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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 313 // निर्णय // बबीता गुप्ता

प्रविष्टि क्रमांक - 313

बबीता गुप्ता

निर्णय

देश की सरहद पर अचानक दुश्मनों द्वारा हमला किए जाने के कारण छुट्टी पर गए सैनिकों तुरंत पोस्ट पर हाजिर होने के आदेश प्रेषित कर दिये गए।

सायरन की आवाज सुनते ही सभी सैनिक अपनी ड्यूटी स्थल पर प्रस्थान कर गए, चारों ओर अफरा- तफरी मची हुई थी,दिल दहला देने वाली गोला बारूदों की आवाजें आसमान को फाड़े जा रही थी। घायल सैनिकों को उपचार के लिए कैंप की ओर ले जाया जा रहा था और शहीद हुये सैनिकों को राजकीय सम्मान के साथ राष्ट्रीय झंडे में लपेट कर घर पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही थी ,साथ ही सरकार की ओर से शहीदों के परिवार के लिए राहत राशि की घोषणा की गई।

टेलिविज़न पर चल रहे समाचार को देख नलिनी को पुरानी यादों में खड़ा कर दिया। वो, तिवारी जी के पड़ोस में अपने फौजी पति,धीरज के साथ रहती थी। मिश्रा जी का बेटा धीरज फौज में था,वो भी आदेश मिलते ही सरहद पर देश की रक्षा के लिए अपनी पत्नी नलिनी और दूध मुंही बच्ची पीहू को ,मुझसे देख-रेख की कह कर चला गया था। धीरज ने अपनी मर्जी की शादी करने पर,उसके घर वालों ने अपने से बेदखल कर दिया था।

आज तड़के सुबह सरकारी आदमी द्वारा तार नलिनी को दिया,तो उसके पढ़ते ही वही चक्कर खाकर गिर पड़ी। धीरज के शहीद होने की खबर हवा की तरह पूरे गाँव में फ़ेल गई और पता लगते ही धीरज और नलिनी के माँ-बापू भी सब कुछ भूलकर एक पैर पर दौड़े चले आए।

पूरे राजकीय सम्मान के साथ धीरज का अंतिम संस्कार किया गया। तत्पश्चात नलिनी के पिताजी ,उसके पिताजी के सामने आग्रह पूर्वक कह रहे थे,-‘नहीं हो तो कुछ दिनों के लिए मैं अपनी बेटी को घर ले जाना चाहता हूँ’।’

‘अरे आप कैसी बातें करते हैं ! वो हमारी बहू हैं। नातिनी हमारे घर की रौनक हैं,वो कहीं नहीं जाएगी।’

‘लेकिन साहब,दोनों अकेली कैसे रहेगी ? वहां भैया-भाभी हैं,मन लगा रहेगा।’

‘वाह !साहब जी आपने अपना सोचा। हमारी बिटिया कुछ दिनों बाद ससुराल चली जाएगी। फिर हम बुड्ढे – बुड्ढी को कौन सहारा हैं।’

दरवाजे के पीछे खड़ी दोनों का अचानक से उत्पन्न असीम स्नेह को देख सोच रही थी,अनायास ये नफरत में प्यार का गुड़ कैसे समा गया ?अपनी खींचा-तानी सुन उसका सब्र टूट गया और सामने आकर किसी के साथ ना जाने का मन जता दिया ।

‘पर ,बेटी,क्या हम तुम्हारे कोई नहीं हैं ?’नलिनी के पिताजी ने याचना भरे लहजे में कहा।

‘उस दिन आपका ये अधिकार कहा चला गया था,जब ससुराल से ठुकराने के बाद मैं,आपके पास आई थी। जब आपने ससुराल ही तेरा घर हैं, कहकर मुंह छिपा लिया था।’

अपने श्वसुर की तरफ मुखातिब होकर बोली,-‘और पिताजी आपने तो कलंकिनी कहा था,आज कैसे गृहलक्ष्मी बन गई?’

दोनों नलिनी की बात सुन,सिर झुका,आगा-पीछा सब भूलकर ,साथ चलने का आग्रह करने लगे। बात पूरी सुने बिना नलिनी तपाक से बोली-‘कही यह मोह सरकार के दान ने तो नहीं जाग्रत कर दिया ?’

दोनों अपने मन के चोर पकड़े जाने पर ,लड़खड़ाती जबान से कहने लगे –‘कैसी बात करती हो?हम तो तुम्हारे अपने...........’

‘मुझे किसी की जरूरत नहीं, ज़िंदगी की सच्चाई का पाठ सीख लिया हैं,खुद निर्वाह कर लूँगी।’ अपना अंतिम निर्णय सुना अंदर चली गई।

विचारों में खोई नलिनी की तंद्रा पीहू की आवाज ने तोड़ी,नजर उठा कर देखा,तो मिलिट्री की ड्रेस पहने पीहू खड़ी मुस्करा रही थी, उसमें धीरज की परछाई..देख आंखें सजल हो गई,उसे अपने निर्णय पर कोई पछतावा नहीं, फख्र था।

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बबीता गुप्ता

c/o श्रीरमणी ट्रीटमेंट सेंटर ,

कल्पना विहार ,नेहरू नगर,

अमेरी रोड,बिलासपुर [छ्त्तीसगढ़ ]

लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 8768950811734117669

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  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है आपकी सलाह, सुझाव हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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