल्ली घात लगाए बैठी थी;--  बापरे ! जान बची,वहां से फिर सब आकाश में ऊपर-नीचे गोल गोल गोते लगाने लगी तभी एक बड़ा सा बाज उनके ऊपर मंडराने लगा घबरा कर सभी पेड़ पर छिप गई।


धीरे धीरे शाम होने को आई,सभी चिड़ियाँ घर वापसी में थी रीना चिडिया भी उनके साथ चली।
नियत स्थान पर देखा तो पेड़ की कई डालें कटी नीचे गिरीं थी,कुछ चिड़ियाँ अपने घरौंदे ढूंढ रही थी जिसमें उनके बच्चे थे, वे बौराई सी पेड़ के गोल गोल चक्कर लगाने लगी पर वे कहीं नज़र नहीं आए। अब तक अंधेरा घिर आया था,  प्यास भी लगी थी,  पर पानी कही नजर नहीं आ रहा था। बाकी सभी चिड़ियाँ पेड़ पर जहां जगह मिली बैठीं और सो गई। रीना चिडिया ने भी सोने की कोशिश की ,बैठे-बैठे सोना, बापरे ! कितना कठिन है और नींद में भी चौकस रहना,अचानक उसे लगा सरसराहट की आवाज़ उसके पास आ रही है लगा एक साँप उसे बस निगलने वाला है,  वह जोर से चिल्लाई,लगा डाल पर से पैर उखड़ से गए और वह नीचे गिरने लगी और तभी  ----- उसकी आँख खुली,  सारा बदन पसीने पसीने हो रहा था, सांस तेज चल रहीं थी। राकेश ने उठ कर उसे अपने करीब ले लिया, 'क्या हुआ रीना कोई बुरा सपना देखा क्या ?' रीना बिना कुछ बोले राकेश के करीब सोई रही। सुबह नींद खुली तो देखा सात बज रहे हैं वह बाहर निकलीं तो देखा दरवाजे पर माली खड़ा है,
'मैडम, आज कुल्हाड़ी लाया हूँ, वो आपने नीम के पेड़ की डालियाँ काटने ----'


'कोई डालें-वालें नही काटनी हैं, तुम बस सफाई कर बगीचे में पानी दे दो,और हाँ ,टहनी पर जो सकोरे लटकाए हैं उनमें भी पानी भर देना ।'
इतना कह वह अंदर आई ।राकेश चाय का कप लिए सामने खड़े मुस्कुरा रहे थे।
  'ये क्या मुझे उठाया क्यों नही ?'
  'अरे भई आज संडे हैं संडे इज हॅाली डे----
लो गरमा गरम चाय पियो'
रीना ने महसूस किया चिड़िया के जीवन से यही अच्छा है और वह इत्मीनान से चाय पीने लगी।

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श्रीमती प्रतिभा परांजपे

जबलपुर।
prparanjpe@gmail.com

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 7647964050773837987

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  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है, आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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