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मोबाइल जिंदगी // डॉ अश्विनी शुक्ल

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याद है जुलाई 1999 का वह वक्त । पहली पहली बार मोबाइल सिम की लॉटरी निकली थी । एक हजार एक सौ लोगों में केवल दस लोगों को ही लॉटरी सिस्टम से सिम ...

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याद है जुलाई 1999 का वह वक्त ।

पहली पहली बार मोबाइल सिम की लॉटरी निकली थी । एक हजार एक सौ लोगों में केवल दस लोगों को ही लॉटरी सिस्टम से सिम मिले थे । एक्सचेंज पर मेला लगा था। सिम प्राप्त करने वाले लोगों को प्रत्यक्ष बधाई और परोक्ष ईर्ष्या का सामना करना पड़ रहा था । बड़े सुखद एवं आत्म गौरव के क्षण। उस समय पूरे शहर में गिनती के मोबाइल धारक थे ।मेरा भी नाम मोबाइल धारकों में शुमार हो गया । चलती बस में मोबाइल का टोन अभिजात वर्ग में खुद ही सम्मिलित करा देता , लेकिन मोबाइल पर फोन आते नहीं तो घंटी सुनाई कैसे दें । पहली बात मोबाइल की कमी , दूसरी सेट के अभाव में कोई किसी को कैसे फोन करें । फिर भी मेरे पास दस बीस फोन तो आ ही जाते थे । पूरा का पूरा दिन कुछ लोग इंतजार ही करते रह जाए ।

हैलो कहकर मोबाइल को देखकर जेब में रख लेने से ही बडे आत्म गौरव की अनुभूति होती ।धीरे-धीरे समय बदला । तमाम प्राइवेट कंपनियां मार्केट में आने लगी । फोन का आना शुरू हुआ । फोन काल्स फिर धीरे-धीरे मैसेज । इनबॉक्स में मैसेज से सन्देशा देने का सिलसिला जारी । एक कदम हमारे दो कदम उनके । कदम दर कदम की यात्राएं बढ़ती गई और आज जहां हम खड़े हैं उसके पीछे बहुत बड़ा फलक दिखाई दे रहा है । विभिन्नस्मृतियां ,घटनाएं ,मिलन ,बिछोह , आमोदप्रमोद, यश अपयश और सुख-दुख की ढ़ेरों चित्र अपना अस्तित्व बनाए दिखाई दे रहे हैं । वेज तथा नॉनवेज मैंसेज ।

उस दिन भी मारे थकान के अल्मोड़ा जाने का मन नहीं था । पूरे दिन की थकान को लेकर कार्यालय के पास एक किराए के मकान में अक्सर देर हो जाने पर हम लोग रूक जाया करते थे । हम जैसों को चाहिए एक या दो गज का कमरा दो रोटी और कॉपी कलम किताब । सायं काल की बेला थी । सर्दियों के दिन थे । वही 6 दिसंबर की शाम । कुहरे ने शाम से ही अपने चादर में पूरी दुनिया को छुपा लिया था । सुनिधि को अल्मोड़ा वापस जाना था । बाप रे बाप । ऐसा मौसम और साठ किलोमीटर की यात्रा । रास्ते भर पूरे दिन लगा रहने वाला जाम । तब तक अचानक मोबाइल बज उठा । हां .. हां.।

मैं तो अभी कार्यालय पर ही हूं ।कहकर फोन काट दिया । कुछ देर में ही सुनिधि भी कार्यालय पहुँच गईं ।उसने अपने बैग से कुछ पेपर निकालें और सत्यापन हेतु हस्ताक्षर का आग्रह करने लगी । उसने लगभग 10 मिनट बाद अल्मोड़ा चलने का आग्रह करने लगी ।

यद्यपि आज मुझे घर नहीं जाना था फिर भी सोचा चलो अल्मोड़ा हो ही आएं । यही सोचकर सुनिधि से कहा अच्छा चलो बस में सीट लो । हम 5 मिनट में पहुंच रहे है।। बस स्टेशन से निकल चुकी थी । चौराहे पर सुनिधि बस में बैठ गई ।ऑफिस से निकलते निकलते कुछ वक्त लग गया तब तक जाम ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया । बड़े चौराहे पर पुलिस वालों ने बस को 200 मीटर आगे जाकर खडा कर दिया । थोड़े इंतजार के बाद मैं भी बस पर पहुंच गया । सुनिधि बेचैनी के साथ मेरा इंतजार कर रही थी ।

सौंदर्य और सौजन्य की अप्रतिम प्रतिमा । सोचा चलो कोई बात नहीं । मुझ को देखते ही खीझ रहे यात्रियों के चेहरे पर संतोष उभर आया । बस में अधिकांश दैनिक यात्री थे । कंडक्टर सुनिधि के कारण बस को सड़क के किनारे रोककर टिकट काटने लगा । कड़ाके की ठंड के कारण ऊनी कंबल को कंधे पर डाले बैठा था । रह-रहकर ठंड हवा के झोंके हाड़़ तक कंपा दे रहे थे । बमुश्किल 20 यात्री रहे होंगे । जानबूझकर सुनिधि बस के पीछे वाली सीट पर बैठ गई । मैंने कंबल अपने पैरों पर डाल लिया ।

कुछ कुशल शिकारी अपने को पूर्ण सुरक्षित करके ही शिकार करते हैं । जब तक अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त नहीं होते तब तक निष्क्रिय ,निर्लिप्त एवम निष्काम भाव से बैठे रहते हैं । धीरे-धीरे अंधकार होने लगा । अपनत्व एवं नजदीकियां मानसिक से वाचिक और कड़ाके की ठंड के कारण शारीरिक । रास्ता कोहरे के कारण दिखाई नहीं दे रहा था । सुरभि का रूप सौंदर्य कुछ ऐसा था कि पहली बार में देखने वाला मोहित हो जाए । धीरे-धीरे बस सरकने लगी । तब तक कंडक्टर टिकट- टिकट बोल पड़ा । मैंने कंडक्टर को पैसा दे दिया । उसने मात्र एक ही टिकट का पैसा काट कर शेष पैसा वापस कर दिया कर दिया । धीरे-धीरे ठंड का भी एहसास बढ़ने लगा । मैंने अपने आजू-बाजू को भी कंबल से ढक लिया था। गरम टोपी टोपी निकाल कर सुनिधि को दे दिया । उसका सौंदर्य बढ़ गया था । दो सीट वाली बस में जगह ही कितनी होती है । उसने आराम से बैठने के लिए आश्वस्त कर दिया । कपड़ो ने शरीर का आकार बढ़ा दिया था । दोनों को मजबूर होकर बैठना ही पड़ा । रास्ता साफ नहीं दिख रहा था । पहाड़ी इलाका ,ऊंचे ऊंचे पहाड़ों पर खड़े भीमकाय चीड़ देवदार के वृक्ष और दूसरी और अनंत घटाटोप अंधकार में श्मशान सी नीरवता लिए हुए घाटियां ।

ठंड के कारण झोपड़ियों की रोशनी भी बुझी बुझी सी लग रही थी । घुप्प अंधकार मन को आतंकित कर रहा था । मेरे लिए सुनिधि ही इस यात्रा का आकर्षण था । सामने की सीट पर दो वयस्क पहाड़ी स्त्रियां । कान को मैले कुचैले स्कार्फ से ढके हुए रह रह कर पीछे मुड़े बिना हमारी बातें सुनने की असफल कोशिश कर रही थी । समर्पण व अभिसार की प्रतिमूर्ति सुनिधि मेरा साथ दे रही थी । जैसे

बस आज कुछ ज्यादा ही तेज चल रही थी ,शायद आज जाम भी नहीं लगेगा।

सुनिधि का अपॉइंटमेंट हुए अभी एक माह भी नहीं बीता था । वह पूरे ऑफिस में अपनी सुंदरता के कारण चर्चा का विषय बन गई थी । सद्यस्नात , अक्षत सौंदर्य ,अनाघ्रात पुष्प की भांति सभी सहकर्मियों को वह अपनी ओर आकर्षित कर रही थी । जिसको देखो वही उसी के सान्निध्य के लिए छटपटा रहा था । इस समय ऑफिस में चर्चा की विषय वस्तु सुनिधि ही थी । मुझे लगता है कि उसे सर्वाधिक मेरा ही सान्निध्य पसंद है । जिसके कारण वह मुझमें कुछ ज्यादा ही रुचि दिखाई दे रही थी । ठंडी हवा के झोंकों के साथ ही उसका सामीप्य भी बढ़ता जा रहा था । खिड़कियों के शीशे के बंद होने के बाद भी शीशों के बीच से आ रही सर्द हवा रह-रह कर हांड़ कंपा रही थी ।

हर झोंके के सिहरन के साथ सुनिधि और भी पास आ जा रही थी ।। बाहर घना अंधकार छा गया था ।हम दोनों लोग आश्वस्त होकर बैठे थे । तब तक सुनिधि का फोन अचानक कांप उठा । पर्स से फोन निकालकर उसने बस 20 मिनट में कहकर फोन काट दिया ।

किसका फोन था ?

इनका।

मैंने पूछा देर हो रही है ?

परेशान हो रहे हैं । सुनिधि में संक्षेप में उत्तर देकर अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया ।

बस धीरे-धीरे रेंगते हुए चल रही थी । लगभग आधे घंटे तक सुनिधि ने अपने दांपत्य जीवन के बारे में बहुत कुछ बता डाला । मुझे इस बात में कोई बहुत दिलचस्पी नहीं रही । वह बार-बार केवल और केवल मेरे प्रति सद्भाव व्यक्त कर रही थी । मैं भी आह्लादित हो रहा था । कुछ देर बाद बस अल्मोड़ा पहुंच गई । रात के लगभग 7:40 हो रहे थे । सभी यात्री सराय से दूर जल्दी-जल्दी अपने घर जाने के लिए उत्सुक थे ।

मैं बस अड्डे के बाहर ही उतर गया और किसी अंधेरे की खोज में लघुशंका से निपटने के लिए बढ़ गया । मध्यम मध्यम प्रकाश में बस के नीचे के यात्री दिखाई दे रहे थे । वह इधर उधर देखने लगी । शायद वह किसी को खोज रही थी । शायद वह रिक्शा या ऑटो खोज रही थी । दस कदम चली ही होगी कि उसके बगल बीस बाइस वर्ष का एक लड़का चलता हुआ दिखाई पड़ा । मैं गुमटी की ओट में खड़ा हो गया । सुनिधि के पास ही वह लड़का भी आकर खड़ा हो गया। मैंने अपनी सांसे थाम ली । बमुश्किल चार कदम पर मैं गुमटी के पीछे था और वह दोनों गुमटी के बगल में । मैं अंधकार में वह प्रकाश में । मैं जड़वत उन दोनों की बात सुनने लगा ।

सुनिधि तुमने तो बड़ी देर लगा दी ।

यार बस खराब हो गई थी ।

मेरा फोन क्यों नहीं रिसीव कर रही थी।

अरे यार क्या करती हो मेरे पीछे वाली सीट पर ही मेरे एक विभागीय अधिकारी आकर बैठ गए थे । वह तो गनीमत थी कि मेरे बगल में एक महिला बैठी थी नहीं तो चिपकू मेरे ही पास बैठे होते ।

तो क्या होता ?

यार बेकार की बातें छोड़ो मुझे ऐसे लोगों का साथ पसंद नहीं है ।

इतना कहकर वह उसके सीने से लिपट गई । उसने जोर से सुनिधि को अपनी बांहों में भींच लिया । मैं किसी चलचित्र के दर्शक की भांति सांसे थामें हुए उन दोनों को अपलक देखता रहा । वह अज्ञात बड़ी देर से सुनिधि के शरीर के साथ खेलता रहा । सुनिधि भी बिना प्रतिवाद किए आनंदित हो रही थी । दोनों की गर्म गर्म सांसे मेरे कानों में पिघले शीशे की तरह उतर रही थी । सुनसान बढ़ता जा रहा था । सीमा उल्लंघन के भय से सुनिधि ने जल्दी से चलने का उपक्रम किया । इतना कहकर उसने उस अज्ञात के चेहरे पर दो चार चुंबन जड़ दिए। दोनों के चेहरे खिल उठे । दोनों परिंदे अलग-अलग दिशा में उड़ चले ।

मैं अवाक पूरी घटना का चश्मदीद । दस मिनट हुए होंगे ,अचानक मेरा फोन घनघना उठा ।

घर पहुंच गए ? मैंने हां में उत्तर दिया ।

और आप?

मैं तो कब की पहुंच गई। अच्छा ठीक है ।पिताजी कमरे में हैं। फिर बात करेंगे ,कहकर फोन काट दिया।

मैंने इधर से प्रयास किया तो वह व्यस्त थी । किसी दूसरे से बात करने में मशगूल थी ।

वह स्टेशन पर मुझसे मात्र बीस कदम की दूरी पर चल रही थी । मैं और उसके नजदीक बढ़ने लगा । वह किसी को अपनी लोकेशन दे रही थी । तब तक एक मोटरसाइकिल सवार उसके पास आकर रुका । लगभग साढ़े आठ हो गए थे । मोटर साइकिल के प्रकाश में वह अपने बैग में मोबाइल रखते हुए दिखाई पड़ी । वह जल्दी से उछलकर मोटरसाइकिल पर बैठ गई और किसी चिड़िया की बात अनंत आकाश मैं उड़ चली । मोबाइल स्विच ऑफ हो गया था। मैं उसको अपने आगे आगे मोटर साइकिल पर जाते हए देख रहा था। घर पहुंचकर उसने फिर फोन किया ।

मेरी थकान मेरे शब्दों पर उतर आई थी । जबकि उसकी खनकती आवाज और भी खनकदार हो गई । ना मालूम क्यों मैं बुझा जा रहा था । मेरा मन उससे बात करने को नहीं कह रहा था । मैं ऐसे सरल व्यक्तित्व की जटिलता में पूरी रात उलझा रहा ।

देर रात तक नींद ना आने के कारण सुबह जब सुनिधि का फोन आया तो सुबह के 8:30 बज रहे थे । मैंने स्पष्ट शब्दों में बाहर जाने से इंकार कर दिया । बहाना था शारीरिक अस्वस्थता का लेकिन थी मानसिक अस्वस्थता। धन्य हो मोबाइल ! मोबॉईल तुम्हारी जय हो !तुमने तो रिश्तों को भी मोबाइल कर दिया।

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रचनाकार: मोबाइल जिंदगी // डॉ अश्विनी शुक्ल
मोबाइल जिंदगी // डॉ अश्विनी शुक्ल
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