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कहानी // जीवित प्रमाण पत्र // डॉ. अश्विनी शुक्ल

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काका बहुत सहनशील है ।उनके चेहरे पर कभी भी दुख की लकीरें उभरने का साहस नहीं कर सकी। हां जब कभी उनके भाई भतीजों को जरा सा भी दुख होता तो उसका ...

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काका बहुत सहनशील है ।उनके चेहरे पर कभी भी दुख की लकीरें उभरने का साहस नहीं कर सकी। हां जब कभी उनके भाई भतीजों को जरा सा भी दुख होता तो उसका असर उनकी बड़ी-बड़ी ओजस्वी आंखों पर अवश्य पड़ जाता गांव-गिरांव के लोग काका कि इसी रोबीली आभा के कायल थे बच्चे मजाक में कहा करते थे कि फौजी काका को अकबर बादशाह ने यह मुझे उपहार में दी है 24 साल की फौज की नौकरी के बाद काका रिटायर हुए थे ।

उनके एक बड़े भाई और थे । खेती किसानी का काम दोनों भाई संभालते थे ।लेकिन काका के फौज में जाने के बाद घर का कामकाज और भी बढ़िया चलने लगा था ।काका साल में 20 दिन की छुट्टी पर घर आते ।गजब की ताकत थी । मोटी मोटी पसलियां भरा पूरा गबरु जवान ।काकी घूंघट के तले तले अपने सुदर्शन पति को देखकर सिहर उठती । लेकिन काका भाई भतीजे भाभियों के बीच अपने को भुला देते। क्या मजाल कि दिन के उजियारे में अपनी नवविवाहिता पत्नी से बात तक कर ले । न रोक न टोक लेकिन संयुक्त परिवार की मर्यादा उन्हें देहरी लांघने ना दे । काका के आने पर पूरे घर में उत्सव जैसा माहौल बना रहे ।

बड़ा सा दरवाजा और सहन पर सुबह-सुबह गांव वालों की भीड़ । चारों तरफ वैभव ही वैभव नजर आए । ऐसा लगे सच में पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आया हो ।काका के आने की खुशी से सारा घर जहां झूमने लगता था वहीं काका के वापस जाने के 2 दिन पहले से ही पूरे घर का मुंह उतर जाता था । विदाई की बेला आते आते सब लोग दुखी हो जाते थे । काकी तो पहली बार आई थी । उनका अंदर ही बुरा हाल हो रहा था । नई-नई शादी बमुश्किल से 11 दिन हुआ था और 12 दिन विदाई हो गई । एक दिन पहले ही काकी मायके वापस चली गई । पूरा घर वीरान हो गया । कल की चहल-पहल शांति में तब्दील हो गई ।

धीरे-धीरे काका को 3 महीने बीत गए । उन्हें छुट्टी नहीं मिल पा रही थी । पिताजी को 3 महीने के भीतर ही काकी का गौना कराना था । काका नहीं आए। लेकिन गौना तो होना ही था । आज काकी की आवई थी । काका के ना आने से मन बड़ा उदास था । निरुपाय पिताजी करते तो क्या करते। बेचारे दुखी मन से घर से विदाई के लिए निकल पड़े ।अगले दिन करीब 11:00 विदाई हो गई । काकी और पिताजी एक जीप से घर आ रहे थे ,कि रास्ते में उन दोनों का एक्सीडेंट हो गया । काकी और पिताजी की मौके पर मौत हो गई । ड्राइवर भी नहीं बचा । ईश्वर को ना मालूम क्या पसंद था। पूरे गांव में कोहराम छा गया। बनी बनाई दुनिया उजड़ गई। पूरी की पूरी गृहस्थी बर्बाद हो गई । जहां चारों तरफ खुशियां किलकारी किया करती थी वही आज वीरानी छा गई । पूरा गांव मुंह लटकाए बैठा है । अम्मा का रो रो कर बुरा हाल हो रहा है । दो-दो मिनट पर वह बेहोश हो जा रही हैं। करुण बिलापता के दौरान कोई न कोई नया रिश्तेदार आ जा रहा और एक 2 मिनट की चुप्पी फिर कोहराम में तब्दील हो जा रही है ।

काका को तार कर दिया गया ।अगले दिन वह भी आ गये । काका अवाक । उनकी सूनी आंखों में सदा के लिए उदासी ने डेरा डाल दिया । फिर 11 वे दिन काका पलटन को वापस चले गए । काम तेरहवीं के बाद घर पर सिर्फ 3 प्राणी बच गए ।अम्मा और 11 तथा 14 साल के हम दोनों भाई । कुछ दिन तो समझ नहीं आया कि दिन की शुरुआत कहां से हो , लेकिन धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया । पिताजी की जगह अम्मा ने ले लिया । समय बड़ा बलवान वह धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य कर देता है । हम लोग अभ्यस्त हो गए। शायद काका की जिम्मेदारी घर के प्रति अपने आप बढ़ गई थी । काकी के एक्सीडेंट के बाद ऐसा नहीं कि काका की शादी के रिश्ते नहीं आए लेकिन काका ने शादी न करने का निर्णय कर लिया था । आखिर काका की उम्र ही कितनी थी । 24 वर्षीय काका धीर-गंभीर हो गए । पिताजी काका से 13 साल बड़े थे ।

काका जब फौज से आते थे तो कैंटीन से घर की हर जरूरी चीजें पूरे साल के लिए ले लाते । अम्मा के लिए दवाई च्यवनप्राश से लेकर हम लोगों के लिए अंडरवियर तक सब कुछ । काका धीरे-धीरे इस परिवार के लिए अन्योन्याश्रित हो गए । नई पीढ़ी तो काका को ही दोनों बच्चों का बाप मानती थी । रिटायरमेंट के बाद सरकार ने 30 बीघा जमीन भी काका को पुरस्कार स्वरूप दे दी थी । काका के कारण सुख सुविधा से एक बार पूरा घर भर गया । बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली थी । काका जमकर मेहनत करते ।दोनों भाइयों की पढ़ाई पर ध्यान देते । हम लोगों के दिन फिर से बदल गए । बड़ा भतीजा गांव में और छोटा शहर चला गया । काका को आखिर करना ही क्या था । सारी जमीन दोनों बच्चों के नाम कर ही दी थी । केवल एकाधिकार बचा था तो हर महीने की पेंशन पर। काका को किसी चीज की भी जरूरत नहीं बची थी । पेंशन भी बड़े भैया ATM कार्ड से निकाल लेते थे ।ऊनी कपड़े लत्ते फौज ही नहीं फट रहे थे ।

शांत एवं सहनशील काका को किसी की कोई बात बुरी भी लगे तो अपने ही अंदर दबा लेते हैं । आखिर किससे शिकायत करें । सब लोग तो उन्हीं के हैं। उनके स्वभाव के कारण उनका उनके बेटों से कभी भी मनमुटाव तक नहीं हुआ । बहुओं ने अगर कुछ दुर्व्यवहार भी किया , उपेक्षा भी की तो कभी भी भतीजों के कान तक बात नहीं पहुंचने दी । बस बहुत हुआ तो अकेले बड़बड़ा कर चुप हो गए । यही खासियत उनकी और यही रिश्तों के लिए बड़ी बात थी ।

एक महीने बाद बड़े पोते की शादी है । शादी की तैयारियां जोर-शोर से चल रही है । काका की तबीयत इधर कई दिनों से खराब है । फरवरी की 25 तारीख को शादी है । बारात की तैयारी के लिए बैंड बाजा कपड़ा लत्ता सब के इंतजाम में बड़ा बेटा लगा हुआ है । आखिर काका की भी इज्जत का सवाल है । बेटा एकदम तैयारी को लेकर परेशान । एक तरफ घर की रंगाई पुताई चल रही है । दूसरी तरफ जेवर असबाब का काम । बहू पूरे दिन अपनी आने वाली नव ब्याहता के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ के रखना चाह रही है। आज काका के पैरों में असहनीय दर्द है । जवानी का कसरती शरीर बुढ़ापे में तो दुख देता ही है , यही सोचकर काका चुप हो जाते हैं । रहाइस ना होने पर हाय राम हाय राम कहकर दर्द पी लेते , लेकिन ठंड के कारण एक हफ्ते से दर्द बहुत ज्यादा बढ़ गया है । काका जानते हैं कि पूरा घर विवाह की तैयारी में परेशान है । बेचारा रमन अकेले कितना काम करें। काका खुद भी तो अब उतना सहयोग नहीं कर पाते ,नहीं तो खुद न जाकर सब इंतजाम करा देते । बेचारे काका अपनी लाचारी पर मन मसोसकर रह जाते हैं । वैसे पुराना जमा सारा का सारा पैसा काका ने शादी में खर्च करने के लिए रमन को निकाल दिया है । आखिरकार काका को तो पहली तारीख को पेंशन मिल ही जाएगी ।

घुटने का दर्द बढ़ता ही जा रहा है । तीन-चार दिन से मारे कोहरा के कारण सूरज का दर्शन भी नहीं हुआ । ठंड बढ़ जाने के कारण अब उठना बैठना भी मुश्किल हो गया ।दबी जुबान से एक दो बार खाना खाते समय अपनी तबीयत के बारे में रमन के सामने बात छेड़ी पर रमन और बहू ने गैर जरूरी बात समझ कर ध्यान नहीं दिया । काका एकदम चुप हो गए ,लेकिन आज तकलीफ बर्दाश्त के बाहर हो गई । इसलिए सोचा कि गांव के सरकारी अस्पताल में चल कर दिखा दिया जाए ।

घुटने की सूजन देखकर डॉक्टर ने कहा कि तत्काल शहर जाकर इसका इलाज करवाया जाए नहीं तो घुटना एकदम काम करना बंद कर देगा । हड्डी अंदर से घिस रही है , जिसके कारण सूजन और बढ़ सकती है ,फिर घुटना बदलना भी पड़ सकता है । काका मन ही मन डर गए । पहली बार काका के चेहरे पर लाचारी दिखाई पड़ी । काका की दवाई तो फौजी अस्पताल में बिना दाम के भी हो जाएगी लेकिन कौन साथ लेकर जाएगा ? यही प्रश्न काका के मन में रह रह कर कौंध रहा था । घर लौटकर फौरन काका ने सारी बात रमन की बहू को बता दिया । काका ने सकुचाते हुए कहा ,रमन तो अभी शादी की तैयारी में व्यस्त है । बाजार से लौट आए तो जैसा उचित हो वैसा करें । काका ने अपनी तरफ से समस्या का समाधान भी रख दिया कि कहीं बहू उखड़ न जाए । यह सुनकर बहू अप्रत्याशित रूप से बोल पड़ी काका इस में देरी करना उचित नहीं है । वैसे भी शादी तक इनके पास टाइम नहीं है । अच्छा होगा आप जल्दी से डॉक्टर को दिखा दे । घुटने का मर्ज है । वैसे भी चलने फिरने नहीं देता है । छोटे को फोन कर दो वह आकर तुम्हें लिवा ले जाए । देर करना बुद्धिमानी नहीं है । इस समय बहू को काका से छुटकारा मिलने का सबसे सरल उपाय यही जान पड़ा ।

काका ने कहा ---नहीं ! छोटे को अभी फोन ना करना ।

क्यों ? बहू ने पूछा ।

भईया को आ जाने दो जैसा कहेंगे वैसा किया जाएगा । छोटे के पास फुर्सत कहां होगी , जो मुझे आकर ले जाए । काका ने अपने मन की बात बता दी ।

मगर जैसा आप सोचो , देरी करना ठीक नहीं है । बल्कि मैं कल सुबह बस पर बैठा दूंगी , वह तुम्हें बस से उतार लेंगे । बहु ने सुझाव दिया ।

नहीं बहू ! समझा तो करो ! मैं कई बार उसके घर जा चुका हूं । रास्ता जाना पहचाना है । बस स्टेशन से रिक्शा कर के मैं खुद ही पहुंच जाऊंगा । फिर हालत देखकर वह कुछ ना कुछ करेगा ही । खुद नहीं तो नौकर के साथ ही अस्पताल भेज देगा ।

इतना सुनकर उमा भड़क उठी। काका इतना छोटे से डरते हो ! ऑफसर होगा अपने ऑफिस का । कमा कमा के अनाज दाल सरसों उसे भेजते रहते हो । उसका उसके ऊपर कोई एहसान नहीं । इतनी ही जमीन जायदाद सब कुछ उसको भी मिली है । कुछ कम नहीं किया उसके लिए । यहां सालों से अपनी सेवा करवाते आ रहे हो और उसके पास जाने मात्र से डर गए । कुछ दिन के लिए । पीपल के पत्ते की तरह कांपने लगे । काका को हिम्मत बंधाते हुए उन्होंने कहा- जाइए ! बहुत ज्यादा दिन की बात नहीँ है । शादी में तो सब लोग आएंगे ही । उन्हीं के साथ दवा पानी करा कर चले आना । काका को तो दवा करानी ही थी । ठीक है। काका ने स्वीकृति में सिर हिला दिया । अगली सुबह काका की तैयारी कर दी गई । तैयारी क्या थी सिर्फ उनकी धोती बनियान एक कैनवास का झूला पुरानी नूरा मेंट की क्रीम 1 ब्रस और 1जीभी ।

                       11:00 बजे काका पवन के दरवाजे पहुंच गए । घुटने के दर्द की तुलना में आसन्न संकट ज्यादा गम्भीर लगा । पवन ऑफिस चला गया होगा यह सोचकर काका का मन और भी बुझ गया ।

दरवाजे पर पहुंचकर काल बेल बजाते समय न जाने क्यों आज काका के हाथ कांप गए । मरता न तो क्या करता । दरवाजा छोटी बहू ने खोला । काका को देखते ही वह बोल पड़ी ---अरे काका तुम ! ममता की आवाज में उपेक्षा का भाव काका की आंखों में ताड़ लिया । ममता मुंह मोड़ कर कमरे में चली गई । काका पीछे पीछे बैठक तक चले आए । दो तीन मिनट बार बैठक का दरवाजा खुला । काका तब तक बाहर खड़े ही खड़े अपने ही बीते जीवन की पड़ताल करने लगे । अबकी बार दरवाजा बहू ने नहीं बल्कि नौकरानी ने खोला ।

अरे दादा आप ठीक तो हैं ?बड़े ही आत्मीय भाव से काका की कुशल-क्षेम पूछी ।

काका के उदास मन को कुछ सुकून मिला । नौकरानी ने अपने पल्लू से काका के पैर छूए।

काका ने आशीर्वाद दिया । तब तक बहू ममता फिर कमरे में आ गई । उसे काका और रूपा के बीच की बातचीत पसंद नहीं आई ।

वैसे भी यह समय बहू के TV सीरियल देखने का था । वह इस समय किसी भी प्रकार के ऐसे भी ठिकाना नहीं पसंद करती थी । भोजन करने के बाद वह इस समय केवल TV सीरियल देखकर अपना समय बिताना चाहती । इस समय किसी का भी आना ममता को पसंद नहीं था ।

ममता ने आते ही काका पर प्रश्न बाण छोड़ दिया । कम से कम आते समय एक फोन तो कर देते ।

हां ,लेकिन तुम्हारे फोन में पैसे ही कहां रहे होंगे ? वहां पोते की शादी होने जा रही है । जब तक देह में जागर रहा तब तक तो खूब खेती किसानी की । पूरे परिवार की दौड़ दौड़ कर सेवा करते रहे ,और जब लटरिया गए तो ममता याद आ गई ।

काका ने इधर उधर देखा । कमरे में पड़े एक तख्त पर बिना कहे ही काका बैठ गए । घुटने जवाब दे रहे थे । काका कुछ देर तक चुपचाप बैठे रहे । घर से निकलने के बाद रास्ते में पानी तक नहीं पिया था । सोचा था घर तो चल ही रहे हैं वही चल कर खा पी लेंगे । मारे प्यास के हलक सूख रहा था । इसी बदहवासी में न जाने कब काका ने रूपा से पानी मांग लिया । रुपा पानी लेने अंदर चली गई ।

चल फिर नहीं पाते हो । रास्ते में अगर कुछ हो जाता तो फिर क्या होता । सब दोष हमारे ही मत्थे मढा जाता । ममता ने झुंझलाते हुए कहा ।

नहीं बहू मेरे घुटनों में दो-तीन दिनों से बड़ी परेशानी हो गई फिर इस टाइम दोनों लोग शादी की तैयारी में खुद ही परेशान कैसे आ सकते थे । काका ने घबराते घबराते उत्तर दिया ।और यहां मैं गुलछर्रे उड़ा रही हूं ? खाली बैठी हूं ? ममता एकाएक सुलगती हुई लालटेन की तरह भड़क उठी । काका आपको जरूर बुरा लग रहा होगा लेकिन जरा खुद ही सोचो कि जिस अधिकार से इतने सालों से वह लोग तुम्हें अपनी अमानत मान कर रखे हुए थे , उसी नाते उन्हें बीमारी में भी देखरेख करनी चाहिए । हम किस तरह से अपने बच्चों को पालते हैं हम जानते हैं । कभी तुमने सोचा उस वक्त तो तुम्हें भी गांव का हरा भरा खेत खलिहान, मस्ती बहुत अच्छी लगती थी । खेत में जाकर खुद काम करना बहुत अच्छा लगता था । आज ना मालूम कैसे आपकी यहां आने की हिम्मत पड़ गई ?

पर्दे की आड़ में खड़ी रूपा यह सुन कर कर ढंग रह गई । गिलास का पानी वापस किचन में रख आई । इस हालात में काका को पानी देने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ी । काका की भी सारी उम्मीदों पर पानी पड़ चुका था । काका एक चुप हजार चुप । काका कुछ भी नहीं बोले उनकी प्यास मिट गई थी । वे सिर झुकाए कुछ देर तक घुटनों पर हाथ फेरते रहे फिर एकाएक उठकर घर के बाहर निकल गए । बस इतना ही कहा कि बहू तुम लोग राजी खुशी से रहो । मेरी वजह से तुम लोग परेशान न हो । बाहर निकलते हुए काका ने खुद ही दरवाजा बंद कर दिया ।

काका के जाने के बाद ममता ने एक पल के लिए सोचा कहीं काका लौटकर पवन से हमारी शिकायत ना कर दें । लेकिन अगले पल अपने को समझाया जो होगा सो देखा जाएगा । वह लौटकर कहां आने वाले । सच शाम तक काका वापस नहीं लौटे। इस बात से ममता को बड़ी राहत मिली

। शाम को पवन जब ऑफिस से आया तो काका के प्रति अपनत्व भरा गुस्सा दिखाते हुए ममता ने काका के आने की जानकारी पवन को दी । काका के अकेले अस्पताल जाने की बात पवन को जरूर खटकी । तुमने उन्हें अकेले जाने ही क्यों दिया ? तुम ही साथ चली जाती ? या ...............कल मैं अपने साथ ले जाकर ठीक से डॉक्टर को दिखा देता ।

अरे बाबा वह मानते तब ना । वह मां ने ही कहा । उनको तो पोते की शादी की तैयारी जो करनी थी । उनका पल पल यहां किस तरह से कट रहा था यह तो मैं ही जानती हूं । 2 मिनट ठीक से बैठे तक नहीं । चाय पानी भी नहीं किया । बहू हमें बहुत जल्दी है यही रट लगाए थे । तभी तो लौटकर यहां नहीं आए । सीधे घर चले गए । यह बात पवन को थोड़ा अटपटी लगी , लेकिन फिर भी चुप रहा । आखिर दोष तों काका का ही था । उनका मन ही यहां कहां लगता है ! यही सोचकर पवन भी चुप रहा।

पांचवें दिन रमन ने काका का हाल चाल पूछने के लिए पवन को फोन किया । पता चला काका अभी गांव नहीं पहुंचे ।यह सुनकर पवन को सांप सूंघ गया । उसने झट ममता को फोन से इस बात की सूचना दी । अरे क्या कह रहे हो काका घर नहीं पहुंचे ? या सुनकर ममता एकदम सन्न रह गई । गांव गए नहीं यहां आए नहीं .........

तो फिर गए कहां काका ??

पवन सिर पकड़ कर बैठ गया ।

आज ममता को अपने व्यवहार पर खीज होने लगी । उसने पवन को पकड़कर झटका और पूछा बताओ न आखिरकार आ गए कहां ? आज तो लगभग 6 दिन हो रहे हैं । एक लंबी सांस लेकर पवन ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया । क्या पता ? अब क्या होगा भगवान ! ममता सिर पटक पटक कर रोने लगी । रूपा भी ममता के बगल में खड़ी हो गई । उसकी आंखों के सामने ममता का क्रूर व्यवहार एक बार फिर उभर आया । काका के प्रति किया गया ममता का व्यवहार एक-एक कर रूपा की आंखों के सामने नाचने लगा ।

तिरिया चरित्तर में निपुण ममता ने कहा बड़े भैया को तत्काल बुला लो बिना उनके आखिर काका को ढूंढा कहां जाए । अकेले आप क्या कर लेंगे । पवन के चाय का समय हो गया था । आज ममता खुद ही चाय बनाने रसोई में चली गई । आज उसे अपने व्यवहार पर मन ही मन पछतावा हो रहा था । सब कुछ उसकी ही गलती थी । इस तरह घर में कदम रखते ही उसे काका के साथ दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए था । उसे काका के ऊपर तरस आने लगा । वह इस हालात में अकेले न जाते । उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कारने लगी । उसे काका का समर्पण एक-एक करके याद आने लगा । आज उसे लगा दो अनाथ बच्चों के मोह में उन्होंने खुद को ही अनाथ बना लिया । क्या उनकी सगी बहू भी इस तरह घर से भगा देती । आखिर काका रुक जाते तो क्या हो जाता । रूपा तो थी ही । आज नहीं तो कल नौकर जाकर अस्पताल दिखा देता । एक रोटी और एक कौर दाल चावल । खाते ही कितना है । एक छोटे बच्चे से भी कम । मेरी तो मति मारी गई थी । वह मन ही मन अपने को कोसने लगे । पर मुसीबत से मुक्त होना इतना आसान नहीं था ।

शाम को रमन भाई साहब भी घर आ गए । दोनों भाइयों ने देर रात तक अपने रिश्तेदार नातेदार से काका के बारे में फोन पर जानकारी ली । लेकिन काका का कहीं अता-पता नहीं चला । निराशा ही हाथ लगी । कोई सुराग ना मिलने पर सुबह पुलिस चौकी में रिपोर्ट लिखवाने का निर्णय लिया गया ।

अगली सुबह 7:00 बजे तडक़े दोनों भाई पुलिस चौकी पहुंच गए । पता चला करीब 5 दिन पहले एक बूढ़े व्यक्ति का सड़क के किनारे एक्सीडेंट हो गया था । उसे अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दिया था । उसे लावारिस अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है । पता नहीं अब उसकी कैसी हालत हो ।

मन ने पूरी उत्सुकता के साथ पूछा - किस अस्पताल में ? रेलवे अस्पताल में ...............पुलिस ने बताया ।

तत्काल दोनों भाई रेलवे अस्पताल पहुंच गए ।अस्पताल में पूछने पर पता चला की बुड्ढा परसों ही मर चुका है । कल लाश को लावारिस समझकर उस की अंतेष्टि भी करा दी गई है । शिनाख्त के लिए उनके जूते, कपड़े -लत्ते सुरक्षित रखे गए हैं । अगर चाहो उनके कपड़ों की शिनाख्त कर लो ।

दोनों भाइयों को पूरा विश्वास हो गया था कि काका की मौत हो चुकी है । काका को ₹14000 पेंशन के मिलते थे । आज 22 जनवरी है । लगभग 7 महीने तक जीवित प्रमाण पत्र के कागज दिए बगैर पेंशन आती रहेगी । पवन जानता है कि रमन काका की हर महीने की पेंशन निकालते हैं ।

दोनों भाई आपस में खुसर पुसर करने लगे । घर पर शादी का कार्यक्रम चल रहा है । अगर काका गुजर गए तो शादी में व्यवधान पड़ जाएगा । ऐसी स्थिति में काका का जिंदा रखना ही हम दोनों के हित में हैं । दूसरी बात काका को अभी 7 महीने तक बिना जीवित प्रमाण पत्र दिए पेंशन मिलती रहेगी , इसलिए काका का जीवित रहना हम दोनों के हक में हैं । क्यों ना हम लोग काका की लाश को पहचानने से इंकार कर दे । दोनों भाई की बातचीत के दौरान लाश घर का कर्मचारी भी वहां आ टपका ।

चलिए भाई साहब लाश के सामान की शिनाख्त कर लीजिए।

दोनों भाई भारी मन से लावारिस सामान देखने चले गए । जूता, कुर्ता ,थैला ,ब्रश ,नूरा मेंट सब एक-एक कर काका के सबूत दे रहे थे । सामान देखकर दोनों भाइयों की फटी फटी आंखें जडवत हो गई । दोनों भाइयों के आंखों की संवेदना मर चुकी थी । दोनों भाइयों के बीच आंखों ही आंखों में सम्वाद हो गया और फिर दोनों भाइयों ने एक ही अंदाज में अपने अपने सिर हिला दिये ।

पवन ने भाव शून्य मुख मुद्रा से कहा ---अरे ! हां यह तो हमारे काका का सामान नहीं है ।

आगे कुछ बोलने की जरूरत नहीं बची । दोनों भाई सिर झुकाए मर्चरी से बाहर निकल आये ।

एक के हाथ में रिपोर्ट लिखा पन्ना तथा दूसरे के हाथ में जीवित प्रमाण पत्र बनवाने की चिंता दोनों के साथ घर चली गई । रिपोर्ट लिखे पन्ने के पीछे बेटे के शादी का सामान लिखा था।

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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,240,लघुकथा,1217,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1995,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,700,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,782,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,75,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,196,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: कहानी // जीवित प्रमाण पत्र // डॉ. अश्विनी शुक्ल
कहानी // जीवित प्रमाण पत्र // डॉ. अश्विनी शुक्ल
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रचनाकार
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