---प्रायोजक---

---***---

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

प्राची - जनवरी 2019 : व्यक्तित्व-कृतित्व - जीवन जिया तो क्या जिया - प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय (डी. लिट.)

साझा करें:

व्यक्तित्व-कृतित्व जीवन जिया तो क्या जिया प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय (डी. लिट.) वास्तव में शिक्षक का धर्म पढ़ना, पढ़ाना है। वह पढ़ेगा, तो सोचेगा,...

व्यक्तित्व-कृतित्व

जीवन जिया तो क्या जिया

प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय (डी. लिट.)

वास्तव में शिक्षक का धर्म पढ़ना, पढ़ाना है। वह पढ़ेगा, तो सोचेगा, चिंतन करेगा फिर लिखेगा। अधिकांश प्रोफेसर चर्वित चर्वण करते-करते जीवन व्यतीत कर देते हैं। एक बार कोई नोट बनाया, उसे ही दुहराते हुए जिन्दगी की शाम घिर आई। परन्तु कुछ यहां ऐसे भी प्रोफेसर हैं जिन्होंने गम्भीर अध्ययन किया, सभा, गोष्ठियां, सेमिनारों में अपने विचारों से क्रांति लाई। इतना ही नहीं, अपने गहन, अध्ययन मनन, चिंतन की अभिव्यक्ति पुस्तकों में की। सभा, समारोहों में अपने शोध-गवेषण का प्रकाश फैलाया। प्रबुद्धों को जगाया, उन्हें दिशा दी। नागार्जुन की एक कविता है “अरे जीवन जिया तो क्या जिया”। इसका निहितार्थ है कि मनुष्य (चिंतन, मनन, सृजन, प्रकाशन) होने का पक्का प्रमाण न दे पाया तो उसका जीवन निष्फल है, निष्प्रयोज्य है। परन्तु डॉ. उपाध्याय विद्यासागर हैं। वहां का जल खारा नहीं, मीठा है। अगजग की प्यास बुझाने वाला. वह पढ़ते रहे वर्षों। मनन करते रहे उस पर। फिर लिखना आरम्भ किया तो सभी दिशाओं में सारस्वत चेतना का प्रकाश फैल गया। तब यह आवश्यक हो गया कि उनके पांडित्य को अभिव्यक्ति का व्यापक आकार मिले, उसका प्रकाशन, प्रसारण हो। इस दिशा में डॉ. रोशनी देवी का प्रयास सार्थक है, प्रामाणिक है और भावी पीढ़ी का दिग्दर्शक।

यह कृति ‘पशुपतिनाथ उपाध्याय : व्यक्तित्व एवं कृतित्व छः अध्यायों में विभक्त है। पहना अध्याय तो उनके जन्म, शिक्षा, वातावरण, साहित्यिक गतिविधियों, मौलिक कृतियों, उनके मिलने वाले सम्मानों आदि पर विरमता है और उनके साहित्यानुशीलन के क्षितिज पर प्रकाश डालता है। यह अध्याय विषय प्रवेश भर न होकर आगे के अध्यायों के कथ्य, विषय, स्थापनाओं, मूल्य आदि की पीठिका तैयार करता है।

अग्नि पुराण में कहा गया है कि इस अपार काव्य-संसार का प्रजापति कवि है और वह अपनी इच्छानुसार उसे जैसा समझता है, उसे जैसा रुचता है, वैसा ही सृजन करता है।

अपारे काव्य संसारे, कविरेव प्रजापति।

यथास्मै रोचते विश्वे, तथास्मै सृज्यते।।

इस लेखक का साहित्य-संसार पद्य पर नहीं गद्य पर टिका है, वह भी आलोचना पर। वैसे गद्य लिखना, वह भी परिष्कृत, बड़ा कठिन काम है। कवियों के लिए ‘गद्य’ निकष (कसौटी) है,

‘गद्य’ कवीनां निकषं वदन्ति.

लेखक की गति गद्य में उल्लेखनीय है।

आलोचना के क्षेत्र में इनका काम ऐतिहासिक है। काव्याशास्त्र में भी इनकी गति है, जिसका उल्लेख ‘समन्वयवादी समीक्षा और डॉ. नगेन्द्र में किया गया है। उनका मानना है कि वाद-विवाद, मत-मतांतर, पक्ष-विपक्ष के कांतार में यत्र-तत्र भटकने से मूल उद्देश्य ओझल हो जाता है। रह जाता है मत वैभिन्य, अलगाववाद और अपनी ढपली, अपना राग। इस विषम-विपरीत परिस्थितियों में उनका निर्णय विवेक सम्मत और समीचीन लगता है : ‘मुझे किसी वाद से विवाद नहीं है और न ही किसी के पक्ष-विपक्ष में इजहार करना है बल्कि आज के युग की यही आकांक्षा है, यही अभिलाषा है और यही मांग है। वसुधैव कुटुम्बकम् की संकल्पना तभी साकार और सार्थक हो सकती है, जब साहित्यालोचन साहित्य का शंखनाद करे। समस्याएं आती रहीं हैं और आशा एवं विश्वास है कि भविष्य में भी आती रहेंगी लेकिन उनका समाधान सामंजस्य में है, समन्वय में है। तादात्म्य में है। यही संकल्प है और यही आज की समस्या का विकल्प। मेरी अपनी समस्या साहित्यालोचन की भी यही रही है। (समन्वयवादी आलोचना पृ.7)

समन्वयवादी आलोचना और लेखन का शुभारंभ का कथ्य है- आलोचना के अर्थ, संदर्भ, लक्षण, तत्व, उद्देश्य और प्रभाव पर विचार-विमर्श करना। बलाघात रहता है। समन्वय के तत्वों, घटकों, पड़ावों, प्रवृत्तियों पर। जहां मत वैभिन्य है- मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना है, वहां समन्वय नहीं होगा, फिर उसका न प्रभाव होगा, न कृति आस्वाद्य (जो कृति का मूल उद्देश्य है) होगी। अतः धनुष की डोरी की याद करनी होगी जिसे न खूब कसा जाए, न ढीला ही छोड़ा जाए। एकदम सम पर रहे-सधी, संतुलित, तभी कृति आस्वाद्य और रसग्राहिणी बन सकेगी। यह बड़ा आश्चर्यमिश्रित आनन्दानुभूति कराना है कि लेखक डॉ. उपाध्याय की व्यापक विद्यायिनी दृष्टि सर्वत्र अपना मार्ग, प्रशस्त करती चलती है। पहले सूत्रात्मक कथन, फिर विवेचन, तब स्थापनाएं, निष्कर्ष, प्रमाण, साक्ष्य आदि।

व्यावहारिक आलोचना पर लेखक की टिप्पणी उल्लेखनीय है क्योंकि व्यावहारिक आलोचना वह रूप है जिसमें वैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा साहित्य-सिद्धान्तों का निरूपण समन्वयवादी प्रवृत्ति से किया जाता है। इसमें कृति बाह्य, आभ्यांतरिक, गौड़ और प्रधान आदि सभी पक्षों का विवेचन होता है। (पृ. 83) यह हुआ सैद्धान्तिक कथन, जिसकी अनिवार्यता, प्रासंगिकता, निर्विवाद है. परंतु लेखक को इसी से संतोष नहीं होता। वह एक लेखक का सच्चा जीवन जीता है- सिद्धान्त में- व्यवहार में। अतः उसने अपनी दीर्घकालीन साधना से जो सीखा है, जो राय बनाई है, उसे निस्संकोच कह देता है।

टी.एस. इलियट ने कहा है कि हम जो जीवन जीते हैं, भोगते हैं, पल-पल पर जिसका अहसास होता है, उसकी अविकल अभिव्यक्ति साहित्य नहीं है। भोगना, जीना एक बात है और उसे सृजन बनाना एकदम दूसरी बात। भोगने वाली मनीषा और सृजन करने वाली मनीषा में अंतर होता है और यह अंतर जितना गहराता है- कला उतनी ही महान होती है। ष्प्दकप टपकनंसपजलं दक ज्ंसमदजष् में यह कथन है। डॉ. उपाध्याय ने बहुत पढ़ा है और उसे पचाया है और इलियट की मान्यता का पग-पग पर विनियोग किया है। उसे आजमाया है। यही कारण है कि उनकी स्थापनाएं स्पष्ट, निर्विवाद, नीरक्षीर, विवेकी और शास्त्र सम्मत हैं।

डॉ. उपाध्याय ने समन्वयवादी आलोचना के विकास, प्रक्रिया, प्रभाव और इतिहास पर प्रामाणिक स्थापनाएं दी हैं। उस समय के कवि होते थे रसवादी, जिसकी व्याख्या, विवेचना करने और उसे लेखन में अमल करने में उनका योगदान रहा है। वह तुलसीदास का साक्ष्य देते हैं, जो महान समन्वयवादी थे।

डॉ. उपाध्याय इसे और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं_ ‘महान कवि का स्वान्तः सुखाय लोकमंगल के साथ पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लेता है। इसी से उसकी अनुभूति साधारणीकरण की अनुभूति बन जाती है। (पृ. 123) लेखक ने शुक्लपूर्व युग में समन्वयवादी तत्वों की प्रधानता पर बल दिया है। परन्तु शनैः शनैः उसके ”ास पर भी चिंता व्यक्त की है। यह आलोचनात्मक कृति कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण बन सकी है। यहां न केवल आलोचना की परिभाषा, अवधारणा, प्रवृत्ति, योगदान, विकास आदि की व्याख्या-विवेचना हुई है, उसकी गहनता में प्रवेशकर आलोचना की प्रवृत्ति, विकास, प्रमुख आलोचक, उनके योगदान आदि की अंतर्यात्रा भी हुई है। समन्वयवादी आलोचना के सुदीर्घ इतिहास, विकास, उसके प्रधान घटकों पर विरमते हुए लेखक उस युगधारा के अवगाहन करता है और वहां के अच्छे तैराकों का प्रामाणिक वर्णन भी करता है। उनके देय, अवदान की चर्चा भी करता है। वहां लेखक समाज की आशा-आकांक्षाओं, उसके स्वप्न-सम्भावनाओं को जगाने और उसे समाज सापेक्ष बनाने की दिशा में तत्पर दिखता है।

लेखक की यह चिंता चैन नहीं लेने देती कि आज आलोचना में व्यक्तिवाद, गुट, अहोरूप, अहोध्वनि की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कोई कुछ छपवाता है, तो अपने ही गुट के लोगों को चर्चा के लिए बुलाता है। यदि यही प्रवृत्ति रही तो कृतियों की अन्तरात्मा में अवगाहन कर रत्न कौन निकालेगा? अगजग का कल्याण कैसे सधेगा? यही चिंता लेखक को सताती है और वह इस ओर सकारात्मक पहल करता है।

‘अतएव, आधुनिकतावादी प्रवृत्ति भारतीय संवेदना को सामंजस्य एवं समन्वय को ठोस पीठिका पर अधिष्ठित करना चाहती है जिससे साहित्यालोचन जगत् में विषमता के स्थापन पर समता, विद्रोह के स्थान पर सौहार्द्र, आक्रामक स्वर के स्थान पर समन्वयात्मक स्वर तथा जीवनमूल्यों के प्रति संवेदनात्मक भाव जाग्ररित हो सके। (पृ. 165)

लेखक का एक-एक वाक्य सूत्रात्मक है। गहन अध्ययन, मनन, अनुशीलन का साक्ष्य है। साहित्य समष्टि का गायक है। लोकमंगल का साधक है। कृति में इस प्रकार कवियों, प्रवृत्तियों, विचारधाराओं, उनके योगदान प्रभाव का प्रामाणिक वर्णन करते हुए लेखक सामाजिक, साहित्यिक अवदान का चित्रण है, विवेदन है। उन्होंने समरस समाज की स्थापना हेतु सर्वधर्म समभाव को स्वयं अंगीकार किया है। उनका मानना है कि छात्रों को जो साधन उपलब्ध कराए जाते हैं, उनके सर्वांगीण विकास के लिए, वे पर्याप्त नहीं हैं। इसके साथ घर, परिवार, समाज का व्यवहार भी मधुर होना चाहिए।

डॉ. उपाध्याय का साहित्य विविध आयामी है। यहां शिक्षा, संस्कार, मूल्य, पारस्परिकता, त्याग, समर्पण श्रम, साधना आदि मानवोत्थान के विषयों को लिया गया है। उनका दर्शन सबको साथ लेकर चलना। विकास का यही प्रत्यय है। शून्य से यात्रा कर पूर्ण पर जाकर विश्राम यही ध्येय रहता है। सबको सुखी, आनंदित बनाने की दिशा में अहर्निश प्रयास। यह साहित्य सृजन द्वारा हो या फिर समाज सेवा द्वारा।

जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में यही संदेश दिया है_

औरों को हंसते देखो,

मन है सो और सुख पाओ,

अपने सुख को विस्मृत कर लो,

जग को सुखी बनाओ।

यह बड़ी बात ध्यान देने योग्य है कि इस कृति में अभीष्ट व्यक्ति डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय, उनकी कृतियों पर पहले विचार किया गया है। व्यक्तित्व, क्रियाकलापों पर बाद में। ऐसे अधिकांश शोधग्रंथ व्यक्ति, परिवार पर विचित्र टिप्पणीकार रचनाओं पर थोड़ा प्रकाश डालकर सिद्धकाम होते हैं। परन्तु डॉ. रोशनी देवी के पांडित्य, साधक, धैर्य, उत्साह, साहित्य की विविध विधाओं में उसकी गति की जितनी चर्चा की जाए, कम है। डॉ. रोशनी देवी ने कृति ‘पशुपतिनाथ उपाध्यायः व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ में बहुआयामी व्यक्तित्व अनुशीलन स्वच्छन्दतावादी धरातल पर समन्वयात्मक दृष्टि से तटस्थतावादी वृत्ति के साथ किया है। ऐसे वैश्वानर अब इतिहास के पृष्ठों में अंकित हैं। परन्तु डॉ. रोशनी देवी ने वर्षों डॉ. उपाध्याय के साहित्य का अध्ययन किया। उनके कई बैठकों में संवाद किया। तब यह कृति शरीर धारणकर सकी है। इसीलिए इतनी प्रामाणिक और ऐतिहसिक बन पड़ी है। दोनों को अशेष साधुवाद।

सम्पर्क : वृन्दावन, राजेन्द्रपथ,

धनबाद (झारखण्ड)

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच करें : ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3913,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,260,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2872,कहानी,2166,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,495,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,91,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,330,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,54,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,23,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,1138,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1957,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,686,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,724,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,72,साहित्यम्,4,साहित्यिक गतिविधियाँ,193,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,73,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्राची - जनवरी 2019 : व्यक्तित्व-कृतित्व - जीवन जिया तो क्या जिया - प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय (डी. लिट.)
प्राची - जनवरी 2019 : व्यक्तित्व-कृतित्व - जीवन जिया तो क्या जिया - प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय (डी. लिट.)
https://4.bp.blogspot.com/-SrCcBLOMiuo/XElaR8Ri04I/AAAAAAABGw4/ADwIcY8qRrAOer_Qr-OG98lXkIFtqQUbQCLcBGAs/s320/%25E0%25A4%25AA%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%259A%25E0%25A5%2580%2B%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25B5%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%2580%2B2019.png
https://4.bp.blogspot.com/-SrCcBLOMiuo/XElaR8Ri04I/AAAAAAABGw4/ADwIcY8qRrAOer_Qr-OG98lXkIFtqQUbQCLcBGAs/s72-c/%25E0%25A4%25AA%25E0%25A5%258D%25E0%25A4%25B0%25E0%25A4%25BE%25E0%25A4%259A%25E0%25A5%2580%2B%25E0%25A4%259C%25E0%25A4%25A8%25E0%25A4%25B5%25E0%25A4%25B0%25E0%25A5%2580%2B2019.png
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2019/01/2019_43.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2019/01/2019_43.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ